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भारतीय मृदा के प्रकार

 




Types of indian soils


भारतीय मृदा के प्रकार

1. जलोढ मृदा :-

- इस मृदा का निर्माण जल द्वारा लाए गए अवसादों से
होता है।
- इसे निक्षेपण मृदा भी कहते है।
- यह अक्षेत्रीय मृदा है। इस मृदा के कण बारीक
होते हैं। अत: इसकी जल संग्रहण क्षमता अधिक होती है।
- इस मृदा से मृदा परिच्छेदिका का निर्माण नही हो पाता।

- इस मृदा के दो प्रकार है -
A. खादर -  नयी जलोढ मृदा
B. बागर - पुरानी जलोढ मृदा
- इस मृदा में नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा ह्यूमस की मात्रा सीमित होती है।
- इस मृदा में पोटाश की उचित मात्रा पाई जाती है।
- यह मृदा मुख्यतः उत्तरी मैदानी प्रदेश तथा तटवर्ती
मैदानी प्रदेश में पाई जाती है
- यह भारत का सबसे बड़ा मृदा समूह है।

2. काली मृदा -

- इस मृदा का निर्माण लावा के अपक्षय से होता है।
- यह मृदा कपास की खेती के लिए उपयोगी है। अत: इसे
कपासी मृदा एवं रेगुर भी कहते है।
- यह मृण्मय मृदा है।
- यह मृदा जलग्रहण करने तथा छोड़ने में समय लेती है।
- जलग्रहण करने के बाद यह लम्बे समय तक जल
धारण करके रखती है।
- यह मृदा वर्षा आधारित फसलों को शुष्क ऋतु के दौरान
नमी उपलब्ध करवाती है।
- जलग्रहण करने पर यह मृदा फूलकर चिपचिपी हो जाती
है तथा सूखने पर यह मृदा सिकुड़ जाती है। अतः शुष्क
ऋतु के दौरान इस मृदा में दरारों का निर्माण होता।
इसलिए इस मृदा को स्वत: जुताई वाली मृदा कहते है।
- इस मृदा में नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा ह्यूमस की मात्रा सीमित पाई जाती है।
- पोटाश की मात्रा उचित पाई जाती है
- इस मृदा मे अन्य तत्व भी पाए जाते है।
जैसे - Magnesium , Alumina , Lime, Iron.
- यह मृदा मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर-पश्चिमी
भाग में पाई जाती है।
- इस मृदा का काला रंग टाइटेनिफेरस मैग्नेटाइट के
कारण होता है।

3. लाल-पीली मृदा -

- इस मृदा का निर्माण आग्नेय तथा कायान्तरित चट्टानों
से होता हैं। (क्रिस्टलीकृत चट्टानों)
- इसमें लौह तत्व की मात्रा अधिक पाई जाती है जिसके
कारण इसका रंग लाल नजर आता है। जल ग्रहण करने पर
यह मृदा पीले रंग की नजर आती है।
इस मृदा में नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा ह्यूमस की मात्रा सीमित पाई जाती है।
इस मृदा में पोटाश की मात्रा सीमित पाई जाती है।
- यह मृदा मुख्य रूप से उत्तर-पूर्वी राज्यों तथा प्रायद्वीपीय
भारत के उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिणी भाग में पाई जाती है।
- मोटे कण वाली लाल - पीली मृदा अधिक उपजाऊ नहीं
होती तथा बारीक कण वाली लाल-पीली मृदा उपजाऊ होती है।

4. लैटेराइट मृदा :-

- यह मृदा अधिक तापमान तथा अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में
पाई जाती है।
- इस मृदा का निर्माण निक्षालन की प्रक्रिया द्वारा होता है।
- इस प्रक्रिया के दौरान जल में घुलनशील तत्व (सिलिका, चूना) मृदा की निचली परतों में चले जाते है जिसके कारण ऊपरी परत में लौह एवं एल्युमीनियम के ऑक्साइड की मात्रा अधिक पाई जाती है।
- इस मृदा में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, ह्यूमस की मात्रा सीमित पाई जाती है
- ऑक्साइड की मात्रा अधिक होने के कारण सूखने पर
यह मृदा कठोर हो जाती है। अत: इस मृदा का उपयोग
ईंटों के निर्माण के लिए किया जाता है।
- इस मृदा का नाम लेटिन भाषा के शब्द Later से
बना है जिसका अर्थ होता है - ईट
- यह मृदा मुख्य रूप से मेघालय पठारी क्षेत्र तथा पश्चिमी
घाट के ढाल वाले क्षेत्रों में पाई जाती है।
- इस मृदा का उपयोग रोपण कृषि (चाय , कॉफी) के
लिए किया जाता है।

5. शुष्क मृदा -

- यह मृदा उच्च तापमान तथा कम वर्षा वाले शुष्क
तपा अर्शुधष्क क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
- यह बालू प्रकृति की मृदा होती हैं (बलुआ मृदा)
अतः इस मृदा की जलग्रहण क्षमता कम होती हैं।
- इस मृदा मे नाइट्रोजन, पोटाश, हयूमस सीमित मात्रा में
तथा फास्फोरस की मात्रा अधिक पाई जाती है।
- निचली परतों में चूने की मात्रा बढने के कारण कंकर
की एक परत पाई जाती है जिसके कारण निचली
परतों में जल का रिसाव सीमित होता है।
नियमित सिंचाई सुविधा उपलब्ध करवाने पर इस मृदा
का उपयोग कृषि के लिए किया जा सकता है।
- यह मृदा मुख्य रूप से पश्चिमी राजस्थान, पंजाब
हरियाणा तथा गुजरात के कुछ भागों मे पाई जाती है।

6. लवणीय तथा क्षारीय मृदा :-

- यह मृदा उन शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ सिंचाई
सुविधा एवं रासायनिक उर्वरकों का उपयोग अधिक किया
जाता है।
- इस मृदा को रेह, कल्लर तथा ऊसर भी कहते हैं।
-इस मृदा में केशिकत्व क्रिया के कारण ऊपरी परत में
लवणों की सान्द्रता अधिक पाई जाती है तथा एक
सफेद परत का निर्माण होता है।
- इस मृदा में सोडियम, पोटाश की मात्रा अधिक तथा नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा ह्यूमस की मात्रा सीमित पाई जाती है।
- इस प्रकार की मृदा उन तटवर्ती क्षेत्रों में भी पाई जाती
है जहां ज्वारीय गतिविधियां अधिक होती है।
जैसे- कच्छ का रन ।
- यह मृदा मुख्य रूप से हरित क्रांति से प्रभावित क्षेत्रों में,
पाई जाती है।
जैसे - पंजाब, हरियाणा , उत्तर प्रदेश
- जिप्सम तथा रॉक फॉस्फेट के उपयोग द्वारा इस मृदा
की लवणीयता एव क्षारीयता को कम किया जा सकता है।

7. पीटमय मृदा :-

- यह मृदा जलमग्न स्थिति में पाई जाती है।
- इसे दलदली मृदा भी कहते है।
- जलमग्न स्थिति में होने के कारण इस मृदा में वायुमण्डल.
से ऑक्सीजन का आदान-प्रदान नहीं हो पाता।
- इस मृदा में वनस्पति का विकास अधिक होता है।
इसलिए यहां जैव पदार्थों की मात्रा एवं ह्यूमस
पाया जाता है।
- इस मृदा मे नाइट्रोजन, फास्फोरस की मात्रा सीमित एवं पोटाश की मात्रा उचित पाई जाती है।
- यह मृदा मुख्य रूप से तराई क्षेत्र, डेल्टा क्षेत्र, तटवर्ती
क्षेत्र एवं आर्द्रभूमि क्षेत्र में पाई जाती है।
- इस मृदा का उपयोग चावल की खेती के लिए किया जाता है
उदा. - उत्तराखण्ड का दक्षिणी भाग, बिहार का उत्तरी भाग व तटवर्ती क्षेत्र।

8. पर्वतीय एवं वन मृदा :-

- पर्वतीय क्षेत्रों मे ऊँचाई बढने के साथ जलवायु
परिस्थितियां बदलती है, जिसके कारण विभिन्न प्रकार
की मृदा पाई जाती है।
- पर्वतों के हिमाच्छादित क्षेत्रों में मृदा में Humic Acid
की मात्रा पाई जाती है । (पांड जोड मृदा)
- पर्वतों के वनाच्छादित क्षेत्रों में मृदा में Humus
पाया जाता है। [लेटोसॉल]
- पर्वतों के ढाल वाले क्षेत्रों में मृदा की परत पतली पाई
जाती है। अत: पर्वतों के ढाल पर रोपण कृषि की जाती है।
- घाटी क्षेत्रों में उपजाऊ मोटे परत वाली मृदा पाई जाती है।
- पर्वतीय एव वन मृदा में नाइट्रोजन, फास्फोरस की मात्रा सीमित तथा पोटाश की मात्रा उचित पाई जाती है।
यह मृदा मुख्य रूप से उत्तरी तथा दक्षिणी भारत के
पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है।
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