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राजस्थान के अभिलेख - 2

 
Inscription of Rajasthan - 2



राजस्थान के अभिलेख - 2

Inscription of Rajasthan.
भाब्रू अभिलेख। कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति। बडवा स्तंभ लेख। भ्रमर माता लेख। विजयगढ़ यूप स्तंभ लेख।
सामोली अभिलेख। श्रृंगि ऋषि शिलालेख।

बीजक डूंगरी पर सर्वप्रथम अशोक के शिलालेख की खोज किसने और कब की ?
1. रतन चंद्र अग्रवाल 1954 ईस्वी
2. अमलानंद घोष 1951ईस्वी
3. बी बी लाल 1961ईस्वी
4. कैप्टन बर्ट 1837 ईस्वी
उत्तर - कैप्टन बर्ट 1837 ईस्वी

भाब्रू अभिलेख/ बैराठ कलकत्ता अभिलेख
यह अभिलेख विराट नगर (बैराठ) की बीजक डूंगरी से प्राप्त हुआ था, जिसे कैप्टन बर्ट द्वारा भाब्रू शिविर में रखे जाने के कारण भाब्रू अभिलेख भी कहा जाता है।
• 1840 ई में कैप्टन बर्ट द्वारा इसे कलकत्ता के संग्रहालय (एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल) में भेज दिया गया। अतः इसे बैराठ कलकत्ता अभिलेख भी कहा जाता है।
• यह मौर्य सम्राट अशोक का लघु शिलालेख है, जिसे वृत्ताकार बौद्ध मंदिर के प्रवेश द्वार पर जन सामान्य तथा बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों तथा श्रावक-श्राविकाओं के पढ़ने हेतु लगाया गया।
• इस अभिलेख में अशोक को मगध का राजा कहा गया है तथा उसे प्रियदर्शी नाम से सम्बोधित किया गया है।
इस अभिलेख में अशोक बुद्ध, संघ तथा धम्म में श्रद्धा प्रकट करता है।
इस अभिलेख से 7 बौद्ध ग्रन्थों की भी जानकारी मिलती है।
कैप्टन किटोई ने इसका अनुवाद किया था।

बैराठ अभिलेख
• 1871-72 ई में कार्लाइल को बैराठ में भीमसेन की डूंगरी से अशोक का एक अन्य लघु शिलालेख प्राप्त हुआ जिसकी भाषा सासाराम और रूपनाथ अभिलेखों के समान है।
• इस अभिलेख में अशोक यह जानकारी देता है, कि उसने उपासक बनने के 2.5 वर्ष बाद तथा संघ में आने के 1 वर्ष बाद धम्म का प्रचार-प्रसार प्रारम्भ किया है।
• इस लेख का संपादन (Editing) बुहलर और सेनार्ट ने किया था।

नोट:- ह्वेनसांग ने बैराठ की यात्रा की थी। उसने यहां 8 बौद्ध मंदिरों का उल्लेख किया है, जिन्हें हूण शासक मिहिरकुल ने तुडवा दिया।
ह्वेनसांग ने बैराठ को पी-लो-ये-तो-लो (परियात्रा) कहा है।
ह्वेनसांग की पुस्तक का नाम - सी-यू-की
 

वह कौनसा अभिलेख है, जो महाराणा कुंभा के लेखन पर प्रकाश डालता है ?
1. कुंभलगढ़ प्रशस्ति 1460 ईस्वी
2. कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति 1460 ईस्वी
3. जगन्नाथ राय प्रशस्ति 1652 ईस्वी
4. राज प्रशस्ति 1676 ईस्वी
उत्तर - कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति

कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति
(3 दिसंबर 1460 ईस्वी / मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी विक्रमी संवत 1517)

प्रशस्तिकारः- अत्रि भट्ट व महेश भट्ट
• यह प्रशस्ति अनुमानतः 8 शिलाओं पर लिखी गयी थी परंतु वर्तमान में हमे केवल 2 शिलाएँ ही प्राप्त होती है।
• इस प्रशस्ति से बापा से लेकर कुंभा तक मेवाड़ के गुहिलवंशीय शासकों की उपलब्धियां प्राप्त होती है।

• इस प्रशस्ति से कुंभा के विजय अभियानों की जानकारी मिलती है। जैसे:- मंडोर, सपादलक्ष, नराणा, वसंतपुर, आबू, खंडेला, जांगलदेश, नागौर, गुजरात, मालवा आदि।
इस प्रशस्ति में मालवा तथा गुजरात की संयुक्त सेनाओ को पराजित करने का वर्णन मिलता है।

• इस प्रशस्ति में कुंभा द्वारा रचित ग्रन्थों की जानकारी मिलती है‌। जैसे:- संगीतराज, चंडी-शतक तथा गीतगोविंद की टीका, सुधा-प्रबंध तथा 4 नाटक।

कुंभा के विरूदों (उपाधियों) की जानकारी प्राप्त होती है। जैसे:-राजगुरु, दानगुरु, शैलगुरु, अभिनव-भरताचार्य...
इस प्रशस्ति से कीर्तिस्तम्भ, कुंभलगढ़, अचलगढ़ आदि में किए गए निर्माण कार्यों की तिथि मिलती है।

बड़वा स्तंभ लेख - 238 ई. (बारां)
• यहां से चार यूप (यज्ञ) स्तंभ प्राप्त हुए हैं, जिनमें से 3 पर लेख उत्कीर्ण किए गए हैं।
• ये लेख मौखरी वंश की जानकारी देते हैं
• यहां पर महासेनापति बल के चार पुत्रों (बलवर्धन, सोमदेव, बलसिंह) ने त्रिरात्र यज्ञ संपन्न करवाया था।

प्रश्न.बड़वा से कितने यूप स्तंभ लेख प्राप्त हुए हैं ? - 3
नोट:- महासेनापति बल शक क्षत्रप विजयदामन के सामंत रहे होंगे।

विजयगढ़ यूप स्तंभ लेख - 371-72 ई. (बयाना)
विष्णुवर्धन नामक गुप्त सामंत ने पुण्डरीक यज्ञ का आयोजन करवाया तथा यहां पर भीमलाट नामक यूप स्तंभ लगवाया।
• विष्णुवर्धन वरीक वंश का था।

नोट:- • संभव है विष्णुवर्धन समुद्रगुप्त का सामंत रहा होगा।
समुद्रगुप्त ने प्रयाग प्रशस्ति में लिखा है कि उसने बयाना के  यौद्धेयों को हराया। 
अतः भीमलाट को समुद्रगुप्त का विजय स्तंभ माना जाता है।
प्रश्न.राजस्थान का पहला विजय स्तंभ किसने लगवाया था ? - समुद्रगुप्त 

गुप्तों के सर्वाधिक सिक्के (1821 सिक्के) नगलाछैल (बयाना, भरतपुर) नामक स्थान से मिले है। 

करौली के जादौन वंश के संस्थापक विजयपाल ने बयाना को अपनी राजधानी बनाया था। जिसकी जानकारी नल्ल की पुस्तक विजयपाल रासौ से मिलती है।

• बयाना के अन्य नाम:- बाणासुर, भदानक, श्रीप्रस्थ, श्रीपंथ, संतपुर सुल्तानकोट

• बयाना में प्रतिहार राजा लक्ष्मण सेन की पत्नी चित्रलेखा ने 10वीं शताब्दी में उषा मंदिर बनवाया था।
जिसे मुस्लिम शासन में उषा मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया।
कालांतर में जाट वंश के शासन के दौरान पुनः उषा मंदिर कर दिया गया।

• बयाना में अन्य इमारतें:-
अकबर की छतरी - 12 खंभे
अकबर कालीन सादुल्लाह सराय
जहांगीरी दरवाजा
इब्राहिम लोदी के काल की लोदी मीनार
दाउदखां की मीनार

• बयाना का युद्ध - 16 फरवरी 1527
राणा सांगा ने बाबर को हरा दिया था।

• बयाना नील की खेती के लिए प्रसिद्ध रहा है।
फ्रांसिस्को पैलसायर्ट (Francisco Pelsaert) ने बयाना में नील की खेती का वर्णन किया है।
 
भ्रमर माता का लेख - 490 ई. (छोटी सादडी, प्रतापगढ़)
गौर वंश के शासकों (पुण्यशोभ, राज्यवर्धन यशोगुप्त) ने छोटी सादडी में इस मंदिर का निर्माण करवाया था।
औलिकार वंश के आदित्यवर्धन की भी जानकारी मिलती है।
• इस अभिलेख से शक्ति पूजा, ब्राह्मणों को दान और सामंत प्रथा की जानकारी मिलती है।

नोट:- संभव है गौर वंश का शासन मेवाड़ के आसपास रहा हो, क्योंकि सांगा के पिता रायमल ने भी एक अभिलेख में गौर वंश का उल्लेख किया है।

सामोली अभिलेख - 646 ई.(उदयपुर)
यह गुहिल राजा शिलादत्य (गुहिल वंश का 5वां राजा) के समय का अभिलेख है, जो  संस्कृत भाषा में लिखा गया है।
इसके अनुसार वटनगर (सिरोही) से आये हुए महाजन समुदाय के मुखिया जेंतक ने अरण्यवासिनी देवी (जावर माता) का मंदिर बनवाया था।
यह मंदिर गायकों तथा धनी पुरुषों से भरा रहता था।
जेंतक ने देवबुक नामक स्थान पर अग्नि में प्रवेश कर लिया था।
यह अभिलेख जावर में तांबे व जस्ते के खनन उद्योग की जानकारी देता है।
यह अभिलेख गुहिल वंश का समय निर्धारण करने में सहायक है।

श्रृंगि ऋषि शिलालेख - 1428 ई.
उदयपुर में एकलिंग जी के समीप यह अभिलेख प्राप्त हुआ है, जो संस्कृत भाषा में लिखा गया है।
यह अभिलेख मेवाड़ महाराणा मोकल के समय का है।
इस अभिलेख के अनुसार मोकल ने अपनी बाघेला रानी गौराम्बिका की मुक्ति (आत्माा की मुक्ति) के लिए यहां पर कुण्ड का निर्माण करवाया।
इस अभिलेख से हम्मीर से लेकर मोकल तक मेवाड़ के शासकों की जानकारी मिलती है।
इसके अनुसार हम्मीर ने जीलवाड़ा, ईडर, पालनपुर को जीता तथा भीलों को हराया। (भील गुफा में रहते थे)
क्षेत्र सिंह ने मालवा के प्रांतपति अमीशाह को हराया।
**लक्षसिंह ने काशी, प्रयाग तथा गया को कर मुक्त करवाया। गया में शिव मंदिरों का निर्माण भी कराया।
मोकल ने नागौर के फिरोज खान तुथा गुजरात के अहमद शाह को हराया तथा उसने एकलिंग मंदिर की प्राचीर तथा यहां तीन द्वारों का निर्माण करवाया।
मोकल ने 25 तुलादान किये थे जिनमें से एक पुष्कर के वराह मंदिर में किया गया था।
मोकल ने इस कुण्ड के निर्माण की आज्ञा गुरु त्रिलोचन से प्राप्त की थी तथा अपनी अन्य रानी मायापुरी के साथ प्रतिष्ठा समारोह में भाग लिया था।
रचियता - कविराज वाणीविलास योगीश्वर
उत्कीर्णक - फना

नोट:- श्रृंगि ऋषि, विभांडक ऋषि और उर्वशी अप्सरा की संतान थे। श्रृंगि ऋषि ने राजा दशरथ के लिए पुत्र प्राप्ति यज्ञ करवाया था।
इस अभिलेख की जानकारी सर्वप्रथम गौरीशंकर ओझा देते है। जबकि संपादन (Editing) अक्षय कीर्ति व्यास ने किया।
है।


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