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गुर्जर प्रतिहार राजवंश

 
Gurjar Pratihar Dynasty


गुर्जर प्रतिहार राजवंश

Gurjar Pratihar Dynasty.

• इनका सर्वप्रथम उल्लेख चालुक्य के राजा पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में मिलता है।
जैक्सन तथा भंडारकर ने इनकी उत्पत्ति एक विदेशी जाति 'खजर' से मानी है।
जेम्स टॉड तथा विलियम क्रुक ने इन्हें शक अथवा सीथीयन कहा है।
कनिंघम में इन्हें कुषाण (यू ची) कहा।

प्रतिहारों का शासन गुर्जरात्रा क्षेत्र में था। इसलिए इन्हें गुर्जर प्रतिहार कहा गया। इन्होंने सैकड़ों वर्षो तक भारत पर होने वाले मुस्लिम आक्रमणों को विफल किया था।

गुर्जरात्रा - राजस्थान, गुजरात का सीमावर्ती क्षेत्र।
प्रतिहार का अर्थ - द्वारपाल
प्रतिहार प्रारंभ में सामंत/द्वारपाल थे।
 
• राष्ट्रकूट अभिलेखों (नीलकुंड, राधनपुर, देवली, करहाड़) तथा अरब यात्रियों ने इन्हें गुर्जर कहकर पुकारा है।
• प्रतिहार अभिलेखों में इन्होंने स्वयं को लक्ष्मण के वंशज तथा इक्ष्वाकु कुल के रघुवंशी क्षत्रिय बताया है।

• गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार प्रतिहार सूर्यवंशी क्षत्रिय थे तथा इसके लिए उन्होंने भोज प्रथम की गवालियर प्रशस्ति, विग्रहराज द्वितीय (चौहान) की हर्षनाथ प्रशस्ति तथा कविराज शेखर की पुस्तकों (विद्धशालभंजिका, बालभारत) का उल्लेख किया है।
• पृथ्वीराज रासो में इन्हें अग्निवंशी बताया गया है।
• बाउक प्रशस्ति तथा घटियाला शिलालेखों में इन्हें हरिश्चंद्र नामक ब्राह्मण की संतान बताया गया है।


मंडौर के प्रतिहार

1. हरिश्चंद्र 
उपाधि - रोहलिद्धि (योग क्रिया में निपुण)
इसे विप्र हरिश्चंद्र कहा गया है।
यह वेद शास्त्रों का ज्ञाता था।
इसकी ब्राह्मण रानी से ब्राह्मण प्रतिहार तथा क्षत्रिय रानी से क्षत्रिय प्रतिहार (भोगभट्ट, कक्क, रज्जिल, दद्द) पैदा हुए।
इन चारों ने अपने बाहुबल से मंडौर का किला जीतकर वहां पर परकोटे के निर्माण करवाया।
प्रतिहारो की प्रथम राजधानी - मंडौर।

2. रज्जिल:- मंडौर के प्रतिहारों की वंशावली यहीं से प्रारंभ होती है।
3. नरभट्ट:- इसकी वीरता के कारण इसको पेल्लापेल्ली कहा जाता है।

4. नागभट्ट:- इसको नाहड भी कहते है। इसने मेड़ता को अपनी राजधानी बनाया था।
इसके पुत्र तात ने संन्यास धारण कर मंडौर के पवित्र आश्रम में जीवन बिताया तथा अपने छोटे भाई भोज को राज्य सौंप दिया।
5. भोज:-
6. यशोवर्धन:-
7. चन्दुक:-
8. शीलूक:- इसने त्रवणी (फलौदी) तथा वल्ल (जैसलमेर) को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। वल्ल मंडल के राजा देवराज भाटी से उसका छत्र छीन लिया।

9. झोट:- इसने गंगा नदी में जल समाधि ली।
10. भिल्लादित्य:- अपने पुत्र को राज्य सौंप कर हरिद्वार चला गया तथा अंत में अनशन व्रत से शरीर त्याग दिया।

11. कक्क:- यह रघुवंशी प्रतिहार राजा वत्सराज का सामंत था तथा उसकी तरफ से मुंगेर के युद्ध में धर्मपाल के खिलाफ लड़ा था।
यह व्याकरण, ज्योतिष, तर्क का ज्ञाता तथा काव्य में निपुण था।
इसकी भाटी रानी पद्मनी से बाउक तथा दुर्लभदेवी से कक्कुक का जन्म हुआ।

12.बाउक:- इसने भूअकूप के युद्ध में मयूर नामक राजा को हराया तथा मंडौर में प्रशस्ति लगवायी। (837 ई.)

13. कक्कुक:- घटियाला शिलालेखों के अनुसार इसने अपने सच्चरित्र से मरू, माड़, तमणी, अज, गुर्जरात्रा के लोगों का अनुराग प्राप्त किया।
• वडणालय मंडल में भीलों के पालों (गांवों) को जलाकर उनका उपद्रव शांत किया।
• रोहिन्सकूप के निकट गांव में बाजार बनवाकर महाजनों को बसाया।
रोहिन्सकूप तथा मंडौर में जयस्तंभ स्थापित करवाये।
राजस्थान का दूसरा विजयस्तम्भ - मंडौर।
• यह संस्कृत में काव्य रचना करता था।

चेराई अभिलेख (936 ई.)
इसमें प्रतिहार दुर्लभराज के पुत्र जसकरण की जानकारी है।

सहजपाल का अभिलेख (1139 ई.)
नाडौल के चौहान रायपाल ने प्रतिहारों से मंडौर छीन लिया था। इसके पुत्र सहजपाल का अभिलेख मंडौर से प्राप्त होता है।

कालांतर में ईन्दा प्रतिहारों ने अपने राजा हमीर प्रतिहार से परेशान होकर मारवाड़ के राव चूंडा राठौड़ को मंडौर  दहेज में दे दिया था।

रोचक जानकारी:- हमीर प्रतिहार का भाई दीपसिंह ग्वालियर चला गया। उसके वंशजों को सौंधिया परिहार कहा गया।
•  हमीर प्रतिहार का भाई गूजरमल खैराड़ चला गया और मीणा जनजाति की महिला से शादी की। इसके वंशजों को परिहार मीणा कहा गया।
 

भीनमाल/ जालौर/ अवन्ति/ कन्नौज के प्रतिहार
1. नागभट्ट प्रथम (730-756 ई.)
अन्य नाम - नागावलोक
हांसोट (भडौच की राजधानी) दान पत्र के अनुसार - चौहान भर्तृवृद्ध द्वितीय इसका सामंत था।
ग्वालियर प्रशस्ति में इसे मलेच्छों का नाशक कहा गया है तथा नारायण की उपाधि दी गई है।
अमोघवर्ष के संजन ताम्रपत्र के अनुसार राष्ट्रकूट दंतिदुर्ग के हिरण्यगर्भ यज्ञ में अवन्ति नरेश (नागभट्ट प्रथम) ने प्रतिहार का कार्य किया था।

प्रश्न.अमोघवर्ष के संजन ताम्रपत्र के अनुसार राष्ट्रकूट दंतिदुर्ग ने किसे अपना प्रतिहार नियुक्त किया था ? - नागभट्ट प्रथम।

2. ककुस्थ:-
817 ई. के बालादित्य गुहिल के चाटसू (चाकसू) अभिलेख में सुमन्त्रभट्ट की तुलना रघुवंशी ककुस्थ से की गई है।

3. देवराज:-
इसे देवशक्ति भी कहा जाता है तथा यह परम वैष्णव था।

4. वत्सराज (783-795 ई.)
यह प्रतिहार वंश का वास्तविक संस्थापक था।
इसके समय त्रिपक्षीय संघर्ष प्रारंभ हुआ था।
इसने मुंगेर के युद्ध में पाल शासक धर्मपाल को हराया, इस युद्ध में मंडौर का कक्क प्रतिहार (बाउक प्रशस्ति) तथा सांभर का दुर्लभराज चौहान (पृथ्वीराज विजय) इसके साथ थे।
राष्ट्रकूट ध्रुव ने इसे हराकर मरुस्थल में शरण लेने को मजबूर कर दिया था। संभवतः इस समय इसने जालौर को अपनी राजधानी बनाया था।

त्रिपक्षीय संघर्ष:-
हर्षवर्धन की मृत्यु पश्चात राजधानी कन्नौज पर कब्जा करने के लिए उसके सामंतों के बीच संघर्ष छिड़ गया।
यह संघर्ष गुर्जर प्रतिहार (भीनमाल), पाल (बंगाल, बिहार) और राष्ट्रकूट (कर्नाटक, महाराष्ट्र) के बीच हुआ।
 
• 778 ई. में उद्योतन सूरी ने जालौर में कुवलयमाला नामक पुस्तक लिखी जिसमें इसे राणहस्तिन कहा गया है।

• 783 ई. में जिनसेन ने हरिवंश पुराण नामक पुस्तक लिखी, जिसमें इसे अवन्ति का राजा बताया गया है।

• ग्वालियर प्रशस्ति के अनुसार इसने भंडी वंश का राज्य छीनकर इक्ष्वाकु कुल को उन्नत किया।
• ओसियां के महावीर मंदिर के लेख में इसे रिपुदमन कहा गया है। इसने ओसियां में सूर्य व जैन मंदिरों का निर्माण करवाया।
पश्चिमी भारत का सबसे प्राचीन जैन मंदिर - ओसियां का महावीर मंदिर।

5. नागभट्ट द्वितीय (795-833 ई.)
इसे दूसरा नागावलोक कहा जाता है।
राष्ट्रकूट गोविंद तृतीय ने इसे पराजित किया।
इसने चक्रायुद्ध को हराकर कन्नौज का साम्राज्य छीन लिया तथा कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया।
• हर्षनाथ प्रशस्ति के अनुसार इसके दरबार में चौहान गुवक प्रथम को वीर की उपाधि दी गई थी।

• गौरीशंकर ओझा के अनुसार पुष्कर पर घाटों का निर्माण करवाने वाला लोक प्रसिद्ध नाहड़राव प्रतिहार नागभट्ट द्वितीय ही था।
• कई जैन विद्वानों ने इसके स्थान पर "आम" नामक शासक का नाम लिखा है लेकिन चंद्रप्रभ सूरी की प्रभावक चरित के अनुसार आम व नागावलोक दोनों एक ही शासक थे।
इसी पुस्तक के अनुसार इसने गंगा में जल समाधि ली थी।
• बुचकला अभिलेख से भी इसकी जानकारी मिलती है।

6. रामभद्र:-
इसने देवपाल को हराया था।
बाउक प्रशस्ति के अनुसार बाउक ने इसके प्रतिहारी के रूप में कार्य किया था।

7. मिहिरभोज (836-885 ई.)
ग्वालियर प्रशस्ति में इसे आदिवराह तथा दौलतपुर लेख में इसे प्रभास कहा गया है।
अरबी यात्री सुलेमान ने इसके शासनकाल में भारत की यात्रा की थी तथा उसने इसे इस्लाम का शत्रु बताया है।
सुलेमान ने इसे बरूआ कहा है।
इसके अनुसार इसकी अश्वसेना अत्यधिक विशाल थी तथा इसका राज्य अपराधों से मुक्त था।
• इसने द्रम्म नामक सिक्का चलाया था जिस पर वराह  का चित्र अंकित था।
• मिहिरभोज देवपाल से हार गया था परंतु इसने नारायण पाल को हरा दिया था।

8. महेंद्र पाल (885-910 ई.)
प्रसिद्ध कवि राजशेखर इसके गुरु थे।
राजशेखर की पुस्तकें:-
• नाटक - 1. कर्पूर मंजरी (प्राकृत भाषा)
2. बाल रामायण
3. बाल भारत (प्रचंड तांडव)
4. विद्धशाल भंजिका

• काव्यग्रंथ -
1. काव्य मीमांसा
2. हरविलास
3. भूवनकोष

नोट:- बी एन पाठक के अनुसार यह भारत का अंतिम हिंदू सम्राट था।
 
9. महिपाल/क्षितिपाल (912-943 ई.)
राजशेखर इसके दरबार में भी रहते थे।
राजशेखर ने इसे आर्यवर्त का महाराजाधिराज तथा रघुकुल मुक्तामुणि कहा है।
• हुड्डाला (गुजरात) दान पत्र के अनुसार वढ़वाण में धरनीवराह चावड़ा इसका सामंत था।
• बगदाद यात्री अल मसूदी इसके शासनकाल में भारत की यात्रा पर था।
अल मसूदी ने इसके राज्य को अल गुर्जर तथा इसे बौरा कहा है।
• राष्ट्रकूट इंद्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण कर उसे लूट लिया था।

10. भोज द्वितीय:-
11. विनायकपाल:-
12. महेंद्रपाल द्वितीय:-
प्रतापगढ़ शिलालेख के अनुसार घोटावर्षिका का इन्द्रराज चौहान इसका सामंत था तथा उसने यहां सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया। महेंद्रपाल द्वितीय ने उसे धारापद्रक गांव दान में दिया था।

13. देवपाल:-
14. विजयपाल:-
राजौरगढ़ अभिलेख (अलवर) के अनुसार मथनदेव इसका सामंत था।

15. राज्यपाल:-
उत्बी तथा फरिश्ता के अनुसार गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण कर इसे हरा दिया था।
चंदेल राजा गंड के पुत्र विद्याधर ने इसे मार दिया था। दूबकुण्ड के अर्जुन कच्छपघात (कछवाहा) ने विद्याधर का साथ दिया था।

16. त्रिलोचनपाल:-
17. यशपाल:-
यह कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार वंश का अंतिम शासक था।
गहडवाल चंद्रदेव ने इसे हराकर कन्नौज पर अधिकार कर लिया था।


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