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राजस्थान में मंदिर स्थापत्य। राजस्थान के प्रमुख मंदिर

 
Rajasthan ke pramukh mandir


राजस्थान में मंदिर स्थापत्य

मौर्य काल से गुप्त काल तक मंदिरों के केवल अवशेष मिलते हैं। जैसे - बैराठ का मौर्ययुगीन गोल बौद्ध मंदिर तथा नगरी (चित्तौड़गढ़) का वैष्णव मंदिर।

प्रारंभिक काल:-
• गुप्त काल से सातवीं शताब्दी तक का काल मंदिर निर्माण का प्रारंभिक काल माना जाता है।
• झालरापाटन स्थित शीतलेश्वर महादेव मंदिर राजस्थान का सबसे पुराना समयांकित (689 ई) मंदिर है।
कर्नल टॉड ने झालरापाटन को घंटियों का शहर कहा है।
• कंसुआ के मंदिर (739 ई) में दीवारें सादी है।

• सातवीं से दसवीं सदी के मध्य का काल राजस्थान में मंदिरों के विकास का काल माना जाता है।

गुर्जर-प्रतिहार अथवा महामारू शैली 
• 8वीं सदी से राजस्थान में मंदिर निर्माण की क्षेत्रीय शैली का विकास हुआ जिसे गुर्जर-प्रतिहार अथवा महामारू शैली कहा जाता है।
मंडोर के प्रतिहारों, सांभर के चौहानों तथा चित्तौड़ के मौर्यों ने इस शैली में मंदिर निर्माण किया।
विशेषताएं:- अलंकृत जगती, मुख्य मंदिर के नीचे अलंकृत मंच, अलंकृत खंभे, समतल छत, गर्भगृह की पीठ एवं वेदीबंध, अलंकृत मूर्तिकला।
उदाहरण:- 
ओसियां का सूर्य मंदिर, हरिहर व महावीर मंदिर, चित्तौड़ दुर्ग के कालिका मंदिर (सूर्य मंदिर), आभानेरी, पीपाड़, बुचकला के मंदिर।
हर्षनाथ मंदिर (सीकर), नीलकंठेश्वर मंदिर (अलवर), नीलकंठेश्वर मंदिर (कैकीन्द या जसनगर), दधिमाता मंदिर (गोठ मांगलोद), सिरोही का ब्राह्मण स्वामी मंदिर।
पाली जिले में आउवा का कामेश्वर मंदिर,
खेड़ (बालोतरा) का रणछोड़ मंदिर।
गुर्जर-प्रतिहार शैली का अंतिम व सबसे भव्य मंदिर किराडू का सोमेश्वर (1016 ई) मंदिर है।

नोट:- इस काल में दक्षिणी राजस्थान में कुछ मंदिर गुर्जर- प्रतिहार शैली से अलग भी है।
जैसे:- बाडौली का मंदिर (900 ई), नागदा का सास-बहू मंदिर (975 ई), उदयपुर में जगत अंबिका मंदिर।

सोलंकी अथवा मारु गुर्जर शैली
11वीं से 13वीं सदी के बीच का काल मंदिर स्थापत्य का स्वर्ण काल था। इस समय बने मंदिर सर्वश्रेष्ठ है।
• इस काल में विशाल और अलंकृत मंदिर बने जिन्हें सोलंकी या मारु गुर्जर शैली के अंतर्गत रखा जा सकता है।
• विशेषताएं:- ऊंची पीठ एवं वेदीबंध, खंभे अलंकृत, पतले लंबे वह गोलाई लिए हुए है।
महामारू शैली से कम अलंकृत मूर्तिकला।
उदाहरण:-
समिध्देश्वर मंदिर (चित्तौड़गढ़ दुर्ग)
सच्चिया माता मंदिर (ओसियां)
महावीर मंदिर (ओसियां)
चंद्रावती के मंदिर (आबू)
किराडू के 3 छोटे शिव मंदिर

नोट:- महामारू शैली में तक्षणकला (Instant Art) तथा मारु गुर्जर शैली में स्थापत्य कला की प्रधानता है।

प्रश्न.पश्चिम भारत के मंदिर स्थापत्य की दो प्रमुख शैलियां महा-मारू तथा मरू-गुर्जर के मध्य अंतरों को स्पष्ट कीजिए।

राजस्थान के जैन मंदिर
• राजस्थान में 10वीं से 13वीं सदी के मध्य अनेक जैन मंदिर बने।
विशेषताएं:- स्थापत्य के स्थान पर अलंकरण को अधिक महत्व दिया गया है।
• उदाहरण:- 
देलवाड़ा के मंदिर समूह, देलवाड़ा का चौमुखा मंदिर, रणकपुर, ओसियां, जैसलमेर के जैन मंदिर।
घाणेराव (पाली) का मुछाला महावीर मंदिर, 
करौली में श्रीमहावीर जी का मंदिर आदि।

भूमिज शैली
• यह नागर शैली की उप शैली है।
• राजस्थान में इस शैली का सबसे पुराना मंदिर पाली जिले में सेवाड़ी का जैन मंदिर है। (लगभग 1010-1020 ई)
• मेनाल का महाकालेश्वर मंदिर। (पंचरथ)
• रामगढ़ (बारां) का भण्ड देवरा मंदिर। (सप्तरथ)
• बिजौलिया का उंडेश्वर मंदिर। (सप्त रथ)

13वीं सदी के बाद के मंदिर
• इस काल में बड़े मंदिरों का निर्माण जारी रहा।
• उदयपुर का जगदीश मंदिर, एकलिंगजी का मुख्य मंदिर, केशोरायपाटन के मंदिर, आमेर का जगतशिरोमणी मंदिर।
• रणकपुर का चौमुख मंदिर
• डूंगरपुर का सोमनाथ मंदिर (कच्छपघात शैली)

 हवेली शैली के मंदिर
• धार्मिक असहिष्णुता के कारण मंदिरों को नष्ट किया जाने लगा।
• अतः 16वीं-17वीं सदी के बाद हवेली शैली के मंदिरों का निर्माण हुआ।


राजस्थान के प्रमुख मंदिर

Famous temple of Rajasthan.

एकलिंगजी का मंदिर:- कैलाशपुरी (उदयपुर)
• निर्माण:- बप्पा रावल
• वर्तमान स्वरुप रायमल ने बनवाया।
• मेवाड़ शासकों के कुल देवता।

किराडू के मंदिर:- हाथमा गांव (बाड़मेर)
• किराडू का प्राचीन नाम किराट कूप था, जो परमार राजाओं की राजधानी थी।
• यहां 5 मंदिरों का समूह है, जिनमें वैष्णव व शिव मंदिर है।
इन मंदिरों में चार भगवान शिव को तथा एक विष्णु को समर्पित है।
• किराडू को राजस्थान का खजुराहों कहते हैं।
• इन मंदिरों में उच्च कोटि की तक्षण कला के साथ-2 गुप्तकालीन, परमार एवं सोलंकी शैली का मिश्रण मिलता है।
• किराडू का सोमेश्वर मंदिर किस शैली में बना है ? - गुर्जर-प्रतिहार शैली।

जगतशिरोमणि मंदिर:- आमेर
• निर्माण:- मानसिंह की पत्नी कंकावती ने अपने पुत्र जगत सिंह की याद में।
• इस मंदिर में श्रीकृष्ण की वही मूर्ति है, जिसकी मीराबाई चित्तौड़ में पूजा करती थी।
• मानसिंह इसे चित्तौड़ से लेकर आये थे।

अम्बिका माता का मंदिर:- जगत (उदयपुर)
• इसे मेवाड़ का खजुराहों कहते है।
• इसे राजस्थान का मिनी खजुराहों कहते है।

देलवाड़ा के जैन मंदिर समूह:- माउंट आबू (सिरोही)
• ये मंदिर सोलंकी (चालुक्य) शैली में बने है।
• यहां स्थित 5 जैन मंदिरों में दो मंदिर प्रमुख है।
विमलशाही मंदिरः- इसका निर्माण 1031 ई. में गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव के मंत्री विमलशाह ने करवाया। 
यह मंदिर प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव/आदिनाथ का है।

नेमिनाथ मंदिर:- इसका निर्माण 1230 ई. में चालुक्य राजा धवल के मंत्री तेजपाल एवं वास्तुपाल ने करवाया।
यह मंदिर 22वें जैन तीर्थंकर नेमिनाथ का है।
इस मंदिर को लूणवसाही भी कहा जाता है।

रणकपुर के जैन मंदिर:- पाली
• निर्माण:- कुम्भा के समय धरणकशाह ने।
• मुख्य मंदिर- चौमुखा मंदिर (वास्तुकार-देपाक)
• 1444 खंभों पर टिका होने के कारण इसे खंभों का अजायबघर भी कहते है।
• इस मंदिर के पास ही पार्श्वनाथ मंदिर हैं, जिसे वेश्याओं का मंदिर भी कहते हैं। (डॉ गोपीनाथ शर्मा)
नोट:- कुछ जगह पर नेमिनाथ मंदिर लिखा हुआ है।

अपडेट जारी....

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3 Comments

  1. Very nice collection Meena ji 👍
    Carry on 🙏

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  2. किराडू के मंदिर गुर्जर प्रतिहार शैली में निर्मित है न कि नागर शैली में ।

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