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राजनीति में अपराधीकरण। Editorial

Criminalization of politics





राजनीति में अपराधीकरण

Criminalization of politics.

हाल ही बिहार में हुए विधानसभा चुनावों में चुने गए विधायकों में से 57% विधायकों के खिलाफ अपराधिक प्रवृत्ति के मामले दर्ज है और 39% गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं। अतः राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण चिंता का विषय बनता नजर आ रहा है।

राजनीति में अपराधीकरण का अर्थ - अपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित करना। जैसे - अपने बल, भय व आतंक से मतदाताओं को प्रभावित करना। राजनीतिक सत्ता का उपयोग अपराधिक गतिविधियों के संरक्षण हेतु करना आदि।

आपराधिक आंकड़े
एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म द्वारा प्रस्तुत एक आंकड़े के अनुसार 17वीं लोकसभा में 43% सांसदों (233 सांसद) पर आपराधिक मुकदमा चल रहा है और 29% पर गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं।
भाजपा के 303 सांसदों में से 116 एवं कांग्रेस के 52 सांसदों में से 29 सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज है।

राजनीति में अपराध का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। जो इस प्रकार है - 
2004 में 24% दागी सांसद
2009 में 30% दागी सांसद
2014 में 33% दागी सांसद
2019 में 43% दागी सांसद

संसद और राज्य विधानसभाओं के कुल 4896 सदस्यों में से 1765 सदस्यों पर अपराधिक मामले चल रहे हैं।
नोट - केरल के इडुक्की जिले के एक सांसद पर 204 अपराधिक मामले दर्ज है।

👉 इस संबंध में कानूनी प्रावधान - 

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम - 1951 में उम्मीदवारों के नामांकन से लेकर चुनाव समाप्ति तक का विवरण दिया गया है। 
इस अधिनियम की धारा - 8 दोषी साबित हो चुके प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से रोकती है। लेकिन जिन उम्मीदवारों पर मुकदमा चल रहा हैै, वे चुनाव लड़ सकते हैं।

इस अधिनियम की धारा 8(1) एवं धारा 8(2) के अनुसार यदि जनप्रतिनिधि हत्या, बलात्कार, विदेशी मुद्रा विनियमन, सांप्रदायिक अस्थिरता बढ़ाने का दोषी, प्रतिबंधित वस्तुओं का व्यापार एवं राष्ट्रीय गौरव एवं संविधान का निरादर करने का दोषी हो तो वह उसे 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने हेतु अयोग्य माना जाएगा। 

धारा 8(3) के अनुसार दोषी सिद्ध व्यक्ति को 2 वर्ष तक कारावास की सजा प्राप्त होने पर, वह दोषी ठहराए जाने की तिथि से अयोग्य माना जाएगा।
वह व्यक्ति सजा पूरी करने की तिथि से 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने हेतु अयोग्य माना जाएगा।

धारा 8(4) के अनुसार यदि दोषी व्यक्ति निचली अदालत के इस फैसले के विरुद्ध 3 महीने के भीतर उच्च न्यायालय में अपील दायर कर देता है, तो वह चुनाव लड़ने हेतु अयोग्य नहीं माना जाएगा।

नोट - 2013 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक मामले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(4) को असंवैधानिक घोषित किया गया था जिसका विरोध कई राजनीतिक दलों द्वारा किया गया। लेकिन वर्ष 2018 में जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ द्वारा इस फैसले को उलट दिया गया। जिसके अनुसार कोर्ट द्वारा दोष सिद्धि पर स्टे लगा देने से सांसद या विधायक अयोग्य नहीं होंगे।

👉इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले एवं दिशा-निर्देश :-

• वर्ष 2002 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक फैसले में प्रत्याशियों के लिए यह अनिवार्य किया कि वे अपनी शिक्षा, संपत्ति, बैंक में जमा राशि एवं समस्त देनदारियों के साथ अपने खिलाफ लंबित व आपराधिक मामलों में दोषी करार दिए जाने संबंधी समस्त जानकारी उपलब्ध करवाते हुए एक शपथ पत्र प्रस्तुत करें।

• वर्ष 2013 में एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा कहा गया कि जेल/हिरासत में लिये गये व्यक्ति को चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं है।

नोट - जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 62(5) के अनुसार पुलिस हिरासत में जा चुका व्यक्ति मतदान नहीं कर सकता।

• वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मामलों के शीघ्र निवारण हेतु विशेष अदालतों के गठन का निर्देश दिया गया।

• वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संवैधानिक पीठ द्वारा गंभीर अपराध में शामिल लोगों के चुनाव लड़ने व पार्टी पदाधिकारी बनने पर रोक लगाने हेतु सरकार को तत्काल कानून बनाने का निर्देश दिया।

• वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक ओर फैसले के अनुसार यदि किसी मामले पर उच्च न्यायालय के स्टे को 6 महीने से ज्यादा समय हो जाए तो स्टे के बावजूद ट्रायल कोर्ट मामले पर पुनः सुनवाई शुरू कर सकता है।

• फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक फैसले के अनुसार केंद्र व राज्य स्तर पर चुनाव हेतु राजनीतिक दलों को अपनी वेबसाइट एवं स्थानीय व राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों में अनिवार्य रूप से अपराधिक मामलों में लिप्त उम्मीदवारों के बारे में जानकारी उपलब्ध करवानी होगी और उन्हें टिकट देने का कारण भी बताना होगा। साथ ही राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों के चयन के 72 घंटों के भीतर चुनाव आयोग में इस संबंध में रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
यदि राजनीतिक दल ऐसा करने में विफल रहे तो चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट की जानकारी में यह लाना होगा। क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है।


राजनीति में अपराधीकरण बढ़ने के कारण

• राजनीतिक दलों द्वारा सुप्रीम कोर्ट की नसीहत को दरकिनार करते हुए *जीतने की योग्यता* के आधार पर आपराधिक छवि वाले लोगों को टिकट  दिया जाता है।

• न्यायिक प्रक्रिया में उपस्थित खामियां। जैसे - जब तक व्यक्ति पर दोष सिद्धि न हो, तब तक वह निर्दोष माना जाता है। इस प्रकार के प्रावधानों का राजनेताओं द्वारा गलत फायदा उठाया जाता है।

• देशहित के बजाय धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र के आधार पर मतदान देना।

• आपराधिक तत्वों का समाज में दबदबा और जनता में उनकी स्वीकार्यता।

• निर्वाचन प्रणाली की खामियां।


राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को रोकने हेतु सुझाव

• राजनीतिक दलों को अपना स्वार्थ न देख कर देशहित के लिए जिताऊ उम्मीदवार की जगह एक स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवार को टिकट देना चाहिए।

• सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार अधिकाधिक फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करना चाहिए ताकि जनप्रतिनिधियों से संबंधित मामलों की सुनवाई में अधिक समय न लगे।

• लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 में संशोधन करना चाहिए। ताकि गंभीर अपराधों में दोषी व्यक्ति हमेशा के लिए चुनाव लड़ने हेतु अयोग्य हो।

• संविधान के अनुच्छेद 102 में सदस्यों की अयोग्यता को लेकर संशोधन करना चाहिए।

• जनता को इस संबंध में अधिक जागरूक बनाना चाहिए।

नोटा को अधिक प्रासंगिक बनाना चाहिए।

नोट - दागी उम्मीदवार को जीतने से रोकने हेतु 2014 से ईवीएम में नोटा का विकल्प दिया गया था।

• 26 नवंबर 1949 को संविधान का ड्राफ्ट संविधान सभा द्वारा मंजूर किए जाने से पहले डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने कहा था -
"हमें स्वीकार करना चाहिए कि देश की स्थिति और लोगों में बड़े पैमाने पर दोष अंतर्निहित है , यदि चुने गए लोग सक्षम है और चरित्र और अखंडता के पुरुष है तो वह एक दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वश्रेष्ठ बनाने में सक्षम होंगे, अगर उनमें कमी है तो संविधान देश की मदद नहीं कर सकता है"

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