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ऑनलाइन शिक्षा क्या है ? ऑनलाइन शिक्षण की चुनौतियां

ऑनलाइन शिक्षा क्या है ?

ऑनलाइन शिक्षा क्या है ?

अपने स्थान पर ही इंटरनेट व अन्य संचार उपकरणों की सहायता से प्राप्त की जाने वाली शिक्षा, ई-लर्निंग अथवा ऑनलाइन शिक्षा कहलाती है। ई-शिक्षा के विभिन्न रूप हैं, जिसमें वेब आधारित लर्निंग, मोबाइल आधारित लर्निंग या कंप्यूटर आधारित लर्निंग और वर्चुअल क्लासरूम इत्यादि शामिल हैं।

कोरोनाकाल के दौरान लगी पूर्णबंदी ने तकनीकी शिक्षा एवं ई-लर्निंग को बढ़ने का अवसर दिया है। भविष्य में यह प्रणाली पूरी तरह स्मार्ट तकनीक एवं कृत्रिम बुद्धिमता (artificial intelligence) पर आधारित होगी।

फोर्ब्स की एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोनाकाल के दौरान दुनिया के 90 फ़ीसदी से अधिक लोग ऑनलाइन शिक्षण प्रशिक्षण के माध्यम से घर बैठे शिक्षा ले रहे हैं। इसके साथ ही इस प्रणाली के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिले हैं।


ऑनलाइन शिक्षा के लाभ

आपातकालीन परिस्थितियों में ऑनलाइन एजुकेशन का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
"कहीं भी कभी भी" कथन पर आधारित ऑनलाइन शिक्षा में समय और जगह की पाबंदी नहीं रहती है।  
शिक्षण संस्थानों में आने-जाने के समय में बचत होने से विद्यार्थियों द्वारा उस समय में अपनी रुचि के अनुरूप एक्स्ट्रा करिकुलर वर्क किया जा सकता है।

• ऑनलाइन एजुकेशन के माध्यम से छात्र नई कौशल तकनीक को सीखेगा।

• शिक्षार्थी को मनपसंद पाठ्यक्रम के विस्तृत अवसर प्रदान करती है।

• यह शैक्षणिक दबाव (academic pressure) को कम करने में सहायक है।

• ऑनलाइन शिक्षा विद्यार्थी को स्वयं के अनुकूल माहौल में पढ़ने का अवसर प्रदान करती है।

• इसके माध्यम से शिक्षार्थी अपने संचार कौशल (communication skills) में वृद्धि कर सकता है। 

• ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर विद्यार्थी कठिन टॉपिक को आसानी से समझ सकते हैं व अपने पाठ्यक्रम की बार-बार समीक्षा कर सकते हैं एवं सूचनाओं से खुद को अपडेटेड रख सकते हैं।

• इससे शिक्षार्थी देश-विदेश की विभिन्न शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से भी शिक्षा प्राप्त कर सकता है।  

मानवीय मूल्यों पर आधारित तकनीकी शिक्षा समाज को एक नई दिशा प्रदान करेगी।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के लिए लाभदायक है, क्योंकि इसके माध्यम से ग्रामीण पृष्ठभूमि कि वे लड़कियां भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकती हैं, जिन्हें अकेले पढ़ाई करने हेतु शहर नहीं भेजा जाता।


ऑनलाइन शिक्षा के नकारात्मक प्रभाव - 

• ऑनलाइन शिक्षा बच्चे के शारीरिक व मानसिक विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। जिसके परिणाम अब सामने आने लगे हैं। जैसे- अधिक स्क्रीन टाइम के कारण आंखों में जलन होना, देखने की क्षमता कमजोर होना, नींद का ठीक से ना आना, आंखों में दर्द होना, सिर दर्द, चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी आदि।

• इस प्रणाली से शिक्षक व छात्रों के मध्य संवादहीनता की स्थिति बनती है।

• सहपाठियों व शिक्षक के बिना अकेलेपन के कारण अवसाद से पीड़ित होने की आशंका भी बढ़ जाती है। क्योंकि कक्षाकक्ष का माहौल विद्यार्थियों को मनोयोग से पढ़ने में सहायता प्रदान करता है।

• अध्यापन भी दूसरे क्षेत्रों की भांति एक व्यवसाय का रूप ले लेगा।

• मूल्य उद्देश्य शिक्षा से भटक कर विद्यार्थियों (बच्चों) के पोर्नोग्राफी की तरफ बढ़ने की संभावना है।

• इस प्रणाली से देश में अमीरों और गरीबों के बीच एक बड़ा डिजिटल विभाजन देखने को मिलेगा।

अतः ऑनलाइन शिक्षा कभी भी विद्यालयी शिक्षा का विकल्प नहीं बन सकती। क्योंकि शिक्षण संस्थान विद्यार्थियों में सामाजिक-मानवीय मूल्यों के साथ-2 उनके व्यक्तित्व के विकास में सहायक होते है, परंतु ऑनलाइन एजुकेशन में इसका अभाव होता है।


ऑनलाइन शिक्षण में चुनौतियां

• देश के प्रत्येक हिस्से के विद्यार्थियों तक इस प्रणाली की पहुंच बनाने में सबसे बड़ी बाधा इसके लिए बुनियादी ढांचे का अभाव होना है। 

• गुणवत्तापूर्ण इंटरनेट कनेक्टिविटी का अभाव।

• स्मार्टफोन, लैपटॉप जैसे डिजिटल उपकरणों तक गरीब विद्यार्थियों की पहुंच ना होना।

• इंटरनेट के इस्तेमाल में लैंगिक असमानता भी देखने को मिलती है। जैसे - एक आंकड़े के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 72 फ़ीसदी पुरुषों के मुकाबले सिर्फ 28 फ़ीसदी महिलाएं ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाती है। 

इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार 2019 में 67% पुरुष इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं जबकि 33% महिलाएं ही इंटरनेट का इस्तेमाल करती हैं।


• ई-शिक्षा के वर्चुअल क्लासरूम में प्रैक्टिकल या लैब वर्क करना संभव नहीं है।

•  विद्यार्थियों में सामाजिक-मानवीय मूल्यों को विकसित नहीं करती है।


डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु सरकार के प्रयास

• डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत डिजिटल शिक्षा के लिए उपलब्ध प्लेटफार्म को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा  "भारत पढ़े ऑनलाइन" कार्यक्रम की शुरुआत की गई है। 

• नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ़ इंडिया ( NDLI ), ई-यंत्र एवं ई-पाठशाला जैसी परियोजनाएं सरकार द्वारा शुरू की गई है।

• स्वयं प्रभा नामक पोर्टल की शुरूआत की है। जो भारत के मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स का एक महत्वपूर्ण प्लेटफार्म है। 

नोट - लगभग 2000 कोर्स के साथ यह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म सभी लर्नर्स को फ्री एक्सेस प्रदान करता है और कक्षा 9 से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक के शिक्षार्थियों के लिए कोर्स का संचालन करता है। 
इस हेतु 15 जीसैट सेटेलाइट एवं 32 डीटीएच चैनलों का प्रयोग किया गया है। 
(SWAYAM  full form - study webs of active learning for young aspiring minds )

ऑनलाइन शिक्षा की सभी  शिक्षार्थियों तक पहुंच सुनिश्चित करने हेतु सरकार द्वारा निम्न प्रयास व सुधार किए जाने आवश्यक है -

• डिजिटलीकरण की प्रक्रिया में आने वाली बाधाओं को जल्द दूर करके इस हेतु बुनियादी अवसंरचना को और अधिक मजबूत बनाना चाहिए।

• गरीब परिवारों के विद्यार्थियों की भी बेहतरीन शिक्षकों तक पहुंच बनाने एवं गरीब-अमीर के बीच डिजिटल विभाजन को दूर करने हेतु निर्धन जरूरतमंद परिवारों तक भी गुणवत्तापूर्ण, मुफ्त या रियायती दरों पर स्मार्टफोन , लैपटॉप जैसे आवश्यक डिजिटल उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए। 

• इस प्रणाली में मानवीय मूल्यों का समावेशन करना चाहिए। 

• लोगों को इस संबंध में जागरूक बनाने हेतु सरकार द्वारा विभिन्न कार्यक्रम एवं परियोजनाओं का संचालन करना चाहिए। 


शिक्षा का महत्व

 
सा विद्या या विमुक्तये अर्थात शिक्षा व्यक्ति को मुक्त करती है। 
शिक्षा समाज की आत्मा है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती है।

स्वामी विवेकानंद के शिक्षा संबंधी विचार
स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को जीवन विकास का मंत्र बताया है।
स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा का अर्थ समझाते हुए कहा था कि शिक्षा एक उपकरण है, जो मनुष्य को पहले से ही मौजूद पूर्णता को पहचानने और उसे प्राप्ति का काम करती है। अतः शिक्षा द्वारा बच्चे में आत्मनिर्भरता को बढ़ाना आवश्यक है।
विवेकानंद की दूरदर्शिता आज की शिक्षा पर सवाल करती है और प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत अभियान के सफल होने में एक सहयोग का काम करती हैं।
शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्ति को उसकी छिपी प्रतिभाओं से रूबरू कराना और यह सिखाना है कि वह इन प्रतिभाओं को कहां और कैसे अपने जीवन के संघर्षों को चुनौती में बदल सफल हो सकता है।

सदियों से अपने ज्ञान और अध्यात्म का प्रकाश फैला रहे भारत को दुनिया का विश्व गुरु कहा जाता रहा। हमारे नालंदा और तक्षशिला जैसे शिक्षण संस्थानों ने दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। हमारी प्राचीनतम गुरुकुल शिक्षण प्रणाली दुनिया में कौतूहल का विषय बनी रही। तमाम सभ्यताएं पठन-पाठन के हमारे ही बताए रास्ते पर चलती दिखीं। सदियों तक हम अपने विश्व गुरु के रुतबे पर न केवल इतराते रहे बल्कि उसे बरकरार रखने की हर संभव कोशिश भी करते रहे। शनै: शनै: हमारी यह कोशिश क्षीण होती गई।


भारतीय शिक्षा प्रणाली का क्रमिक विकास :-


परंपरावादी शिक्षा: शुरुआती दौर में भारत में ब्राह्मण परिवार शिक्षा देते थे। मुगलों के समय में शिक्षा संभ्रांतवादी विचारधारा के अधीन थी

ब्रिटिश शिक्षा तंत्र: अमीरों को शिक्षा के चलन को ब्रिटिश शासन ने और समर्थन दिया। ब्रिटिश शासन ने आधुनिक राज्य, अर्थव्यवस्था और आधुनिक शिक्षा तंत्र को बढ़ावा दिया।

नेहरू और शिक्षा: 19वीं सदी के शुरुआती दौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने राष्ट्रीय शिक्षा का नारा दिया। बेहतर शिक्षा के लिए देश में आइआइएम और आइआइटी जैसे उच्च शिक्षण व तकनीकी संस्थानों की नेहरू ने परिकल्पना की।

कोठारी समिति: 1964 में गठित कोठारी समिति ने देश के चहुंमुखी विकास के लिए निशुल्क शिक्षा और 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा को अहम माना। भाषाओं को और विकसित करने तथा विज्ञान की पढ़ाई को भी महत्तवपूर्ण माना।

शिक्षा की राष्ट्रीय नीति: 1986 में राजीव गांधी ने शिक्षा की राष्ट्रीय नीति की घोषणा की। इस नीति ने भारत को 21वीं सदी के लिए तैयार किया।

ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड: 1987-88 में यह अभियान चला। इसका उद्देश्य प्राइमरी स्कूलों में विभिन्न संसाधनों को बढ़ाना था।

शिक्षकों की शिक्षा: 1987 में इसके तहत शिक्षकों की शिक्षा और ज्ञान को बढ़ाने के लिए संसाधन मुहैया कराए जाने लगे।

बच्चों को पौष्टिक आहार: 1995 में प्राइमरी स्कूलों में उपस्थिति और संख्या बढ़ाने के लिए ताजा पौष्टिक भोजन मुहैया कराया जाने लगा।

सबको शिक्षा: 2000 में सभी बच्चों को वर्ष 2010 तक शिक्षा मुहैया कराने के उद्देश्य से आंदोलन छेड़ा गया।

मौलिक अधिकार: 86 वें संविधान संशोधन - 2002  के द्वारा संविधान में अनुच्छेद- 21A जोड़ा गया एवं शिक्षा को  मौलिक अधिकार बनाया गया।

विश्व साक्षरता दिवस
8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस मनाया जाता है।
इसका उद्देश्य साक्षरता के महत्व पर बल देना है। अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की घोषणा यूनेस्को द्वारा नवंबर 1966 में की गई।
इस दिन यूनेस्को पेरिस स्थित अपने मुख्यालय में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता पुरस्कार प्रदान करता है।
वर्ष 2009-2010 को संयुक्त राष्ट्र साक्षरता दशक घोषित किया गया था।

• वर्ष 2002 में 86वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया जिसके तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया।
• साक्षरता के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, मिड डे मील योजना जैसे कार्यक्रमों को पूरी तरह से धरातल पर लागू करने की आवश्यकता है।

• राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में साक्षरता दर 77.7%  है।
ग्रामीण इलाकों की साक्षरता दर = 73.5%
शहरी इलाकों की साक्षरता दर = 87.5%

• 96.2% की साक्षरता दर के साथ केरल भारत का सबसे साक्षर राज्य है।
• 66.4% की साक्षरता दर के साथ आंध्र प्रदेश देश का सबसे कम साक्षर राज्य है।
• राजस्थान की साक्षरता दर = 69.7%

कम साक्षरता दर के कारण
विद्यालयों की कमी, स्कूल में शौचालय की कमी, जातिवाद, गरीबी, लड़कियों के साथ बलात्कार और छेड़छाड़ होने का डर, जागरूकता की कमी।

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