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केशवानंद भारती वाद ।। संविधान का बुनियादी ढांचा

 
केशवानंद भारती वाद


केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 ईस्वी

Kesavananda bharti case

केरल स्थित इडनीर मठ के प्रमुख केशवानंद भारती का निधन
भारत का सबसे बड़ा केस लड़ने वाले केशवानंद भारती का 6 सितंबर 2020 को निधन हो गया।  जो केरल के कासरगोड जिले में इडनीर मठ (शैव मठ)  के वंशानुगत प्रमुख थे। 
वे सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय कि "किसी भी परिस्थिति में संविधान की मूल संरचना को संसद द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता" के याचिकाकर्ता के रूप में प्रसिद्ध थे।

पृष्ठभूमि
संविधान के अनुच्छेद 13(2) के अनुसार संसद ऐसी कोई विधि नहीं बना सकती जो मूल अधिकारों को सीमित करती हो।
(a) शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ 1951 ईस्वी.
(b) सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य 1965 ईस्वी.
उपर्युक्त दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 13(2) अनुच्छेद 368 पर लागू नहीं होता है । यह केवल सामान्य विधियों पर लागू होता है अतः संसद सामान्य विधियों द्वारा मूल अधिकारों में कटौती नहीं कर सकती है, लेकिन संविधान संशोधन के माध्यम से मूल अधिकारों में कटौती कर सकती है।

(c) गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य बाद 1967 ईस्वी.
इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती निर्णय को उलटते हुए माना कि संविधान संशोधन भी एक विधि है । अतः संसद संविधान संशोधन के द्वारा भी मूल अधिकारों में कटौती नहीं कर सकती है।

Note- 9 वीं अनुसूची :-
यह प्रथम संविधान संशोधन 1951 ई. द्वारा अनुच्छेद 31(b)  के तहत जोड़ी गई। अनुच्छेद 31(b) के अनुसार इस अनुसूची में रखे गए विषयों पर न्यायिक पुनरावलोकन नहीं किया जा सकता।

केशवानंद भारती वाद क्या था ? 
29 वें संविधान संशोधन 1972 ईस्वी द्वारा केरल भूमि सुधार संबंधित एक्ट को 9 वीं अनुसूची में डाला गया। इसी एक्ट के तहत केरल सरकार द्वारा इडनीर मठ पर संपत्ति के प्रबंधन को लेकर पाबंदियां लगायी गयी। 
सुप्रीम कोर्ट में केशवानंद भारती की ओर से 1973 में दायर याचिका पर प्रमुख न्यायविद नानी पालकीवाला ने जिरह की और अनुच्छेद-26 का हवाला देते हुए 29 वें संविधान संशोधन को चुनौती दी।

इस मामले के दौरान गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य वाद तथा 24वें एवं 25वें संविधान संशोधनो पर पुनर्विचार किया गया। 

उच्चतम न्यायालय का निर्णय -
68 दिन की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की पीठ ने 7-6  बहुमत से 24 अप्रैल 1973 को केशवानंद भारती के पक्ष में निर्णय देते हुए संविधान के बुनियादी ढांचे की अवधारणा दी। न्यायालय ने 24वें एवं 25वें संविधान संशोधनों को वैधानिक माना। 
न्यायालय के अनुसार संविधान संशोधन की शक्ति संविधान को बनाने की शक्ति के बराबर नहीं है। संसद संविधान संशोधन तो कर सकती है, लेकिन संविधान का पुनर्लेखन नहीं कर सकती, क्योंकि संविधान निर्माण की शक्ति संविधान सभा के पास होती है और संसद संविधान सभा नहीं है। 
अतः संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन नहीं कर सकती है। 
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार संविधान का बुनियादी ढांचा तथ्य न होकर एक अवधारणा है, जिसमें देश, काल, परिस्थिति के अनुसार बदलाव किया जा सकता है। अतः न्यायालय समय-समय पर इस अवधारणा को स्पष्ट करता रहेगा। हालांकि, संविधान की कुछ विशेषताओं को आधारभूत ढांचा बताया गया था । जैसे- संविधान की सर्वोच्चता, न्यायिक पुनरावलोकन, संसदीय शासन व्यवस्था ,लोकतांत्रिक गणराज्य आदि।


बुनियादी ढांचा की अवधारणा के अनुप्रयोग -

1.इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण वाद 1975 ईस्वी
सुप्रीम कोर्ट ने 39 वें संविधान संशोधन को अवैधानिक माना तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन को लोकतंत्र का मूल तत्व मानते हुए इसे संविधान का बुनियादी ढांचा भी बताया।

2. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ वाद 1980 ईस्वी
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 31(c) के विस्तार को अवैधानिक माना तथा कहा कि संसद की संशोधन करने की शक्ति असीमित नहीं हो सकती।

3. एस. आर बोम्मई बनाम भारत संघ वाद 1994 ईस्वी
उच्चतम न्यायालय ने पक्षनिरपेक्षता को संविधान का बुनियादी ढांचा माना।

4. एल. चन्द्रकुमार बनाम भारत संघ वाद -1997 ईस्वी
उच्चतम न्यायालय ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बुनियादी ढांचा बताया।

Note - हाल ही में उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून को इसी आधार पर खारिज किया गया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है। इसलिए यह संशोधित करने योग्य नहीं है।

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद की प्रासंगिकता -
इस केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला आज भी संविधान के मूल तत्व को संरक्षित रखने की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ है। न्यायालय में पहुंचने वाले संवैधानिक मामलों में आधे से ज्यादा को इसी आधार पर चुनौती दी जाती है। इस अवधारणा के माध्यम से संसद की संविधान संशोधन की शक्ति को सीमित किया गया है।
इस अवधारणा ने सरकारों को संविधान के दायरे में रहकर कार्य करने के लिए न केवल अधिक उत्तरदायी बनाया है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण की मांग में वृद्धि कर जवाबदेही बढ़ाई है । 
राज्य की स्वेच्छाचारिता पर अकुंश लगाकर इसने निष्पक्षता के प्राकृतिक सिद्धांत का भी संरक्षण किया है।

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