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आर्मेनिया अज़रबैजान युद्ध 2020

आर्मेनिया अज़रबैजान युद्ध 2020

आर्मेनिया अज़रबैजान युद्ध 2020

Armenia azerbaijan war 2020

• हाल ही 27 सितंबर 2020 को आर्मेनिया और अजरबेजान के बीच युद्ध शुरू हो गया।
दोनों ही देशों के बीच जुलाई से ही संघर्ष जारी था, जिसने सितंबर के अंतिम सप्ताह में युद्ध का रूप ले लिया।
गौरतलब हैै, कि दोनों देशों के बीच अलगाववादी क्षेत्र नागोर्नो-कराबाख को लेकर सीमा विवाद चलता रहता है।

• आर्मेनिया और अजरबैजान भौगोलिक रूप से काकेशियन क्षेत्र में है, जो कि विघटन से पहले सोवियत संघ (रूस) के प्रभाव क्षेत्र में आते थे।

काकेशस पर्वत का निर्माण कैसे हुआ ? - अरेबियन प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराने से।


आर्मेनिया देश के बारे में

कैस्पियन सागर के पश्चिम में एवं काला सागर के निकट स्थित आर्मेनिया की सीमाएं पश्चिमी एशिया के तुर्की, जॉर्जिया, अजरबैजान एवं ईरान देशों से लगती है। 
• 16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच आर्मेनिया पश्चिमी एवं पूर्वी आर्मेनिया के नाम से दो भागों में बंटा हुआ था। जिस पर अलग-2  दौर में बारी-2 से ऑटोमन एवं पर्शियन शासक राज करते रहे।
• आर्मेनिया ईसाई बहुल देश है तथा फ्रांस का करीबी है।
सबसे पहले अपने आप को क्रिस्चियन घोषित करने वाला राष्ट्र आर्मेनिया ही है।
• 19 वीं शताब्दी में पूर्वी आर्मेनिया रूस के हिस्से में चला गया एवं पश्चिमी हिस्सा ऑटोमन साम्राज्य में ही रहा।
• अंगूर से शराब बनाने की कला सबसे पहले आर्मेनिया में विकसित हुई थी। 
• आर्मेनिया की राजधानी येरेवन दुनियां की सबसे प्राचीन राजधानियों में से एक है। 
• यहाँ की सेवान झील पूरे देश का लगभग 18% भौगौलिक क्षेत्र घेरती है।
• आर्मेनिया का राष्ट्रीय खेल फुटबॉल है।
• आर्मेनिया मूलतः कृषि, खनिज संसाधनों, दूरसंचार और पन-बिजली पर आधारित अर्थव्यवस्था है।


अजरबैजान देश के बारे में

यह पश्चिमी एशिया में कैस्पियन सागर के पास स्थित है एवं जॉर्जिया,आर्मेनिया, ईरान एवं रूस इसके पड़ौसी देश है।
• 97% मुस्लिम बहुल आबादी वाले इस देश की राजधानी बाकू है।
• तेल की प्रचुरता के कारण अर्थव्यवस्था काफी कुछ इस पर ही निर्भर करती है। अज़रबैजान मध्य एशिया और यूरोप में तेल के निर्यातक के रूप में स्थापित है।



नागोर्नो-काराबाख़  के बारे में

नागोर्नो-काराबाख दक्षिण-पश्चिमी अज़रबैजान में 4,400 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला एक पहाड़ी इलाका है। 
• इसे अर्तसख गणराज्य भी कहा जाता है।
• इस इलाके में पारंपरिक रूप से आर्मीनियाई मूल के ईसाई और तुर्की मूल के मुसलमान रहते हैं।
• प्रथम विश्व युद्ध के बाद साल 1918 और 1921 में आर्मेनिया और अजरबैजान स्वतंत्र हुए थे। ये दोनों ही देश 1922 में सोवियत संघ में शामिल हो गए।
तत्कालीन सोवियत संघ के नेता स्टालिन ने नागोर्नो-करबाख क्षेत्र को अज़रबैजान के भीतर एक स्वायत्त क्षेत्र बना दिया। आर्मेनिया के निवासियों ने इसका विरोध किया था।
• वर्ष 1988 में अज़रबैजान की सीमाओं के भीतर होने के बावजूद नागोर्नो-काराबाख की विधायिका ने आर्मेनिया में शामिल होने का प्रस्ताव पारित किया।
• वर्ष 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया और नागोर्नो-काराबाख स्वायत्त क्षेत्र ने एक जनमत संग्रह के माध्यम से स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया, वहीं अज़रबैजान ने इस जनमत संग्रह को मानने से इनकार कर दिया। 

• 1991 में आर्मीनियाई सेना ने नागोर्नो-काराबाख पर अधिकार स्थापित करके वहां स्वतंत्रता की घोषणा कर दी।
इसे किसी भी राष्ट्र द्वारा स्वीकार नहीं किया गया।

• 1994 में रूस की अध्यक्षता में दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम का समझौता किया गया। फिर भी छुटपुट लड़ाई चलती रही। 
• 1994 में खत्म हुई लड़ाई के बाद से इस इलाके पर आर्मेनिया का कब्जा है।
साल 1988-94 के दौरान हुए युद्ध में तकरीबन दस लाख लोग विस्थापित हुए थे और 30 हज़ार लोग मारे गए थे। 

• अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत इस क्षेत्र को अज़रबैजान का घोषित किया जा चुका है लेकिन यहां आर्मीनियाई मूल के लोगों की जनसंख्या अधिक होने के कारण दोनों देशों के बीच संघर्ष चल रहा है।
• अप्रैल 2016 में इस क्षेत्र में हिंसक संघर्ष काफी तेज़ हो गया, जिसके कारण इस क्षेत्र में तनाव काफी बढ़ गया था, इस संघर्ष को फोर-डे वॉर (Four-Day War) के रूप में भी जाना जाता है।
• इस वर्ष जुलाई के महीने से हालात खराब हो गए।

इस भौगोलिक विवाद के निपटारे हेतु ऑर्गेनाइजेशन फॉर सिक्योरिटी एंड कॉरपोरेशन इन यूरोप के तहत मिंस्क ग्रुप का गठन 1992 में किया गया जिसमें रूस, अमेरिका और फ्रांस को मध्यस्थ के तौर पर रखा गया।
उद्देश्य - काकेशियन क्षेत्र में स्थिरता लाना।

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया
अमेरिका - मिंस्क समूह के साथ सहयोग करने और जल्द से जल्द बातचीत शुरू करने की अपील की।

रुस - तटस्थ रहा और दोनों देशों के बीच 10 अक्टूबर को संघर्ष विराम समझौता कराया
गौरतलब है कि आर्मेनिया में रूस का सैन्य अड्डा है और दोनों देशों के बीच सुरक्षा और सहयोग संधि भी है।

फ्रांस - फ्रांस में बड़ी संख्या में आर्मीनियाई मूल के लोग रहते हैं। इसलिए वह आर्मेनिया का साथ देता है। हाल ही के विवाद में फ्रांस द्वारा तुर्की को चेतावनी भी दी गई।

तुर्की - तुर्की खुलकर अज़रबैजान का समर्थन करता है। 
यूरोप के एकमात्र मुस्लिम बहुल देश तुर्की ने 1991 में सोवियत संघ के विभाजन के बाद अस्तित्व में आए अजरबैजान को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी और उसे अपना भाई बताया।

• आर्मेनिया में  कुर्दों का एक उपसमुदाय यजीदी भी रहता है। जो यजीदी धर्म को मानता है।
इस समुदाय पर सीरिया-ईरान के गृह युद्ध में आईएसआईएस ने कहर बरपाया था।
गौरतलब है कि तुर्की कुर्दो का विरोध करता है।

भारत ने कोई विशिष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी परंतु भारत शांति और स्थिरता का समर्थक रहा है।
भारत अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर (INSTC) का हिस्सा है, जो कि भारत, ईरान, अफगानिस्तान, अज़रबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप के बीच माल की आवाजाही के लिये जहाज़, रेल और सड़क मार्ग का एक नेटवर्क है।
उल्लेखनीय है कि अज़रबैजान, तुर्की की तरह कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की स्थिति का समर्थन करता है।

नोट - इस विवाद की समानता कश्मीर के साथ की जाती है क्योंकि यहां के लोग भी खुद की आजादी की बात करते हैं।

पाकिस्तान और तुर्की ने खुलकर अजरबैजान का समर्थन किया। इसलिए अज़रबैजान-पाकिस्तान-तुर्की के रणनीतिक गठबंधन को संतुलन प्रदान करने के लिए भारत और आर्मेनिया के द्विपक्षीय संबंध अच्छे होना आवश्यक है।

फिलहाल अक्टूबर 2020 में रूस की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच युद्ध विराम का समझौता कर लिया गया है परंतु दोनों देश एक-दूसरे पर युद्धविराम के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं।
युद्ध टालने के लिए तुर्की पर दबाव डालना बहुत जरूरी है, क्योंकि संभावना है, कि युद्ध की स्थिति में तुर्की द्वारा भेजे गए लड़ाके आर्मेनिया में स्थित यजीदियों पर अत्याचार करेंगे।

युद्ध के कारण मध्य एशिया और यूरोप में अजरबैजान द्वारा किया जाने वाला तेल और गैस निर्यात प्रभावित होगा।

SAVE WATER

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