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रण में फूल (भाग-2)

रण में फूल, हिंदी कहानियां

रण में फूल (भाग-2)


उसका नाम विक्रम ही था, या कुछ ओर मैं नहीं जानता। रोज सवेरे 7:30 बजे की चाय मैं उसी टपरी पर पीता था। मैं पिछले एक हफ्ते से किसी नई कहानी की खोज में था। एक रोज वहा ज्यादा भीड़ नहीं थी।
"साहब चाय" रखकर वो जाने लगा।
"ओए छोटू सुन" मैने उसे पुकारा।
"जी साहब"
"क्या नाम है तेरा ?"
"रतन"
"सब तुझे विक्रम क्यू बुलाते है ?"
हाथ बांधे, सर नीचा किए वो अपने पैर से ज़मीन को खुरेचने लगा..कोई जवाब नहीं दिया।

"ए विक्रम चल इधर आ..भैया को चाय दे।"
वो दौड़ता हुए चला गया
उस टपरी पर पूरा दिन वो लड़का सुबह से लेकर शाम तक मौजूद रहता। आस-पास की दुकानों में वो कभी चाय देने गया हो ये मैने कभी नहीं देखा। जब उस टपरी की मालकिन के बच्चे स्कूल से आते तब ना जाने रतन उर्फ विक्रम उन्हें देखकर क्यू खुश होता था ? उस औरत के बच्चों के लिए रतन भी वैसा की एक खिलौना था जैसे कि बाकी के खिलौने जो खरीदे हुए थे।

उसी शाम


"चाय" टेबल पर रखते वक्त मैने कहा।
"और रतन केसा है ?"
उसने कोई जवाब नहीं दिया।

रतन एक 12 साल का मध्यम कद का लड़का था। काली छोटी -छोटी आंखे। हल्के भूरे बाल, सांवला रंग। ओर कभी कभार शायद नहाने से धुला हुआ मासूम चेहरा। लेकिन ये सब वो नहीं था जिसने मेरा ध्यान उसकी तरफ खींचा था। हमेशा एक मुस्कान जो उसके चेहरे पर थी, वो मुझे किसी की याद दिलाया करती थी।

"रतन तेरे पास जूते नहीं है ?"
तपते दिनों में सड़क के किनारे की उस तपती रेत पर उसके पांव झुलस भी सकते है। ऐसा शायद उस औरत ने कभी सोचा भी ना हो। मगर जब मैने ये बात पूछी वो तपाक से बोल पड़ी।

"अरे साहब मैं क्या इसे कोई दुख देती हूं ? मेरे भी बच्चे है।उनके जैसा इसे रखती हूं। जब इसका भाई इसे मुझे बेच गया था, आपने इसकी दशा नहीं देखी थी। इसे सोने या खाने की कभी कोई तकलीफ़ मैने दी हो तो पूछ लो।"

शायद मेरा रतन के लिए बढ़ता स्नेह उस चाय की टपरी की मालकिन ने पहचान लिया था। उसका कुछ बिगाड़ ना हो जाए इस डर से अपने रहमोकरम की बातें करना जरूरी था।

"चल इधर आ साहब लोग से बात करने की क्या जरूरत है, तुझे ? जा पास की दुकान पर चाय देकर आ।"

मैं उस औरत की दरियादिली के किस्से को सच मान भी लेता अगर उसने रतन को किसी ओर अंदाज़ में पुकारा होता।लेकिन अगर वो गुस्से में ना तिलमिलाए तो शायद वहा डेरा डाले ड्राइवर, चाय के बहाने गर्ल्स कॉलेज की लड़कियों को ताड़ने वाले सस्ते आशिक़, गलती से कभी कभार गुजरने वाले 'बड़े साहब' दो पैसा कमाना मुश्किल कर दे।

"आपके पति क्या करते है ?"
पूछने के बाद एहसास हुआ, शायद किसी औरत से ना पूछे जाने वाले सवालों कि फेहरिस्त में यह सवाल भी शामिल कर देना चाहिए।

"क्या करेगा वो साहब! आप तो देख ही रहे हो कैसे-2 पूरा दिन धूप में तप कर इनके लिए खाना और स्कूल की फीस जमा करा पाती हूं।" उसने अपने बच्चो की तरफ इशारा करते हुए कहा।
"और ये लड़का कहां मिला आपको ?" मैने रतन कि ओर इशारा करते हुए पूछा।

इसका जवाब देने में वो थोड़ा हिचकिचाई...फिर कुछ सोच के बोली" आप क्या करते हो साहब ?"
"मैं शहर के बाहर एक स्कूल में टीचर हूं।"

वो हंसने लगी ओर बोली "इसे पढ़ने की क्या जरूरत है ?
ये थोड़ा बहुत पढ़ लिख लेता है।" उसने रतन की ओर इशारा करके कहा। रतन झेंप गया।

"पढ़ने लिखने से क्या कर लेगा ये ? पढ़े लिखे लोग भी क्या करते है ? मैने भी बी ए कर रखी है, सरकारी कॉलेज से। पैसा ही कमाना पड़ता है, साहब। रात को जब मेरे बच्चे पढ़ते है, तो ये भी साथ बैठ जाता है। दो चार अक्षर सीख लेगा तो मेरा धंधा भी सही से कर सकेगा।"

उस औरत की बात को मैं सिरे से खारिज तो नहीं कर सका। करता भी कैसे सच है, ना जाने कितने पढ़े लिखे बेरोजगार डिग्री लिए फिरते है। कितने तो इस टपरी पर देश की बेरोजगारी और सरकार की नाकारी को कोसते है। कुछ ऐसे भी है, जो बिना शिकायत किये प्राइवेट सेक्टर्स, पार्ट टाइम जॉब में संतुष्ट होकर, किसी दूसरे की सफलता की कहानी पढ़कर अंदर ही अंदर कुढ़ते जाते है।

उस औरत के बिजनेस स्किल पर मुझे ज़रा भी संदेह नहीं था।बतौर उस महिला निकम्मी तो सरकार  है। लेकिन अगर कमाना ही सब कुछ था। तो वो औरत अपने बच्चो को उस टपरी पर काम पे क्यू नहीं लगा सकती थी ? इस सवाल का जवाब मेरी समझ के परे था।

अगले दिन सुबह

"आपका नाम क्या है?"
"राधा"
रतन चाय रख कर चला गया मैने देखा कि उसके पैरों में पुराने कुछ फटे काले रंग के स्कूल शूज थे। जब मैं उसके जूतों की तरफ देख रहा था, वो शरमा गया।
 "हा तो आप कह रही थी। ये पढ़ लिख सकता है।"
"हा साहब पढ़ना आता है, इसको।"

"रतन तुम स्कूल गए हो कभी ?"
"हा भैया में यहां आने से पहले स्कूल जाता था।"
"कौनसी स्कूल"
"सरकारी"
"किस क्लास तक स्कूल गए हो ?"
"5 वीं तक"
मेरे हाथ में अखबार था। मैनें उसकी तरफ बढ़ाते हुए इशारा किया उसने कुछ लाइन पढ़ कर सुनाई।
"तुम्हे एबीसीडी आती है ?"
"हा थोड़ी बहुत स्पैलिंग भी आती है और गिनती भी।"
"फिर यहां क्यू काम करता है ?"
कोई जवाब नहीं आया। वो चाय देने चला गया।
रतन से मुझे ये भी पता चला की शाम को राधा अपने बच्चों के साथ उसे पढ़ने नहीं बिठाया करती थी। वो पढ़ते थे और रतन घर के बर्तन साफ करता था। सुबह फिर जल्दी उठ कर बच्चों का काम ओर फिर दुकान का काम करता था। राधा ने कुछ पुराने कपड़े उसे पहनने को दिए थे।
राधा से मुझे पता चला कि रतन के पिता और मां नहीं है।उसका एक भाई और भाभी है। अपने बच्चों को पाल सके इतनी ही हैसियत थी, तो रतन को इस औरत को बेच दिया था। रतन के भाई को अब भी कुछ पैसे देने बाकी थे। इसलिए रतन का जितना पैसा इस टपरी पे काम करके बनता वो सब उसका भाई ले जाता। रतन अपनी क्लास में फर्स्ट आता था।

"मैं इसे रोज सुबह यहां इसी टपरी पे पढ़ा सकता हूं,अगर आप हा करे तो ?" मैने राधा से पूछा।
"हा...थोड़ी देर के लिए ये फ़्री रहता है, काम से तब पढ़ा सकते हो। मगर इसकी कॉपी-किताब मेरे ज़िम्मे नहीं है।"
"मैं लाया हूं।"
मैने रतन को कुछ कॉपी और पेंसिल दिए।

मैं रोज उसे पढ़ाने लगा और यह सिलसिला कई दिनों तक चला। मैं चाहता था, कि उसका एडमिशन किसी स्कूल में करवा दूं। पढ़ाई के लिए उसकी लगन और मुझे उसे पढ़ाते देख वहां आने वाले कई लड़के भी उसे पढ़ाने लगे थे।

"साहब आप यहां मत आया करो, आपके इसको पढ़ाने लिखाने से ये काम से जी चुराने लगा है।"
"आपने इसे कितने में खरीदा है ?"
"उससे आपको क्या मतलब है। लडके रोज-2 नहीं मिलते।"
"इसके भाई से बात करलों ये मेरे साथ रहेगा।"

बहुत देर की बेहस के बाद जब मैने उसे कहा कि ये इंसानों की खरीद-फरोख्त एक गुनाह है और मैं उसे पुलिस के हवाले कर सकता हूं। उसने बहस छोड दी।

दो दिन बाद रतन मेरे साथ था। मैंने उसका एडमिशन करवा दिया। अगले दिन मुझे दिल्ली निकलना था। मैंने प्रीति से शादी करने का फैसला कर लिया था। मैंने देखा कि रात को रतन बालकनी में बैठ कर कोई चित्र बना रहा था। मैं बिना आवाज़ किए उसके पीछे खड़ा हो गया। रतन ने एक रेगिस्तान में खिले फूल की तस्वीर बनाई थी। नीचे लिखा था, रण में फूल।

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