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प्रेरक प्रसंग - गुरु का महत्व

गुरु का महत्त्व

प्रेरक प्रसंग - गुरु का महत्व


एक युवक अत्यंत जिज्ञासु प्रवृत्ति का था। वह अल्प समय में सभी प्रकार का ज्ञान हासिल करना चाहता था। इसके लिए वह अक्सर पुस्तकालय जाता और वहां नई-पुरानी सभी प्रकार की पुस्तकों का अध्ययन करता रहता था।

लगातार किताबें पढ़ते रहने से युवक के ज्ञान में काफी वृद्धि हुई भी थी। और उसे इस बात का बहुत अहंकार भी था।

एक बार युवक को घुड़सवारी सीखने की इच्छा हुई। वह तत्काल पुस्तकालय में पहुंचा और वहां घुड़सवारी से संबंधित पुस्तक खोजने लगा।

काफी देर खोजने के बाद उसे एक पुस्तक मिली जिसमें घुड़सवारी के गुर लिखे हुए थे। उसने एक दिन में ही पूरी पुस्तक पढ़ डाली।

अगले दिन वह अपने एक मित्र के घर गया, जिसके पास एक घोड़ा था।
घोड़ा देख युवक ने मित्र से घुड़सवारी का आग्रह किया।
मित्र ने कहा बैठ कर देखो।

युवक ने घोड़े पर चढ़ने का प्रयास किया, परंतु घोड़े ने उसे गिरा दिया, क्योंकि घोड़ा केवल अपने मालिक को पहचानता था।

युवक ने हर संभव कोशिश की लेकिन सफल न हो सका।
तब मित्र ने पूछा - तुमने घुड़सवारी कहां से सीखी ?
युवक बोला - किताब से।

यह सुनकर मित्र ने कहा किताबें पढ़कर ही सभी कलाएं नहीं सीखी जा सकती। इसके लिए गुरु की जरूरत होती है।
प्रत्येक विद्या का ज्ञान पुस्तकों से होना संभव नहीं है।
विषय पर पूर्ण अधिकार व दक्षता हासिल करने के लिए किसी योग्य गुरु का मार्गदर्शन लेना चाहिए।

देश के पहले उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन 5 सितंबर भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे बचपन से ही किताबें पढ़ने के शौकीन थे और स्वामी विवेकानंद से काफी प्रभावित थे। राधाकृष्णन का निधन चेन्नई में 17 अप्रैल 1975 को हुआ।

पुस्तकें वह साधन है, जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं - डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन

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