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प्रेरक प्रसंग - आचार्य कृपलानी की जाति

प्रेरक प्रसंग - आचार्य कृपलानी की जाति

प्रेरक प्रसंग - आचार्य कृपलानी की जाति

एक बार आचार्य कृपलानी ट्रेन से सफर कर रहे थे। ट्रेन का वह प्रथम श्रेणी का डिब्बा था। इस वजह से उसमें अधिक भीड़ नहीं थी। सभी लोग एक-दूसरे से विभिन्न मुद्दों पर चर्चा में व्यस्त थे‌। उनकी बातों से मालूम पड़ रहा था कि वे सभी पढ़े-लिखे और सभ्य लोग थे। विभिन्न मुद्दों पर होते हुए चर्चा जाति पर आ टिकी और सभी लोग अपनी-2 जाति की महत्ता बताने लगे। कृपलानी जी चुपचाप एक पुस्तक पढ़ने में मशगूल थे। तभी किसी व्यक्ति ने उनसे उनकी जाति के बारे में पूछ लिया, तो उन्होंने परेशान बड़े शांत स्वर में कहा कि -
1. जब मैं सुबह लोटा लेकर नित्यकर्म के लिए जाता हूं तो शूद्र बन जाता हूं।
2. जब गांधी जी के साथ स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करता हूं तो स्वयं को छत्रिय समझता हूं।
3. जब बच्चों को पढ़ाता हूं तो ब्राह्मण बन जाता हूं।
4. और महीने के अंत में वेतन का हिसाब लगाता हूं तो वैश्य बन जाता हूं।
इस प्रकार कृपलानी जी के जातिगत भेदभाव से परे के विचारों को सुनकर उन महाशय का सिर शर्म से नीचे झुक गया और उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया।

शिक्षा - हमें जातिगत भेदभाव से बचना चाहिए और समाज में आपसी भाईचारे को बढ़ावा देना चाहिए। मानवता से बढ़कर कोई धर्म या कोई जाति नहीं हो सकती।

स्पृश्य और अस्पृश्य दोनों को केवल कानून द्वारा एक साथ नहीं रखा जा सकता एक ही चीज प्रेम दोनों को एक साथ रख सकती है... बाबा साहब अंबेडकर

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