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टिड्डी हमलें, नियंत्रण एवं उपाय

टिड्डी हमला एवं नियंत्रण

हाल ही नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर टिड्डी को राष्ट्रीय श्रेणी की आपदा घोषित करने की मांग की हैं।
गौरतलब है कि भारत में इस बार टिड्डियां 19 दिन पहले 2 मई 2020 को ही आ गई।

• कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश में हाल के टिड्डी हमलों में गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र सहित देश के 6 राज्यों में 2 लाख हेक्टेयर से ज्यादा इलाके की फसल को नुकसान हुआ है, वहीं देश के 38% बागवानी उत्पादन पर भी संकट गहरा गया है।


टिड्डी (Locust)

मुख्यतः टिड्डी एक प्रकार के उष्णकटिबंधीय कीड़े होते हैं।
इनके पास उड़ने की अतुलनीय क्षमता होती है, जो विभिन्न प्रकार की फसलों को नुकसान पहुँचाती हैं।
ये गर्मी और बारिश के मौसम में ही सक्रिय होती हैं।
अच्छी बारिश और परिस्थितियाँ अनुकूल होने की स्थिति में ये तेज़ी से प्रजनन करती हैं।


भारत में टिड्डियों की प्रजाति

विश्व में टिड्डियों की 10 प्रमुख प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन भारत में केवल चार प्रजाति ही मिलती हैं।
1. रेगिस्तानी टिड्डी
2. प्रवासी टिड्डी
3. बॉम्बे टिड्डी
4. ट्री टिड्डी

रेगिस्तानी टिड्डी (Schistocerca gregaria)
यह टिड्डियों की सबसे खतरनाक प्रजाति होती है। इससे लोगों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और आर्थिक विकास पर खतरा उत्पन्न होता है।
ये व्यवहार बदलने की अपनी क्षमता में अपनी प्रजाति के अन्य कीड़ों से अलग होती हैं और लंबी दूरी तक पलायन करने के लिये बड़े-बड़े झुंडों का निर्माण करती हैं।
रेगिस्तानी टिड्डी पारंपरिक रूप से पश्चिमी अफ्रीका और भारत के 1.6 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में रहती हैं।


टिड्डियों से संबंधित तथ्य

• आकार - टिड्डी का आकार 0.5 इंच से लेकर 3 इंच तक हो सकता है। तथा इसका वजन 2 ग्राम के लगभग होता है। इसका जीवनकाल कुछ महीनों का होता है।

• आहार - टिड्डियां अपने वजन के बराबर खाना खा सकती हैं। टिड्डियों का एक वर्ग किलोमीटर का झुंड 1 दिन में 35,000 लोगों के बराबर खाना खा सकता है।
एक वर्ग किलोमीटर झुंड में 4-8 करोड़ टिड्डियां होती है।

• रफ्तार - टिड्डी फसलों के सबसे बड़े दुश्मन है। टिड्डी की गति 15 से 20 किलोमीटर प्रति घंटे होती है।
इनकी गति वायु की दिशा और रफ्तार पर भी निर्भर करती है।
एक दिन में 150 किलोमीटर यात्रा कर सकती है।

• टिड्डी दल फसलों को तबाह कर देता है जिससे भुखमरी और अकाल की स्थिति पैदा हो सकती है। पहले कई देशों में इसके कारण अकाल की स्थिति पैदा हो चुकी है।

• मादा टिड्डी मिट्टी में कोस्ट बनाकर अंडे देती है। प्रत्येक कोस्ट में 20 से 100 अंडे होते हैं।

• वयस्क होने तक इनकी त्वचा का रंग 4 से 6 बार बदलता है।

• अकेली टिड्डी खतरनाक नहीं होती। लेकिन जब वे समूह में आ जाते हैं, तब उनका व्यवहार आश्चर्यजनक रूप से बदल जाता है। व्यवहार में यह बदलाव और समूह में रहने की प्रवृत्ति को ग्रेगराइजेशन कहा जाता है।

• टिड्डी आवाज के कंपन को महसूस कर सकती है।

• रेगिस्तान में जब हरियाली सूख जाती है। तब थोड़ी बहुत जो हरियाली होती है, वे उस तरफ आने लगती हैं। ऐसे में झुंड बनने लगता है।
एक साथ होने पर इनमें बदलाव आने लगते हैं।
इनके सेंट्रल नर्वस सिस्टम में सेरेटॉनिन रिलीज होता है।
जिससे इनका व्यवहार बदलने लगता है।


टिड्डियों की उत्पत्ति

टिड्डी का उद्गम लाल सागर के दोनों ओर स्थित अफ्रीका के पूर्वी देशों और सऊदी अरब से हुआ है। इसके बाद यह सऊदी अरब, यमन, ओमान और ईरान से होती हुई पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रांत में आती है।

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चित्र - टिड्डी दल का रास्ता

अफ्रीकी देश इथियोपिया, केन्या, सोमालिया- यमन- ईरान- पाकिस्तान- भारत


• आमतौर पर नवंबर माह तक टिड्डियां खत्म हो जाती है लेकिन इस बार यह नहीं हुआ। क्योंकि वर्ष 2019 में मानसून पश्चिमी भारत में समय से पहले शुरू हुआ, विशेषकर टिड्डियों से प्रभावित क्षेत्रों में। और यह सामान्य रूप से सितंबर/अक्टूबर माह के बजाय एक माह आगे नवंबर 2019 तक सक्रिय रहा।
नवंबर 2019 में बारिश होने से टिड्डी को प्रजनन करने की अनुकूल परिस्थितियों मिली।
साथ ही वर्षा से प्राकृतिक वनस्पति भी पैदा हुई, जिससे उन्हें लंबे समय तक भोजन उपलब्ध रहा।

पश्चिमी हिंद महासागर में अधिक तापमान पाया गया परिणामस्वरूप भारत समेत पूर्वी अफ्रीका में घनघोर वर्षा हुई।
वर्षा के कारण नम हुए अफ्रीकी रेगिस्तानों ने टिड्डियों के प्रजनन को बढ़ावा दिया और वर्षा की अनुकूल हवाओं द्वारा इन्हें भारत की ओर बढ़ने में सहायता मिली।

लॉकडाउन के कारण कीटनाशकों का बेहतर ढंग से छिड़काव नहीं हो पाया।

• संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO)  की नई रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन के कारण टिड्डियां अब अपनी सामान्य क्षमता से 400 गुना तक प्रजनन करने लगी हैं। भारत के लिए यह बेहद चिंताजनक है क्योंकि यहां जलवायु परिवर्तन का असर सबसे अधिक दिख रहा है।


प्रभावित क्षेत्र

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार टिड्डियों के कारण तीन क्षेत्रों (अफ्रीका का हॉर्न क्षेत्र, लाल सागर क्षेत्र, और दक्षिण-पश्चिम एशिया) में स्थिति चिंताजनक है।
अफ्रीका का हॉर्न क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है। इथियोपिया और सोमालिया से टिड्डी दल दक्षिण में केन्या और महाद्वीप के 14 अन्य देशों में पहुँच गए।
लाल सागर क्षेत्र में सऊदी अरब, ओमान और यमन पर टिड्डियों के दल ने हमला किया है, तो वहीँ दक्षिण पश्चिम एशिया में ईरान, पाकिस्तान और भारत में टिड्डियों के झुंडों ने फसल को भारी नुकसान पहुँचाया है।


टिड्डी नियंत्रण एवं उपाय

टिड्डी चेतावनी संगठन
(Locust Warning Organization-LWO)
भारत का टिड्डी नियंत्रण कार्यक्रम दुनिया में सबसे पुराना है। 1926 और 1931 के मध्य टिड्डियों के हमलों में 2 करोड़ रुपए की फसल बर्बाद हो गई थी।
ब्रिटिश सरकार ने 1939 में कराची में टिड्डी चेतावनी संगठन (एलडब्ल्यूओ) की स्थापना की थी।
1946 में एलडब्ल्यूओ कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के पादप संरक्षण, संगरोध और भंडारण निदेशालय के अधीन चला गया।

एलडब्ल्यूओ का प्रमुख कार्य निगरानी करना, सर्वेक्षण करना तथा टिड्डी दल के किसी भी प्रकार के हमले को नियंत्रित करना है।
इस संगठन के दो मुख्यालय हैं -
फरीदाबाद - यह संगठन के प्रशासनिक कार्यों की देखरेख करता है।
जोधपुर - यह संगठन के तकनीकी कार्यों की देखरेख करता है।

• ड्रोन के माध्यम से बिना फसलों वाले स्थान पर मेलाथियान 96 रसायन का छिड़काव किया जाता है।
वही फसलों पर विभिन्न साधनों के द्वारा क्लोरफिरिफोस का छिड़काव किया जाता है।

• टिड्डियां आवाज के कंपन को महसूस कर सकती है। अतः  किसान टिड्डियों को भगाने के लिए परंपरागत प्रयोग (जैसे - खेतों में धुआं करना, बर्तन और डीजे बजाना) करते हैं।

• टिड्डियों के द्वारा दिये गए अंडों को नष्ट कर देना चाहिए।
• कृषि क्षेत्र के आस-पास खाईयाँ खोद कर अपरिपक्व टिड्डियों को जल और केरोसीन के मिश्रण में गिराया जा सकता है।
ड्रोन या हेलीकॉप्टर आदि का प्रयोग कर उनके प्रजनन स्थलों पर कीटनाशकों का छिड़काव किया जाना चाहिए।
सोशल मीडिया (फेसबुक)  पर भी समूह बनाकर टिड्डियों के आगमन की सूचना दी जा सकती है।

सुझाव

• वैश्विक तापन के कारण ही टिड्डियों की संख्या में तीव्र वृद्धि हुई। सभी देशों को वैश्विक तापन को कम करने की दिशा में मिलकर प्रयास करना चाहिेए।
• टिड्डी हमलों को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाना चाहिए क्योंकि इनसे फसलों के साथ-2 चारा एवं चरागाह नष्ट हो जाने के कारण अधिक संख्या में मवेशियों की भी मृत्यु हो जाती है।
• प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में टिड्डियों से नुकसान के लिए बीमा आवरण प्रदान नहीं किया जाता है, जिसे वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर शामिल करने की आवश्यकता है।
• टिड्डियों को उनके उत्पत्ति स्थलों पर ही नष्ट करने के प्रयास किए जाने चाहिए क्योंकि एक बार फैलने पर इन्हें नियंत्रित करना आसान नहीं है।


अन्य संबंधित तथ्य

टिड्डी प्लेग - जब दो से अधिक निरंतर वर्षों के लिये टिड्डियों के झुंड का हमला होता है, तो इसे प्लेग कहा जाता है।

केन्या में टिड्डियों को फ्लाइंग प्रोटीन तथा ऑस्ट्रेलिया में फ्लाइंग झींगे के रुप में जाना जाता है और भोजन के रूप में खाया जाता है।

नेपाल में 1 टिड्डी पकड़ने पर एक रूपया तथा 1 किलो टिड्डी पकड़ने पर ₹500 प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान है। इस प्रोत्साहन राशि को बढ़ाए जानेेे पर विचार किया जा रहा है।

गुजरात और पश्चिमी राजस्थान में टिड्डियों का अचार बनाया जाता है।


हाल ही टिड्डियों को ड्रोन से काबू करने वाला दुनिया का पहला देश कौन बना है ? - भारत

हाल ही जुलाई 2020 में राजस्थान के जैसलमेर-बाड़मेर में MI-17 हेलीकॉप्टर द्वारा टिड्डी नियंत्रण के लिए कौन से रसायन का छिड़काव किया गया है ? - मैलाथियॉन

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