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राजस्थान में लोकायुक्त



राजस्थान में लोकायुक्त

1973 में राजस्थान में लोकायुक्त पद की स्थापना की गई।
न्याय मूर्ति आई डी दुआ राजस्थान के पहले लोकायुक्त थे।

राजस्थान में सर्वप्रथम 1963 में हरिश्चंद्र माथुर की अध्यक्षता में गठित प्रशासनिक सुधार समिति ने लोकायुक्त जैसी संस्था की स्थापना की सिफारिश की थी जो कार्यपालिका के कार्यो पर नजर रखें तथा शिकायतों व भष्ट्राचार के मामलों की जांच कर सकें।

भारत में लोकपाल अथवा लोकायुक्त का नाम 1963 में प्रसिद्ध कानूनविद् एम. एल. सिंघवी ने दिया था।


राष्ट्रीय स्तर पर 5 जनवरी 1966 को मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया। 
इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, अकुशलता तथा जन सामान्य की शिकायतों के शीघ्र निवारण के लिए केंद्रीय स्तर पर लोकपाल तथा राज्य स्तर पर लोकायुक्त नामक संस्था की स्थापना की सिफारिश की।

देश में सर्वप्रथम 1970 में ओडिशा में लोकपाल  बिल पारित किया गया, परंतु ओडिशा में लोकायुक्त पद की स्थापना 1983 में की गई।

सर्वप्रथम 1971 में महाराष्ट्र में लोकायुक्त पद की स्थापना की गई।

1973 में राजस्थान में लोकायुक्त तथा उप लोकायुक्त अध्यादेश पारित किया गया। इसके तहत राजस्थान में लोकायुक्त्त्त पद की स्थापना की गई।

केरल में लोकायुक्त को पब्लिक मैन, जम्मू-कश्मीर में कमिश्नर ऑफ इंक्वायरी कहा जाता है।

लोकायुक्त की नियुक्ति

लोकायुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
राजस्थान में लोकायुक्त की नियुक्ति मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष एवं हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सलाह के बाद राज्यपाल द्वारा की जाती है।

हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को लोकायुक्त नियुक्त किया जा सकता है।

लोकायुक्त का कार्यकाल

राजस्थान में लोकायुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष का था जिसे मार्च 2018 में सरकार द्वारा बढ़ाकर 8 वर्ष कर दिया गया है।

जुलाई 2019 में लोकपाल एवं उप लोकायुक्त कानून में संशोधन किया गया और लोकायुक्त का कार्यकाल वापिस 8 वर्ष से 5 वर्ष कर दिया गया।
अतः वर्तमान में राजस्थान में लोकायुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष है।

राजस्थान के प्रथम तथा एकमात्र उप लोकायुक्त श्री के पी यू मेनन थे।

अब तक 12 लोकायुक्तो की नियुक्ति हो चुकी है।
12वें लोकायुक्त न्यायमूर्ति एसएस कोठारी के इस्तीफे के बाद वर्तमान में राजस्थान में लोकायुक्त का पद रिक्त है।

हटाने की प्रक्रिया
कदाचार या असमर्थता की स्थिति में लोकायुक्त को राज्यपाल द्वारा हटाया जा सकता है।

लोकायुक्त का वेतन हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समान होता है।

लोकायुक्त की संरचना

लोकायुक्त
  ⬇️
उप लोकायुक्त
 ⬇️
सचिव
 ⬇️
उप सचिव
⬇️
सहायक सचिव

लोकायुक्त का प्रतिवेदन
लोकायुक्त अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपता है। जिस पर  राज्यपाल विधानसभा  में चर्चा करवाता है।

लोकायुक्त का पद रिक्त होने पर उप लोकायुक्त तथा उप लोकायुक्त का पद रिक्त होने पर लोकायुक्त उसके कार्यों का निर्वहन करता है।
दोनों का ही पद रिक्त होने पर राज्यपाल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से सलाह करके हाईकोर्ट के किसी भी न्यायाधीश को इनका कार्यभार सौंप सकता है।

लोकायुक्त निम्नलिखित के विरूद्ध शिकायत की जांच करने का अधिकार रखता है -

राज्य के सभी मंत्री, राज्य का कोई भी लोक सेवक।
जिला प्रमुख तथा उप जिला प्रमुख। 
पंचायत समितियों के प्रधान तथा उपप्रधान।
नगर निगम के महापौर तथा उपमहापौर।
स्थानीय प्राधिकरण नगर परिषद तथा नगर पालिका के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष।
नगर विकास न्यास (यूआईटी) के अध्यक्ष।

लोकायुक्त निम्नलिखित के विरूद्ध शिकायत की जांच नहीं कर सकता है -

राजस्थान के मुख्यमंत्री,  महालेखाकार, विधायक, सरपंच, पंच।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीश।
भारत के किसी भी न्यायालय के अधिकारी अथवा कर्मचारी।
राजस्थान विधानसभा सचिवालय के कर्मचारी अधिकारी।
सेवानिवृत्त लोक सेवक।
राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अथवा सदस्य। (RPSC)
राज्य का निर्वाचन आयुक्त।

NOTE:- 5 वर्ष से अधिक पुराने मामलों में शिकायत व जांच नहीं की जा सकती है।

शिकायत प्रक्रिया
शिकायतकर्ता अपने स्पष्ट नाम व पते के साथ ₹10 के शपथ पत्र द्वारा शिकायत कर सकता है। शिकायतकर्ता इस पत्र को लोकायुक्त, सचिव, उप सचिव, सहायक सचिव किसी को भी भेज सकता है।
लोकायुक्त देखेगा कि किस लोकसेवक के विरुद्ध शिकायत की गई है यदि शिकायत दुर्भावना के साथ की गई है तो लोकायुक्त जांच प्रक्रिया को वहीं रोक देगा अन्यथा जांच प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
लोकसेवक या उसके विभाग से तथ्यात्मक रिपोर्ट या दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। स्वयं लोक सेवक को भी पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है।
शिकायत सही पाए जाने पर लोकायुक्त राज्य सरकार को संबंधित लोक सेवक पर अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए लिख सकता है।
इस आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि लोकायुक्त एक सलाहकार संस्थान है।

लोकायुक्त के कार्य
किसी भी लोक सेवक, राजनीति पदाधिकारी के खिलाफ शिकायत प्राप्त करना।
शिकायत की जांच करना।
शिकायत सही नहीं होने पर शिकायतकर्ता को भी दंडित कर सकता है।
स्वत: संज्ञान लेकर भी जांच प्रारंभ कर सकता है।
लोक सेवकों के कृत्यों के विरुद्ध भी शिकायत मिलने पर जांच कर सकता है। जैसे - लोक सेवक द्वारा किसी को हानि पहुंचाना।

लोकायुक्त की शक्तियां
लोक सेवक या उसके विभाग से जांच हेतु दस्तावेज मंगवाना
लोक सेवक से शपथ पत्र लेना
जांच के दौरान किसी भी व्यक्ति विशेष या लोक सेवक को लोकायुक्त कार्यालय में बुला सकता है।
उच्च न्यायालय से किसी भी प्रकार के अभिलेख की प्रतिलिपि मांग सकता है।

लोकायुक्त की सीमाएं या आलोचनाएं
बहुत से लोक सेवक एवं पदाधिकारी अभी भी लोकायुक्त की जांच के दायरे से बाहर है। जैसे - मुख्यमंत्री,  महालेखाकार, विधायक, सरपंच, पंच।
लोकायुक्त की रिपोर्ट पर सदन में उचित चर्चा नहीं होती है।
स्वयं की जांच एजेंसी का अभाव।
कर्मचारियों की कमी।
लोकायुक्त को लेकर लोगों में जागरूकता का अभाव है।

लोकायुक्त को सशक्त बनाने के सुझाव
सभी लोक सेवक एवं पदाधिकारियों को लोकायुक्त की जांच के दायरे में लाया जाए
इसकी सिफारिशों को सरकार द्वारा गंभीरता से लिया जाए।
किसी भी लोक सेवक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की सिफारिश करने पर सरकार द्वारा तत्काल कार्यवाही की जानी चाहिए।
लोकायुक्त का स्वयं का जांच तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।

गौरतलब है कि राजस्थान सरकार द्वारा 28 फरवरी 2014 को मौजूदा लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन कर इसे सशक्त तथा प्रभावी बनाने हेतु महाधिवक्ता नरपत मल लोढा की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया गया।

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