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अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी। उपग्रह। प्रक्षेपण यान

 
Types of Satellite


उपग्रह एवं प्रक्षेपण यान

उपग्रह की कक्षाएं :
कक्षा :- किसी भी खगोलीय पिंड अथवा उपग्रह, जो किसी अन्य खगोलीय पिंड की परिक्रमा कर रहा है ,का काल्पनिक पथ कक्षा कहलाता है।

कक्षा के प्रकार :- 
(i) निम्न भू कक्षा
यह 160 -2000 Km की ऊंचाई पर अवस्थित है। मुख्यतः 900-1000 Km ऊंचाई का उपयोग किया जाता है।
इसका उपयोग मुख्यतः सुदूर संवेदी उपग्रहों हेतु किया जाता है परंतु आजकल इसका उपयोग संचार व नौवहन उपग्रहों हेतु भी किया जाने लगा है।
इसका उपयोग साउंडिंग रॉकेट ,परीक्षण उपग्रहों हेतु भी किया जाता है। जैसे- स्पूतनिक ,आर्यभट्ट, भास्कर।
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन भी यही अवस्थित है ।(400km, 15 चक्कर/दिन)‌ ।
इस कक्षा में उपग्रह का परिक्रमण काल 90-128 मिनट तक होता है।

(ii) धु्वीय कक्षा
यह निम्न भू कक्षा का एक विशेष प्रकार है।
यह कक्षा पृथ्वी के धुवीय अक्ष के समांतर होती है।
इसका उपयोग मुख्यतः सुदूर संवेदी उपग्रहों हेतु किया जाता है।
उपयोग - 
• सुदूर संवेदन
• जासूसी व निगरानी
• वातावरण जलवायु परिवर्तन का अध्ययन

(iii) सूर्य तुल्यकालिक कक्षा
यह निम्न भू कक्षा का एक विशेष प्रकार है।
इस कक्षा में उपग्रह की कक्षा का झुकाव सूर्य के सापेक्ष स्थिर रहता है।
उपग्रह समान अक्षांश पर समान स्थानीय समय पर पहुंचता है।
उपयोग - 
• पृथ्वी के मानचित्रण व इमेजिंग में
• जासूसी व निगरानी
• सुदूर संवेदन में
• वातावरण का अध्ययन करने में

(iV) मध्य भू कक्षा
यह निम्न भू कक्षा (2000km) व भूतुल्यकालिक कक्षा (35786Km) के मध्य अवस्थित है।
इसमें मुख्यतः 20200 Km ऊंचाई का उपयोग किया जाता है।
इसका उपयोग मुख्यतः नौवहन उपग्रह हेतु किया जाता है । (GPS, GLONASS,GALILEO ) 
इस कक्षा में उपग्रह का परिक्रमण काल 2 से 24 घंटे तक होता है।

(V) भू तुल्यकालिक कक्षा
यह 35786 Km की ऊंचाई पर अवस्थित है।
इस कक्षा में पृथ्वी का परिभ्रमण काल तथा उपग्रह का परिक्रमण काल समान होता है।
उपग्रह एक दिन में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है।(23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड)।
इसका उपयोग मुख्यतः संचार उपग्रहों हेतु किया जाता है परंतु इसमें नौवहन उपग्रह भी प्रक्षेपित किए जा सकते हैं। (NAVIC/IRNSS)

(Vi) भूस्थिर कक्षा
यह भूतुल्यकालिक कक्षा का एक विशेष प्रकार है।
यह कक्षा पृथ्वी के विषुवत रेखीय तल के समांतर होती हैं।
इस कक्षा में उपग्रह पृथ्वी के सापेक्ष सदैव स्थिर प्रतीत होता है।
इसका उपयोग मुख्यतः संचार उपग्रहों हेतु किया जाता है परंतु इसे नौवहन अथवा सुदूर संवेदन हेतु प्रयुक्त किया जा सकता है।

(Vii) भू तुल्यकालिक/भूस्थिर स्थानांतरण कक्षा (GTO) :-
यह कक्षा भूस्थिर अथवा भूतुल्यकालिक कक्षा से लगभग 200 Km नीचे स्थित होती है।
प्रारंभ में संचार उपग्रह को इसी कक्षा में प्रक्षेपित किया जाता है, तत्पश्चात उसे भूस्थिर कक्षा में स्थानांतरित कर दिया जाता है।

(Viii) होहमन स्थानांतरण कक्षा
यह एक दीर्घवृत्ताकार कक्षा है जिसका उपयोग किसी उपग्रह को एक वृत्ताकार कक्षा से दूसरी वृत्ताकार कक्षा में स्थानांतरित करने हेतु किया जाता है।

(iX) ग्रेवयार्ड कक्षा -
इसे जंक या डिस्पोजल कक्षा भी कहते हैं।
यह 36050 Km की ऊंचाई पर अवस्थित है।(भूतुल्यकालिक कक्षा से लगभग 300 किलोमीटर ऊपर)।
इसका उपयोग अंतरिक्ष कचरे की समस्या के निस्तारण हेतु किया जाता है।
निष्क्रिय उपग्रहों को इस कक्षा में स्थानांतरित कर दिया जाता है।

प्रणोदक व क्रायोजेनिक स्टेज:-
प्रणोदक :-
ईधन और ऑक्सीकारक को संयुक्त रूप से प्रणोदक कहां जाता है।
ईंधन + ऑक्सीकारक = प्रणोदक
प्रक्षेपण यान या रॉकेट, संवेग संरक्षण के सिद्धांत पर कार्य करता है।
जब ईधन को ऑक्सीकारक की उपस्थिति में दहन किया जाता है तो भारी मात्रा में गर्म दाबित गैसें से नीचे की ओर उत्सर्जित होती हैं जिसे रॉकेट को ऊपर की ओर बल(प्रणोद) मिलता है ।

प्रणोदक के प्रकार :-
1. ठोस प्रणोदक
2. द्रव प्रणोदक
3. क्रायोजेनिक स्टेज

(1) ठोस प्रणोदक -
ईंधन : हाइड्रोक्सिल टर्मिनेटेड पॉलीब्यूटाडाइन (HTPB)
ऑक्सीकारक : अमोनियम परक्लोरेट

(2) द्रव प्रणोदक -
लोअर स्टेज
ईंधन : अनसिमेट्रिक डाईमेथिल हाइड्राजीन (UDMH)
ऑक्सीकारक : नाइट्रोजन पराॅक्साइड

अपर स्टेज
ईंधन : मोनो मेथिल हाइड्रोजन (MMH)
ऑक्सीकारक : नाइट्रोजन के ऑक्साइड

(3) क्रायोजेनिक स्टेज -
ईंधन : तरल हाइड्रोजन (-253°C) 
ऑक्सीकारक : तरल ऑक्सीजन (-183°C)

क्रायोजेनिक इंजन का संक्षिप्त इतिहास 
1990 : ISRO व GLAVKOSMOS के मध्य क्रायोजेनिक तकनीक के हस्तांतरण संबंधी समझौता हुआ।
1991 : सोवियत संघ का विघटन हो गया चूंकि रूस MTCR का सदस्य था परंतु भारत नहीं था । अतः उपर्युक्त समझौता रद्द हो गया।
1993 : भारत और रूस के मध्य एक नया समझौता हुआ जिसके तहत रूस भारत को 7 क्रायोजेनिक इंजन प्रदान करेगा।
1994 : ISRO द्वारा महेंद्रगिरी तमिलनाडु में "क्रायोजेनिक अपर स्टेज प्रोग्राम" की शुरुआत की गई।

2014 : भारत ने स्वदेशी निर्मित क्रायोजेनिक इंजन का सफल परीक्षण किया ।(C.E. - 7.5, C.E. - 20) 
भारत क्रायोजेनिक तकनीक विकसित करने वाला विश्व में 6th देश है।
‌ISRO द्वारा विकसित C.E.- 20 विश्व में अब तक का सबसे शक्तिशाली क्रायोजेनिक इंजन है।

प्रक्षेपण यान
प्रक्षेपण यान एक रॉकेट इंजन पर प्रणोदित वाहन है, जिसका उपयोग पर पेलोड (सेटेलाइट, उपकरण आदि) को पृथ्वी की सतह से पृथ्वी की कक्षा या अंतरिक्ष तक ले जाने हेतु किया जाता है।

प्रक्षेपण यान के प्रकार
> ऐतिहासिक -
• सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SLV)
• ऑगमेन्टेड सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल (ASLV)

> वर्तमान
• पोलर सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV)
• जियोसिंक्रोनस सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV)

> भविष्य के
• रियूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV)

• स्मॉल सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV)


(1) SLV (उपग्रह प्रक्षेपण यान) 
प्रथम पीढ़ी का प्रक्षेपण यान 
इसका विकास डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में किया गया।
इसका प्रथम परीक्षण 1979 में किया गया जो असफल रहा। दूसरा परीक्षण 1980 में किया गया जो सफल रहा।
इसमें 4 स्टेज ठोस प्रणोदक का उपयोग किया गया ।
यह 40 - 50 किलोग्राम के सेटेलाइट को निम्न भू कक्षा में स्थापित करने में सक्षम था।
इसके माध्यम से रोहिणी सीरिज के सेटेलाइट प्रक्षेपित किए गए।

(2) ASLV (संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान) 
दूसरी पीढ़ी का प्रक्षेपण यान
इसका उपयोग 1987 से 1994 के बीच किया गया।
इसमें 5 स्टेज ठोस प्रणोदक का उपयोग किया गया।
यह 140 - 150 किलोग्राम सेटेलाइट को निम्न भू कक्षा में स्थापित करने में सक्षम था।
इसके माध्यम से स्ट्रेचड रोहिणी सीरिज सेटेलाइट ( SRoSS) प्रक्षेपित किए गए।

(3) PSLV (ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान)
तीसरी पीढ़ी का प्रक्षेपण यान 
यह ISRO का मुख्य प्रक्षेपण यान है ।
इसका प्रयोग 1994 से किया जा रहा है।
इसमें चार स्टेज प्रणोदक का प्रयोग होता है (ठोस, द्रव, ठोस, द्रव) 
इसमें 6 स्ट्रेप ऑन बूस्टर्स का उपयोग किया जा सकता है जिनमें ठोस प्रणोदक का उपयोग होता है।
इसमें S-139 इंजन( ठोस स्टेज) तथा विकास इंजन (द्रव स्टेज) का उपयोग होता है।

PSLV के प्रकार:-

कोर अलोन
 ग्राउंड /स्टैंडर्ड
 एक्स्ट्रा लार्ज

4 stage propellant

4 stage propllent

 4 stage propellant
 No strap on boosters
6 strap on boosters with 9 tonne solid propellant

 6 strap on boosters with 12 tonne solid propellant

 1100 kg Satellite upto LEO
1680 kg satellite  up to LEO
1800 kg satellite upto LEO


(4) GSLV (जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल)
चतुर्थ पीढ़ी का प्रक्षेपण यान
यह ISRO का सबसे शक्तिशाली प्रक्षेपण यान है।
इसका प्रयोग 2001 से किया जा रहा है।
इसमें तीन स्टेज प्रणोदक का उपयोग होता है (ठोस, द्रव, क्रायोजेनिक) 
इसमें 4 स्ट्रेप ऑन बूस्टर्स का उपयोग किया जा सकता है, जिनमें द्रव प्रणोदक का उपयोग होता है।
इसमें S-200 इंजन(ठोस स्टेज), विकास इंजन (द्रव स्टेज), C.E 7.5 / C.E 20 (क्रायोजेनिक स्टेज) का उपयोग होता है।

GSLV के प्रकार:-

GSLV -mk1


Russian KVD engine was used
 GSLV- mk2


C.E 7.5 engine is used
 GSLV-MK3

C.E 20 engine is used
 1.5 tonne satellite upto GTO

2.5 tonne on satellite up to GTO

 4 tonne satellite upto GTO
 
5 tone satellite  up to LEO 

 10 tonnes Satellite up to LEO

 

(5) रियूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) 
PSLV, GSLV जैसे पारंपरिक प्रक्षेपण यान को केवल एक बार उपयोग किया जा सकता है। इससे प्रक्षेपण की लागत बढ़ती है तथा मानव मिशन संभव नहीं हो पाता है।
RLV ऐसा प्रक्षेपण यान है जो पेलोड (सेटेलाइट, स्पेसक्राफ्ट) को अंतरिक्ष में लॉन्च करने के बाद पुनः पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करता है तथा उच्च ताप व दाब परिस्थितियों को सहन करते हुए लक्षित स्थान पर लैंड करता हैं।
इस प्रकार RLV को एक से अधिक बार प्रक्षेपण हेतु प्रयुक्त किया जा सकता है।

2016 में ISRO द्वारा RLV-TD(Technology demonstrator) का सफल परीक्षण किया गया।
इसमें स्क्रैमजेट इंजन का प्रयोग किया गया है।

इसके तहत निम्नलिखित परीक्षण किए गए हैं - 
1. हाइपरसोनिक फ्लाइट
2. ऑटोनॉमस लैंडिंग
3. पावर्ड क्रूज फ्लाइट
4. हाइपरसोनिक फ्लाइट यूजिंग एयर ब्रीदींग प्रपल्शन

महत्व :- 
• प्रक्षेपण की लागत में कमी
• फ्रिक्वेंट प्रक्षेपण संभव
• मानव मिशन संभव

(6) SSLV (लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान)
ISRO द्वारा निर्माणाधीन "बेबी रॉकेट"

विशेषता :-
• 15 दिनों में असेंबल करने योग्य
• छोटे सेटेलाइट(माइक्रो/ नैनो सेटेलाइट) ले जाने में सक्षम (500 kg upto LEO ; 300 Kg up to SSO)
• मल्टीपल ऑर्बिटल ड्रॉप ऑफ क्षमता से युक्त
इसमें 3 स्टेज ठोस प्रणोदक का उपयोग किया जाएगा।

महत्व :-
• प्रक्षेपण लागत में कमी
• फ्रिक्वेंट प्रक्षेपण संभव
• रेवेन्यू में वृद्धि


उपग्रह (Satellite)

उपग्रह के प्रकार :-
1. सुदूर संवेदी उपग्रह
2. संचार उपग्रह
3. नौवहन उपग्रह
4. अंतरिक्ष अनुसंधान उपग्रह

1. सुदूर संवेदी उपग्रह
किसी वस्तु के भौतिक संपर्क में आए बिना उसके बारे में जानकारियां प्राप्त करना सुदूर संवेदन कहलाता है।
सुदूर संवेदन हेतु प्रयुक्त उपग्रह सुदूर संवेदी उपग्रह कहलाते हैं।
इन्हें सामान्यतः निम्न ‌भू कक्षा में प्रक्षेपित किया जाता है, जहां इनका आवर्तकाल 90 - 128 मिनट तक हो सकता है।

सुदूर संवेदी उपग्रह पर विभिन्न प्रकार के कैमरे में सेंसर लगे होते हैं जो सूक्ष्म तरंगों, अवरक्त तरंगों ,दृश्य तरंगों का प्रयोग करते हैं।
जैसे -
लाइन इमेजिंग सेल्फ स्क्रीनिंग कैमरा
वाइड फील्ड सर्वे
पेन क्रोमेटिक कैमरा
ओशन कलर कैमरा
वेरी हाई रेजोल्यूशन स्पेक्ट्रोमीटर/ रेडियोमीटर

सुदूर संवेदी उपग्रह के उपयोग :-
• संसाधनों का आकलन - (वन, मरुस्थल, कृषि, जल, समुंद्र, खनिज) 
• मौसम अनुसंधान
• आपदा प्रबंधन (पूर्व चेतावनी, आंकलन, खोज, बचाव)
• शहरी नियोजन
• ग्रामीण विकास
• जासूसी व निगरानी

भारत द्वारा पहला सुदूर संवेदी उपग्रह IRS-1A‌ 1988 में USSR की मदद से प्रक्षेपित किया गया। (इंडियन रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट - IRS)
वर्तमान में भारत के 13 सुदूर संवेदी उपग्रह सक्रिय हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं -
1. ResourceSAT - संसाधनों का पता लगाने हेतु
2. OceanSAT - समुद्री संसाधनों का पता लगाने हेतु
3. CartoSAT - मानचित्र करण व्यर्थ इमेजिंग हेतु
4. RISAT - अर्थ ऑब्जरवेशन हेतु
5. Megha Tropiques - ISRO व CNES फ्रांस की संयुक्त परियोजना उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में जल चक्र के अध्ययन हेतु
6. Saral - ISRO व CNES फ्रांस की संयुक्त परियोजना , Satellite with Argos and Altika, समुद्र विज्ञान अध्ययन हेतु
7. Metsat/कल्पना 1 - भूस्थिर कक्षा में प्रक्षेपित सुदूर संवेदी उपग्रह मौसम की जानकारी देना वातावरण का अध्ययन

2. संचार उपग्रह 
संचार प्रक्रिया में प्रयुक्त उपग्रह संचार उपग्रह कहलाते हैं । इन्हें सामान्यतः भूस्थिर कक्षा में प्रक्षेपित किया जाता है, जहां इनका आवर्तकाल 24 घंटे होता है।

संचार उपग्रहों पर ट्रांसपोंडर लगे होते हैं। यह अपलिंक वह डाउनलिंक द्वारा संचार सुनिश्चित करते हैं।

संचार उपग्रह का उपयोग :- 
(1) दूरसंचार
(2) दूरदर्शन/टेलीविजन प्रसारण
(3) डीटीएच सेवाओं के प्रदायगी 
(4) दूरस्थ शिक्षा
(5) दूरस्थ चिकित्सा

भारत द्वारा पहला संचार उपग्रह INSAT-1B 1983 में NASA की मदद से प्रक्षेपित किया गया।
INSAT- 1A का 1982 में प्रक्षेपण असफल रहा था।

संचार उपग्रहों के तहत INSAT व GSAT सीरीज के उपग्रह प्रक्षेपित किए गए (Indian National Satellite - INSAT, Geostationary Satellite - GSAT)

वर्तमान में भारत के 15 संचार उपग्रह सक्रिय हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित है :-
(1). एंग्री बर्ड : वायु सेना हेतु
(2). रुकमणी : नौसेना हेतु
(3). Gramsat : ग्रामीण विकास दूरसंचार व दूरस्थ शिक्षा हेतु।
(4). Edusat : दूरस्थ शिक्षा

3. नौवहन उपग्रह
उपग्रह नौवहन एक ऐसी प्रणाली है जिसमें उपग्रहों का उपयोग कर सब्जेक्ट की भूस्थानिक अवस्थिति पता की जाती है।
इससे सब्जेक्ट के अक्षांश, देशांतर व ऊंचाई का पता लगाया जाता है।
संपूर्ण पृथ्वी पर नौवहन हेतु 24 उपग्रह आवश्यक होते हैं।
सब्जेक्ट की त्रिविमीय स्थिति का पता लगाने हेतु न्यूनतम 4 उपग्रहों की आवश्यकता होती है।

नौवहन तंत्र के 3 मुख्य अवयव होते हैं :- 
I. स्पेस सेगमेंट
II. कंट्रोल सेगमेंट
III. यूजर सेगमेंट

नौवहन प्रणाली दो प्रकार की सेवा प्रदान करते हैं :-
1. स्टैंडर्ड पोजीशन सर्विस - आम नागरिकों हेतु
2. रेस्ट्रिक्टेड सर्विस - सेना व महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालयों हेतु।


विश्व के प्रमुख नौवहन तंत्र :- 
1. GPS - यूएसए
2. Glonass - रूस 
3. गेलिलियो - यूरोपीय संघ
4. Beidou - चीन
5 Navic/IRNSS -‌ ‌भारत


ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) :
USA का नौवहन तंत्र
इससे Navstar भी कहा जाता है(नेवीगेशन सेटेलाइट एंड रेन्जिंग)
इसका नियंत्रण USA की वायुसेना के पास है।
GPS प्रणाली का पहला उपग्रह 1978 में प्रक्षेपित किया गया। इस प्रणाली ने 1995 में पूर्ण रूप से कार्य करना आरंभ कर दिया।
इस प्रणाली में कुल 32 उपग्रह है।
यह उपग्रह मध्य भू कक्षा में प्रक्षेपित किए गए हैं।

NAVIC(IRNSS)- नेवीगेशन विद इंडियन कांस्टेलेशन :
नेविगेशन विद इंडियन कान्स्टेलेशन
भारत की क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली 
इसे IRNSS यह कहा जाता है(इंडियन रीजनल नेवीगेशन सेटेलाइट सिस्टम)
यह भारत की सीमा से 1500 किलोमीटर की परास में नौवहन सुविधा उपलब्ध करवाता है।
 
इस प्रणाली में अभी तक 8 उपग्रह प्रक्षेपित किए गए हैं -
3 भूस्थिर कक्षा में
5 भूतुल्यकालिक कक्षा ‌मे 

अनुप्रयोग :-
• स्थलीय, हवाई व समुद्री नौवहन हेतु
• मैपिंग व भू सर्वेक्षण में
• आपदा प्रबंधन में
• मोबाइल फोन में नौवहन हेतु
• सटीक समय निर्धारण में
• वाहनों की ट्रैकिंग फ्लीट मैनेजमेंट में

गगन(GAGAN) :
GPS ऐडेड जियो ऑगमेंटेड नेवीगेशन सिस्टम
ISRO व एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया की संयुक्त परियोजना।
गगन उपग्रहों व ग्राउंड स्टेशन से युक्त प्रणाली है जो GPS संकेतों का उन्नयन करती है, जिससे उनकी गुणवत्ता व सटीकता में वृद्धि होती है।
इससे भारतीय उड़ान सूचना क्षेत्र में बेहतर नौवहन सेवाएं प्रदान की जा सकती हैं।

अनुप्रयोग:- 
• वायु परिवहन में
• Gemini एप्लीकेशन में ( गगन इनेबल्ड मरीनर्स इंस्ट्रूमेंट फॉर नेवीगेशन एंड इनफॉरमेशन) 
• मिसाइल नौवहन में
• वन संरक्षण में (कर्नाटक वन विभाग)

4. अंतरिक्ष विज्ञान उपग्रह (space science satellite) :
अंतरिक्ष के अध्ययन हेतु मुख्यत: 4 मिशन प्रक्षेपित किए जाते
 हैं -
1. Flyby mission
2. Orbiter
3. Lander 
4. Rover

1. फ्लाई बाई मिशन :-‌
यह मिशन अंतरिक्ष में किसी खगोलीय पिंड के पास से गुजरते हुए सूचना एकत्रित करता है।
उदाहरण - नासा का मैसेंजर मिशन बुध ग्रह हेतु।

2. आर्बिटर : -‌
यह मिशन अंतरिक्ष में किसी खगोलीय पिंड के चारों ओर चक्कर लगाते हुए सूचनाएं एकत्रित करता है।
उदाहरण - ISRO का चंद्रयान, मंगलयान

3. लैंडर :- 
यह मिशन किसी खगोलीय पिंड की सतह पर लैंड करता है तथा एक ही स्थान पर रहते हुए सूचना एकत्रित करता है।
उदाहरण - नासा का इनसाइट मिशन मंगल ग्रह हेतु।

4. रोवर :- 
यह मिशन किसी खगोलीय पिंड की सतह पर गति करते हुए सूचना एकत्रित करता है।
उदाहरण - नासा का क्यूरोसिटी रोवर मंगल ग्रह हेतू।

SAVE WATER

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