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राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था

 
Administrative system of Rajasthan


मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था

• मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था सामंती व्यवस्था पर टिकी हुई थी।

सामंती व्यवस्था:- सामंती व्यवस्था से तात्पर्य ऐसी व्यवस्था से है, जिसमें प्रशासनिक व सैनिक व्यवस्था सगौत्रीय व रक्‍त संबंधों पर आधारित थी तथा राजा समकक्षों में प्रथम हुआ करता था।
इस व्यवस्था के अनुसार बड़ा भाई राजा बनता था तथा छोटे भाइयों को जीवन निर्वाह के लिए तथा प्रशासनिक व्यवस्था संभालने के लिए भूमि आवंटित की जाती थी। इस भूमि को जागीर व इसके मालिक को सामन्त कहा जाता था।
सामंतों का इन जागीरों पर वंशानुगत अधिकार हुआ करता था।

यूरोप में सामन्ती व्यवस्था में राजा और सामन्त के बीच स्वामी व सेवक का संबंध होता था, परन्तु हमारी सामन्ती व्यवस्था बंधुत्व पर आधारित थी।

 • मध्यकाल में मुगलों की मनसबदारी से प्रभावित होकर हमारी सामंती व्यवस्था पदसोपान जैसी हुई परंतु फिर भी मूल ढांचा यथावत बना रहा।
• हमारी सामंती व्यवस्था का स्वरूप एक टेंट के समान था, जिसका मध्य का मुख्य स्तंभ राजा हुआ करता था व अन्य छोर के स्तंभ सामंत थे। किसी भी एक स्तंभ के हिलने से पूरी व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता था।

सामंतों द्वारा राज्य को दिए जाने वाले कर:- 
1.रेख :- सामंत द्वारा राज्य को दिया जाने वाला एक निश्चित भू-राजस्व रेख कहलाता था। राजपूतों के मुगलों के संपर्क में आने के बाद रेख व्यवस्था नियमित हुई।

 रेख दो प्रकार की होती थी - 
(i)पट्टा रेख          (ii)भरतु रेख

(i) पट्टा रेख:- वह अनुमानित भू-राजस्व जो जागीर दिए जाते समय पट्टे में लिखा होता था।
(ii) भरतु रेख:- वह वास्तविक, भू-राजस्व जो जागीरदार राज्य को भरता था।

2.चाकरी:-
• राज्य को जागीरदार द्वारा युद्ध व शान्ति के समय दी जाने वाली सेवा चाकरी कहलाती थी।
• युद्ध के समय तो जागीरदार अपनी सेना (जमीयत) सहित राज्य की सेवा में हाजिर होता था। 
• शान्तिकाल के समय सामन्त वर्ष में एक बार सेना सहित दरबार में हाजिर होता था तथा उस समय के लिए उन्हें विशेष दायित्व दे दिए जाते थे। दशहरा, आखातीज आदि अवसरों पर भी सामन्त दरबार में जाते थे।
जैसलमेर एकमात्र रियासत थी,जिसमें चाकरी के बदले धन मिलता था

3.उत्तराधिकार शुल्क:-
• जागीरदार की मृत्यु के बाद राज्य जागीर पर जब्ती बैठाता था। नया जागीरदार जागीर प्राप्त करने की एवज में राज्य को कर चुकाता था जिसे मेवाड़ में कैद खालसा, तलवार बंधाई या नजराना तथा मारवाड़ में हुक्मनामा या पेशकशी कहा जाता था।
• यह एक प्रकार से जागीर का नवीनीकरण शुल्क था।
• अपवाद - जैसलमेर

4.नजराना:-
राजा के बड़े बेटे की पहली शादी पर सामन्तो द्वारा दिया जाने वाला कर नजराना कहलाता था।
• दशहरा, आखातीज आदि अवसरों पर राजा को जो भेंट दी जाती थी, उसे भी नजराना कहते थे।

5.न्योत कर:-
राजकुमारियों की शादी पर दिया जाने वाला कर।

6.गनीम बराड:- 
युद्ध के समय लिया जाने वाला कर।

सामंतो को मिलने वाले सम्मान /विशेषाधिकार
1.ताजीम:-
सामन्त के दरबार में हाजिर होने पर राजा खड़े होकर उसका अभिवादन किया करता था।
• यह दो प्रकार की होती थी -
(i) इकेवडी:- राजा केवल आने पर खड़े होकर अभिवादन करता था।
(ii)दोवडी:- आने व जाने दोनों पर खड़े होकर अभिवादन करता था।

2.बाँह पसाव:-
• सामंत दरबार में आने पर राजा के घुटनों से अपनी तलवार छूता था तथा राजा उसके कंधों को थपथपाते थे।

3.हाथ कुरब:-
इसमें राजा सामन्त के कंधे पर हाथ रखकर हाथ को हृदय के पास लगा लेता था ।

जागीर के प्रकार
(i) सामन्त जागीर
(ii) हुकुमत जागीर
(ii) भौम जागीर
(iv) सांसण जागीर

(i) सामन्त जागीर:- राजा द्वारा अपने भाई, बंधुओं व निकट संबंधियों को दी जाने वाली जागीरें, जिन पर उनका वंशानुगत अधिकार रहता था।

(ii) हुकुमत जागीर:- राजा द्वारा अपने कर्मचारी (मुत्सद्दी) को वेतन के बदले दी जाने वाली जागीरें जिन पर उनका वंशानुगत अधिकार नहीं होता था।

(iii) भौम जागीर:- राज्य की सेवा में बलिदान होने वाले सैनिकों को दी जाने वाली जागीरें।
ये वंशानुगत व अवंशानुगत दोनों प्रकार की होती थी।

(iv) सासण जागीर:- मंदिर, मस्जिद, दरगाह, समाधि, चारण कवि तथा ब्राह्मणों को दी जाने वाली जागीरें ।
• ये करमुक्त होती थी। इसलिए इन्हें माफी जागीर भी कहते थे।


सामन्तों की श्रेणियाँ:-
• मेवाड़ रियासत में सामन्तों की तीन श्रेणियाँ थी। इनमें प्रथम श्रेणी के 16 सामन्त होते थे, जिन्हें उमराव कहा जाता था। इनमें प्रमुख सामन्त सलूम्बर का था जो हमेशा राज्य का सनापति होता था।
उसे हरावल में रहने का अधिकार था।
नए राजा के राजतिलक के समय तलवार बांधने का अधिकार था। 
मेवाड के परवाने व पट्टों पर हस्ताक्षर करने का अधिकार था। राजा की अनुपस्थिति में राजधानी संभालने का अधिकार था ।
• दूसरी श्रेणी के सामन्त 32 थे। तृतीय श्रेणी के सामन्तों को "गोल के सामन्त" कहते थे व इनकी संख्या कई सौ थी।

मारवाड में सामन्तों की चार श्रेणियाँ
(i) राजवी
(ii) सिरदार
(iii) गिनायत
(iv) मुत्सद्दी
राजवी:- राजा के निकट तीन पीढियों के सामन्त जिन्हें रेख, चाकरी, हुक्मनामा नहीं देना पड़ता था।
तीन पीढ़ी के अलावा अन्य राठौड़ सामन्त सिरदार तथा ऐसे सामन्त जिनसे मारवाड के राठौड वंश के वैवाहिक सम्बन्ध होते थे, गिनायत कहलाते थे।
कर्मचारियों को मुत्सद्दी कहा जाता था।

बीकानेर रियासत में सामन्तों की तीन श्रेणियां
(i) प्रथम श्रेणी में बीका के वंशज
(ii) दूसरी श्रेणी में बीका के अलावा अन्य राठौड़ सरदार
(iii) तृतीय श्रेणी में राठौडों के आने से पहले रहने वाली जातियां।

कोटा 
• कोटा में मुख्य सामन्त 30 हुआ करते थे। ये दो भागों में विभाजित थे - (i) देशथी - वे सामन्त जो राज्य में रहते थे।
(ii) हजूरथी - वे सामन्त जो राजा के साथ राज्य से बाहर रहते थे।

जैसलमेर
हरराज के समय सामंतों की दो श्रेणियाँ बनाई गई थी। 
 (i) डावी  (ii) जीवणी

आमेर
पृथ्वीराज के समय राज्य का 12 भागों में विभाजन किया गया था, जिसे बारह कोटडी व्यवस्था कहा जाता था।

भौमिए सामन्त:-
ऐसे सामंत जिन्हें बलिदान के बदले राज्य द्वारा भूमि दी जाती थी। यह भूमि वंशानुगत तथा अवंशानुगत दोनो प्रकार की होती थी।
• भौमिया सामन्तों से राज्य कई प्रकार के कार्य करवाता था। जैसे डाक पहुंचाना, खजाने की सुरक्षा, अधिकारियों की यात्रा के दौरान रहने, खाने की व्यवस्था।

ग्रासिया सामन्त:- 
• राज्य द्वारा सैनिक सेवा के बदले दी जानी वाली भूमि के मालिक।
• इनकी सेवा में कमी आने पर इनकी भूमि छीनी जा सकती थी।

सामन्ती व्यवस्था की विशेषताएँ:- 
1. यह रक्त संबंधों पर आधारित प्रशासनिक व सैनिक व्यवस्था थी। राजा विभिन्न प्रशासनिक पदों पर सामन्तों की नियुक्तियां करता था।
2. राजा प्रशासनिक, सैनिक व नीतिगत निर्णयों में सामन्तों की सहायता लेता था। राज्य के उत्तराधिकारी के चयन में भी सामन्त मुख्य भूमिका निभाते थे।
3. सामन्त का उत्थान व पतन राजा के साथ ही होता था। सामन्त अपनी मर्जी से किसी अन्य राजा से युद्ध या संधि नहीं करता था।
4. राजा व सामन्तों के संबंध सम्मान व कर्तव्य पर आधारित थे। राजा सामंतों को सम्मान दिया करता था, इसके बदले सामंत राज्य के प्रति अपना कर्तव्य निभाते थे।
5. राजा सामन्तों का स्वामी न होकर समकक्षों में प्रथम था। इस तथ्य को मजबूती देने के लिए राजा सामंतों को काकाजी, भाईजी कहा करते थे। वही सामंत राजा को बापजी कहा करते थे।
6. सामंत को हमेशा अपने पास एक सेना रखनी पड़ती थी, जो युद्ध व शांति के समय राज्य के काम आती थी क्योंकि सभी सामन्त राज्य को सामूहिक धरोहर तथा अपनी पैतृक संपत्ति मानते थे।

राज्य के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी 
1. राजा:- 
• राज्य की सभी प्रशासनिक, न्यायिक व सैनिक शक्तियां राजा में निहित होती थी। राजा अपने मंत्रियों, पुरोहित व युवराज की सहायता से राज्य चलाता था।
• राजा स्वेच्छाचारी नहीं होता था बल्कि उस पर धर्मशास्त्रों का व नीतिगत निर्णयों का दबाव रहता था।
• यदि राजा अल्पायु होता था तो राजमाताएँ शासन कार्य संभाला करती थी।
• कभी-2 राजा के बडे पुत्र को युवराज बना दिया जाता था। युवराज भी राजा के शासन कार्य में सहायता करता था।

2. प्रधान:-
यह राजा को प्रशासनिक व सैनिक परामर्श दिया करता था।
• कोटा व बूंदी में इसे दीवान/फौजदार, 
जयपुर में मुसाहिब, 
बीकानेर तथा भरतपुर में मुख्त्यार,
मेवाड, मारवाड, जैसलमेर में प्रधान कहा जाता था।

3. दीवान:-
• यह राजा को आर्थिक, वित्त व राजस्व संबंधी परामर्श दिया करता था।
• परगनों में हाकिम की नियुक्ति की सिफारिश किया करता था।
• कभी-कभी राजा के बाहर रहने पर वह राज्य संभालता था तब उसे "दशदीवान” कहते थे।

4. बक्षी (रक्षामंत्री):- यह सेना से संबंधित अनुशासन, प्रशिक्षण व सैन्य सामान की व्यवस्था करता था।

5. नायब बक्षी:- सेना व किलो पर होने वाले खर्चों की देखभाल करता था। 'रेख' का हिसाब रखता था।

6 शिकदार:- यह मुगल प्रशासन के कोतवाल के समान था, जो नगर प्रशासन देखा करता था। यह ग़ैर-सैनिक कर्मचारियों के खर्चों की जांच भी करता था।

7. खानसामा:- यह राजकीय महल की आवश्यकताओं की पूर्ति, राजकीय उद्योगों में बनने वाले सामान का क्रय-विक्रय करता था।
• राजा इस पद पर बेहद ईमानदार व्यक्ति की नियुक्ति करता था।

8. मीर मुंशी:- 
• राज्य का कूटनीतिक पत्र व्यवहार करने वाला अधिकारी।
रूक्का:- राजा द्वारा सामन्तों को भेजे जाने वाले पत्र।
खरीता:- राजा द्वारा अन्य राजा को भेजे जाने वाले पत्र।

9. वकील:- यह राजधानी में ठिकाने का प्रतिनिधि होता था।
10. किलेदार:- किलो की देखरेख करता था।
11. नैमेत्तिक:- राज ज्योतिषी।

अपडेट जारी...

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