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राजस्थानी साहित्य के प्रकार। राजस्थानी भाषा। राजस्थानी बोलियां

 
History of Rajasthani language


राजस्थानी साहित्य के प्रकार

ख्यात किसे कहते हैं ?
ख्यात शब्द संस्कृत के ख्याति से बना है, जिसका अर्थ  लोकप्रियता होता है। 
इन पुस्तकों से किसी राजवंश की राजनीतिक उपलब्धियों का पता चलता है। यह पुस्तकें राजवंश की वंशावली का वर्णन करती हैं।।
उदाहरण - मुंडियार री ख्यात।
यह पुस्तक मुंडियार गांव (नागौर) के चारण लेखकों द्वारा लिखी गई थी।
इससे मारवाड़ के राठौड़ वंश की जानकारी तथा मुगल मारवाड़ वैवाहिक संबंधों की जानकारी मिलती है।
पहली ख्यात - नैणसी री ख्यात
• अंतिम ख्यात - बीकानेर रा राठौड़ा री ख्यात (दयालदास ने लिखी)

वात किसे कहते हैं ?
वात का शाब्दिक अर्थ होता है - बात या कहानी।
इसके माध्यम से किसी व्यक्ति के युद्ध अथवा प्रेम संबंधी कार्यों का वर्णन मिलता है। 
जैसे - वीरमदेव सोनगरा री वात, ढोला मारू री वात, जगदेव परमार री वात।

वचनिका किसे कहते हैं ?
वचनिका में गद्य-पद्य दोनों का प्रयोग किया जाता है। वचनिका में अपभ्रंश मिश्रित राजस्थानी का उपयोग करते हैं। इन पुस्तकों के माध्यम से किसी व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों का पता चलता है। जैसे - अचलदास खींची री वचनिका।

दवावैत - इसमें उर्दू, फारसी, अरबी शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इसमें किसी व्यक्ति की प्रशंसा दोहों के माध्यम से की जाती है।

विगत क्या है ?
इन पुस्तकों से सामाजिक-आर्थिक इतिहास की जानकारी मिलती है। यह किसी राज्य के प्रशासनिक ग्रंथ होते थे। इनसे किसी राजदरबार की दिन-प्रति-दिन की घटनाओं का पता चलता है। (रोजनामचे)
उदहारण - मारवाड़ रा परगना री विगत।


राजस्थानी भाषा का इतिहास

वैदिक संस्कृत →पालि →शौरसेनी प्राकृत → गुर्जरी अपभ्रंश→राजस्थानी → 1. डिंगल  2. पिंगल।

डिंगल
पिंगल
पश्चिम राजस्थानी का साहित्यिक रूप।
चारण लेखकों द्वारा अधिक प्रयोग।
वीर रस का अधिक प्रभाव।
राजस्थानी का अधिक प्रभाव।
पूर्वी राजस्थानी का साहित्यिक रूप।
भाट लेखकों द्वारा अधिक प्रयोग की गई।
श्रृंगार रस का अधिक प्रभाव।
राजस्थानी एवं ब्रजभाषा का मिश्रण

वज्रसेन सूरी ने डिंगल को जैन शैली बताया।

•783 ई. में उधोतन सूरि ने कुवलयमाला (भाषा - संस्कृत) नामक पुस्तक लिखी। इसमें मरू भाषा का वर्णन किया गया है। 
• 16वीं शताब्दी में अब्दुल फजल ने आईन- ए-अकबरी (भाषा - फारसी) में मारवाड़ी भाषा का उल्लेख किया।
• 1912 में जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने Linguistic survey of India में राजस्थान भाषा का वर्णन किया।
राजस्थानी भाषा की पांच बोलियां बताई।
• पंडित नरोत्तम लाल स्वामी ने राजस्थानी भाषा को 4 वर्गों में बांटा है।
• सीताराम लालस ने राजस्थानी शब्दकोष बनाया।


राजस्थान की प्रमुख बोलियां

मारवाड़ी:-
क्षेत्र - जोधपुर, नागौर, पाली, जालौर, बाड़मेर
उदाहरण - मीराबाई की रचनाएं, वेलि क्रिसन रुक्मणी री, ढोला मारु रा दूहा।

मेवाड़ी:- मारवाड़ी की उपबोली
क्षेत्र - उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद
उदाहरण - कुम्भा के नाटक, लक्ष्मी कुमारी चुंडावत की रचनाएं।

देवड़ावाटी:-
मारवाड़ी की उपबोली
क्षेत्र - सिरोही

शेखावाटी:-
मारवाड़ी की उपबोली
क्षेत्र - चूरू, सीकर, झुंझुनू
इस पर ढूंढाड़ी भाषा का प्रभाव है।

खैराडी़:-
मारवाड़ी की उपबोली।
क्षेत्र - शाहपुरा (भीलवाड़ा) तथा बूंदी का कुछ भाग।
इस पर मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती तीनों का प्रभाव है।

ढूंढाड़ी:-
क्षेत्र - जयपुर, टोक, किशनगढ़।
उदाहरण - दादू दयाल जी की रचनाएं।

हाड़ौती:-
ढूंढाड़ी की उपबोली।
क्षेत्र - कोटा, बूंदी, झालावाड़।
उदाहरण - सूर्यमल्ल मिसण की रचनाएं।

तोरावाटी:-
ढूंढाड़ी की उपबोली
क्षेत्र - झुंझुनू का दक्षिणी भाग तथा सीकर का पूर्वी एवं दक्षिणी पूर्वी भाग।

राजावाटी:-
ढूंढाड़ी की उपबोली।
क्षेत्र - जयपुर का पूर्वी भाग।

नागरचोल:-
ढूंढाड़ी की उपबोली
क्षेत्र - सवाई माधोपुर का पश्चिमी भाग तथा टोंक का दक्षिण पूर्वी भाग।

काठेडी़:-
ढूंढाड़ी की उपबोली
क्षेत्र - जयपुर का दक्षिणी भाग।

चौरासी:-
ढूंढाड़ी की उपबोली
क्षेत्र - शाहपुरा (जयपुर) व टोंक का पश्चिमी भाग।

वागडी़:- 
क्षेत्र -डूंगरपुर, बांसवाड़ा।
उदाहरण - संत मावजी की रचनाएं।

मेवाती:-
क्षेत्र - अलवर-भरतपुर का मेव क्षेत्र।
रचनाएं - चरणदासी और लालदासी संप्रदाय की रचनाएं।

मालवी:-
क्षेत्र - मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र की भाषा।
इस पर मारवाड़ी व मेवाड़ी का प्रभाव है।

रागडी:-
मालवी की उपबोली।
क्षेत्र - मालवा क्षेत्र के राजपूतों द्वारा।

निमाड़ी:-
मालवी की उपबोली
दक्षिणी राजस्थानी भी कहते हैं।

अहीरवाटी (राठी):-
कोटपूतली (जयपुर) एवं मुंडावर (अलवर)
उदाहरण - जोधराज की हम्मीर रासो।

आगे पढ़े 👉 राजस्थान का साहित्य

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