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सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन

 
Social and religious reform movement


सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन

19वीं सदी में भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन हुए। (Social and religious reform movement.)

सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के कारण:-

1. अंग्रेजों से संपर्क:- भारतीय जब अंग्रेजों के संपर्क में आए तो उनके आडंबर रहित धर्म, समानता आधारित समाज तथा प्रगतिशील सोच से प्रभावित हुए और भारतीय समाज को भी वैसा बनाने के लिए सोचने लगे।

2. अंग्रेजी शिक्षा:- अंग्रेजी शिक्षा के कारण यूरोप के आविष्कार, खोजक्रांतियों का पता चला जिससे भारतीय समाज में आधुनिक मूल्यों का समावेश हुआ।
अंग्रेजी अनुवाद के कारण हम प्राचीन भारतीय पुस्तकें पढ़ने में सक्षम हुए। इससे भारतीय समाज में चेतना का संचार हुआ।

3. ईसाई मिशनरी:- इसाई मिशनरियों ने हिंदू तथा मुस्लिम धर्म का मजाक उड़ाया। अतः भारतीयों को सामाजिक व धार्मिक कुरीतियों का पता चला और कालांतर में भारतीयों ने इन कुरीतियों को कम करने का प्रयास किया।

4. अंग्रेजी कानून:- अंग्रेजों ने सती प्रथा तथा दास प्रथा को समाप्त करने के कानून बनाए और विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया,  जिससे भारतीय समाज सुधारकों को ऊर्जा मिली तथा आंदोलन को गति मिली।

5. यातायात व संचार के साधन:-   
    "रेलवे ने भारत को आधुनिक बनाया"
यातायात व संचार के साधनों के विकास के कारण सामाजिक गतिशीलता बढ़ गई, जिससे सामाजिक भेदभाव कम हुआ तथा समाज की संकीर्णता दूर हुई।

6. मध्यमवर्ग का विकास/ उदय:- अंग्रेजी शिक्षा के कारण भारतीय समाज में मध्यम वर्ग का उदय हुआ। इसी मध्यम वर्ग द्वारा सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया गया क्योंकि वे जानते थे कि बिना सामाजिक व धार्मिक सुधारों के राजनीतिक सुधार नहीं किए जा सकते

7. समाचार पत्र व पुस्तकें:-  हमारे समाज सुधारकों ने विभिन्न समाचार पत्रों का प्रकाशन किया तथा अनेक पुस्तकें लिखी।
इन समाचार पत्रों तथा पुस्तकों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किए, जिससे समाज में बदलाव आना शुरू हुआ।

8. इतिहास का पुनर्लेखन:-  अंग्रेजों द्वारा भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन किया गया। उन्होंने प्राचीन काल को हिंदू काल तथ मध्यकाल को मुस्लिम काल बताया। क्योंकि वह भारतीयों में फूट डालना चाहते थे, लेकिन इस दौरान अंग्रेजों द्वारा प्राचीन काल को स्वर्ण युग बताया गया। अतः भारतीय अपने समाज को पहले जैसा ही बनाने की सोचने लगे।

9. स्व: प्रेरणा:-  राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती जैसे समाज सुधारक स्व: प्रेरणा से आगे आए तथा समाज में जन जागरण का कार्य किया।

10. राष्ट्रवाद का उदय:- 19वीं सदी पूरे विश्व में राष्ट्रवाद के उदय का काल था। अतः भारत में भी राष्ट्रवाद का विकास हो रहा था और राष्ट्रवाद के चरण में सामाजिक-धार्मिक सुधार आवश्यक होते हैं।

राजा राममोहन राय:-


उपाधियां
इनके द्वारा स्थापित संगठन
आधुनिक भारत का पिता
आत्मीय सभा -1815 ई.
भारतीय पुनर्जागरण का जनक
हिंदू कॉलेज-1817 ई.
अतीत व भविष्य के बीच सेतु
वेदांत कॉलेज-1825 ई.
पूर्व व पश्चिम का संश्लेषण
ब्रह्म समाज-1828 ई.

कोलकाता यूनिटेरियन सोसाइटी

• डच घड़ीसाज डेविड हेयर तथा स्कॉटिश धर्म प्रचारक अलेक्जेंडर डफ हिंदू कॉलेज की स्थापना में सहयोगी थे।

ब्रह्म समाज में राजा राम मोहन राय के सहयोगी:- 
(i) ताराचंद चक्रवर्ती (प्रथम मंत्री)
(ii) द्वारिका नाथ टैगोर
(iii) प्रसन्न कुमार टैगोर
(iv) चंद्रशेखर देव

पुस्तकें
समाचार पत्र 
(i)  तुहफुतुल मुहावुद्दीन /Gift of Monotheist /
एकेश्वरवादियों को उपहार
(i) मिरातुल अखबार (फारसी)
(ii) हिंदू उत्तराधिकार के नियम
(ii) संवाद कौमुदी / प्रज्ञा चांद (बांग्ला)
(iii) Precept of Jesus : guide to peace and happiness.
(iii) ब्रह्मोनिकल मैगजीन (अंग्रेजी)

(iv) बंगदूत (हिंदी)

राजा राममोहन राय की विचारधारा:- 
समर्थन:- एकेश्वरवाद, महिला शिक्षा,अंग्रेजी शिक्षा, प्रेस की स्वतंत्रता, स्थाई बंदोबस्त, Jury व्यवस्था, शक्तियों का पृथक्करण, उच्च सेवाओं का भारतीयकरण, यूरोपीय मानववाद, अंतरराष्ट्रीयवाद ।

विरोध:- बहूदेववाद, अवतारवाद, मूर्ति पूजा, सती प्रथा, बाल विवाह, बहु विवाह, कन्या वध, वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा।

• 1821 ई. में नेपल्स क्रांति(इटली) की विफलता पर राजा राममोहन राय ने अपने सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए थे।
• 1822 ई. में स्पेनिश क्रांति की सफलता पर राजा राममोहन राय ने सार्वजनिक दावत का आयोजन किया था।
आयरलैंड के जमीदारों के शोषण व अत्याचार का विरोध किया था।

एकेश्वरवाद को लेकर राजा राममोहन राय तथा सीरामपुर के ईसाई मिशनरियों के बीच वाद-विवाद हुआ था।
मूर्ति पूजा को लेकर राजा राममोहन राय तथा सुब्रमण्यम स्वामी के बीच वाद-विवाद हुआ था।
1833 ईस्वी में ब्रिस्टल (इंग्लैंड) में राजा राममोहन राय की मृत्यु हो गई थी।

• 1843 ईस्वी में देवेंद्र नाथ टैगोर ने ब्रह्म समाज का नेतृत्व संभाला।
1857 ई. में केशव चंद्र सेन ब्रह्म समाज में शामिल हुए तथा उन्हें ब्रह्म समाज का आचार्य नियुक्त किया गया।
1865 ई. में केशव चंद्र सेन को ब्रह्म समाज से निकाल दिया गया तथा ब्रह्म समाज का दो भागों में विभाजन हो गया -
(1) आदि ब्रह्म समाज - देवेंद्र नाथ टैगोर
(2) भारतीय ब्रह्म समाज - केशव चंद्र सेन

• केशव चंद्र सेन के प्रयासों से 1872 ई. में नेटिव मैरिज एक्ट पारित हुआ तथा इसमें विवाह की न्यूनतम आयु तय की गई। 
लड़की -14 वर्ष, लड़का - 18 वर्ष

• केशव चंद्र सेन ने अपनी नाबालिग पुत्री की शादी कूचबिहार के राजा के साथ कर दी। इसलिए भारतीय ब्रह्म समाज में भी विभाजन हो गया तथा 1878 ई. में साधारण ब्रह्म समाज की स्थापना की गई।
साधारण ब्रह्म समाज के सदस्य:-   
सुरेंद्रनाथ बनर्जी
आनंद मोहन बोस 
द्वारिका नाथ गांगुली

देवेंद्र नाथ टैगोर:- 
संगठन:- तत्वबोधिनी सभा (1839 ई.)
पत्रिका:- तत्वबोधिनी 
इस पत्रिका के संपादक - अक्षय कुमार दत्त

केशव चंद्र सेन:- 
समाचार पत्र:- इंडियन मिरर (Indian mirror)
संगठन:-   (i) मैत्री संघ (संगत सभा)
               (ii) इंडियन रिफॉर्म एसोसिएशन
              (iii) टेबरनिकल ऑफ न्यू डिस्पेंशन

वेद समाज:- 1864 ई.
इसकी स्थापना केशव चंद्र सेन के प्रयासों से हुई। इसे दक्षिण भारत का  'ब्रह्म समाज' कहते हैं।
संस्थापक: -  (i) धरलु नायडू
                  (ii) विश्वनाथ मुदालियर

प्रार्थना समाज:-  1867 ई.
स्थापना :-  महाराष्ट्र में केशव चंद्र सेन के प्रयासों से हुई।
उद्देश्य: - 
जाति प्रथा, बाल विवाह का विरोध।
महिला शिक्षा, विधवा विवाह को समर्थन करना।
संस्थापक :-
(i)  जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे
(ii) आत्माराम पांडुरंग**
(iii) आर.जी. भंडारकर
(iv) चंद्रावकर

जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे:- 
उपाधियां:- 
• महाराष्ट्र का सुकरात
• पश्चिम भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अग्रदूत।

संगठन:-  
• विधवा विवाह संघ (1867)
• पूना सार्वजनिक सभा (1871)
•  दक्कन एजुकेशनल सोसायटी/फर्ग्यूसन कॉलेज, पूना (1884) 
सहयोगी:-  गोपाल गणेश आगरकर, गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक इस संस्था से जुड़े थे।
•  इंडियन नेशनल सोशल कॉन्फ्रेंस (1887)

नोट:- रानाडे, गोखले के राजनीतिक गुरु थे।

रानाडे के सहयोगी‌:- 
(i) D.K. कर्वे
(ii) विष्णु शास्त्री पंडित

रानाडे की पुस्तक :-  एक आस्तिक की धर्म में आस्था।

स्वामी दयानन्द सरस्वती
जन्म - 1824 ई. में मौरवी ( गुजरात).  
वास्तविक नाम - मूल शंकर
प्रथम गुरु - पूूूूूर्णानंद जी
मूल शंकर का नाम बदलकर दयानंद सरस्वती किया।
द्वितीय गुरु - विरजानंद जी/वृद्धानंद /बुड्डन बाबा
इन्होंने दयानन्द सरस्वती को वेदों की शिक्षा दी।

• दयानंद सरस्वती ने "वेदों की ओर लौटो" का नारा दिया।
• यह ऋग्वेद को प्रमाणिक ग्रंथ मानते थे।
• इन्होंने कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था का समर्थन किया तथा जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था की आलोचना की।
• इन्होंने जाति व्यवस्था तथा छुआछूत की आलोचना की।
• मूर्ति पूजा का विरोध किया।
• अवतारवाद का विरोध किया।
• एकेश्वरवाद का समर्थन किया।
• महिला शिक्षा का समर्थन किया।
• यज्ञों का समर्थन किया। शुद्र तथा स्त्रियां भी यज्ञ कर सकती हैं।
•• स्वराष्ट्र, स्वधर्म, स्वभाषा, स्वदेशी पर बल दिया।
• हिंदी का समर्थन किया था।
• इन्होंने 1875 में बॉम्बे में आर्य समाज की स्थापना की।
1877 -  में लाहौर में,
1878 -  में दिल्ली।

पुस्तक:- सत्यार्थ प्रकाश।

• 1883 ईस्वी में अजमेर में इनकी मृत्यु हो गई थी।
•  इनकी मृत्यु के बाद शिक्षा को लेकर आर्य समाज दो भागों में विभाजित हो गया था -
(1) पाश्चात्य शिक्षा और वैदिक शिक्षा के समर्थक
• लाला लाजपत राय, लाला हंसराज।
• D.A.V. स्कूल / कॉलेज की स्थापना की।

(2) वैदिक शिक्षा के समर्थक
• मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद), लेखराम।
• गुरुकुल कांगड़ी (1902)- हरिद्वार की स्थापना की।

आर्य समाज ने शुद्धि आंदोलन चलाया था। इसके तहत धर्मांतरित हिंदुओं को पुनः हिंदू धर्म में लाया जाता था।
• आर्य समाज ने अंतरजातीय विवाह (inter cast marriage) का समर्थन किया।
वैलेंटाइन शिरोल ने अपनी पुस्तक Indian unrest में आर्य समाज को भारतीय अशांति का जनक कहा था।
और व्यक्तिगत रूप से बाल गंगाधर तिलक को भारतीय अशांति का जनक बताया था ।

आर्य समाज का राजस्थान में प्रभाव:-
1865 ई. में स्वामी दयानंद सरस्वती ने करौली की यात्रा की।
यह उनकी प्रथम राजस्थान यात्रा थी। करौली के राजा मदन पाल ने उन्हें आमंत्रित किया था।
1881 ईस्वी में इन्होंने भरतपुर की यात्रा की।
1881 ईस्वी में अजमेर में आर्य समाज तथा जयपुर में वैदिक धर्म सभा की स्थापना की।
• इसी समय कविराज श्यामलदास के आमंत्रण पर उदयपुर गए। उदयपुर के गुलाब बाग के नौलखा महल में स्वामी जी को ठहराया गया। यही पर स्वामी जी ने "सत्यार्थ प्रकाश"  का द्वितीय संस्करण लिखा था।
1883 ईस्वी में उदयपुर में परोपकारिणी सभा की स्थापना की गई। इसका सभापति महाराणा सज्जन सिंह को बनाया गया।
• बाद में परोपकारिणी सभा का मुख्यालय अजमेर स्थानांतरित किया गया। अजमेर में वैदिक यंत्रालय की स्थापना की गई तथा यहीं से सत्यार्थ प्रकाश का प्रकाशन किया गया था।
विष्णु पंड्या ने मेवाड़ में जबकि वासुदेव खंडेलवाल ने अलवर में आर्य समाज की स्थापना की थी।

आर्य समाज के मुख्य कार्यकर्ता:- 
अजमेर -  चांद करण शारदा, हरबिलास शारदा ।
भरतपुर - जुगल किशोर चतुर्वेदी, मास्टर आदित्येंद्र ।
जयपुर - कल्याण सिंह, श्याम लाल वर्मा ।
जोधपुर - महाराजा जसवंत सिंह -II , सर प्रताप, राव राजा तेज सिंह ।
शाहपुरा - राजा नाहर सिंह ।

• जोधपुर महाराजा जसवंत सिंह -II की प्रेमिका नन्हीं जान ने दयानंद सरस्वती को जहर दे दिया था तथा 1883 ई. में दीपावली के दिन इनकी अजमेर में मृत्यु हो गई थी।

• आर्य समाज के कारण राजस्थान में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ जिससे राजस्थान में किसान आंदोलनों तथा प्रजामंडल आंदोलनों को समर्थन मिला।
• राजस्थान में सामाजिक कुरीतियों में कमी आई। जैसे पर्दा प्रथा में कमी, महिला शिक्षा में वृद्धि।
• दयानंद सरस्वती का प्रभाव राजस्थान के राजाओं पर पड़ा जिससे शासन में उदारता आई।
• राजस्थान में शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई जिससे शिक्षा को बढ़ावा मिला।
• अनेक समाचार पत्रों तथा पुस्तकों का प्रकाशन किया गया जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा मिला।
• राजस्थान में हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार हुआ।
• राजस्थान में स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार प्रसार हुआ।

•>  हरविलास शारदा के प्रयासों से 1929 ईस्वी में बाल विवाह अवरोधक अधिनियम पारित हुआ, जिसे शारदा अधिनियम भी कहा जाता है।  इसमें विवाह की न्यूनतम आयु तय की गई थी। 
(लड़की - 14 वर्ष , लड़का - 18 वर्ष)

• चांदकरण शारदा की पुस्तकें: -  
 (i)  विधवा विवाह       (ii) दलित उद्धार 

स्वामी विवेकानंद
सुभाष चंद्र बोस ने राष्ट्रीय आंदोलन का आध्यात्मिक पिता कहा।
वास्तविक नाम - नरेंद्र नाथ दत्त
गुरु - रामकृष्ण परमहंस ।
रामकृष्ण परमहंस से दीक्षा प्राप्त करने के बाद नरेंद्रनाथ का नाम विविदिषानंद कर दिया गया था।
• कालांतर में खेतड़ी महाराजा अजीतसिंह ने इन्हें विवेकानंद नाम रखने का सुझाव दिया तथा शिकागो जाने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की।
1893 ईस्वी में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लिया तथा भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार किया।
1896 ईस्वी में न्यूयॉर्क में वेदांत समाज की स्थापना की।
1897 ईस्वी में वैलूर में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की तथा मार्गरेट नोबेल (भगिनी निवेदिता) को इसका प्रमुख बनाया गया।
• कालांतर में अल्मोड़ा में भी रामकृष्ण मिशन का एक कार्यालय स्थापित किया गया।

विवेकानंद जी के समाचार पत्र: - 
(i) प्रबुद्ध भारत (अंग्रेजी)           
(ii) उद्बोधन (बांग्ला)

पुस्तकें:-   
(i) ज्ञान योग                     (ii) कर्म योग 
(iii) राजयोग                     (iv) मैं समाजवादी हूं 
(v) लेक्चरर्स फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा 

• स्वामी विवेकानंद जी ने विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार किया था।
• विवेकानंद जी ने भारतीय आध्यात्मिकता तथा पश्चिमी भौतिकवाद को जोड़ा था।
• विवेकानंद जी ने भारतीय युवाओं में राष्ट्रवाद तथा आत्मसम्मान का संचार किया था।
• विवेकानंद जी ने मूर्ति पूजा तथा बहूदेववाद का समर्थन किया।
• विवेकानंद जी ने धर्म की व्यवहारिक व्याख्या की थी।

एनी बीसेंट:- 

थियोसॉफिकल सोसायटी:- 1875  (न्यूयॉर्क)
संस्थापक:-   (i) मैडम बलावत्सकी   
                   (ii) कर्नल अल्कॉट 
1882 ईस्वी में एनी बीसेंट थियोसॉफिकल सोसायटी की सदस्या के रूप में भारत आई थी।
1907 में एनी बीसेंट थियोसॉफिकल सोसायटी की अध्यक्ष बनी थी।
• थियोसॉफिकल सोसायटी हिंदू , बौद्ध व पारसी धर्म /संस्कृति में विश्वास रखती थी।
• थियोसोफिकल सोसायटी कर्म सिद्धांत , आत्मा की अमरता तथा पुनर्जन्म में विश्वास रखती थी।
उपनिषदीय ज्ञान पर बल देती थी ।
1898 ईस्वी में एनी बेसेंट ने बनारस में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना की थी, जो 1916 ई.  में BHU में बदल गया था।

एनी बेसेंट के समाचार पत्र :-   
(i) न्यू इंडिया   (ii) कॉमनवील 

हेनरी विवियन डेरोजियो:-
पिता- पुर्तगाली माता- भारतीय
• कोलकाता के हिंदू कॉलेज में प्रोफेसर थे।
• इन्होंने राजा राममोहन राय की परंपरा को आगे बढ़ाया था।
• उन्होंने स्वतंत्र चिंतन तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया था।
• इन्हें  " भारत का पहला राष्ट्रवादी कवि" माना जाता है।

संगठन:- 
(i) सोसायटी फॉर एग्जीबिशन ऑफ जनरल नॉलेज।
(ii) एकेडमिक एसोसिएशन
(iii) डिबेटिंग क्लब
(iv) बंग हित सभा
(v) एंग्लो इंडियन हिंदू एसोसिएशन

समाचार पत्र:-
(i) ईस्ट इंडिया
(ii) इंडिया गजट
(iii) कोलकाता साहित्य गजट

1831 ई. में 22 वर्ष की आयु में डेरोजियो की हैजे से मृत्यु हो गई थी।
••>  डेरोजियो ने यंग बंगाल आंदोलन चलाया था।
• सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने इनके अनुयायियों को  सभ्यता के अग्रदूत तथा हमारी जाति के पिता कहा है।

ज्योतिबा फुले:- 
संगठन:-  सत्य शोधक समाज (1873 ई.)
समाचार पत्र :-  गुलामगिरी
• अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर दलितों तथा लड़कियों के लिए स्कूल खोलें।
• इन्होंने शिवाजी की जीवनी लिखी थी।

गोपाल हरी देशमुख:- 
संगठन :-   परमहंस मंडली।
समाचार पत्र :-   लोकहितवादी (मराठी)
• इस पत्रिका के कारण इन्हें लोकहितवादी कहा जाने लगा।

पंडिता रमाबाई:- 
संगठन :-   शारदा सदन  ==> बालिका शिक्षा के प्रयास

मंसाराम:- 
संगठन :-  मानव धर्म सभा

मुस्लिम धर्म सुधार आंदोलन
1. अलीगढ़ आंदोलन :- 
प्रवर्तक :-  सर सैयद अहमद खां
• यह ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी करते थे।
• इन्होंने मुसलमानों के आधुनिकीकरण पर बल दिया था।
• उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा का शासन का समर्थन किया।
• इन्होंने कुरान की वैज्ञानिक व्याख्या की।
• बाइबल पर टीका लिखी।
• पीर- मुरीदी प्रथा का विरोध किया था।

संगठन:-
1863 -  मुहम्मडन  लिटरेरी एसोसिएशन
1864 -  साइंटिफिक सोसायटी
1875 -  मुहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज ।    ==>  यही 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना।

1886 -  मुहम्मडन एजुकेशन कॉन्फ्रेंस
1888 -  संयुक्त भारतीय राज भक्त सभा ।  =>यह संगठन बनारस के राजा शिवप्रसाद के साथ मिलकर बनाया गया। यह कांग्रेस की विरोधी संस्था थी।

समाचार पत्र :-
तहजीब उल अखलाक     (सभ्यता व नैतिकता)

पुस्तकें:-
(i) असबाब ए बगावत ए हिंद
(ii) लॉयल मुहम्मडन इन इंडिया (राजभक्त मुसलमान)
(iii) बिजनौर की बगावत
(iv) causes of the Indian revolt

• प्रारंभ में में हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे तथा इनके अनुसार हिंदू तथा मुस्लिम एक सुंदर दुल्हन की दो आंखें हैं।
हालांकि कालांतर में इन्होंने हिंदू और मुस्लिम को दो अलग-अलग देश बताया था।

सहयोगी:-   (i) चिराग अली,  (ii) अल्ताफ हुसैन हाली, (iii) नजीर अहमद।

NOTE :-   w.w.हंटर की पुस्तक -  इंडियन मुसलमान ।

2. देवबन्द आंदोलन / दार-उल-उलूम आंदोलन :-

1867 ईस्वी में देवबंद(यूपी) में शुरू हुआ।
• 1857 ईस्वी की क्रांति में शामिल लोगों ने यह आंदोलन शुरू किया।

संस्थापक :-
(i) रशीद अहमद गंगोही
(ii) मोहम्मद कासिम नानोतवी

उद्देश्य :- 
(i) इस्लाम के मूल स्वरूप को स्थापित करना।
(ii) अच्छे धार्मिक शिक्षक तैयार करना।

• इन्होंने आधुनिकीकरण का विरोध किया।
• अंग्रेजी शासन तथा अंग्रेजी शिक्षा का विरोध किया।
अलीगढ़ आंदोलन का विरोध किया
कांग्रेस का समर्थन किया।

• महमूद हसन ने देवबंद आंदोलन को राजनीतिक स्वरूप प्रदान किया।
शिबली नुमानी :- पहले अलीगढ़ आंदोलन से जुड़े थे लेकिन बाद में देवबंद आंदोलन से जुड़ गए थे।

3. वहाबी आंदोलन / वलीउल्लाह आंदोलन :

भारत में सैयद अहमद बरेलवी ने इसे लोकप्रिय किया था।
उद्देश्य:-    दार-उल-हर्ब (गैर मुस्लिम) को दार-उल-इस्लाम में बदलना।

• यह एक हिंसक एवं सांप्रदायिक आंदोलन था।
• प्रारंभ में यह आंदोलन पंजाब में सिखों के खिलाफ था लेकिन पंजाब के विलय के बाद यह आंदोलन अंग्रेजो के खिलाफ हो गया था।
कालांतर में इसका मुख्य केंद्र पटना (पूर्वी भारत) बन गया था।
पटना के मुख्य नेता:-  (i) हाजी करामत अली
                               (ii) शरीयत उल्लाह खान।

4. अहमदिया आंदोलन / कादियानी आंदोलन :- 

1889 ईस्वी में गुलाम अहमद ने कादिया(पंजाब) में शुरू किया।
स्वयं को  पैगंबर तथा भगवान श्रीकृष्ण का अवतार घोषित कर दिया था।

पुस्तक:-  बहरीन- ए - अहमदिया।
• यह आंदोलन अंग्रेजी शिक्षा का समर्थक था।


पारसी धर्म सुधार आंदोलन :- 

1. रहनुमा - ए - माज्दा - ए - सभा :-    1851 ई.
संस्थापक :-     (i) फरदौन जी नौरोजी
                     (ii) दादाभाई नौरोजी
                     (iii) बहराम जी मालाबारी
                     (iv) s.s. बंगाली

समाचार पत्र:-   राफ्त गोफ्तार   (अर्थ सच बोलने वाला)
• इस संगठन ने महिला सशक्तिकरण का प्रयास किया।

2. विधवा विवाह :- 
1850 में विष्णु शास्त्री पंडित ने विधवा विवाह समाज की स्थापना की।
1852 ई. में करसोन दास मलजी ने सत्य प्रकाश (गुजराती) नामक पत्रिका निकाली जो विधवा विवाह को बढ़ावा देती थी।
1878 ई. में वीर शैलिगन ने राजामुंद्री सोशल रिफॉर्म की स्थापना की। यह संस्था भी विधवा विवाह को बढ़ावा देती थी।
1899 ई. में D.k. कर्वे ने विधवा आश्रम की स्थापना की।

3. बालिका शिक्षा :- 
1819 ई. में ईसाई मिशनरियों ने कोलकाता में तरुण स्त्री सभा की स्थापना की।
1849 ई. में J.E.D. बेथून(बेटन) ने कोलकाता में पहले बालिका विद्यालय की स्थापना की थी।
• ईश्वर चंद्र विद्यासागर 35 से अधिक बालिका विद्यालयों की स्थापना से जुड़े थे।
D.k. कर्वे ने 1906 ई. में बॉम्बे में महिला कॉलेज की स्थापना की थी।
• केशव चंद्र सेन, फातिमा शेख तथा रुकैया सखावत हुसैन ने भी बालिका शिक्षा के लिए प्रयास किए थे ।


4. सम्मति आयु अधिनियम / age of consent act :- 
1860 ई. में ईश्वर चंद्र विद्यासागर के प्रयासों से सम्मति आयु अधिनियम पारित हुआ जिसमें न्यूनतम आयु 10 वर्ष तय की गई।
1891 ई. में बहराम जी मालाबारी के प्रयासों से सम्मति आयु अधिनियम पारित हुआ तथा न्यूनतम आयु 12 वर्ष तय की गई।

5. बाल विवाह :
1929 ई.  में बाल विवाह रोकने के लिए हरविलास शारदा के प्रयासों से शारदा अधिनियम बना । जिसमें विवाह की न्यूनतम आयु तय की गई।
(लड़की - 14 वर्ष,              लड़का - 18 वर्ष) 


धर्म सुधार आंदोलन के प्रभाव :- 

सकारात्मक प्रभाव :-
(i) हमारा धर्म आडम्बरों से मुक्त हुआ तथा सामाजिक कुरीतियां दूर हुई।
(ii) महिलाओं से संबंधित सामाजिक कुरीतियां दूर हुई, जिससे महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला।
(iii) सामाजिक भेदभाव कम होने से सामाजिक एकता बढ़ी, जिससे राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिली।
(iv) समाज- सुधारकों द्वारा अनेक स्कूल व कॉलेज की स्थापना की गई। इससे शिक्षा का प्रसार हुआ तथा आधुनिकता आई।
(v) समाज- सुधारकों  ने अनेक पुस्तकें लिखी है व समाचार पत्र निकाले, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बल मिला।
(vi) इस आंदोलन में प्राचीन भारतीय इतिहास का गौरव गान किया गया, जिससे भारतीयों का आत्मविश्वास बढ़ा जो राष्ट्रीय आंदोलन में काम आया।
(vii) इस आंदोलन में हमने अन्याय व अत्याचार के खिलाफ संघर्ष किया। कालांतर में यही प्रवृत्ति  अंग्रेजो के खिलाफ जारी रही।

नकारात्मक प्रभाव:-
(i) थियोसॉफिकल सोसायटी व अहमदिया आंदोलन के अतिरिक्त सभी सुधारकों ने अपने- अपने धर्म की बातें की, जिससे दूसरे धर्मों की अप्रत्यक्ष आलोचना हुई तथा समाज में कूप मंडूकता(संकीर्णता) आई।
(ii) आर्य समाज के शुद्धि आंदोलन तथा वहाबी आंदोलन के दार-उल-इस्लाम के नारे से सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिला।
(iii) कुछ समाज- सुधारक यथास्थितिवादी थे तथा उन्होंने सामाजिक कुरीतियों को सांस्कृतिक मूल्य बताकर उनका संरक्षण किया, जिससे आंदोलन पश्चगामी(Adverse) हो गया।

धर्म सुधार आंदोलन का स्वरूप/ प्रकृति/ विशेषताएं :-
(1) आधुनिकतावादी :- 
इस आंदोलन का स्वरूप आधुनिकतावादी था क्योंकि यह पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित था तथा इसमें तार्किकता पर अधिक बल दिया जाता था।
• सामाजिक रीति-रिवाजों की तार्किक व्याख्या की जाती थी।
• सभी समस्याओं का हल मानव को केंद्र में रखा किया जाता था। अतः इसमें मानववाद पर बल दिया गया।
जैसे:-  ब्रह्मसमाज, अलीगढ़ आंदोलन, यंग बंगाल आंदोलन

(2) पुनरुत्थानवादी :- 
कुछ समाज सुधारकों का मानना था कि जितने भी आधुनिक मूल्य है, वह हमारी संस्कृति में पहले से मौजूद हैं तथा इसके लिए हमें पश्चिम की तरफ देखने की आवश्यकता नहीं है।
अतः उन्होंने पाश्चात्यकरण का विरोध किया व प्राचीन भारतीय मूल्यों को पुनः स्थापित करने की कोशिश की।
जैसे:- आर्य समाज, देवबंद आंदोलन

(3) रूढ़िवादी :- 
कुछ समाज सुधारक रूढ़िवादी थे तथा सामाजिक कुरीतियों को सांस्कृतिक मूल्य बताते थे तथा उन्हें बचाने का प्रयास करते थे। इन्होंने भी पाश्चात्यकरण का विरोध किया।
जैसे:- धर्म सभा, वहाबी आंदोलन

(4) मध्यम वर्गीय :- 
अधिकतर समाज सुधारक मध्यम वर्ग से संबंधित थे तथा इस आंदोलन का प्रभाव भी मध्यम वर्ग पर अधिक देखने को मिला।

(5) संगठनात्मक :- 
धर्म सुधार आंदोलन के दौरान अनेक संगठनों की स्थापना की गई। 
जैसे:-  राधा कृष्ण मिशन, सत्य शोधक समाज

(6) वहाबी आंदोलन के अतिरिक्त धर्म सुधार आंदोलन अहिंसात्मक प्रवृत्ति का था।

धर्म सुधार आंदोलन की सीमाएं :- 
(1) भारतीय समाज यथास्थिति वादी है तथा परिवर्तनों को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता है।
(2) भारतीय समाज में शिक्षा का अभाव था तथा भारतीय आधुनिक मूल्यों से परिचित नहीं थे।
(3) समाज सुधार आंदोलन को अंग्रेजी सरकार द्वारा कोई सहयोग नहीं मिला था।
(4) भारत एक बड़ा देश था तथा यातायात व संचार के साधनों की कमी और भाषा की दिक्कतों के कारण समाज सुधारक अपने क्षेत्र से बाहर नहीं निकल पाए थे।।


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