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राजस्थान में 1857 की क्रांति

 
Revolt of 1857 in Rajasthan

राजस्थान में अंग्रेजों के साथ संधियां

कारण:- मराठा आतंक, पारस्परिक युद्धो से मुक्ति, सामंती विद्रोह

• 1818 ई. में अंग्रेजों ने राजस्थान की अधिकतर रियासतों के साथ संधिया की।
नोट:- अलवर, भरतपुर के साथ 1803 में संधि कर ली
गई।
संधियों में अंग्रेज प्रतिनिधि - चार्ल्स मेटकॉफ
गवर्नर जनरल - लॉर्ड हेस्टिंग्ज (1813-23)
संधि करने का क्रम:-
1803 ई. - भरतपुर (29 सितंबर), अलवर (नवंबर)
1817 ई. - करौली (9 नवंबर), टोंंक (15 नवंबर), कोटा (26 दिसंबर)
1818 ई. - अधिकतर रियासतों के साथ इसी वर्ष संधि की।
1823 ई. - सिरोही (10 सितंबर)
1838 ई. - झालावाड़ (10 अप्रैल)

संधियों की शर्तें:-
1. ईस्ट इंडिया कंपनी और संधिकर्ता राज्य के बीच हमेशा मित्रता के संबंध बने रहेंगे।
2. राजा द्वारा अपनी सुरक्षा (बाहय आक्रमण + आंतरिक विद्रोह) तथा विदेशी मामले अंग्रेजों को देने पड़ते थे।
3. संधिकर्ता राज्य, कंपनी की सर्वोच्चता स्वीकार करेंगे।
4. संधिकर्ता राज्य के आंतरिक मामलों में कंपनी हस्तक्षेप नहीं करेगी।
5. जो राज्य पहले मराठों को खिराज चुकाते थे, वे अब कंपनी को चुकाएंगे। मराठों को खिराज नहीं चुकाने वाले राज्यों से कंपनी खिराज नहीं लेगी।
बीकानेर व जैसलमेर खिराज नहीं देते थे।
• प्रारंभिक 3 वर्ष तक करौली को खिराज से मुक्त रखा गया जबकि करौली रियासत मराठाओं को खिराज देती थी।
6. प्रत्येक रियासत में एक अंग्रेज अधिकारी नियुक्त किया जाता था, जिसे पोलिटिक्ल एजेंट कहते थे। यह राजधानी में रहता था तथा इसलिए इसे रेजिडेंट भी कहा जाता था।

रेजिडेंट फॉर राजपूताना का मुख्यालय दिल्ली था‌।
प्रथम रेजिडेंट फॉर राजपूताना - डेविड ऑक्टरलोनी

1832 ईस्वी में रेजिडेंट फॉर राजपूताना का नाम परिवर्तन करके एजेंट टू गवर्नर जनरल (एजीजी) कर दिया गया इसका मुख्यालय अजमेर बनाया गया।
प्रथम एजीजी - अब्राहम लॉकेट
• 1845 ईस्वी में एजीजी का मुख्यालय आबू स्थानांतरित कर दिया गया।
• 1857 ईस्वी की क्रांति के समय एजीजी - जॉर्ज पैट्रिक लोरेंस
पैट्रिक लोरेंस पहले मेवाड़ का पोलिटिक्ल एजेंट था।
मेवाड़ का पहला पोलिटिक्ल एजेंट - जेम्स टॉड 

• गवर्नर जनरल का मुख्यालय - कलकत्ता
• 1864 ई. में एजीजी के लिए 6 माह अजमेर में रुकना निर्धारित कर दिया गया।


राजस्थान में 1857 की क्रांति

राजस्थान में अंग्रेजों की 6 सैनिक छावनियां थी -
1. नसीराबाद - अजमेर
2. देवली - टोंक
3. ब्यावर - अजमेर
4. नीमच - मध्यप्रदेश
5. खैरवाड़ा - उदयपुर
6. एरिनपुरा - पाली - सिरोही

नोट:- ब्यावर तथा खैरवाड़ा सैनिक छावनियों ने क्रांति में भाग नहीं लिया था।

1. नसीराबाद छावनी:-
• 28 मई को 15वीं N. I. ने क्रांति की शुरुआत की। 30वीं N.I. ने भी इनका साथ दिया। (NI - नेटिव इन्फेंट्री)
• इन्होंने कई अंग्रेज अधिकारियों को मार दिया।
जैसे- के. वेनी, न्यूबरो, स्पोर्टिसवुड
सभी विद्रोही दिल्ली की तरफ चले गए।

2. नीमच में क्रांति:-
• मोहम्मद अली बेग (लखनऊ) नामक सैनिक ने कर्नल एबाॅट के सामने अंग्रेजों की प्रति वफादारी की प्रतीक्षा करने से मना कर दिया।
• 3 जून को हीरासिंह के नेतृत्व में क्रांति हुई।
शाहपुरा के राजा लक्ष्मणसिंह ने विद्रोहियों की सहायता की। निम्बाहेड़ा (टोंक-चित्तौड़) में जनता ने विद्रोहियों का स्वागत किया ।
         देवली छावनी के सैनिक भी इनके साथ जुड़ गए तथा सभी विद्रोही दिल्ली चले गए।
• 40 अंग्रेज नीमच छावनी से भाग गए थे तथा डूंगला गांव (चित्तौड़गढ़) में रूघाराम जी किसान के पास शरण ली। मेवाड़ के पोलिटिक्ल एजेंट कैप्टन शाॅवर्स ने इन्हें बचाया तथा इन्हें उदयपुर लेकर गया।
मेवाड़ महाराणा स्वरूपसिंह ने इन्हें जगमंदिर महलों में रखा।

3. एरिनपुरा:-
1835 ई. में जोधपुर लीजियन का गठन किया गया। (मुुुुुुुख्यालय - एरिनपुरा)
21 अगस्त को पूर्बिया सैनिकों ने आबू में क्रांति कर दी।
विद्रोही एरिनपुरा आए तथा अपने बाकी साथियों को लेकर दिल्ली की तरफ बढ़ते हैं।
खैरवा नामक गांव में विद्रोहियों की मुलाकात कुुुुशालसिंह चंपावत से हुई। कुशाल सिंह चंपावत आउवा का सामंत था। इसने एरिनपुरा के विद्रोहियों का नेतृत्व किया।
• बिठौडा का युद्ध - 8 सितंबर 1857 ई.
 कैप्टन हीथकोट + कुशलराज सिंघवी (जोधपुर) v/s कुशालसिंह
कुशालसिंह जीत गया। जोधपुर का ओनाड़सिंह पवार युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया।

• चेलावास का युद्ध (पाली) - 18 सितंबर 1857 ई.
जॉर्ज पैट्रिक लोरेंस + मैकमैसन (जोधपुर का पोलिटिकल एजेंट) v/s कुशालसिंह
• कुशालसिंह जीत गया। मैक मैसन को मार दिया गया।
इस युद्ध को काले-गोरे का युद्ध भी कहा जाता है।

• आउवा का युद्ध - 20 जनवरी 1858 ई. (कुछ जगह 29 जनवरी)
कर्नल होम्स+हंसराज जोशी (जोधपुर) v/s पृथ्वीसिंह (लाम्बिया)
• कुशाल सिंह सहायता प्राप्त करने के लिए मेवाड़ चला गया। • अंग्रेज जीत गए।
•  कर्नलहोम्स ने आउवा पर अधिकार कर लिया तथा सुगाली माता की मूर्ति उठाकर अजमेर ले गया।
सुगाली माता की मूर्ति को राजपूताना म्यूजियम (अजमेर) में रखा गया।
•  मेवाड़ में केसरीसिंह चूंडावत (सलूंबर) तथा जोधसिंह (कोठारिया) ने कुशालसिंह चंपावत को शरण दी।
• 8 अगस्त 1860 ई. को कुशालसिंह ने नीमच में आत्मसमर्पण कर दिया।
कुशालसिंह की जांच के लिए टेलर कमीशन बनाया गया था।

• कुशालसिंह का साथ देने वाले अन्य सामंत:-
शिवनाथ सिंह- आसोप, बिशनसिंह - गूलर (नागौर), अजीतसिंह - आलणियावास (नागौर)
• विद्रोहियों ने शिवनाथसिंह के नेतृत्व में दिल्ली की तरफ जाने का प्रयास किया था लेकिन नारनौल (हरियाणा) के पास अंग्रेज सेनापति गेरार्ड से हार गए थे।

• कानजी:- यह बिठौड़ा का सामंत था, जिसे कुशालसिंह ने मार दिया था।
• तख्तसिंह:- क्रांति के समय जोधपुर का राजा था।

सुगाली माता:- यह आउवा की ईष्ट देवी थी। यह काले संगमरमर की मूर्ति है, जिसमें सुगाली माता के 10 सिर तथा 54 हाथ हैं।
पहले इस मूर्ति को अजमेर के राजपूताना म्यूजियम में रखा गया था लेकिन कालांतर में पाली के बांगड़ म्यूजियम में रख दिया गया।

कोटा में जन-विद्रोह (15 अक्टूबर 1857 ई.):-
विद्रोही:-
मेहराब ख़ान - रिसालदार (सेना),
जयदयाल (वकील)
• राजा ‌रामसिंह द्वितीय को नजरबंद कर दिया गया तथा पोलिटिक्ल एजेंट बर्टन (पुत्र - फ्रेंक व आर्थर) को मार दिया गया।
• मथुरैश जी मंदिर के महंत कन्हैयालाल गोस्वामी ने राजा तथा विद्रोहियों के बीच समझौता करवाया।
• राजा रामसिंह द्वितीय को बर्टन की हत्या की जिम्मेदारी वाले दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने पड़े। करौली के राजा मदनपाल ने रामसिंह द्वितीय को आजाद करवाया।
• मार्च 1858 ई. में रॉबर्ट्स ने कोटा को विद्रोहियों से पुर्णत:  मुक्त करवाया। जयदयाल तथा मेहराब खान को मृत्युदंड दिया गया।
• राजा राम सिंह द्वितीय को भी दंडित किया गया, उसकी तोपों की सलामी 15 से घटाकर 11 कर दी गई।

टोंक में क्रांति:-
नवाब वजीरूद्दौला अंग्रेजों का समर्थक था परंतु उसके मामा मीर आलम खां ने विद्रोहियों का साथ दिया।
• निम्बाहेड़ा में ताराचंद पटेल ने जैक्सन की सेना का सामना किया था। (जैक्सन नीमच के विद्रोहियोंं का पीछा कर रहा था)
•  टोंक में महिलाओं ने भी विद्रोह में भाग लिया।

धौलपुर में क्रांति:-
विद्रोही - राम रामचंद्र, हीरालाल
• राजा भगवंतसिंह ने विद्रोह दबाने के लिए पटियाला से सेना बुलाई थी।

भरतपुर में क्रांति:-
विद्रोही जनजाति - गर्जर, मेव
• राजा जसवंतसिंह ने पोलिटिक्ल एजेंट मॉरिसन को भरतपुर छोड़ने की सलाह दी।

अलवर में क्रांति:-
 राजा विनयसिंह अंग्रेजों का समर्थक था लेकिन उसके दीवान फैजल खां ने विद्रोहियों का साथ दिया।

जयपुर में क्रांति:-
विद्रोही - सादुल्ला खां, विलायत खां, उस्मान खां
पोलिटिक्ल एजेंट ईड़न के कहने पर राजा रामसिंह द्वितीय ने विद्रोहियों को गिरफ्तार कर लिया।
राजा रामसिंह द्वितीय को सितार-ए-हिंद की उपाधि तथा कोटपूतली जागीर दी गई।

बीकानेर में क्रांति:-
• राजा सरदारसिंह ने अपनी रियासत से बाहर जाकर विद्रोह को दबाया। (हिसार के पास बाडलू)
अंग्रेजों ने इसे टिब्बी परगने (हनुमानगढ़) के 41 गांव दिए थे।

• अमरचंद बांठिया:- मूल रूप से बीकानेर के थे। क्रांति के दौरान ग्वालियर में झांसी की रानी की आर्थिक सहायता की इन्हें क्रांति का भामाशाह कहा जाता है। 
अंग्रेजों ने इसे मृत्युदंड दिया था। (राजस्थान में सबसे पहले)

तात्या टोपे की राजस्थान में गतिविधियां:-
तात्या टोपे क्रांति के दौरान 2 बार राजस्थान आया था।
सबसे पहले भीलवाड़ा के मांडलगढ़ आया था, टोंक के नासिर मुहम्मद खां ने तात्या टोपे का साथ दिया।
• कुआडा़ का युद्ध - भीलवाड़ा के कोठारी नदी के पास।
 अंग्रेज सेनापति रॉबर्ट्स ने तात्या टोपे को हरा दिया।
झालावाड़ के राजा पृथ्वीसिंह ने तात्या टोपे के खिलाफ पलायता नामक स्थान पर अपनी सेना भेजी। गोपाल पलटन को छोड़कर बाकी सेना ने तात्या टोपे के खिलाफ लड़ने से मना कर दिया।
तात्या टोपे ने झालावाड़ पर अधिकार कर लिया।
राजा पृथ्वीसिंह को तात्या टोपे को 5 लाख रु. देने पड़े।
•  तात्या टोपे ने बांसवाड़ा पर भी अधिकार किया था।
•  जैसलमेर को छोड़कर तात्या टोपे राजस्थान की सभी रियासतों में सहायता मांगने गया था।
• मेवाड़ में सलूम्बर के केसरीसिंह तथा कोठारिया के जोधसिंह ने तात्या टोपे की सहायता की।
• बीकानेर के राजा सरदारसिंह ने तात्या टोपे को 10 घुड़सवारों की सहायता दी थी।
• सीकर के सामंत को अंग्रेजों ने फांसी दी थी, क्योंकि उसने तात्या टोपे को शरण दी थी।
तात्या टोपे की छतरी - सीकर

क्रांति का महत्व/प्रभाव:-
• क्रांति के दौरान राजा-महाराजाओं ने अंग्रेजों का साथ दिया इसलिए क्रांति के बाद अंग्रेजों ने राजाओं के साथ सहयोग की नीति अपनाई तथा राजाओं को सम्मानित किया गया।
जयपुर के रामसिंह द्वितीय को सितार-ए-हिंद की उपाधि व कोटपूतली जागीर दी गई।
बीकानेर के सरदारसिंह को 41 गांव (टिब्बी परगना) दिए।
करौली के मदनपाल को 17 तोपों की सलामी दी।

• क्रांति के दौरान सामंतों ने विद्रोहियों का साथ दिया इसलिए क्रांति के बाद सामंतों को प्रभावहीन (power less) बनाया गया।

• क्रांति के दौरान वैश्य वर्ग ने अंग्रेजों का साथ दिया था इसलिए क्रांति के बाद अंग्रेजों ने इन्हे संरक्षण प्रदान किया।
दामोदर दास राठी ने ब्यावर में राजस्थान की पहली सूती वस्त्र मिल स्थापित की।
• 1857 की क्रांति के बाद राजस्थान में यातायात व संचार के साधनों का विकास किया गया।
• जनता तथा राजा के आपसी संपर्क और तोड़ने के लिए राजा- महाराजाओं के बच्चों के लिए अलग स्कूल तथा कॉलेज स्थापित किए गए।
जैसे- वाॅल्टर योजना (1869) के तहत अजमेर में 1875 में मेयो कॉलेज की स्थापना की गई।
• अंग्रेजों ने अयोग्य राजाओं को संरक्षण प्रदान किया जिससे जनता का शोषण बढ़ा।
राजाओं की विलासिता में वृद्धि हुई तथा राजाओं ने जनता पर कर बढ़ा दिए। अतः राजस्थान में किसान विद्रोह शुरू हो गए।
• राजस्थान की जनता ने क्रांति में भाग लिया था। अतः यह सिद्ध हो गया कि राजस्थान की जनता अंग्रेजों की समर्थक नहीं है।
• क्रांति ने आगामी राष्ट्रीय आंदोलन के लिए प्रेरणास्रोत का कार्य किया था तथा कुशालसिंह चंपावत राजस्थान की लोक कहानियों तथा लोकगीतों का नायक बन गया।

राजस्थान परिप्रेक्ष्य में 1857 की क्रांति:-
कारण -  
1. राज्यों के आंतरिक शासन में हस्तक्षेप
जैसे - 1821 ई. में मांगरोल युद्ध में अंग्रेजों ने कोटा महाराव के विरुद्ध दीवान जालिमसिंह की सहायता की।
2. राज्यों के उत्तराधिकार मामलों में हस्तक्षेप 
जैसे - अलवर, भरतपुर
3. राज्यों की कमजोर वित्तीय स्थिति:-
राज्यों को खिराज देने के साथ-साथ कंपनी के लिए सेना रखनी पड़ती थी। 
जोधपुर लीजियन (1835), मेवाड़ भील कोर (1841) की स्थापना राज्यों के खर्च पर की गई।
4. राज्यों का शिथिल प्रशासन - रेजिडेंट शक्तिशाली बने
5. किसानों के हितों पर कुठराघात - किसानों पर कर भार में वृध्दि 

1857 की क्रांति का स्वरूप/प्रकृति:-
ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे सैनिक विद्रोह बताया।
गैर ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे -  जन आक्रोश बताया।
भारतीय इतिहासकारों ने इसे जनसाधारण का राष्ट्रीय आंदोलन कहा, जिसमें हिंदू-मुस्लिम सभी ने भाग लिया।

• वीर सावरकर ने अपनी पुस्तक 'भारत का स्वातंत्र्य समर' में इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा।
• राजस्थान की आम जनता ने विद्रोहियों का साथ दिया।
• सूर्यमल्ल मीसण व बांकीदास जैसे कवियों ने अपना योगदान दिया।
• अत: हम कह सकते हैं कि 1857 का यह संघर्ष विदेशी शासन से मुक्त होने का प्रथम प्रयास था, जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहां जाये तो अनुचित नहीं होगा।


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