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1857 की क्रांति से पूर्व के लोकप्रिय विद्रोह

Revolt movements before 1857


1857 से पूर्व के विभिन्न विद्रोह

(A) नागरिक विद्रोह - जनजातीय, किसान, राजा, धार्मिक।
(B) सैनिक विद्रोह -

संन्यासी विद्रोह (1763-1800 ई):-
यह विद्रोह बंगाल में संन्यासियों द्वारा किया गया था।
नेता:- द्विज नारायण, केना महाराज।
यह सन्यासी शंकराचार्य के अनुयायी थे तथा गिरी व नागा संप्रदाय से संबंधित थे।
कारण:-     
(i) अंग्रेजों ने तीर्थ यात्राओं पर रोक लगा दी थी।
(ii) 1770 ईस्वी में अकाल के दौरान अंग्रेजी सरकार उदासीन रही थी। अतः किसानों, मजदूरों व जमीदारों में असंतोष था।
• वारेन हेस्टिंग्स ने इस विद्रोह का दमन किया था।
• बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने आनंदमठ उपन्यास में इस विद्रोह का वर्णन किया है।
• इसी उपन्यास में वंदे मातरम का उल्लेख मिलता है।
1896 ईसवी में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार वंदे मातरम गाया गया था।
इस अधिवेशन में कांग्रेस का अध्यक्ष - रहीमतुल्ला सयानी।

फकीर विद्रोह (1776-77 ई):-
यह संन्यासी विद्रोह के समकालीन था।
नेता:- मजनू शाह, चिराग अली, भवानी पाठक, देवी चौधरानी।
बंकिम चंद्र चटर्जी ने देवी चौधरानी नामक उपन्यास भी लिखा था।

अहोम विद्रोह:- 
अहोम, असम का कुलीन वर्ग था।
यह विद्रोह प्रथम अंग्रेज-बर्मा युद्ध के बाद हुआ था।
कारण:- 
(i) अंग्रेज अहोम प्रदेशों को अपने साम्राज्य में मिलाना चाहते थे।
(ii) प्रथम अंग्रेज-बर्मा युद्ध के बाद अंग्रेज अहोम प्रदेशों से वापस नहीं जाना चाहते थे।
नेता - गोमधर कुंवर
गोमधर कुंवर के नेतृत्व में अहोमो ने रंगपुर पर आक्रमण की योजना बनाई लेकिन अंग्रेजों ने इसे विफल कर दिया।
• कालांतर में अंग्रेजों ने शांतिपूर्ण नीति अपनाई तथा उत्तरी असम के क्षेत्र महाराज पुरंदर सिंह को दे दिए गए।

खासी विद्रोह:-
कारण:-
(i) अंग्रेजों ने गारों तथा जयंतिया पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया था।
(ii) अंग्रेज ब्रह्मपुत्र से सिलहट के बीच सैनिक मार्ग की योजना बना रहे थे। 
नेता - राजा तीरत सिंह
गारो, खाम्पटी, सिंहपो जनजाति के लोगों ने भी विद्रोह में भाग लिया था।
• 1833 ई. में राजा तीरत सिंह को गिरफ्तार करके ढाका भेज दिया गया तथा वहीं उनकी मृत्यु हो गई थी।

फरायजी/फरैजी विद्रोह (1838-57 ई):-
फरायजी एक धार्मिक संप्रदाय था जो शरीयत उल्ला खां द्वारा प्रारंभ किया गया था। इस संप्रदाय के लोग धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में आमूल-चूल परिवर्तन चाहते थे।
• कालांतर में दादू मियां ने इस विद्रोह को आगे बढ़ाया तथा अंग्रेजों को बंगाल से बाहर निकालने की योजना बनाई।
किसान (मुजारे) भी इस विद्रोह में शामिल हो गए थे क्योंकि जमीदारों द्वारा उनका शोषण किया जाता था।
• कालांतर में इस विद्रोह के लोग वहाबी आंदोलन में शामिल हो गए थे।

पागलपंथी विद्रोह (1840-50 ई):-
यह बंगाल का एक अर्द्ध धार्मिक संप्रदाय था।
नेता:- करमशाह, टीपू
• टीपू ने शेरपुर पर अधिकार कर लिया था तथा स्वयं को यहां का राजा घोषित कर दिया।
• किसान भी इस विद्रोह में शामिल थे क्योंकि जमीदारों द्वारा उनका शोषण किया जाता था।

दीवान वेलुटम्पी का विद्रोह (1805 ई):-
त्रावणकोर के राजा ने अंग्रेजों के साथ सहायक संधि कर ली थी लेकिन अंग्रेज रेजिडेंट का राजा के प्रति व्यवहार अनुचित था। 
राजा द्वारा कंपनी को दिया जाने वाला धन बकाया होता चला गया। अतः राजा के दीवान वेेेेेेेेलुटम्पी ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह कर दिया।
नायर सेना ने वेलूथंपी का साथ दिया।
• वेेेेेेेेलुटम्पी लड़ता हुआ मारा गया लेकिन अंग्रेजों ने उसके उसके शव को भी फांसी पर लटका दिया था।

घोंडजी बाघ विद्रोह:-
1799 ईस्वी में चौथे अंग्रेज-मैसूर युद्ध के बाद अंग्रेजों ने मैसूर राज्य पर अधिकार कर लिया था। अतः घोंडजी बाघ विद्रोह कर देता है। गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली को स्वयं इस विद्रोह को दबाने जाना पड़ा। घोंडजी बाघ लड़ता हुआ मारा गया।

किट्टूर विद्रोह (1824 ई):-
राजा शिवरूद्रलिंग की मृत्यु के पश्चात रानी चेनम्मा उसके दत्तक पुत्र को राजा बनाना चाहती थी लेकिन अंग्रेजों ने इसके लिए मना कर दिया।
अतः रानी चेनम्मा, रायप्पा के साथ विद्रोह कर देती है।
• धारवाड़ के कलेक्टर की हत्या कर दी गई।
• अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबा दिया था।
• रायप्पा को फांसी दे दी गई तथा रानी चेनम्मा को गिरफ्तार कर लिया गया।

रामोसी विद्रोह (1822-26 ई):-
रामोसी, महाराष्ट्र की एक जनजाति है। इन्होंने अधिक करो के कारण विद्रोह कर दिया था।
नेता:- चितर सिंह, उमाजी।

खोंड विद्रोह (1838-57 ई):-
यह जनजाति तमिलनाडु से लेकर बंगाल तक के क्षेत्रों में रहती थी तथा मध्य भारत में भी इनका निवास स्थान था।
कारण:-    
(i) अंग्रेजों ने मानव बलि पर प्रतिबंध लगा दिया था।
(ii) जमीदारों का शोषण।
नेता:- चक्र बिसोई, राधाकृष्ण, दंडसेन।

पाइक विद्रोह/खुर्दा विद्रोह (1817 ई.):-
पाइक उड़ीसा का एक सैनिक समुदाय था, जिन्हें सैनिक सेवा के बदले भूमि प्रदान की जाती थी।
• कालांतर में इनके भूमि संबंधी अधिकार समाप्त कर दिए गए। अतः इन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह कर दिया तथा पुरी के जगन्नाथ मंदिर पर अधिकार कर लिया।
हालांकि अंग्रेजों ने विद्रोह को दबा दिया था।
नेता:- बक्शी जगबंधु।

संथाल विद्रोह (1855-56 ई)**:-
यह विद्रोह भागलपुर से लेकर राजमहल के बीच संथाल जनजाति द्वारा किया गया था। यह क्षेत्र दामिन-ए-कोह कहलाता था।
कारण:-       
(i) संथाल अंग्रेजों द्वारा लगाए जा रहे अधिक करो से परेशान थे।
(ii) जमीदार तथा साहूकार इनका शोषण करते थे।
नेता:- कान्हू, चांद, भैरव, सिद्धू (सिद्धू ने स्वयं को ठाकुर जी का अवतार घोषित कर दिया था)।
यह विद्रोह हिंसक हो गया था। संथालो ने मेजर बरो को हरा दिया था। हालांकि अंग्रेजों ने एक बड़ी सैनिक कार्यवाही द्वारा विद्रोह को दबा दिया।
• कालांतर में एक अलग संथाल परगना बना दिया गया तथा यह निश्चित किया गया कि कोई भी संथाल किसी गैर-संथाल को अपनी भूमि नहीं दे सकता।

आगे पढ़े 👉 1857 की क्रांति

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