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मारवाड़ का इतिहास

 
History of Marwar


मारवाड़ का इतिहास

मारवाड़ में राठौड़ वंश का शासन था।

नोट:-  मारवाड़ क्षेत्र:- जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर, नागौर, जालौर तथा पाली।
•हर्षवर्धन की राजधानी - कन्नौज (UP) थी - गंगा-जमुना का दोआब।
• दक्षिण भारत के राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया था।
• राष्ट्रकूटों की एक शाखा वहां से बदायूं चली गई। बदायूं से राष्ट्रकूट राजस्थान आये और राठौड़ कहलाए।
•बदायूं शिलालेख (13वीं शताब्दी) से राठौड़ों की जानकारी मिलती है।

राव सीहा:-
•पिता - सेतराम
•1240 ईस्वी में पालीवाल ब्राह्मणों की सहायता के लिए कन्नौज से मारवाड़ आया था।
•राजधानी -  खेड़ (बाड़मेर) - राठौड़ों की पहली राजधानी
•छतरी - बीठू (पाली)
•पत्नी - पार्वती सोलंकी 
• निर्माण - देवल अभिलेख (बीठू, पाली)
•मृत्यु - 1273 ई. - मुसलमानों के विरुद्ध गायों की रक्षा करते हुए।

धूहड़:-
अपनी कुलदेवी नागणेची माता की मूर्ति को कर्नाटक से लेकर आया तथा इसे नागाणा (बाड़मेर) में स्थापित करवाया।
धूहड़ के छोटे भाई का नाम धांधल था, जो लोकदेवता पाबूजी राठौड़ के पिता थे।

मल्लीनाथ:-
राजधानी - मेवा नगर (बाड़मेर)
पश्चिमी राजस्थान के लोकदेवता है।
इनके कारण बाड़मेर क्षेत्र को मालाणी कहा जाता है।
पत्नी - रुयाद (लोकदेवी)
बेटा - जगमाल
जगमाल गुजरात के शासक महमूद बेगड़ा की बेटी गींदोली को उठाकर लाया था। वह दिन गणगौर विसर्जन का दिन था।
• गणगौर के दिन गींदोली के गीत गाए जाते हैं।

राव चूंडा:-
प्रतिहार शाखा इन्दा के राजा ने अपनी बेटी की शादी चूंड़ा से की तथा मंडोर दहेज में दिया।
बेटी - हंसाबाई
पत्नी - चांदकवर सोनगरा (चांदना बावड़ी, जोधपुर)
पुत्र - रणमल, कान्हा
• चूडा़ ने अपनी मोहिल रानी के प्रभाव के कारण अपने बड़े बेटे रणमल के स्थान पर कान्हा को राजा बनाया था।
• रणमल की हत्या मेवाड़ में कर दी गई।

राव जोधा:-
• 1459 ईस्वी में जोधपुर की स्थापना की।
• चिड़ियाटूक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ (मोरध्वज/कागमुखी दुर्ग) बनवाया।
• रणमल की धर्म बहिन करणी माता (बीकानेर) ने मेहरानगढ़ की नींव रखी 
• जोधा ने मेहरानगढ़ में चामुंडा माता एवं राठौड़ों की कुलदेवी नागणेची माता का मंदिर बनवाया।
जोधा के पांचवें पुत्र बीका ने बीकानेर (1488ई.) की स्थापना की।

राव सातल (1489-92) की भाटी रानी फुलेलाव तालाब (जोधपुर) का निर्माण करवाया।
राव सूजा (1492-1515 ई.) के समय भाई बीका ने जोधपुर पर आक्रमण किया।

राव गांगा (1515-31ई.):-
•बीकानेर के राव जैतसी की सहायता से नागौर के दौलत खां को सेवक गांव के युद्ध 1529 ई. में हराया।
•रावगंगा की हत्या - मालदेव ने की। (पितृहंता)

राव मालदेव (1531-62 ई.):-
•अपने पिता गांगा की हत्या करके मालदेव राजा बना।
•राज तिलक के समय मालदेव के पास केवल 2 परगने थे।
1. जोधपुर       2. सोजत
कालांतर में मालदेव ने 52 युद्ध तथा 58 परगने जीते थे।
•मालदेव ने हीराबाडी का युद्ध 1533 ईस्वी में नागौर के दौलत खां को हराया।

पाहेबा/साहेबा-फलोदी (जोधपुर) का युद्ध 1541ई.
मालदेव और जैतसी (बीकानेर) के बीच लड़ा गया।
मालदेव जीत गया तथा उसने बीकानेर पर अधिकार कर लिया और जैतसी युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया।
उसका बेटा कल्याणमल सहायता मांगने शेरशाह सूरी के पास चला गया।
• मालदेव ने मेड़ता पर अधिकार कर लिया था।
मेड़ता का राजा वीरमदेव शेरशाह सूरी के पास चला गया तथा सहायता की मांग की।

मालदेव-हुमायूं संबंध:-
शेरशाह सूरी से हारने के बाद हुमायूं राजस्थान से होकर जा रहा था। उसने जोगीतीर्थ नामक स्थान से मालदेव के पास सहायता के लिए 3 दूत भेजे थे।
1.मीर समंद
2.अतका खां
3.रायमल सोनी
मालदेव ने सकारात्मक उत्तर दिया उसने बीकानेर तथा सैनिक सहायता देने का वादा किया लेकिन हुमायूं अपने पुस्तकालय अध्यक्ष मुल्ला सुर्ख के कहने पर मालदेव पर विश्वास नहीं करता है और सिंध (पाक)की तरफ चला जाता है। उसने अमरकोट के राजा वीर साल के पास शरण ली।
   यदि हुंमायू और मालदेव थोड़ी समझदारी दिखाते तो शेरशाह सुरी (अफगान) के खिलाफ गठबंधन बना सकते थे तथा अफगानों का शासन भारत से समाप्त कर सकते थे।
कालांतर में जो मुगल-राजपूत संबंध अकबर ने प्रारंभ किए थे, वो इसी समय शुरू हो सकते थे।

गिरी सुमेल (जैतारण, पाली) का युद्ध-1544ई.
मालदेव और शेरशाह सूरी के बीच।
मालदेव के सेनापति -  जैता, कूंपा  
 शेरशाह सूरी के सेनापति - कल्याणमल (बीकानेर), वीरमदेव (मेड़ता)
शेरशाह सूरी की चालाकी के कारण मालदेव वापस चला गया। जैता तथा कूंपा ने शेरशाह के खिलाफ युद्ध किया।
जलाल खान जलवानी की सहायता से शेरशाह सूरी युद्ध जीत गया , जीतने के बाद शेरशाह ने कहा कि "मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता"।
शेरशाह ने जोधपुर पर अधिकार कर लिया तथा खवास खां को जोधपुर सौंप दिया।
मालदेव सिवाणा चला गया।
सिवाणा को मारवाड़ के राठौड़ों की शरणस्थली कहा जाता था।
थोड़े दिन बाद मालदेव ने जोधपुर पर पुनः अधिकार कर लिया।
शेरशाह सूरी के साथ संबंधों में मालदेव ने कूटनीतिक गलतियां की।
उसने कल्याणमल और वीरमदेव को शेरशाह सूरी के पास जाने का मौका दिया अन्यथा वह राठौड़ों का गठबंधन बना सकता था ।
यदि वह शेरशाह सूरी की चालाकी में नहीं फंसता तो गिरी सुमेल का युद्ध जीत सकता था। 
प्रश्न.मालदेव के हुंमायु तथा शेरशाह सूरी के साथ संबंधों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए ?

उमादे:-
जैसलमेर के लूणकरण भाटी की राजकुमारी थी, मालदेव की रानी थी।
भारमली नामक दासी की कारण मालदेव से नाराज हो गई थी इसलिए इसे रूठी रानी कहा जाता है।
• इसने अपना कुछ समय अजमेर के तारागढ़ किले में बिताया था तथा कालांतर में केलवा गांव चली गई थी।

•बारात के ठहरने का स्थान  - डेरा
•जला - महिलाओं द्वारा बारात का डेरा देखने जाते समय गाया जाने वाला गीत।

मालदेव के दरबारी विद्वान:-
1. आशानंद जी:- 
पुस्तक - उमा दे भटियाणी रा कवित्त
            बाघा-भारमली रा दुहा
            गोगाजी री पेडी़
•इन्होंने पाहेबा युद्ध में भी भाग लिया था।
2. ईसरदासजी:-
पुस्तक -हाला झाला री कुंडलियां (सुर सतसई)
           देवीयाण, हरिरस
•पश्चिमी राजस्थान के लोक देवता हैं।

• मालदेव ने जोधपुर का परकोटा (Rampart) बनवाया था।
• उसने कई स्थानों पर किले बनवाए -
1. मेड़ता - नागौर  2. रिया का किला - नागौर
3. सोजत - पाली  4. पोकरण किला - जैसलमेर

मालदेव की उपाधियां:-
1. हिंदू बादशाह
2. हसमत वाला राजा (शानो - शौकत वाला राजा)  

मालदेव के पुत्र - राम, उदयसिंह, चंद्रसेन, रायमल।
• मालदेव ने अपने बड़े बेटे राम तथा उदयसिंह को राजा नहीं बनाया बल्कि छोटे बेटे चंद्रसेन को राजा बनाया था।

चंद्रसेन (1562-81):-
• राम ने अकबर से सहायता मांगी। अकबर के सेनापति हुसैन कुली बैग ने जोधपुर पर आक्रमण कर दिया। चंद्रसेन भाद्राजूण (जालौर) चला गया।
• 1570 ईस्वी में चंद्रसेन अकबर के नागौर दरबार में गया। लेकिन अकबर का झुकाव अपने भाई उदयसिंह की तरफ देखकर अकबर से बिना मिले ही वापस चला गया।
• अकबर ने भाद्राजूण पर आक्रमण कर दिया। चंद्रसेन सिवाणा चला गया। (फिर - पीपलोद - कनूजा)
• चंद्रसेन आजीवन संघर्ष करता रहा लेकिन अकबर की  अधीनता स्वीकार नहीं की।
•1581 ई. सारण की पहाड़ियों (पाली) में चंद्रसेन की मृत्यु ( जहर देने से) सिचियाई नामक स्थान पर हो गई। (5 रानी सती हुई)

चंद्रसेन की उपाधियां:-
1. मारवाड़ का भूला बिसरा राजा
2. मारवाड़ का प्रताप
3. प्रताप का अग्रगामी (Guide of pratap)

• अकबर ने जोधपुर को खालसा घोषित किया।

खालसा - ऐसी भूमि जिसका नियंत्रण केंद्र के पास हो।

चंद्रसेन और प्रताप में समानताएं:-
अधीनता - दोनों ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।
छापामार युद्ध प्रणाली - दोनों ने छापामार युद्ध प्रणाली का अनुसरण किया।
• भाई - दोनों को अपने भाइयों के विरोध का सामना करना पड़ा। जैसे - जगमाल ने प्रताप का विरोध किया वैसे ही राम व उदयसिंह ने चंद्रसेन का विरोध किया।
• दोनों के अधिकतर राज्य पर अकबर ने अधिकार कर लिया तथा केवल थोड़ी सी भूमि के बल पर अकबर का सामना किया।
शरण - दोनों को अपने राज्य के बाहर शरण लेनी पड़ी।
जैसे - प्रताप ने छप्पन के मैदान (बांसवाड़ा) में शरण ली और चंद्रसेन ने डूंगरपुर के राजा आसकरण के पास शरण ली।

दोनों में असमानताऐ:-
• प्रताप  का मगल विरोध उसके राजतिलक के साथ प्रारंभ हो गया था लेकिन चंद्रसेन का मुगल विरोध नागौर दरबार, 1570 ई. वीं के बाद शुरू हुआ था।
• प्रताप ने हल्दीघाटी तथा दिवेर के युद्ध में अकबर का प्रत्यक्ष ( Direct) सामना किया परंतु चंद्रसेन ऐसा नहीं कर पाया।
• प्रताप का मुगल विरोध उसकी मृत्यु के बाद उसके बेटे अमरसिंह ने जारी रखा परंतु चंद्रसेन का मुगल विरोध उसकी मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गया था।
• प्रताप ने चावंड को अपना स्थाई केंद्र बनाया था लेकिन चंद्रसेन ऐसा कोई केंद्र स्थापित नहीं कर पाया।
• प्रताप ने मेवाड़ की जनता में राष्ट्रवादी भावनाओं का संचार किया लेकिन चंद्रसेन एहसान नहीं कर पाया।

• इन असमानताओ के बावजूद चंद्रसेन को मारवाड़ का प्रताप कहा जा सकता है क्योंकि -
• चंद्रसेन की भौगोलिक परिस्थितियां प्रताप की तुलना में प्रतिकूल थी, क्योंकि प्रताप के पास पर्वतीय प्रदेश था, जो छापामार युद्ध के लिए अनुकूल था। लेकिन चंद्रसेन के पास मैदानी मरुस्थल था।
• प्रताप को भामाशाह तथा ताराचंद जैसे दानवीर साथियों का समर्थन मिला लेकिन चंद्रसेन को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा।

प्रश्न.चंद्रसेन को मारवाड़ का प्रताप का जाता है ? क्या आप इस कथन से सहमत हैं ?

नागौर दरबार (1570 ई.):- मुगल बादशाह अकबर ने आयोजित करवाया था।
• घोषित उद्देश्य - अकाल राहत कार्य
• वास्तविक उद्देश्य -  राजस्थान के राजाओं को अधीनता स्वीकार कराना।
• राजस्थान के अनेक राजाओं ने यहां अकबर की अधीनता स्वीकार की। जैसे - कल्याणमल - बीकानेर , उदयसिंह - चंद्रसेन का भाई, हरराज - जैसलमेर।
• इस समय अकबर ने नागौर में शुक्र तालाब बनवाया।

नागौर दरबार का महत्व:-
• अकबर ने बिना लड़े ही अपनी कूटनीति के माध्यम से राजस्थान के राजाओं को अधीनता स्वीकार करवायी।
• राजस्थान के राजा स्पष्ट रूप से दो भागों में विभाजित हो गए - 1. मुगल सहयोगी।   2. मुगल विरोधी
• राजस्थान में मुग़ल आश्रित राजाओं की श्रंखला प्रारंभ हुई।  
जैसे - मानसिंह - आमेर, रायसिंह - बीकानेर  
• युद्ध बंद होने से शांति व्यवस्था सुनिश्चित हुई। जिससे कलात्मक गतिविधियों को बढ़ावा मिला।
• अकबर ने बीकानेर के रायसिंह को जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया था (1572-74 ई.)
• कालांतर में अकबर ने जोधपुर को खालसा भूमि (केंद्र द्वारा नियंत्रित भूमि) घोषित कर दिया।

मोटा राजा उदयसिंह (1583-95 ई.):-
• यह मारवाड़ का पहला राजा था जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।
• अपनी बेटी मानीबाई (जोधा बाई) की शादी अकबर के बेटे जहांगीर के साथ की थी। जहांगीर ने मानीबाई को जगत गोसाई की उपाधि दी।
मानीबाई का बेटा - खुर्रम (शाहजहां)

कल्ला रायमलोत (कल्याणसिंह):-
• यह उदयसिंह के भाई रायमल का बेटा था।
• यह सिवाणा का सामंत था।
• 1590 ईस्वी में अकबर ने सिवाणा पर आक्रमण किया।
• कल्ला रायमलोत के नेतृत्व में सिवाणा का दूसरा साका हुआ।
• पृथ्वीराज राठौड़ ने कल्लारायमलोत के मरसिये लिखे थे।

मरसिये - किसी वीर पुरुष के बहादुरीपूर्वक लड़ते हुए मारे जाने पर उसकी वीरता पर लिखे गए दोहे।

गजसिंह (1615-38 ई.):-
पुत्र- अमरसिंह (बड़ा), जसवंतसिंह
अनारा बेगम के कहने पर गजसिंह ने अपने छोटे बेटे जसवंतसिंह को जोधपुर का राजा बनाया तथा बड़े बेटे अमरसिंह को नागौर दिया गया।
जहांगीर ने गजसिंह को दलथंभन की उपाधि दी।

अमरसिंह राठौड़:-
मतीरे री राड़ - 1644 ई.
अमरसिंह (नागौर) और कर्णसिंह (बीकानेर) के बीच।
•अमरसिंह ने शाहजहां के दरबार में मीर बक्शी सलावत खां  को मार दिया था।
• अमरसिंह को कटार का धनी कहा जाता है।
• अमरसिंह की हत्या उसके साले अर्जुन सिंह गौड़ ने की थी।
• नागौर में अमरसिंह राठौड़ की छतरी है। (16 खंभों की)
• आगरा किले के बुखारा दरवाजे को अमरसिंह दरवाजा कहा जाता है, शाहजहां ने इस दरवाजे को बंद करवा दिया था।
• कालांतर में अंग्रेज अफसर जॉर्ज स्टील ने इस दरवाजे को खुलवाया।
• कालांतर में अमरसिंह राठौड़ राजस्थान की लोक कहानियां तथा लोक गीतों का नायक बन गया था।

जसवंतसिंह (1638-78 ई.):-
• जब जसवंतसिंह धरमत के युद्ध से बीच में वापस आ गया था तो उसकी हाडी रानी जसवंत दे ने किले के दरवाजे बंद करवा दिए थे।
खजुआ के युद्ध में औरंगजेब के खिलाफ शुजा की सहायता की।
• औरंगजेब ने जसवंतसिंह को काबुल का गवर्नर बनाया।
• 1678 ई.मे जमरूद का थाना (अफगानिस्तान) नामक स्थान पर इसकी मृत्यु हो गई।
• इसकी मृत्यु पर औरंगजेब ने कहा था "आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया"

जसवंतसिंह की पुस्तके:-
1. आनंद विलास
2. भाषा भूषण
3. प्रबोध चंद्रोदय
4. अपरोक्ष सिद्धांत सार
• इसने महाराष्ट्र में औरंगाबाद के पास जसवंतपुरा नामक कस्बा बसाया था।
•  इसकी रानी जसवंत दे ने जोधपुर में राई का बाग महल का निर्माण करवाया था।
• जोधपुर में अनार का बगीचा लगवाया। (कागा उधान)

जसवंतसिंह के दरबारी विद्वान:-
मुहणौत नैणसी:- नैणसी री ख्यात (राजस्थान का पहला ख्यात ग्रंथ)
मारवाड़ रा परगना री विगत
इस पुस्तक से मारवाड़ की प्रशासनिक सामाजिक व आर्थिक स्थिति की जानकारी मिलती है।
इस पुस्तक को मारवाड़ का गजट कहा जाता है।
इस पुस्तक से जनगणना की जानकारी मिलती है।
• कर्जे से परेशान होकर नैणसी ने अपने भाई सुंदरदास के साथ जेल में आत्महत्या कर ली।
• मुंशी देवी प्रसाद ने मुहणौत नैणसी को राजस्थान का अबुल फजल कहा है।

इंद्रसिंह:-
• अमरसिंह राठौड़ का पौत्र।
• यह नागौर का राजा था।
• औरंगजेब ने 36 लाख रुपए लेकर इसे जोधपुर का राजा बना दिया।
• जोधपुर की जनता ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसके बाद औरंगजेब ने जोधपुर को खालसा घोषित कर दिया।

पृथ्वीसिंह:-
• यह जसवंतसिंह का बेटा था।
• इसने शेर के साथ लड़ाई की थी।
• औरंगजेब ने इसे जहरीले कपड़े देकर मरवा दिया था।

अजीतसिंह व दलथंभन:-
• यह दोनों जसवंतसिंह के बेटे थे।
• औरंगजेब ने दिल्ली में किशनगढ़ के रूपसिंह राठौड़ की हवेली मे इन्हें नजर बंद कर दिया था।

अजीतसिंह (1679-1724 ई.):-
• दुर्गादास राठौड़, मुकुंददास खीची तथा गोरा की सहायता से अजीतसिंह को लेकर मारवाड़ आया।
• गोरा को मारवाड़ की पन्नाधाय कहा जाता है।
• जोधपुर में गोरा की छतरी है।
मारवाड़ के राष्ट्रगान धूंसो में गोरा का नाम लिया जाता था।
• अजीतसिंह को कालिन्द्री गांव (सिरोही) में जयदेव पुरोहित के पास रखा गया।
• मेवाड़ के राजसिंह ने अजीतसिंह को समर्थन दिया।
• औरंगजेब ने नकली अजीतसिंह का नाम बदलकर मुहम्मदीराज कर दिया तथा इसे अपनी बेटी जेबुन्निसा को सौंप दिया।
• दुर्गादास तथा राजसिंह ने औरंगजेब के बेटे अकबर से विद्रोह करवा दिया।
• औरंगजेब की चालाकी  के कारण अकबर को दक्षिण भारत में शंभाजी के पास जाना पड़ा।

बुलंद अख्तर तथा सफीयतुनिस्सा:-
• ये दोनों अकबर के पुत्र-पुत्री थे। इनका पालन-पोषण दुर्गादास राठौड़ ने किया था।
• कालांतर में ईश्वरदास नागर (जोधपुर) की सलाह पर दुर्गादास ने इन्हें औरंगजेब को सौंप दिया।
• 1708 ई. में देबारी समझौते के बाद अजीतसिंह मारवाड़ का राजा बना। दुर्गादास राठौड़ ने अजीतसिंह को राजा बनाने के लिए 30 वर्ष संघर्ष किया था। (1678-1708 ई. तक)
इसे राठौड़ों का 30 वर्षीय संघर्ष कहा जाता है।
• अजीतसिंह ने दुर्गादास राठौड़ को देश निकाला दे दिया था। (मतीरा भेजा)
• अजीतसिंह ने अपनी राजकुमारी इंद्र कंवर की शादी मुगल शासक फर्रूखसियर से की थी। यह अंतिम हिंदू राजकुमारी थी जिसकी शादी किसी मुगल बादशाह से हुई।
• अजीतसिंह की हत्या उसके बेटे बख्तसिंह ने की थी।
• अजीतसिंह के अंतिम संस्कार में अनेक पशु-पक्षी (स्वेच्छा से) जलकर मर गए थे।

दुर्गादास राठौड़:-
पिता- आसकरण
माता- नेत कंवर
जन्म स्थान - सालवा जोधपुर
•आसकरण ने दुर्गादास को लूणेवा जागीर दी थी।
• मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह द्वित्तीय ने दुर्गादास को रामपुरा तथा विजयपुरा जागीरे दी थी।
• दुर्गादास राठौड़ की छतरी उज्जैन में क्षिप्रा नदी के किनारे है।
उपाधियां:-
राठौड़ों का यूलीसेज - कर्नल जेम्स टॉड ने कहा।
राजपूताने का गैरीबाल्डी
मारवाड़ का अणबिन्धिया मोती

• गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अपनी पुस्तक जोधपुर राज्य का इतिहास के द्वितीय संस्करण को दुर्गादास को समर्पित कर दिया।

अभयसिंह (1724-49 ई.):-
खेजड़ली घटना:- भाद्रपद शुक्ल दशमी विक्रमी संवत 1787 (1730 ई.) को अमृता देवी विश्नोई के नेतृत्व में 363 लोग पेड़ों को बचाने के लिए शहीद हो गए।
भारत व राजस्थान सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अमृता देवी पुरस्कार दिया जाता है।
खेजडली में वृक्ष मेले का आयोजन किया जाता है।
अभयसिंह के दरबारी विद्वान:-
1. करणी दान - सूरज प्रकाश (बिड़द सिंगार)
2. वीरभाण - राजरूपक
इन दोनों पुस्तकों से अहमदाबाद युद्ध की जानकारी मिलती है। इस युद्ध में अभयसिंह ने गुजरात के सर बुलंद खां को हरा दिया था।

मानसिंह (1803-43):-
• मारवाड़ का संन्यासी राजा।
• जब मानसिंह जालौर में था तो देवनाथ ने इसके राजा बनने की भविष्यवाणी की थी।
• मानसिंह ने नाथ संप्रदाय के लिए जोधपुर में महामंदिर बनवाया।
• पुस्तक - नाथ चरित्र
• स्थापना - मान पुस्तकालय बनवाया (मेहरानगढ़ किले में)
• अंग्रेजों से संधि की - 1818 ई. में
• 1831ई. में लॉर्ड विलियम बैंटिक के अजमेर दरबार का बहिष्कार किया।
दरबारी विद्वान:-
कविराजा बांकीदास:-
1. बांकीदास री ख्यात
2. मान जसो मंडन
3. कुकवि बत्तीसी (32)
4. दातार बावनी (52)
गीत - आयो अंग्रेज मुल्क रै ऊपर
इस गीत में उन राजाओं की आलोचना की गई है जिन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया था।


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