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अलवर का इतिहास । भरतपुर का इतिहास । करौली का इतिहास

 
History of Alwar


अलवर का इतिहास

• अलवर में कछवाहा वंश की नरुका शाखा का शासन था।
• मिर्जा राजा जयसिंह ने कल्याणसिंह नरूका को माचेडी़ जागीर दी।

प्रतापसिंह:-
• यह मांचेड़ी का सामंत था।
1774 ई. में मुगल बादशाह शाह आलम-द्वितीय ने इसे स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया।
• 1775 ई. में इसने अलवर को जीतकर अपनी राजधानी बनाया।

बख्तावरसिंह:-
• यह बख्तेश तथा चंद्रसखी नाम से कविता लिखता था।
• 1803 ई. में अंग्रेजों के साथ संधि कर लेता है।

विनयसिंह:-
• अलवर में मूसी महारानी की 80 खंभों की छतरी का निर्माण करवाया।
• मूसी महारानी बख्तावरसिंह की दासी थी।
• अपनी रानी शीला के लिए अलवर में सिलीसेढ़ झील (राजस्थान का नंदन-कानन) का निर्माण करवाया।

जयसिंह:-
पहले गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था।
• निम्न कॉलेजों को आर्थिक सहायता दी -
BHU - बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
AMU - अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
सनातन धर्म कॉलेज - लाहौर
• चेंबर ऑफ प्रिंसेज का नाम बदलकर नरेंद्र मंडल कर दिया।
• हिंदी को अलवर में राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया था।
• 10 दिसंबर 1903  ई. को बाल विवाह कथा अनमेल विवाह (mismatch marriage) पर रोक लगाई।
• ड्यूक ऑफ एडिनबर्ग के अलवर आगमन पर सरिस्का महल का निर्माण करवाया गया।
•1933 ई. में तिजारा दंगों (Rites) के बाद इसे हटा दिया गया तथा यह पेरिस चला गया और वहीं पर इसकी मृत्यु हो गई।

तेजसिंह:-
• आजादी के समय अलवर का राजा था।
• महात्मा गांधी की हत्या में संदिग्ध भूमिका थी। (इसका प्रधानमंत्री वी.एन. खरे था)
• सुप्रीम कोर्ट ने इसे निर्दोष करार दिया था।


भरतपुर का इतिहास

भरतपुर और धौलपुर में जाट राजवंश का शासन था।
• 1669 ई. में गोकुल जाट ने मथुरा के आस-पास के जाट किसानों के साथ औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह कर दिया लेकिन औरंगजेब ने इसे दबा दिया।
• 1687 ई. में सिनसिनी गांव (भरतपुर) के राजाराम जाट ने औरंगजेब के खिलाफ दूसरा विद्रोह कर दिया।
1. अकबर का मकबरा (सिकंदरा,आगरा) को लूटा।
2. औरंगजेब  के कहने पर बिशनसिंह (आमेर) ने राजाराम की हत्या कर दी।
 
चूडामन:-
थून (भरतपुर) किले का निर्माण करवाया।

बदनसिंह:-
• सवाई जयसिंह की सहायता से राजा बना।
• इसे डीग की जागीर तथा ब्रजराज की उपाधि दी गई। इसने डीग में किले का निर्माण करवाया।

सूरजमल (1756-63 ई.):- 
• भरतपुर के जाट राज्य का वास्तविक संस्थापक
•  इन्हें जाटों का प्लेटा/अफलातून कहा जाता है।
ड़ीग में जलमहलों का निर्माण करवाया था। ड़ीग को जलमहलों की नगरी कहा जाता है।
भरतपुर में किले का निर्माण करवाया था। (मिट्टी का दुर्ग)
• भरतपुर में कृषि सुधार करवाये। इस समय भरतपुर राज्य की आय 17.5 लाख रु. वार्षिक थी।
• भरतपुर में प्रशासनिक सुधार करवाये तथा योग्यता आधारित (Merit) नौकरशाही गठित की।

दरबारी विद्वान:-
मंगल सिंह पुरोहित की पुस्तक - सुजान सवंत विलास

• पानीपत के तीसरे युद्ध 1761 ई. से भागते मराठा सैनिकों को सूरजमल ने शरण दी थी।
• दिल्ली पर आक्रमण किया तथा वहां से नूरजहां का झूला लेकर आए थे तथा इसे ड़ीग के महलों में लगवाया।

जवाहरसिंह:-
• दिल्ली पर आक्रमण किया तथा वहां से अष्टधातु के दरवाजे लेकर आए तथा इसे भरतपुर के किले में लगवाया।ये दरवाजे मूल रूप से चित्तौड़ किले के थे।
• 1765 में दिल्ली विजय के उपलक्ष्य में भरतपुर में जवाहर बुर्ज का निर्माण करवाया।
     कालांतर में यहां पर भरतपुर के राजाओं का राजतिलक किया जाता था। ‌‌

रणजीत सिंह:-
• 1803 ई. में अंग्रेजों से संधि की।
लार्ड वेलेजली के समय लार्ड लेक ने 1805 ई. में भारत पर आक्रमण किया क्योंकि रणजीत सिंह ने मराठा जसवंतराव होलकर (इंदौर) को दूसरे अंग्रेज-मराठा युद्ध के दौरान शरण दी थी।।
• लार्ड लेक ने भरतपुर पर 5 बार आक्रमण किये लेकिन भरतपुर को जीत नहीं पाया इसलिए भरतपुर किले को लोहागढ़ कहां जाता है।
• इस जीत की याद में भरतपुर में फतह बुर्ज का निर्माण करवाया।


करौली का इतिहास

राजस्थान में यदुवंश की दो रियासतें थीं।
करौली में यदुवंशी जादौन शाखा का शासन था।
जैसलमेर में यदुवंशी भाटी शाखा का शासन था।
• कुलदेवी - कैलादेवी
• करौली का प्राचीन नाम - गोपालपाल

विजयपाल:-
1040 ई. में बयाना भरतपुर को अपनी राजधानी बनाया।

धर्मपाल:-
1650 ई. मे करौली को राजधानी बनाया।
• करौली को पहले कल्याणपुर कहा जाता था। अर्जुनपाल ने कल्याणपुर की स्थापना (1348 ई.) की थी।

गोपालपाल:- 
करौली में मदनमोहन मंदिर (गौड़ीय संप्रदाय) का निर्माण करवाया।

हरबक्शपाल:-
1817 ई. में अंग्रेजों से संधि की।

मदनपाल:-
1865 ई. में स्वामी दयानंद सरस्वती ने करौली की यात्रा की। (राजस्थान में पहली बार यात्रा)
•1857 ई. की क्रांति के दौरान कोटा के राजा रामसिंह-द्वितीय की मदद की।
•अंग्रेजों ने मदनपाल को 17 तोपों की सलामी दी थी।

प्रश्न.स्वामी दयानंद सरस्वती ने किस वर्ष उदयपुर में परोपकारिणी सभा की स्थापना की ? - 1883


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