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मैसूर साम्राज्य। हैदर अली। टीपू सुल्तान। आंग्ल-मैसूर युद्ध

 

Masore empire

मैसूर साम्राज्य

मैसूर पहले विजयनगर साम्राज्य का भाग था लेकिन कालांतर में विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद मैसूर स्वतंत्र राज्य बन गया था।
मैसूर में वाडियार वंश के चिक्का राजा का शासन था। अयोग्य चिक्का राजा के कारण मैसूर की सत्ता नंदराज तथा देवराज के हाथों में थी।
1761 ईस्वी में हैदर अली ने मैसूर की सत्ता पर अधिकार कर लिया। हैदर अली ने डिंडीगुल में फ्रांसीसीयों की सहायता से तोपखाना लगवाया।


प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767 - 69):-

अंग्रेजों ने मराठों तथा हैदराबाद के निजाम के साथ एक गठबंधन बनाया और हैदर अली पर आक्रमण कर दिया।
हैदर अली ने अपनी कूटनीति से इस गठबंधन को तोड़ दिया तथा उसने मद्रास को घेर लिया। अतः अंग्रेजों को मद्रास की संधि करनी पड़ी।
दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के जीते गए क्षेत्र लौटा दिए तथा यदि कोई तीसरा पक्ष आक्रमण करता है, तो दोनों एक दूसरे की सहायता करेंगे।


दूसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84):-

कारण:-(1) मराठा आक्रमणों के समय अंग्रेजों ने हैदर अली की सहायता नहीं की थी।
(2) इस समय अमेरिका में स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था तथा फ्रांस, इंग्लैंड के खिलाफ अमेरिका का साथ दे रहा था।
(3) भारत में अंग्रेजों ने माहे नामक फ्रांसीसी बस्ती पर आक्रमण कर दिया तथा हैदर अली इसे अपनी सीमा मानता था।
इस युद्ध में हैदर अली ने मराठों तथा निजाम को अंग्रेजों से अलग रखा तथा हैदर अली ने अंग्रेज सेनापति बेली को हराया।
पोर्टोनोवा का युद्ध (1781):-
इस युद्ध में अंग्रेज सेनापति आयरकूट ने हैदर अली को हरा दिया। थोड़े दिनों बाद आयरकूट की मृत्यु हो गई तथा हैदर अली ने नए अंग्रेज सेनापति ब्रेथवेट को हराकर उसे गिरफ्तार कर लिया।
थोड़े दिनों बाद हैदर अली की मृत्यु हो गई। अतः उसके बेटे टीपू सुल्तान ने नेतृत्व किया।
टीपू सुल्तान ने मद्रास के गवर्नर मैकार्टनी के साथ मंगलौर की संधि कर ली।
मंगलौर की संधि अंग्रेजों द्वारा किसी भारतीय राजा के साथ बराबरी के स्तर पर की गई अंतिम संधि थी।


तीसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-92):-

कारण:-(1) त्रावणकोर के राजा ने जैकोटे तथा क्रेगानूर नामक दो डच बस्तियां खरीदने का प्रयास किया। यह डच फैक्ट्रियां कोचीन रियासत में थी।
टीपू सुल्तान कोचीन को अपना सहायक राज्य मानता था। अतः उसने त्रावणकोर के राजा का विरोध किया तथा त्रावणकोर पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों ने त्रावणकोर का साथ दिया।
बंगाल के गवर्नर जनरल कॉर्नवालिस ने मराठों तथा निजाम के साथ एक त्रिगुट का निर्माण किया।
टीपू सुल्तान ने अंग्रेज सेनापति मीडोस को हरा दिया।
इसके बाद स्वयं कॉर्नवालिस ने आक्रमण किया तथा टीपू सुल्तान को निर्णायक रूप से हरा दिया गया।

टीपू सुल्तान के साथ श्रीरंगपट्टनम की संधि की गई। 
संधि के तहत टीपू का आधा राज्य छीन लिया गया और उस पर तीन करोड़ का हर्जाना लगाया गया। साथ ही उसके दो बेटों को बंधक के रूप में रखा गया।
अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान से छीने गए आधे राज्य को तीन भागों में बांट दिया -
अंग्रेज - बारामहल, डिंडीगुल, मालाबार
मराठा - तुंगभद्रा नदी के उत्तर का भाग
निजाम - कृष्णा व पेन्नार नदियों के बीच का क्षेत्र

कॉर्नवालिस ने कहा-  "हमने अपने मित्रों को शक्तिशाली किए बिना दुश्मन को पंगु बना दिया है।"


चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799):-

बंगाल के गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली ने आरोप लगाया कि टीपू सुल्तान, फ्रांसीसीयों के साथ षड्यंत्र रच रहा है। अतः अंग्रेजों ने मैसूर पर आक्रमण कर दिया।
टीपू सुल्तान लड़ता हुआ मारा गया।
अंग्रेजों ने मैसूर पर अधिकार कर लिया।
इस युद्ध के बाद वेलेजली ने कहा था - "अब पूर्व का साम्राज्य हमारे कब्जे में है।"
अंग्रेजों ने चिक्का राजा को मैसूर का राजा बना दिया।


टीपू सुल्तान के सुधार कार्य:-

(1) टीपू सुल्तान प्रथम भारतीय राजा था जिसने पाश्चात्य परंपराओं को भारतीय प्रशासन में लागू करने का प्रयास किया था।
(2) टीपू सुल्तान ने सक्रिय विदेश नीति का पालन किया तथा फ्रांस, तुर्की, मिस्र के साथ विदेशी संबंध स्थापित किए थे।
(3) टीपू सुल्तान फ्रांस के जैकोबिन क्लब का सदस्य था। उसने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम में स्वतंत्रता का वृक्ष लगाया था।
(4) टीपू ने नया कैलेंडर तथा नई नाप-तोल प्रणाली शुरू की थी।
(5) श्रृंगेरी के शारदा मंदिर का पुनः निर्माण करवाया था।
टीपू स्वयं को नागरिक टीपू कहलाना पसंद करता था।
टीपू सुल्तान को शेर-ए-मैसूर कहा जाता है। 

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