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मराठा साम्राज्य । मराठा संघ । अंग्रेज-मराठा युद्ध

Maratha empire

मराठा साम्राज्य

मराठों का उत्थान:-
• भौगोलिक उत्थान
• महाराष्ट्र में व्यापार का प्रभाव था।
• यहां की जमीन उपजाऊ नहीं थी।
• मराठा बीजापुर एवं अहमदनगर में सैनिकों के रूप में कार्य करते थे।
• बीजापुर एवं अहमदनगर से प्रशासनिक अनुभव प्राप्त किए।
• शिवाजी का योग्य नेतृत्व।

छत्रपति शिवाजी (1674-80):-
• जन्म - 1627 ईस्वी (शिवनेरी दुर्ग)
माता - जीजाबाई
• पिता - शाहजी भोंसले
पुणे शाहजी भोंसले की जागीर थी। ये बीजापुर शासक के यहां सेवाएं देते थे।
• शिवाजी के संरक्षक/राजनीतिक गुरु - दादा कोणदेव/कोण्डदेव
आध्यात्मिक गुरु - समर्थ गुरु रामदास

शिवाजी ने प्रशासनिक अनुभव पुणे से प्राप्त किए।
1643/46 - शिवाजी ने तोरण/सिंहगढ़ किले को जीता।
1656 - शिवाजी ने रायगढ़ को जीता।
1659 - औरंगजेब ने शाइस्ता खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा।
1664 - शिवाजी ने सूरत पर आक्रमण किया एवं उसे लूट लिया।

1665 - पुरंदर की संधि:-
• यह संधि शिवाजी और मुगल सेनापति जयसिंह (आमेर) के बीच हुई।
शर्ते:- 1. शिवाजी ने 35 में से 23 किले मुगलों को सौंप दिए।
2. अपने पुत्र शंभाजी को औरंगजेब के दरबार में भेजा।
3. मुगलों ने शंभाजी को 5000 का मनसब दिया।

1666 - शिवाजी ने आगरा की यात्रा की।
औरंगजेब ने शिवाजी व शंभाजी को आमेर भवन (जयपुर भवन) में नजरबंद कर दिया।
शिवाजी एवं शंभाजी यहां से चालाकीपूर्वक भाग निकले।

1670 - शिवाजी ने सूरत पर दूसरी बार आक्रमण किया एवं उसे लूटा।

1674 - शिवाजी ने रायगढ़ के किले में अपना राज्याभिषेक करवाया।
बनारस के प्रसिद्ध ब्राह्मण गंगाभट्ट को आमंत्रित किया था।

• शिवाजी की उपाधियां:- शिवाजी ने छत्रपति, गो प्रतिपालक, ब्राह्मण प्रतिपालक की उपाधियां धारण की।
• शिवाजी ने अष्टप्रधान की नियुक्ति की।
• राज्याभिषेक के 12 दिन बाद जीजाबाई की मृत्यु हो गई, शिवाजी ने दूसरा राज्याभिषेक तांत्रिक विधि से करवाया।

1680 - शिवाजी की मृत्यु हो गई।

नोट:- अन्नोजी दत्तो ने शिवाजी के समय भू-राजस्व सुधार किए थे।
• शिवाजी का संबंध मेवाड़ के सिसोदिया गांव (वंश) से था।

शिवाजी के अष्टप्रधान:-
1. पंतप्रधान/ पेशवा
प्रधानमंत्री
2. सुमंत /दुबीर
विदेश मंत्री
3. वाकिया नवीस
गृहमंत्री
4. मजूमदार / अमात्य
वित्त मंत्री
5. शुरू नवीस / चीट नवीस 
पत्राचार विभाग का प्रमुख
6. सर-ए-नौबत
प्रधान सेनापति
7. पंडितराव
धार्मिक मामलों का प्रमुख
8. न्यायाधीश
जज

छत्रपति शंभाजी (1680-89):-
• शिवाजी की मृत्यु के समय पन्हाला के किले में कैद थे।
• 1689 में संगमेश्वर नामक स्थान पर औरंगजेब की सेना ने इनको बंदी बना लिया तथा इनकी हत्या कर दी गई।

छत्रपति राजाराम (1689-1700):- यह संभाजी का भाई था।
ताराबाई (1700-1707):- यह राजाराम की पत्नी थी।

शाहू:- यह संभाजी का पुत्र था। औरंगजेब ने इसे संभाजी के साथ गिरफ्तार कर लिया था।
1707 ईस्वी में मुगल शहजादे आजम ने शाहू को आजाद कर दिया लेकिन इसकी चाची ताराबाई ने इसे छत्रपति मानने से इनकार कर दिया।
शाहू ने खेड़ा के युद्ध में ताराबाई को हरा दिया और सतारा में छत्रपति बन गया। ताराबाई कोल्हापुर चली गई।
शाहू के शासनकाल में पेशवा (प्रधानमंत्री) की शक्तियों में वृद्धि हुई -


मराठा पेशवा:-

1. बालाजी विश्वनाथ (1713-20) :-
यह कोंकण के चितपावन ब्राह्मण थे।
खेड़ा का युद्ध (1707) में शाहू का साथ दिया था। अतः शाहू ने इसे सेनाकर्ते का पद दिया।
सेनाकर्ते - सेना का प्रबंधन तथा संगठन करने वाला।
1713 ईस्वी में शाहू ने इन्हें पेशवा बना दिया।

• बालाजी विश्वनाथ ने हुसैन अली खां (सैय्यद बंधुओं में से एक) के साथ समझौता किया।
इस समझौते में शाहू का प्रतिनिधि- बालाजी विश्वनाथ तथा फर्रूखसियर का प्रतिनिधि- हुसैन अली खां था।

समझौते की शर्तें:- 
(1)शिवाजी का स्वराज क्षेत्र शाहू को दे दिया जाएगा।
(2) हाल ही में जीते गए क्षेत्र भी मराठो को दे दिए जाएंगे। जैसे-हैदराबाद, बरार, खानदेश, गोंडवाना।
(3) मराठा दक्षिण भारत में चौथ व सरदेशमुखी ले सकते हैं।
(4) शाहू के सभी परिजनों को रिहा कर दिया जाएगा।
(5) शाहू कोल्हापुर में रह रहे संभाजी-II (राजाराम व राजसबाई का पुत्र) को तंग नहीं करेगा।
(6) मराठे मुगल बादशाह को प्रतिवर्ष 10 लाख रुपए देंगे।
(7) मराठे मुगल बादशाह को 15000 घुड़सवार सैनिकों की सहायता देंगे।

बालाजी विश्वनाथ 15000 मराठा सैनिकों को लेकर हुसैन अली खां की सहायता के लिए दिल्ली गया। इन मराठा सैनिकों की सहायता से सैय्यद बंधुओं ने फर्रूखसियर की हत्या कर दी।
नए मुगल बादशाह रफी-उद्-दरजात ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया।

रिचर्ड टेंपल ने इस समझौते को मराठों का मैग्नाकार्टा कहा था।

2. बाजीराव -I (1720-40):-
यह बालाजी विश्वनाथ का बेटा था।
उपाधियां:-
लड़ाकू पेशवा
मराठा साम्राज्य का दूसरा संस्थापक
गौ, ब्राह्मण रक्षक
हिंदू पद पादशाही का संस्थापक

बाजीराव ने छत्रपति साहू से कहा - "हम मराठों का झंडा अटक(पाक) से कटक (उड़ीसा) तक फहरा देंगे।"
जवाब में शाहू ने कहा - "निसंदेह आप योग्य पिता के योग्य पुत्र हैं और मुझे विश्वास है कि आप मराठों का झंडा हिमालय के पार फहरा देंगे।"

पालखेड़ा का युद्ध (1728 ई.):-
बाजीराव-I और चिनकिलीज खां (हैदराबाद) के मध्य हुआ।
इस युद्ध में मराठे जीत गए तथा चिनकिलीज खां को मुंगी शिवगांव की संधि करनी पड़ी।

• मुहम्मद खां बंगश के खिलाफ ओरछा के राजा छत्रसाल बुंदेला की सहायता की। बदले में छत्रसाल बुंदेला ने बाजीराव को 4 क्षेत्र प्रदान किए -
(1)कालपी (2)सागर (3)झांसी (4)हदयनगर

• पुर्तगालियों से सालसेट व बसीम क्षेत्र छीन लिए थे।
जंजिरा के सिद्धियों (अफ्रीका के हब्शी) पर अपना नियंत्रण स्थापित किया।
• 1737 ईस्वी में बाजीराव ने 500 सैनिकों के साथ दिल्ली पर आक्रमण किया, इससे डरकर मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला दिल्ली छोड़ कर चला गया।

• 1737 ईस्वी में बाजीराव भोपाल के युद्ध में मुगल सेनापति चिनकिलीज खां को हराता है तथा चिनकिलीज खां को दुरई- सराय की संधि करनी पड़ी।
• मराठों ने गुजरात तथा मालवा से चौथ प्राप्त किया।
• 1731 ईस्वी में कोल्हापुर के संभाजी -II को वारना की संधि के लिए विवश किया तथा उसने शाहू को छत्रपति स्वीकार कर लिया।
• बाजीराव प्रथम ने छापामार युद्ध प्रणाली का अनुसरण किया।

3. बालाजी बाजीराव (1740-61):-
अन्य नाम - नाना साहिब
• 1751 ईस्वी में बंगाल के अली वर्दी खां को मराठो को उड़ीसा देना पड़ा।
• 1752 ईस्वी में मुगल बादशाह ने मराठों का संरक्षण स्वीकार कर लिया।
• मराठों ने पंजाब, मुल्तान तथा बंगाल से चौथ वसूली की।
• इस समय हिंदू पद पादशाही की अवधारणा को नुकसान पहुंचा।

संगोला समझौता (1750 ईस्वी) :-
राजाराम -II(छत्रपति) तथा बालाजी बाजीराव (पेशवा) के मध्य।
• इसके तहत मराठा साम्राज्य की वास्तविक शक्तियां पेशवा को दे दी गई।
• मराठा शक्ति का मुख्य केंद्र सतारा (छत्रपति) की जगह पूना (पेशवा) बनाया गया।
• पेशवा का पद वंशानुगत कर दिया गया।
मराठा संघ का गठन किया गया, जिसका प्रमुख पेशवा  था -  (1) पूना - पेशवा
       (2) सिंधिया - ग्वालियर
       (3) होल्कर - इंदौर
       (4) भोंसले - नागपुर
       (5) गायकवाड - बड़ौदा

पानीपत का तीसरा युद्ध (1761):- 
14 जनवरी 1761
मराठा तथा अहमद शाह अब्दाली (अफगान) के मध्य।
यह अहमद शाह अब्दाली का भारत पर 5 वां आक्रमण था।
इस युद्ध में मराठे मुगल बादशाह की ओर से लड रहे थे।
मराठों का औपचारिक सेनापति - विश्वास राव
वास्तविक सेनापति - सदाशिव राव भाऊ
तोपखाने का प्रमुख - इब्राहिम खां गार्दी
इमाद उल मुल्क (मुगल बादशाह का वजीर) ने मराठों का समर्थन किया।
शुजा-उद्-दौला(अवध) तथा नजीब-उद्-दौला(रुहेलखंड) ने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया था।
इस युद्ध में मराठों की हार हुई।
हार का समाचार सुनकर पेशवा बालाजी बाजीराव की मृत्यु हो गई।

परिणाम:- 
"पानीपत के तीसरे युद्ध ने यह फैसला नहीं किया कि भारत पर कौन राज करेगा, बल्कि यह तय कर दिया था कि भारत पर कौन शासन नहीं करेगा।"

पानीपत की पूरी लड़ाई को इन शब्दों में वर्णित किया गया -
 'दो मोती विलीन हो गए, 22 सोने की मोहरे खो गई और चांदी एवं तांबे की तो गिनती ही नहीं की जा सकती'

यहां दो मोती - सदाशिवराव भाउ और विश्वासराव भाउ, 27 मोहरें- 27 मुखिया और अनगिनत सैनिक।

4. माधवराव (1761-72):-
• मराठा शक्ति को पुनः संगठित किया।
• हैदराबाद के निजाम को हराया।
• मैसूर के हैदर अली से चौथ वसूली की।
• गुजरात, मालवा बुंदेलखंड पर पुन: अधिकार किया।
• 1772 ईस्वी में महादजी सिंधिया मुगल बादशाह शाह आलम - II को दिल्ली लेकर गए।
• 1772 में पेशवा की क्षय रोग से मृत्यु हो गई।

ग्राण्ट डफ के अनुसार "मराठा साम्राज्य के लिए पानीपत का मैदान उतना घातक साबित नहीं हुआ, जितना इस श्रेष्ठ पेशवा की असामयिक मृत्यु से हुआ।"

5. नारायण राव (1772-73):-
यह माधवराव का भाई था।
बालाजी बाजीराव की भाई रघुनाथ राव (राघोबा) ने पेशवा की हत्या कर दी।

6. माधव नारायण राव (1773-95):-
कम आयु में पेशवा बना, इसलिए बार भाई परिषद शासन संभालती थी। बार भाई परिषद के मुख्य सदस्य:-
• नानाजी फडणवीस
• महादजी सिंधिया

रघुनाथ राव बॉम्बे प्रेजीडेंसी के अंग्रेजों के पास चला गया तथा प्रथम अंग्रेज-मराठा युद्ध आरंभ हो गया।


प्रथम अंग्रेज- मराठा युद्ध (1775-82):-

(1) सूरत की संधि (1775):- 
राघोबा तथा बॉम्बे प्रेजीडेंसी के मध्य।
शर्त:- 
 • राघोबा को पेशवा बनाया जाएगा।
 • अंग्रेज राघोबा को 2500 सैनिकों की सहायता देंगे।
 • राघोबा अंग्रेजों को सालसेट, बसीम व थाना देगा।

(2) पुरंदर की संधि (1776):-  
पेशवा तथा बंगाल प्रेसिडेंसी के मध्य।
पेशवा की ओर से यह संधि नाना फडणवीस ने की परंतु यह लागू नहीं हो पाई।
• मराठों ने बड़गांव के युद्ध में अंग्रेजो को हराया।

(3) बड़गांव की संधि (1779) :- 
अंग्रेजों के लिए यह अपमानजनक संधि थी।
• मराठों ने अंग्रेजों द्वारा जीते गए क्षेत्र छीन लिए।

(4) सालबाई की संधि (1782) :-
महादजी सिंधिया की मध्यस्थता से हुई।
शर्त :-  
• माधव नारायण राव को पेशवा मान लिया गया।
• राघोबा को पेंशन दे दी गई।
• अंग्रेजों को सालसेट तथा एलिफेंटा दिया गया।

बंगाल के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने इस संधि को "आपातकाल की सफल संधि" कहा था।

1795 ईस्वी में पेशवा माधव नारायणराव ने आत्महत्या कर ली तथा इसी वर्ष महादजी सिंधिया की भी मृत्यु हो गई।
1800 ईस्वी में नानाजी फडणवीस की मृत्यु हो गई।

इस प्रकार 5 वर्ष के अंदर ही मराठा साम्राज्य के तीन प्रमुख स्तंभ ढह गए।

7. बाजीराव- II (1795-1818):-
यह राघोबा का बेटा था।
• यह एक अयोग्य पेशवा था। अतः दौलतराव सिंधिया तथा जसवंत राव होल्कर पूना में अपना प्रभाव जमाना चाहते थे।
• दौलतराव सिंधिया ने पेशवा के साथ गठबंधन बना लिया और दोनों ने मिलकर होल्कर के भाई बीठूजी की हत्या कर दी।
अतः होल्कर ने पूना पर आक्रमण किया और हड़सपुर के युद्ध में सिंधिया तथा पेशवा की संयुक्त सेना को हरा दिया। तथा विनायकराव को नया पेशवा बना दिया।
• बाजीराव-II अंग्रेजों के पास बॉम्बे चला गया।

बसीन की संधि :- 31 दिसंबर 1802 ई.
अंग्रेज तथा बाजीराव -II के बीच।
यह एक सहायक संधि थी।
इस समय बंगाल का गवर्नर जनरल रिचर्ड वेलेजली था।

शर्तें :- (1) पेशवा बाजीराव-II ने अंग्रेजों का संरक्षण स्वीकार कर लिया।
(2) पूना में अंग्रेजी सेना तैनात कर दी गई।
(3) पेशवा को सूरत अंग्रेजों को देना पड़ा।
(4) पेशवा को 26 लाख रुपए आय वाला क्षेत्र अंग्रेजों को देना पड़ा।
(5) पेशवा को विदेशी मामले अंग्रेजों को देने पड़े।
(6) पेशवा को निजाम तथा गायकवाड के साथ संबंधों में अंग्रेजों की मध्यस्थता स्वीकार करनी पड़ी।
(7) पेशवा किसी भी यूरोपीय को अपनी सेना में नहीं रख सकता।
(8) अंग्रेजों का एक रेजीडेंट पेशवा की राजधानी में रहेगा। अर्थात पूना में रहेगा।

• मराठे रेजीडेंट की नियुक्ति से असंतुष्ट थे। अतः सिंधिया होल्कर तथा भोंसले ने अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध घोषित कर दिया।


दूसरा अंग्रेज - मराठा युद्ध (1803-06):-

वर्ष 1803 में निम्न युद्ध लड़े गए -
(1) असई का युद्ध - सिंधिया व भोंसले  V/S अंग्रेज
(2) अरगांव का युद्ध - सिंधिया व भोंसले V/S  अंग्रेज
(3) लसवाडी का युद्ध - सिंधिया  V/S  अंग्रेज

लसवाडी का युद्ध अलवर में लड़ा गया। तथा इस युद्ध में अलवर के राजा बख्तावर सिंह ने अंग्रेजों का साथ दिया।

• इन तीनों युद्ध में अंग्रेजो की विजय हुई।

1803 ईस्वी में भोंसले ने देवगांव की संधि तथा सिंधिया ने सुर्जी अर्जुनगांव की संधि के माध्यम से अंग्रेजों के साथ संधियां कर ली।
इस समय अंग्रेजों का गवर्नर जनरल रिचर्ड वेलेजली था।

• 1804 में मुकुंदरा का युद्ध (कोटा) मे होल्कर ने अंग्रेज सेनापति मॉनसन को हरा दिया।
इस युद्ध में कोटा रियासत ने अंग्रेजों का साथ दिया।
कोटा का सेनापति - अमर सिंह था।

* मुकुंदरा की हार अंग्रेजों की राजस्थान में प्रथम हार थी।

1804 ईस्वी में डीग के युद्ध में होल्कर ने अंग्रेज सेनापति मेजर फ्रेजर को हराकर उसे मार दिया था।
कुछ समय बाद अंग्रेजों ने डीग पर अधिकार कर लिया।
अतः होल्कर ने भरतपुर के राजा रणजीत सिंह के पास शरण ली।
अंग्रेज सेनापति लॉर्ड लेक ने भरतपुर पर 5 आक्रमण किए परंतु वह भरतपुर को जीत नहीं सका।
अतः भरतपुर के किले को लोहागढ़ कहा जाता है।

चार्ल्स मेटकॉफ के अनुसार "अंग्रेजों की प्रतिष्ठा भरतपुर के आक्रमण में समाप्त हो गई थी।"

1805 ई. में होल्कर ने अंग्रेजों के साथ राजपुरघाट की संधि कर ली। 
इस समय अंग्रेजों का गवर्नर जनरल जॉर्ज बार्लो था।

 

तीसरा अंग्रेज-मराठा युद्ध (1817-18) :-

कारण:-   
• पेशवा ने गायकवाड पर जुर्माना लगा दिया था तथा उसने गायकवाड के दूत गंगाधर शास्त्री की हत्या करवा दी।
• पिंडारीयो की समस्या।

वर्ष 1817 के युद्ध :-
(1)सीतावर्डी का युद्ध - भोसले    V/S    अंग्रेज
(2)महीदपुर का युद्ध - होल्कर    V/S    अंग्रेज
(3)क्रिर्की का युद्ध - पेशवा     V/S      अंग्रेज

वर्ष 1818 के युद्ध :-
(1) भीमा कोरेगांव का युद्ध :- पेशवा  V/S अंग्रेज
(2) अष्टी का युद्ध :- पेशवा  V/S अंग्रेज

• इन सभी युद्धों में अंग्रेजों ने मराठों को निर्णायक रूप से हरा दिया गया।
=> मराठा संघ भंग कर दिया गया।
=> पेशवा का पद समाप्त कर दिया गया।
=> पेशवा बाजीराव द्वितीय को बीठूर भेजकर पेंशन दे दी गई।
• इस समय बंगाल का गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स था।
अंग्रेजों ने शिवाजी के वंशज प्रतापसिंह को सतारा में छत्रपति बनाया।


मराठों के पतन के कारण :-

मुगलों के पतन के बाद मराठों ने राजनैतिक शुन्य को भरने का प्रयास किया लेकिन वह सफल नहीं हो पाए क्योंकि:-
(1) मराठे भी उन्हीं प्रगतिहीन तत्वों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जो मुगलों के पास थे।
(2) मराठों ने कृषि, उद्योग तथा व्यापार में नई तकनीक लाने का प्रयास नहीं किया।
(3) मराठा साम्राज्य रोमन साम्राज्य की तरह लूटपाट पर आधारित था तथा मराठों ने उत्पादन के स्थाई साधनों का विकास नहीं किया।
(4) मराठों ने गंगा-यमुना दोआब, कोरोमंडल तट तथा कर्नाटक को जीत लिया था,लेकिन यहां पर प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं रख सके।
(5) मराठों ने प्रशासनिक संस्थाओं का विकास नहीं किया था।
(6) मराठा संघ सामन्ती प्रकार का था तथा उसमें केंद्रीकरण की कमी थी। अतः कमजोर पेशवा के अधीन मराठा सरदार एक-दूसरे से ही लड़ने लग गए।
(7) मराठों ने परंपरागत छापामार युद्ध प्रणाली को त्याग दिया था तथा नई यूरोपीय युद्ध प्रणाली को अपनाने का प्रयास किया। परंतु मराठे न तो पुरानी तकनीक को पूरी तरह छोड़ पाए और न ही पुरानी व नई युद्ध प्रणाली में सामंजस्य बैठा पाए।
(8) मराठों के पास अंग्रेजों की तुलना में कम अत्याधुनिक हथियार थे।
(9) महादजी सिंधिया की मृत्यु के साथ ही सुयोग्य मराठा सेनापतियों की मृत्यु हो गई थी तथा लॉर्ड लेक और आर्थर वेलेजली, सिंधिया व जसवंत होलकर की तुलना में अच्छे सेनापति साबित हुए।
(10) अंग्रेजों ने अपनी कूटनीति तथा जासूसी व्यवस्था के सहारे मराठों को हरा दिया तथा उन्होंने अपनी कूटनीति से मराठा सरदारों को अलग-अलग अलग कर दिया था।
(11) मराठों ने अपने उच्च आदर्शों तथा नैतिकता का त्याग कर दिया था। अतः जन समर्थन मिलना बंद हो गया था।

प्रश्न.आर्थिक पतन तथा अयोग्य उत्तराधिकारियों ने मराठा साम्राज्य का पतन कर दिया समझाइए ‌? (100 शब्द)

प्रश्न. बसीन की संधि ने अंग्रेजों को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से बात का साम्राज्य दिला दिया बताइए ?

प्रश्न.राज्य व्यवस्था के आवश्यक स्थायी तत्वों के अभाव के कारण ही मराठा साम्राज्य का विखंडन हुआ, समझाइए ? (100 शब्द)

SAVE WATER

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