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पंजाब का इतिहास। सिख साम्राज्य। रणजीत सिंह। आंग्ल-सिख युद्ध

 
History of Punjab

पंजाब का इतिहास

गुरु गोविंद सिंह जी की मृत्यु के बाद बंदा बहादुर ने सिख साम्राज्य को संगठित किया। बंदा बहादुर की मृत्यु के बाद सिख साम्राज्य 12 मिसलो में विभाजित हो गया।

रणजीत सिंह सुकचकिया मिसल से संबंधित था। यह मिसल रावी से चिनाब नदियों के बीच शासन करती थी।
1799 ईस्वी में अफगानिस्तान के राजा जमान शाह ने रणजीत सिंह को लाहौर का राजा बना दिया। लाहौर पंजाब की राजनीतिक राजधानी थी।
1805 ईस्वी में रणजीत सिंह ने भंगी मिसल से अमृतसर छीन लिया। अमृतसर सिखों की धार्मिक राजधानी थी।

1809 ईस्वी में अफगान राजकुमार शाह शुजा रणजीत सिंह के पास सहायता के लिए आया। शाह शुजा ने रणजीत सिंह को कोहिनूर हीरा दिया लेकिन इसके बावजूद रणजीत सिंह ने उसकी सहायता नहीं की। अतः शाह शुजा अंग्रेजों के पास चला गया।
अंग्रेजों ने शाह शुजा को लुधियाना भेज दिया तथा उसे पेंशन प्रदान करने लगे।

अमृतसर की संधि (1809):-
रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के बीच हुई। इस संधि में अंग्रेजों का प्रतिनिधि - चार्ल्स मेटकॉफ
गवर्नर जनरल - लॉर्ड मिंटो प्रथम
संधि के प्रावधान :-
(1) इस संधि द्वारा सतलज नदी को रणजीत सिंह तथा ब्रिटिश साम्राज्य के बीच की सीमा बना दिया गया।
(2) अंग्रेज तथा रणजीत सिंह के मध्य संबंध से स्थापित हुए।
(3) रणजीत सिंह का एकीकृत सिख साम्राज्य का सपना टूट गया।
(4) रणजीत सिंह को उत्तर पश्चिम में साम्राज्य विस्तार का पूरा मौका मिला। अतः उसने - मुल्तान (1818), कश्मीर (1819), पेशावर (1834) पर अधिकार कर लिया।
(5) इस संधि द्वारा रणजीत सिंह अंग्रेजों का दब्बू मित्र बनकर रह गया था क्योंकि - 
(a)उसे सतलज नदी को अपनी राज्य की सीमा मानना पड़ा।
(b)सिंध पर अपने अधिकार त्यागने पड़े।
(c)उसे त्रिपक्षीय संधि में शामिल होना पड़ा।

त्रिपक्षीय संधि (1838) :- 
अंग्रेज, शाह शुजा तथा रणजीत सिंह के मध्य।
यह संधि प्रथम अंग्रेज-अफगान युद्ध से पूर्व की गई थी।
(6) इस संधि के कारण अगले 3 दशकों तक पंजाब में शांति व्यवस्था सुनिश्चित हुई।
1839 में रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई।

रणजीत सिंह के शासन की विशेषताएं:-
रणजीत सिंह खालसा के नाम से शासन करता था।
उसने सिक्कों पर गुरु नानक देव जी तथा गुरु गोविंद सिंह जी के नाम गुदवाए थे।
रणजीत सिंह एक धर्मनिरपेक्ष राजा था।
वह सूफी संतों का आदर करता था तथा उसने विभिन्न धर्मों के लोगों को अपने प्रशासन में नियुक्त किया था -
दीनानाथ - वित्त मंत्री
अजीजुद्दीन - विदेश मंत्री
इलाही बख्श - तोपखाने का प्रमुख
इसने कई यूरोपियनो को भी अपने प्रशासन में नियुक्तियां दी थी - 
वन्तूरा - पैदल सेना का प्रमुख
अलोई - घुड़सवार सेना का प्रमुख
कोर्ट / गार्डनर - तोपखाने का प्रमुख
एविटेबल - पेशावर का प्रशासक
रणजीत सिंह की सेना एशिया की दूसरी सबसे शक्तिशाली सेना थी।

फ्रांसीसी पर्यटक विक्टर जैकोमांट ने रणजीत सिंह की तुलना नेपोलियन से की थी।
रणजीत सिंह के उत्तराधिकारी- खड़ग सिंह, नौनिहाल सिंह, शेर सिंह, दलीप सिंह।

दलीप सिंह:- यह एक अल्प वयस्क राजा था। अतः इसकी माता रानी जिंदा शासन संभालती थी। इसके शासनकाल में अंग्रेजों तथा पंजाब के बीच दो युद्ध हुए थे - 

अंग्रेज-पंजाब संघर्ष के कारण:-
(1). अंग्रेज उत्तर भारत पर अपना अधिकार कर चुके थे परंतु पंजाब अभी बाकी था। अतः अंग्रेज पंजाब पर अधिकार करना चाहते थे।
(2). अंग्रेज पंजाब के आर्थिक संसाधनों को प्राप्त करना चाहते थे।
(3). रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद पंजाब में राजनैतिक अस्थिरता थी। अतः अंग्रेज इसका फायदा उठाना चाहते थे।
(4). पंजाब में राजनीतिक नेतृत्व तथा सैनिक नेतृत्व के बीच विरोधाभास था।
(5)अंग्रेज प्रथम अंग्रेज-अफगान युद्ध में धूमल प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करना चाहते थे।
(6) अंग्रेज अधिकारी मेजर ब्रॉडफुट ने सिखों को युद्ध के लिए उकसाया था।

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845-46):-
प्रमुख युद्ध - (1) मुदकी का युद्ध
(2) फिरोजशाह का युद्ध
(3) अलीवाल का युद्ध
(4) बद्दोवाल का युद्ध
(5) सबराओ का युद्ध:- इसमें सिखो की निर्णायक हार हुई तथा अंग्रेज युद्ध जीत गए।

लाहौर की संधि (9 मार्च 1846):-
(1) दलीप सिंह को राजा मान लिया गया।
(2) रानी जिंदा को संरक्षिका बना दिया गया।
(3) लाल सिंह को वजीर तथा हेनरी लॉरेंस को रेजीडेंट नियुक्त किया गया।
(4) सिखों पर 1.5 करोड़ का युद्ध हर्जाना लगाया गया।
(5) सिखों की सेना सीमित कर दी गई। (20,000 पैदल सैनिक तथा 12,000 घुड़सवार सैनिक निश्चित किए गए)

11 मार्च 1846 को पूरक संधि की गई तथा कहा गया कि इस वर्ष के अंत तक अंग्रेजी सेना लाहौर में रहेगी।

भैरोवाल की संधि (22 दिसंबर 1846):-
(1) जब तक दलीप सिंह वयस्क नहीं हो जाता है, अंग्रेजी सेना लाहौर में रहेगी।
(2) रानी जिंदा को पेंशन देकर शेखपुरा भेज दिया गया।
इस युद्ध के समय अंग्रेजों का गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग प्रथम था।

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध (1848-49):-
कारण - मुल्तान के गवर्नर मूलराज तथा हजारा के गवर्नर चतरसिंह ने विद्रोह कर दिया था।

चिलियानवाला का युद्ध:- 
शेर सिंह तथा गफ के मध्य हुआ।
गफ ने इसे अंग्रेजों के पक्ष में बताया। अतः गवर्नर जनरल डलहौजी ने कहा- "ऐसी एक और जीत हमें बर्बाद कर देगी।"
गफ के स्थान पर नेपियर को सेनापति बनाया गया।

गुजरात (पंजाब) का युद्ध/तोपों का युद्ध:-
यह एक निर्णायक युद्ध था, जिसमें में सिखों की निर्णायक हार हुई। डलहौजी ने पंजाब का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय कर लिया।
दलीप सिंह को उच्च शिक्षा के लिए लंदन भेज दिया गया तथा कोहिनूर हीरा अंग्रेजों ने ले लिया। बाद में दलीप सिंह ईसाई बन गया।
हेनरी लॉरेंस ने पंजाब के विलय का विरोध किया तथा उसने इस्तीफा दे दिया था।

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