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बंगाल के गवर्नर जनरल। वारेन हेस्टिंग्स। लॉर्ड कॉर्नवालिस। जॉन शोर

 
Governor general of Bengal

बंगाल के गवर्नर जनरल

रेगुलेटिंग एक्ट 1773 ई.:-
(1) इसके तहत बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल बना दिया गया।
(2) मद्रास तथा बॉम्बे प्रेसिडेंसी को कुछ शक्तियों के तहत बंगाल प्रेसिडेंसी के अधीन कर दिया गया।
(3)गवर्नर जनरल की सहायता के लिए चार सदस्यों की कार्यकारी परिषद बनाई गई। इसमें निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते थे। वोट बराबर होने पर गवर्नर जनरल निर्णायक मत दे सकता था।
(4) कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट (1774 ई.में) स्थापित किया गया। इसका क्षेत्राधिकार केवल कलकत्ता था। इसमें अंग्रेजी कानून लागू होते थे।
यदि दोनों पक्ष सहमत हो तो कलकत्ता के बाहर के मामले भी सुने जा सकते थे।
(5) कंपनी का कोई भी कर्मचारी निजी व्यापार नहीं कर सकता तथा उपहार भी नहीं ले सकता था।

बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल - वारेन हेस्टिंग्स बना।कार्यकारी परिषद के सदस्य - फ्रांसिस, क्लेवरिंग, मॉनसन, बॉरवेल।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश - एलिजा इम्पै (मुख्य न्यायाधीश), चैंबर्स, लीमेस्टर, हाईड।

बंगाल के गवर्नर जनरल:-
1. वारेन हेस्टिंग्स (1773-85):-
यह बंगाल का अंतिम गवर्नर तथा प्रथम गवर्नर जनरल था।
हेस्टिंग्स के सुधार -
(A) भू-राजस्व सुधार:-
1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने बंगाल में द्वैध शासन को समाप्त कर दिया गया। द्वैध शासन 1765 में क्लाइव द्वारा लागू किया गया था।
1772 में 5 वर्षीय ठेका प्रणाली शुरू की गई तथा नए जमीदारों को ऊंची बोली के आधार पर ठेके दिए गए। यह व्यवस्था असफल हो गई क्योंकि -
• नए जमीदार अनुभवहीन थे।
• पुराने जमीदारों ने किसानों को कर नहीं देने के लिए उकसाया था।
1776 में 1 वर्षीय ठेका प्रणाली शुरू की गई तथा पुराने जमीदारों को ठेके दिए गए।

(B) न्यायिक सुधार:-
जिला स्तर पर जिला दीवानी न्यायालय और जिला फौजदारी न्यायालय की स्थापना की।
जिला दीवानी न्यायालय:- इसका न्यायाधीश कलेक्टर तथा अपीलीय न्यायालय सदर दीवानी न्यायालय होता था।
जिला फौजदारी न्यायालय:- इसका न्यायाधीश भारतीय तथा अपीलीय न्यायालय सदर फौजदारी न्यायालय होता था।
फतवा-ए-आलमगीर का अंग्रेजी अनुवाद किया गया।
code of gentoo laws नामक पुस्तक में हिंदू कानूनों का संकलन किया गया।
विलियम जॉन्स तथा कॉलब्रुक ने digest of Hindu laws नामक पुस्तक लिखी।
1784 में विलियम जोन्स ने कलकत्ता में "एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल" की स्थापना की। यह संस्था प्राचीन भारतीय पुस्तकों का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद करती थी।
विलकिन्स ने "गीता" का अंग्रेजी अनुवाद किया था।

• वारेन हेस्टिंग्स ने अवध की बेगमों से धन लूट लिया था।
• बनारस में चैतसिंह को हटाकर उसके भतीजे महीपनारायण को राजा बना दिया गया।
• बंगाली ब्राह्मण नंदकुमार को जालसाजी के आरोप में फांसी लगा दी गई।
एडमंड बर्क ने ब्रिटिश संसद में वारेन हेस्टिंग्स के खिलाफ महाभियोग चलाया था।

पिट्स इंडिया एक्ट (1784 ई.):-
(1) बोर्ड ऑफ कंट्रोल की स्थापना की गई। यह एक ब्रिटिश संसदीय समिति होती थी,जो कंपनी के राजनीतिक मामलों पर नियंत्रण रखती थी। इसमें 6 सदस्य होते थे, जिनमें से 2 सदस्य ब्रिटिश मंत्री होते थे। अर्थात -
कंपनी के राजनीतिक मामले - बोर्ड ऑफ कंट्रोल
कंपनी के व्यापारिक मामले - कोर्ट ऑफ डायरेक्टर

(2) गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में सदस्यों की संख्या घटाकर 4 से 3 कर दी गई।

1786 का विशेष अधिनियम:- गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस को कार्यकारी परिषद के निर्णय पर वीटो का अधिकार दिया गया।

2. लॉर्ड कॉर्नवालिस (1786-93):-
(A) भू-राजस्व सुधार:-
1790 ई. में 10 वर्षीय ठेका प्रणाली शुरू की गई तथा पुराने जमीदारों को ठेके दिए गए।
स्थाई बंदोबस्त:- 1793 ईस्वी में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा इस व्यवस्था को लागू किया गया। इस व्यवस्था के तहत कंपनी का भू-राजस्व स्थाई कर दिया गया, इसलिए इसे स्थाई बंदोबस्त कहा जाता है। 
इसके तहत जमीदारों को भूमिका स्वामी बनाया गया। अतः इसे जमींदारी व्यवस्था भी कहा जाता है।
इस अवस्था का प्रारूप जॉन शोर द्वारा तैयार किया गया था। अतः इसे जॉन शोर व्यवस्था भी कहा जाता है।
इस व्यवस्था के तहत भू-राजस्व में -
कंपनी का भाग = 10/11
जमींदार का भाग =1/11
यह व्यवस्था ब्रिटिश भारत के 19% क्षेत्र पर लागू की गई थी। (बंगाल, उत्तरी कर्नाटक, बनारस में लागू की गई)।

स्थाई बंदोबस्त से कंपनी को लाभ:-
(1) कंपनी की आय निश्चित हो गई, जिससे कंपनी भविष्य की नीतियां आसानी से बना सकती थी।
(2) कंपनी के धन तथा समय की बचत हुई।
(3) राजस्व विभाग के कर्मचारियों को अन्य विभागों में लगाया गया, जिससे कंपनी की प्रशासनिक कार्यकुशलता बढ़ी
(4) जमींदार अंग्रेजों के वफादार बन गए तथा उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलनों को कुचलने में अंग्रेजों की सहायता की।
(5) स्थाई बंदोबस्त से कंपनी को तात्कालिक लाभ मिले लेकिन कंपनी को दीर्घकालिक रूप से हानि उठानी पड़ी इसलिए कंपनी ने शेष भारत में इस व्यवस्था को लागू नहीं किया।

भारतीय किसानों को हानियां:-
(i) जमींदार को भूमि का मालिक बना दिया गया। अतः किसान मजदूर की भूमिका में आ गया।
(ii) प्रारंभ में ही भू-राजस्व अधिक निर्धारित कर दिया गया,जिससे किसानों का शोषण हुआ।
(iii) जमींदार समय-2 पर भू-राजस्व बढ़ा दिया करते थे, जिससे किसानों की स्थिति खराब हुई।
(iv) भूमि का स्थाई मालिक बन जाने के कारण जमींदारों ने भू-सुधार करने का कोई भी प्रयास नहीं किया।
(v) अनुपस्थित जमींदारों की श्रंखला बन गई।
(vi) सूर्यास्त के नियम के कारण जमींदारों को भी हानियां उठानी पड़ी क्योंकि समय पर भू-राजस्व जमा नहीं करवाने पर उनकी भूमि जब्त कर ली जाती थी।

(B) न्यायिक सुधार:-
(1) कॉर्नवालिस ने दीवानी मामलों में कलेक्टरों से न्यायिक अधिकार वापस ले लिए थे।
(2) दीवानी मामलों के लिए न्यायालयों की एक श्रृंखला तैयार की गई -
मुंसिफ न्यायालय - 50 ₹ तक के मामले
रजिस्ट्रार न्यायालय - 100 ₹ तक के मामले
जिला दीवानी न्यायालय - 200 ₹ तक के मामले
प्रांतीय दीवानी न्यायालय - 1000 ₹ तक के मामले
सदर दीवान न्यायालय - 5000 ₹ तक के मामले 
प्रीवी काउंसिल (लंदन) - 5000 ₹ से अधिक

(3) फौजदारी मामलों के लिए चार भ्रमणशील अदालतें स्थापित की गई -  कोलकाता , ढाका, मुर्शिदाबाद, पटना।
(4) 1793 ईस्वी में कॉर्नवालिस कोड लागू किया गया।

कॉर्नवालिस कोड की विशेषताएं:-
(i) शक्तियों का पृथक्करण किया गया।
(ii) कानून के समक्ष सभी को बराबर माना गया।
(iii) अपराध के तरीके की बजाय अपराध के उद्देश्य पर बल दिया गया।
(iv) अंग-भंग के स्थान पर कठोर कारावास का प्रावधान किया गया।
(v) रक्त मूल्य की परंपरा को समाप्त किया गया।
(vi) साक्षी/गवाह की धार्मिक योग्यता को मानना बंद किया गया।
(vii) वकालत का पेशा प्रारंभ किया गया।

महत्व:-
(i) भारत में आधुनिक न्यायिक व्यवस्था की शुरुआत हुई।
(ii) यह न्याय की पश्चिमी अवधारणा पर आधारित था।
(iii) कानून की सर्वोच्चता लागू की गई।
(iv) निष्पक्षता का सिद्धांत लागू किया गया।

कमियां:-
(i) न्याय महंगा तथा धीमा हो गया।
(ii) न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार बढ़ गया था तथा धनवान लोग धन देकर न्याय खरीद लिया करते थे।
(iii) कानून अत्यधिक जटिल थे।‌ अतः भारतीय उन्हें समझ नहीं पाए थे।
(iv) न्यायाधीश यूरोपियन थे, जो भारतीय परंपराओं को नहीं समझ सके।

कॉर्नवालिस को भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) तथा भारतीय पुलिस सेवा (IPS) का जनक कहा जाता है।

चार्टर एक्ट (1793 ई.):-
(1) कॉर्नवालिस का विशेष अधिकार वीटो अन्य गवर्नर जनरल को भी दे दिया गया।
(2) बोर्ड ऑफ कंट्रोल के सभी खर्चे भारत सरकार पर डाल दिए गए।

3. जॉन शोर (1793-98):- कोई विशेष कार्य नहीं।


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