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मेवाड़ का इतिहास। भाग - 3

 जेम्स
History of mewar part 3


मेवाड़ का इतिहास

History of Mewar.

अमरसिंह (1597-1620 ई.):-

अमरसिंह को समझाने के लिए अभियान:-
(A) अकबर के समय सलीम (जहांगीर) के नेतृत्व में अभियान।
(B) जहांगीर के समय अभियान -
• शहजादा परवेज - 1605 ई
• महावत खां - 1608 ई
• अब्दुल्ला खां - 1609 ई
• राजा बसु - 1611 ई
• मिर्जा अजीज कोका - 1613 ई
ये सभी अभियान असफल रहे।
शहजादा खुर्रम (शाहजहां) का अभियान सफल रहा और मुगल-मेवाड़ संधि की गई।

मुगल-मेवाड़ संधि 5 फरवरी 1605 ई
संधि की शर्तें:-
1. मेवाड़ का राणा मुगल दरबार में नहीं जाएगा।
2. मेवाड़ का युवराज मुगल दरबार में जाएगा।
3. मेवाड़ को चित्तौड़ का किला दे दिया गया परंतु मेवाड़ इस किले का पुनर्निर्माण नहीं करेगा।
4. मेवाड़ के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं किए जाएंगे।
5. मेवाड़ मुगलों को 1000 घुडसवारों की सहायता देगा।

संधि का महत्व:-
1. सांगा तथा प्रताप के समय से चली आ रही स्वतंत्रता की भावना का पतन हुआ।
2. युद्ध बंद होने से मेवाड़ में शांति व्यवस्था सुनिश्चित हुई जिससे सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला।

• अमरसिंह ने यह संधि युवराज कर्णसिंह के दबाव में की थी। मेवाड़ की तरफ से संधि का प्रस्ताव लेकर शुभकरण तथा हरिदास गए थे मुगलों की तरफ से खुर्रम ने संधि की।
• अमरसिंह इस संधि से निराश था तथा नौ चौकी नामक स्थान पर जाकर रहने लगा। कालांतर में यहां पर राजसमंद झील का निर्माण किया गया।
• युवराज कर्णसिंह जहांगीर के दरबार में गया जहांगीर ने कर्णसिंह को 5000 का मनसबदार बनाया।
• जहांगीर ने अमरसिंह तथा कर्णसिंह की मूर्तियां आगरा के किलें में लगवाई।
• अंग्रेज राजदूत सर टॉमस रो के अनुसार मुगल बादशाह ने मेवाड़ को बुद्धि से अधीन किया था, ताकत द्वारा नहीं।

कर्णसिंह (1620-1628 ई.)
• उदयपुर में कर्ण विलास तथा दिलखुश महलों का निर्माण करवाया।
• उदयपुर में जग मंदिर महलों का निर्माण शुरू करवाया।
• अपने विद्रोह (1622) के दौरान खुर्रम जग मंदिर महलों में रुका था।

जगतसिंह (1628-1652 ई.)
• जगमंदिर महलों का निर्माण पूरा करवाया।
• उदयपुर में जगदीश (जगन्नाथ राय) मंदिर का निर्माण करवाया। इसे सपने में बना मंदिर कहा जाता है।  
वास्तुकार - अर्जुन, भाणा, मुकुन्द
जगन्नाथ राय प्रशस्ति का लेखक - कृष्णभट्ट
इस प्रशस्ति से हल्दीघाटी युद्ध की जानकारी मिलती है।
• जगतसिंह ने उदयपुर में नौजूबाई का मंदिर बनवाया। नौजूबाई जगतसिंह की धाय मां थी।
• जगतसिंह अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था।

राजसिंह (1652-80 ई):-
• मुगल बादशाह शाहजहां के खिलाफ आक्रामक नीति अपनाई तथा चित्तौड़ किले का पुनर्निर्माण शुरू करवा दिया।
• उत्तराधिकारी संघर्ष में औरंगजेब का (तटस्थ) समर्थन किया
• इस समय राजसिंह ने अनेक मुगल क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था। (टीका दौड)
• राजसिंह ने औरंगजेब के जजिया कर का विरोध किया था।
• जोधपुर के अजीतसिंह को औरंगजेब के खिलाफ सहायता दी।
इसे राठौड़-सिसोदिया गठबंधन कहा जाता है।
• औरंगजेब के खिलाफ हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों की रक्षा की।
• औरंगजेब के खिलाफ हिंदू राजकुमारियों की रक्षा की।
जैसे - रूपनगढ़ (किशनगढ़) की राजकुमारी चारूमति

सहल कंवर:-
सलूंबर के सामंत रतनसिंह चुंडावत की हाड़ी रानी थी। अपने पति के द्वारा निशानी मांगने पर अपना सिर काटकर दे दिया था।
मेघराज मुकुल की कविता - सैनाणी
• राज. पुलिस की महिला बटालियन - हाड़ी रानी बटालियन 
 
सिहाड़ (नाथद्वारा) में श्रीनाथजी मंदिर बनवाया।
कांकरोली (राजसमंद) में द्वारिकाधीश का मन्दिर बनवाया।
उदयपुर में अम्बामाता का मन्दिर बनवाया।
राजसमंद झील 
निर्माण - 1662-1676 ई. के बीच
अकालराहत कार्य के दौरान इसका निर्माण किया गया।
नौ चौकी नामक स्थान पर यह झील बनी हुई है।
झील के किनारे 25 बड़े-बड़े पत्थरे पर राज प्रशस्ति लिखी हुई है। जिसकी रचना रणछोड़दास भट्ट ने की
थी। इनकी अन्य रचना "अमरकाव्य वंशावली"
• राजसिंह की रानी रामरस दे ने त्रिमुखी बावड़ी (उदयपुर) का निर्माण करवाया।
• इनकी माता ज्ञाना दे राठौड़ ने ज्ञानासागर तालाब बनवाया।
राजसिंह की उपाधि:- विजयकटकातु, हाइड्रोलिक रूलर

महाराणा जयसिंह (1680-1698 ई.) 
उदयपुर में जयसमंद झील का निर्माण करवाया।

महाराणा अमरसिंह -II (1608-1710)
1707 ई. में देबारी समझौता:-
मेवाड़ महाराणा अमरसिंह -I, मारवाड का राजा अजीत सिंह, जयपुर का राजा सवाई जयसिंह के मध्य हुआ।
समझौते की शर्ते-
1. अजीत सिंह को मारवाड़ दिलाने में सहायता की जायेगी।
2. अमरसिंह की बेटी चन्द्रकवर की शादी इस शर्त पर की गई चन्द्रकवर का बेटा जयपुर का अगला शासक
बनेगा।

महाराणा संग्राम-सिंह -II (1710-1734 ई.)
इन्हीं के शासनकाल में मराठों ने सबसे पहले मेवाड़ से कर वसूला।
उदयपुर में सहेलियों की बाड़ी का निर्माण करवाया।
हुरडा सम्मेलन की रूपरेखा तैयार करता हैं।

महाराणा जगतसिंह -II (1734-1751 ई.)
इन्हीं के समय हुरड़ा (भीलवाड़ा) सम्मेलन 17 जुलाई 1734 में हुआ।
सम्मेलन का उद्देश्य-
मराठो के खिलाफ सभी राजपूत शासकों को एक करना।
वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद रामपुरा (कोटा) में मराठों के विरूद्ध युद्ध किया जायेगा।
हिस्सा लेने वाले शासक -
जयपुर से सवाई ज़यसिंह
जोधपुर से अभयसिंह
बीकानेर से जोरावर सिंह
बूंदी से दलेल सिंह
कोटा से दुर्जनसाल
नागौर से बख्त सिंह
करौली से गोपाल सिंह
किशनगढ़ से राजसिंह
सम्मेलन का अध्यक्ष - महाराणा जगतसिंह -II
अध्यक्षता के प्रश्न पर सवाई जयसिंह नाराज हो गया तथा यह सम्मेलन की असफलता का मुख्य कारण था।
• उदयपुर में जगतविलास सहलों का निर्माण करवाया।
• नन्दराम (दरबारी विद्वान) ने जगतविलास नामक पुस्तक लिखी।

महाराणा भीमसिंह (1778-1828 ई.) 
कृष्णा कुमारी विवाद:- मेवाड़ महाराणा भीमसिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी की सगाई मारवाड़ के
राजा भीमसिंह के साथ हुई। शादी से पहले भीमसिंह (मारवाड़) की मृत्यु हो जाती है। तो कृष्णाकमारी की
शादी जगतसिंह से कर दी गई।
मारवाड़ का राजा मानसिह इस पर आपत्ति उठाता है।
सिंगोली का युद्ध (परबतसर का युद्ध) - 1807 में
मानसिंह V/S जगतसिंह
जगतसिंह के साथ टोंक का अमीर खां पिण्डारी, बीकानेर का सूरतसिंह था।
अजीतसिंह चूण्डावत व अमीर खा पिण्डारी की सलाह पर कृष्णा कुमारी को जहर देकर इस विवाद का अन्त
किया गया।
• भीमसिंह ने 1818 ईस्वी में अंग्रेजों से संधि कर ली।
• 1818 से 1821 ई. के दौरान कनैल जेम्स टॉड मेवाड़ का पॉलिटिकल एजेण्ट रहा।

महाराणा स्वरूप सिंह (1842-1861)
1857 की क्रांति के समय मेवाड़ के शासक।
इन्होंने मेवाड़ में स्वरूपशाही सिक्के चलाये ।
NOTE:- मेवाड़ में दान के रूप में "चांदोड़ी सिक्का" दिया जाता था।
• मेवाड़ में सती प्रथा पर रोक लगाई।

महाराणा सज्जनसिंह (1874-1884 ई.)
• सज्जनगढ़ किले का निर्माण करवाया। (उदयपुर में)
इस किले को मेवाड़ का "मुकुटमणि" कहते हैं।
• सज्जनसिंह ने वीर (विनोद पुस्तक) के लिए श्यामलदास को कविराजा की उपाधि दी ।
देश हितैषिणी सभा (2 जुलाई, 1877)-
यह एक समाज सुधार संस्था थी। जिसका मुख्य उद्देश्य राजपूतों की लड़कियों की शादी पर होने वाले खर्च
को सीमित करना और बहुविवाह प्रथा को समाप्त करना था।
यह किसी भी रियासत में समाज सुधार की पहली संस्था थी।
कविराजा श्यामलदास भी इसके सदस्य थे।
महाइन्द्राज सभा - 1880 ई. में स्थापना
यह न्यायिक संस्था थी।

महाराणा फतहसिंह (1884-1921 ई.)
इन्हीं के समय प्रसिद्ध बिजौलिया किसान आन्दोलन हुआ।
1903 ई. में लॉर्ड कर्जन के दिल्ली दरबार में भाग लेने जा रहें फतहसिंह को केसरीसिंह बारहठ ने 13 सोरठे भेजें जिन्हे पढ़कर फतहसिंह दिल्ली स्टेशन से वापस आ गए। इन्हें चेतावनी रा चूंगट्या (13 सोरठे) भी कहा जाता है।
घण घालिया घमसाण, राणा सदा रहयो निडर।
देखतां फरमाण, हलचल किम फतमल हुवै।।


SAVE WATER

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