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मेवाड़ का इतिहास। भाग -1

History of Mewar



मेवाड़ का इतिहास

History of Mewar.

मेवाड़ के प्राचीन नाम:- मेदपाट, प्राग्वाट, शिवि जनपद

• गुहिल ने 566 ई. में मेवाड़ में गुहिल वंश की स्थापना की।
गुहिल वंश की 24 शाखाएं थी इनमें मेवाड़ के गुहिल सबसे प्रमुख थे।
• गुहिल सूर्यवंशी हिंदू थे।
• विश्व का सबसे दीर्घकालीन वंश।
• यहां के शासकों को हिंदूआ सूरज कहा जाता था।
• मेवाड़ के राजचिन्ह में एक पंक्ति लिखी हुई है। 

" जो दृढ़ राखे धर्म को, तिहि राखै करतार। "

बप्पा रावल:-
वास्तविक नाम - कालभोज
• यह हारित ऋषि की गाय चराते थे।
हारित ऋषि के आशीर्वाद से 734 ई. में राजा मान मौर्य से चित्तौड़ छीन लिया और नागदा को अपनी राजधानी बनाया।
• नागदा में एकलिंग जी का मंदिर बनवाया।
• मेवाड़ के शासक स्वयं को एकलिंग (शिव) जी के दीवान मानते हैं।
• बप्पारावल मुस्लिम सेना को हराते हुए गजनी तक चला गया था तथा वहां के राजा सलीम को हटाकर अपने भांजे को राजा 
बनाया।
• रावलपिंडी (पाकिस्तान) शहर का नाम बप्पारावल के कारण पड़ा।
• बप्पारावल ने मुद्रा प्रणाली शुरू की। (115 ग्रेन का सोने का सिक्का)
बप्पारावल की उपाधियां:-
• हिंदू सूरज
• राजगुरू
• चक्कवै (चारों दिशा को जीतने वाला)

अल्लट:-
वास्तविक नाम - आलु रावल
• इसने आहड़ को दूसरा राजधानी बनाया।
• आहड़ में वराह मंदिर बनवाया। (विष्णु जी का)
• हूण राजकुमारी हरियादेवी से शादी की।
• मेवाड़ राज्य में नौकरशाही (Bureaucracy) की स्थापना की।

जैत्रसिंह:-  (1213-1250ई.)
• भूताला का युद्ध:- दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश और जैत्रसिंह के मध्य हुआ। जिसमें जैत्रसिंह विजयी रहा।
इल्तुतमिश की भागती हुई सेना ने नागदा को लूट लिया था। इसलिए जैत्रसिंह ने चित्तौड़ को अपनी नई राजधानी बनाया।
भूताला युद्ध की जानकारी 'जयसिंह सूरी' की पुस्तक "हम्मीर मद मर्दन" से मिलती है।
• जैत्रसिंह के समय को "मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्ण काल" कहते हैं।

रतन सिंह:- (1302-1303 ई.)
रतन सिंह का छोटा भाई कुंभकरण नेपाल चला गया और नेपाल में गुहिल वंश की राणा शाखा की स्थापना की।

अलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ पर आक्रमण (1303 ई.)
आक्रमण के प्रमुख कारण:-
(a) अलाउद्दीन खिलजी की साम्राज्यवादी नीति
(b) सुल्तान की प्रतिष्ठा का सवाल - रतन सिंह के पिता ने दिल्ली सल्तनत की सेना से कर वसूला था।
(c) चित्तौड़ का सामरिक तथा व्यापारिक महत्व
(d) मेवाड़ का बढ़ता प्रभाव
(e) पद्मिनी की सुंदरता

पद्मिनी:- रतन सिंह की रानी का नाम पद्मिनी था, यह सिंहल द्वीप (श्रीलंका) के राजा गंधर्व सेन और चंपावती की पुत्री थी। राघव चेतन नामक एक ब्राह्मण ने अलाउद्दीन खिलजी को पद्मिनी की सुंदरता के बारे में बताया था। 

*25 अगस्त 1303 ई. को चित्तौड़ का पहला साका हुआ।
(साका =  जौहर + केसरिया)
रानी पद्मिनी ने 1600 महिलाओं के साथ जौहर किया।
गोरा और बादल इस साके में लड़ते हुए मारे गए।

• अलाउद्दीन ने किले पर अधिकार कर लिया और किले का नाम बदल कर खिज्राबाद कर दिया और उसे अपने बेटे खिज्र खां को दे दिया।
अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ में 80,000 लोगों का कत्लेआम करवाया।
खिज्र खां ने गंभीरी नदी पर पुल बनवाया था।
खिज्र खां ने यहां पर मकबरे का निर्माण करवाया। इस मकबरे के फारसी लेख में अलाउद्दीन खिलजी को ईश्वर की छाया तथा संसार का रक्षक बताया गया।

कालांतर में चित्तौड़ का शासन मालदेव सोनगरा को सौंपा गया।
मालदेव - जालौर के कान्हडदेव सोनगरा का भाई था।
इस मालदेव को मूंछाला मालदेव कहा जाता था।

• 1540 ई. में 'मलिक मोहम्मद जायसी' ने अपनी पुस्तक "पद्मावत" में पद्मिनी की सुंदरता का वर्णन किया है। यह पुस्तक 'अवधी' भाषा में लिखी गई है।
जेम्स टॉड तथा मुहणौत नैणसी ने भी इस कहानी को स्वीकार किया है परंतु सूर्यमल्ल मीसण ने इस कहानी को अस्वीकार किया है।

• "गोरा बादल री चौपाई" नामक पुस्तक 'हेमरत्न सूरी' ने लिखी है।
• अमीर खुसरो की पुस्तक खजाइन उल फुतुह (तारीख ए अलाई) में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ आक्रमण का वर्णन किया गया है।

नोट:- रतन सिंह रावत उपाधि का प्रयोग करने वाला अंतिम शासक था।

हम्मीर :- (1326-1364ई.)
हम्मीर ने मालदेव सोनगरा के बेटे 'बनवीर सोनगरा' से चित्तौड़ छीना। 
• यह सिसोदा गांव से आया था इसलिए मेवाड़ के राजा अब सिसोदिया कहलाने लगे और मेवाड़ में 'राणा शाखा' की स्थापना हुई।
सिसोदा गांव की स्थापना राहप ने की थी।
हम्मीर ने राणा उपाधि का प्रयोग किया।
हम्मीर को मेवाड़ का उद्धारक कहा जाता है।

सिंगोली का युद्ध :- हम्मीर और मोहम्मद बिन तुगलक के बीच लड़ा गया।
• कुंभलगढ़ प्रशस्ति में हम्मीर को विषम घाटी पंचानन (विकट युद्धों में शेर के समान) कहा गया है।
• "रसिकप्रिया" में हम्मीर को 'वीर राजा' कहा गया है।
• चित्तौड़ के किले में अन्नपूर्णा मंदिर (बरवडी माता) का निर्माण करवाया। बरवडी माता मेवाड़ के सिसोदिया वंश की ईष्ट देवी है।
• सिसोदिया वंश की कुलदेवी बाण माता (बायण माता) है।

राणा लाखा/राणा लक्षसिंह (1382-1421 ई.)
• इनके समय 'जावर' में चांदी की खान निकली।
• एक बंजारे ने 'पिछोला झील' का निर्माण करवाया।
नटनी का चबूतरा - पिछोला झील के पास है।
• कुंभा हाडा नकली बूंदी की रक्षा करते हुए मारा गया।
• राणा लाखा की शादी मारवाड़ के राव चूंड़ा की पुत्री हंसाबाई के साथ हुई।
इस अवसर पर लाखा के बेटे चूंड़ा ने यह प्रतिज्ञा की कि वह मेवाड़ का अगला राणा न बनकर हंसाबाई के पुत्र को बनाएगा।
ऐसी प्रतिज्ञा के कारण चूंड़ा को "मेवाड़ का भीष्म पितामह" कहते हैं।
इस बलिदान के बदले चूंड़ा के वंशजों को कुुछ विशेषाधिकार दिए गए -
• मेवाड़ के 16 प्रथम श्रेणी ठिकानों में से चार चूंडा को दिए गए। इनमें सबसे बड़ा ठिकाणा सलूंबर (उदयपुर) भी शामिल था।
• सलूंबर का सामन्त मेवाड़ का सेनापति होगा।
हरावल में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
• राणा की अनुपस्थिति में सलूंबर का सामंत राजधानी संभालेगा।
• सलूंबर का सामंत ही मेवाड़ के राजा का राजतिलक करता था।
• मेवाड़ के सभी दस्तावेजों पर राणा के साथ सलूंबर का सामन्त भी हस्ताक्षर करेगा।

प्रश्न.मेवाड़ के प्रशासन में सलूंबर का क्या महत्व था ? (50 शब्द) 

मोकल (1421-1433ई.)
यह हंसाबाई का बेटा था।
हंसाबाई के अविश्वास के कारण चूंड़ा मेवाड़ छोड़कर मालवा चला गया। (होशंगशाह मालवा का शासक)
अब मोकल का संरक्षक हंसाबाई का भाई रणमल बन गया।
मोकल ने चित्तौड़ में "समिद्धेश्वर मंदिर" का पुनः निर्माण करवाया।

नोट:- पहले इस मंदिर का नाम त्रिभुवन नारायण मंदिर था। इसका निर्माण भोज परमार ने करवाया था।

हरावल - सेना की अग्रिम टुकडी
चंदावल - सेना की पीछे की टुकडी
 
नागदा में एकलिंग जी के मंदिर का परकोटा बनवाया।
1433 ई. में जीलवाड़ा नामक स्थान पर चाचा, मेरा व महपा पंवार ने मोकल की हत्या कर दी।

राणा कुम्भा (1433-1468ई.)
कुम्भा की माता का नाम - सौभाग्यवती परमार 
रणमल राणा कुम्भा का संरक्षक था।
कुम्भा ने रणमल की सहायता से अपने पिता की हत्या का बदला लिया।

मेवाड़ के दरबार में राठौड़ों का प्रभाव बढ़ रहा था। उन्होनें चूंडा के भाई राघव देव सिसोदिया की हत्या कर दी थी ।
राठौड़ो के इस प्रभाव को खत्म करने लिए हंसाबाई ने चूंडा को मालवा से मेवाड़ वापस बुलवाया।
रणमल की हत्या उसकी प्रेमिका 'भारमली' की सहायता से कर दी गयी।
रणमल का बेटा जोधा अपने भाइयों के साथ भाग गया और बीकानेर के पास काहुनी नामक गांव में शरण ली।
चूंडा ने मंडौर (मारवाड़ की राजधानी) पर अधिकार कर लिया।

'आँवल-बाँवल की सन्धि' (1453 ई.)
हंसाबाई की मध्यस्थता से कुम्भा व जोधा के बीच संधि हुयी। इस संधि को 'आँवल-बाँवल की सन्धि' (1453ई.) कहते हैं।
• मारवाड़ जोधा को आपस दिया गया।
• सोजत पाली को मारवाड़-मेवाड़ की सीमा बनाया गया।
• जोधा की बेटी श्रृंगार कंवर की शादी कुंभा के बेटे रायमल से की गई।

'सारंगपुर का युद्ध' (1437 ई.):-
कुम्भा V/S महमूद खिलजी (मालवा का सुल्तान)
कारण:- महमूद खिलजी ने मोर्कल के हत्यारों को शरण दी थी।
कुम्भा युद्ध गया और जीत की याद में चित्तौड़ में विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया।

विजय स्तम्भ:- 
अन्य नाम- कीर्ति स्तम्भ, विष्णु ध्वज गरूड़ ध्वज, मूर्तियों का अजायबघर, भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष।
• यह नौ मंजिला इमारत हैं। जो 122 फुट लम्बा, 30 फुट चौड़ा हैं।
इसकी तीसरी मंजिल में 9 बार अल्लाह लिखा हैं ।
• वास्तुकार- जैता व उसके पुत्र नापा,पुंजा,पोमा।
• इसमें कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति लिखी गयी हैं। जिसकी रचना अत्रि व उसके बेटे महेश ने की थी।
• इसका ऊपरी भाग क्षतिग्रस्त होने पर महाराजा स्वरूपसिंह ने उसका पुन:र्निमाण करवाया था।
• कर्नल जेम्स टॉड ने इसकी तुलना 'कुतुबमीनार' से की हैं।
• 'फर्ग्युसन' ने इसे रोम के टार्जन टावर से भी श्रेष्ठ बताया हैं।
• राजस्थान पुलिस तथा राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिन्ह है।
• वीर सावरकर के क्रांतिकारी संगठन अभिनव भारत का प्रतीक चिन्ह था।
• राजस्थान की पहली इमारत जिस पर 'डाक टिकट' जारी किया गया। 15 अगस्त 1949 को इस पर 1 रूपये का डाक टिकट जारी हुआ।

जैन कीर्ति स्तम्भ:-
12वीं शताब्दी में एक जैन व्यापारी जीजा शाह बघेरवाल ने इसका निर्माण करवाया था।
• यह सात मंजिला इमारत हैं, जो भगवान आदिनाथ को समर्पित हैं।
 
चम्पानेर की संधि (1456ई.):-
मालवा के महमूद खिलजी और गुजरात के कुतुबुद्दीन शाह के बीच हुई। 
उद्देश्य:- मिलकर कुम्भा को हराना।

बदनौर (भीलवाड़ा) के युद्ध (1457ई.) में कुम्भा ने दोनों की संयुक्त सेना को हरा दिया।
कुम्भा सिरोही के 'सहसमल देवड़ा' को हराता है।
नागौर के शम्स खां को मुजाहिद खां के खिलाफ सहायता देता हैं।


कुम्भा की उपाधियां:-

(1) हिन्दु सुरताण
(2) अभिनव भरताचार्य। (संगीतज्ञ के कारण)
(3) राणौ रासौ (साहित्यकारों का आश्रयदाता)
(4) हाल गुरू (पहाड़ी किलों को जीतने वाला)
(5) दानगुरू
(6) छापगुरू (छापामार युद्ध प्रणाली)


कुम्भा का स्थापत्य कला में योगदान:-

कुंभा को राजस्थान की स्थापत्य कला का जनक कहा जाता है।
'श्यामलदास' की पुस्तक- 'वीर विनोद' के अनुसार मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 का निर्माण राणा कुम्भा ने करवाया था।
(1) कुम्भलगढ़ (राजसमन्द)
वास्तुकार - मंडन।
कुम्भलगढ़ का ऊपरी भाग 'कटारगढ़' कहलाता हैं। यह कुम्भा का निजी आवास था। इसे 'मेवाड की आंख' कहते हैं।
(2) 1452 ई. में अचलगढ़ (सिरोही) के किले का पुनर्निमाण करवाया।
(3) बासन्ती दुर्ग (सिरोही)
(4) मचान दुर्ग (सिरोही) - मेर जनजाति पर नियंत्रण हेतु।
(5) भोमठ दुर्ग - भोमठ के पठार पर (डुंगरपुर - बांसवाड़ा)
भील जनजाति पर नियंत्रण हेतु।
• तीनों किलों (चित्तौड़, कुम्भलगढ़ व अचलगढ़) में कुम्भ स्वामी (विष्णु जी) का मंदिर बनवाया।
• चित्तौड़ में श्रृंगार चंवरी मंदिर बनवाया।

• कुम्भा के समय में 1439 ई. में धरणकशाह ने रणकपुर के जैन मंदिर बनाए।
चौमुखा मंदिर:- रणकपुर के जैन मंदिरों में एक मंदिर हैं। इसमें 1444 स्तम्भ हैं। इसलिए इसे स्तम्भों का अजायबघर कहते हैं।
इसका वास्तुकार देपाक था।

• कुम्भा एक अच्छा संगीतज्ञ था। कुम्भा वीणा बजाता था।
सारगं व्यास कुम्भा के संगीत गुरू थे।

कुम्भा द्वारा रचित संगीत ग्रन्थ:-
(1) सुधा प्रबंध
(2) कामराज रतिसार - 7 भाग है।
(3) संगीत सुधा
(4) संगीत मीमांसा
(5) संगीत राज
• सबसे वृहत एंव सिरमौर ग्रन्थ।
• इसके 5 भाग हैं -
 पाठ्य रत्न कोष, गीत रत्न कोष, नृत्य रत्न कोष,
 वाद्य रत्न कोष, रस रत्न कोष।
 (6) जयदेव की गीत गोविन्द पर रसिक प्रिया नामक टीका लिखी।
(7) बाणभट्ट के चण्डीशतक पर टीका लिखी।
(8) संगीत रत्नाकर पर टीका लिखी।


कुम्भा के दरबारी विद्वानः-

(1) कान्ह व्यास:- 'एकलिंग महात्मय
एकलिंग महात्म्य के पहले भाग की रचना कुम्भा ने की थी, जिसे राज वर्णन कहा जाता हैं।
इस से ज्ञात होता है कि कुंभा वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद, व्याकरण, साहित्य एवं राजनीति में बड़ा निपुण था।
(2) मेहा:- तीर्थमाला पुस्तक लिखी।
(3) मंडन:-
• वास्तुसार 
• देवमूर्ति प्रकरण (रूपावतार)
• राज वल्लभ
• रूपमंडन (मूर्तिकला) 
• कोदंड मडंन (धनुष निर्माण के बारे में)
(4) नाथा (मंडन का भाई):- वास्तुमंजरी
(5) गोविन्द (मंडन का बेटा):-
• द्वार दीपिका 
• उद्धार धोरिणी
• कला निधि - मंदिर के शिखर निर्माण की जानकारी।
• सार समुच्चय - आयुर्वेद के बारे में जानकारी।
(6) रमाबाई :- कुम्भा की बेटी रमाबाई भी एक अच्छी संगीतज्ञ थी। रमा बाई को जावर का परगना दिया था।
रमाबाई की उपाधि:- वागीश्वरी 
(7) तिलाभट्ट
(8) हीरानंद मुनि:- कुंभा के गुरु। 
कुंभा ने कविराजा की उपाधि दी।

कुंभा के दरबार में जैन विद्वान:-
(9) सोमदेव         (10) सोम सुंदर
(11) जयशेखर    (12) भुवनकीर्ति
• कुंभा ने जनों का तीर्थ कर हटा दिया था।

नोट:- कुम्भा की हत्या उसके बेटे उदा ने कुम्भलगढ़ किले में कर दी थी।


SAVE WATER

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