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बंगाल विभाजन। स्वदेशी आंदोलन

 
Swadeshi movement


स्वदेशी आंदोलन

Swadeshi movement.

19 जुलाई 1905 को कर्जन ने बंगाल विभाजन की घोषणा की। पूर्वी बंगाल मुस्लिमों को तथा पश्चिम बंगाल हिंदूओं को दिया गया।
कारण - प्रशासनिक दुविधा।
वास्तविक कारण - फूट डालो राज करो की नीति।

 पूर्वी बंगाल
 पश्चिम बंगाल
 • बांग्लादेश + असम

• राजधानी - ढाका
• 1.80 करोड़ - मुस्लिम
• 1.20 करोड़ - हिंदू

 • पश्चिम बंगाल + बिहार + उड़ीसा
• राजधानी - कलकत्ता
• 4.50 करोड़ - गैर बांग्ला भाषी
• 90 लाख - बांग्ला भाषी
 
 7 अगस्त 1905 को स्वदेशी आंदोलन प्रारंभ किया गया।
आनंद मोहन बोस ने कलकत्ता में एक बड़ी सभा को संबोधित किया।
16 अक्टूबर 1905 को बंगाल विभाजन लागू कर दिया गया।
बंगाल में उस दिन शोक दिवस मनाया गया।

रवीन्द्र नाथ टैगोर के कहने पर बंगाल में लोगों ने एक-दूसरे को राखी बांधी। और टैगोर ने आमार सोनार बांग्ला गीत गाया। (वर्तमान में बांग्लादेश का राष्ट्रगान)

सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने बंगाल विभाजन को आसमान से वज्रपात कहा था। (Bolt from blue)

कृष्ण कुमार मित्र के संजीवनी समाचार पत्र में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने के लिए कहा गया।

अश्विन कुमार दत्त (बारीसाल के अध्यापक) ने स्वदेशी बांधव समिति की स्थापना की तथा स्वदेशी नामक समाचार पत्र निकाला।

अवनींद्रनाथ टैगोर ने स्वदेशी चित्रकारी प्रारंभ की तथा इंडियन सोसाइटी फॉर ओरिएंटल आर्ट्स की स्थापना की। (प्राच्य कला)
• यह संस्था छात्रवृत्ति देने का कार्य करती थी।
नंदलाल बोस को पहली बार छात्रवृत्ति दी गई।

पी.सी. रॉय ने बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्यूटिकल कंपनी की स्थापना की।
जस्टिस गुरुदास बनर्जी ने राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना की।
अरविंद घोष कोलकाता के नेशनल कॉलेज के प्रिंसिपल थे।

स्वदेशी आंदोलन बंगाल के अलावा देश के अन्य भागों में भी हुआ -

 दिल्ली में
 सैय्यद हैदर रजा
 मद्रास में
 चिदंबरम पिल्लै
 आंध्रप्रदेश
 हरि सर्वोत्तम राव
 पंजाब
 लाला लाजपत राय
 महाराष्ट्र
 बाल गंगाधर तिलक
 
स्वदेशी आंदोलन को लेकर नरम दल और गरम दल में मतभेद हो गया।

 नरम दल
 गरम दल
स्वदेशी आंदोलन को बंगाल तक सीमित रखना चाहते थे।
 स्वदेशी आंदोलन को संपूर्ण भारत में फैलाना चाहते थे।
 केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के पक्ष में थे।
 ब्रिटिश सरकार के प्रत्येक पक्ष का बहिष्कार करना चाहते थे।

नोट - अध्यक्ष तथा 1906 के कोलकाता अधिवेशन के 4 प्रस्तावों के क्रियान्वयन को लेकर भी मतभेद थे।

1907 में कांग्रेस का विभाजन हो गया तथा ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को कुचल दिया।
तिलक पर राजद्रोह की धारा 124(A) लगाकर 6 वर्ष की सजा सुनाई गई तथा बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया।
लाला लाजपत राय इंग्लैंड होते हुए अमेरिका चले गए।
बिपिन चंद्र पाल ने राजनीति छोड़ दी।
अरविंद घोष ने भी राजनीति छोड़ दी और आध्यात्मिक कार्यों के लिए पांडिचेरी चले गए।


स्वदेशी आंदोलन का महत्व

• यह भारत का पहला अहिंसक आंदोलन था।
• समाज के सभी वर्गों ने सक्रिय रूप से भाग लिया था। यहां तक की महिलाओं ने भी इस आंदोलन में भाग लिया।
• यह बंगाल विभाजन जैसे क्षेत्रीय मुद्दे से प्रारंभ हुआ था लेकिन बाद में यह पूरे भारत में फैल गया। जिसने हमारी राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया।
• विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से घरेलू उद्योगों को फायदा हुआ।
• स्वदेशी शैक्षिक संस्थानों की स्थापना की गई जिसने शिक्षा को बढ़ावा दिया।
• ब्रिटिश सरकार ने अहिंसक जन आंदोलन को दबा दिया।
इसलिए भारतीय युवाओं ने क्रांतिकारी आंदोलनों की तरफ रुख किया। 
• स्वदेशी आंदोलन के दबाव के कारण 1909 ई. में ब्रिटिशों को सुधार करने पड़े।

स्वदेशी आंदोलन तत्कालीन लक्ष्य में सफल नहीं हो पाया था लेकिन फिर भी यह हमारे स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण सीढ़ी है जिस पर चढ़कर ही आगे की बातें प्राप्त की गई।

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