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समुदाय। समुदाय में अनुक्रमण। समुदाय में अंतरजातीय संबंध

 
Interspecies interaction in community




समुदाय। Ecology Notes

Interspecies interaction in community


समुदाय (Community)
किसी निश्चित क्षेत्र में जीवों का ऐसा समूह जिसमें अनेक जाति के जीव हो, उसे समुदाय कहते है।
समुदाय की सभी जातियां परस्पर अंतर्संबंधित तथा एक-दूसरे पर आश्रित रहती है।
जैसे - किसी अभ्यारण के सभी जीवों का समूह।
• समुदाय तथा पर्यावरण के मध्य का संबंध समुदाय पारिस्थितिकी कहलाता है।
• समुदाय में जातीय विभिन्नता, प्रभाविता एवं स्तरीकरण का गुण होता है। (Species diversity, dominance and stratification)
• समुदाय स्थिर नहीं होते हैं। इनमें लगातार समय और स्थान के साथ परिवर्तन होता रहता है।


समुदाय में अनुक्रमण (Succession in community)


succession in community


किसी भी समुदाय में होने वाले क्रमिक विकास को अनुक्रमण कहते है।
• अनुक्रमण की प्रक्रिया में एक प्रजाति दूसरी प्रजाति द्वारा प्रतिस्थापित होती रहती है। यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि चरम समुदाय का विकास न हो।
• नवीन समुदाय (Pioneer community)
अनुक्रमण की प्रक्रिया में सर्वप्रथम स्थापित समुदाय को नवीन समुदाय कहते हैं।
उदाहरण - वन पारिस्थितिकी में लाइकेन नवीन समुदाय होते है।
• चरम समुदाय (Climax community)
ऐसा समुदाय जिस पर अनुक्रमण की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है।
• क्रम की समुदाय (Transitional/Seral community)
अनुक्रमण की प्रक्रिया में नवीन समुदाय और चरम समुदाय के मध्य बदलते समुदायों को क्रम की समुदाय कहते है।

नोट:- सर्वप्रथम 1885 में हुल्ट ने अनुक्रमण (Succession) शब्द दिया।


अनुक्रमण की प्रक्रिया (Process of succession)

आच्छादन (Nudation):- नवीन समुदाय के आगमन के लिए खाली स्थान प्रदान करने की प्रक्रिया आच्छादन कहलाती है।

प्रवासन (Migration):- नवीन समुदाय (विभिन्न प्रजातियों) का आना। इसे आक्रमण (Invasion) भी कहते है।


स्थापन (Ecesis):- विभिन्न प्रजातियों का नए स्थान पर पहुंचकर स्थापित होना।

स्पर्धा (Competition):- डार्विन के सिद्धांत के आधार पर जीवन के लिए संघर्ष और योग्यतम की उत्तरजीविता में केवल वही प्रजाति सफल होती है जो सभी प्रकार से स्वस्थ और योग्य हो।

प्रतिक्रिया (Reaction):- सफल प्रजाति और पर्यावरण एक- दूसरे से पदार्थों के आदान-प्रदान के समय प्रतिक्रिया करते हैं।
उदाहरण- क्रस्टोज लाइकेन के द्वारा चट्टानों की ऊपरी परत का विघटन होता है और मृदा की पतली परत बन जाती है, जो मौस (Moss) को प्रवासन का निमंत्रण देती है।

स्थायित्व (Stabilisation):- एक लंबी अवधि के बाद प्रजाति (समुदाय) पर्यावरण के साथ संतुलन स्थापित कर लेती है और चरम समुदाय की प्राप्ति होती है।


अनुक्रमण का कारण (Causes of succession)

पर्यावरण में होने वाले बदलाव कुछ प्रजातियों के लिए लाभदायक होते हैं जबकि अन्य प्रजातियों के लिए हानिकारक हो सकते हैं, जिससे समुदाय में अनुक्रमण होता है।
• दो प्रकार के कारक अनुक्रमण में सहायक है -
1. भूआकृतिक कारक (Physiographic factors)
जलवायु, मृदा अपरदन, मृदा जमाव, भूस्खलन, ज्वालामुखी लावा।
ये सभी नवीन समुदाय के लिए रिक्त क्षेत्र का निर्माण करते हैं।

2. जैविक कारक (Biotic factors)
अनुक्रमण की प्रक्रिया में प्रत्येक क्रम की समुदाय उस क्षेत्र में पर्यावरण से क्रिया कर पर्यावरण को अपने लिए प्रतिकूल परंतु अगले समुदाय के लिए अनुकूल बना देता है।
जैसे - मानवीय क्रियाकलापों से मानव स्वयं के लिए प्रदूषण जैसी प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न कर लेता है।


अनुक्रमण के प्रकार (Types of succession)

 प्राथमिक अनुक्रमण
 द्वितीयक अनुक्रमण
 1. यह उस क्षेत्र में होता है, जहां पूर्व में कभी कोई जीव उपस्थित नहीं होता।

2. ज्वालामुखी लावा के कारण, आग्नेय चट्टानों पर, रेत के टीलों पर, भूस्खलन, समुद्र का वह भाग जो अभी-2 खाली हुआ है या स्थल का वह भाग जहां पानी भर गया हो, वहां प्राथमिक अनुक्रमण प्रारंभ  होता है।

3. नवीन समुदाय की स्थापना काफी मुश्किल से होती है।

4. इसमें चरम समुदाय का विकास बहुत धीमी गति से होता है। (सैकड़ों से हजारों वर्ष) 
 1. इस प्रकार का अनुक्रमण उस क्षेत्र में होता है, जहां पूर्व में जीव उपस्थित थे तथा कृत्रिम या प्राकृतिक कारणों से वह क्षेत्र रिक्त हो गया।

2. छोड़ा हुआ खेत, जला हुआ या काटा हुआ जंगल, बाढ़ से प्रभावित भूमि पर द्वितीयक अनुक्रमण प्रारंभ होता है।



3. नवीन समुदाय की स्थापना तुलनात्मक रूप से आसानी से हो जाती है।

4. इसमें चरम समुदाय का विकास तेजी से होता है।
 

अंत:जातीय संबंध (Intraspecific relations)
एक ही जाति के सदस्यों के बीच होने वाली पारस्परिक क्रियाएं अंत:जातीय संबंध कहलाती है।


समुदाय में अंतरजातीय संबंध 

(Interspecies interaction)

समुदाय में अनेक प्रजातियां होती है, जो वृद्धि, पोषण, आवास तथा अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे पर निर्भर होती है।
समुदाय में किन्ही दो जातियों के बीच होने वाली पारस्परिक क्रियाएं अंतरजातीय संबंध कहलाती है।
• किसी समुदाय में प्रजातियों की संख्या अधिक होने पर अंतरजातीय संबंध भी अधिक होते हैं।
• पारस्परिक क्रिया के दौरान जातियों के बीच संबंध लाभदायक (+), हानिकारक (-) या उदासीन (0) हो सकते हैं।

                                       अंतरजातीय संबंध
 1.धनात्मक संबंध
2.नकारात्मक संबंध
A. सहोपकारिता
A. प्रतिस्पर्धा
B. Proto-co.
B. Amenalism (- ०)
C. सहभोजिता
C. शोषण
a.परजीविता ->+
b.परभक्षण -<+

1.धनात्मक संबंध:- दो जातियों के बीच में ऐसा संबंध जिसमें दोनों प्रजातियों को लाभ होता है तथा किसी भी प्रजाति को हानि नहीं होती है।

A. सहोपकारिता/सहजीवी/सहविकास (Mutualism)
दो प्रजातियों के बीच ऐसा संबंध जिसमें दोनों को लाभ होता है।
यह संबंध अविकल्पी होता है अर्थात दूसरा विकल्प नहीं होता।
उदाहरण:-
• लेग्यूमिनस पादप (मटरकुलीय) 
• लाइकेन :- शैवाल और कवक
• माइकोराइजा (कवकमूल) :- पादप जड़ और कवक
• मक्खी तथा आर्किड पुष्प (परागण क्रिया)
• अंजीर के वृक्ष तथा वेस्प जाति (पादप-प्राणी संबंध)
• दीमक तथा ट्राईकोनिम्फा
• आंत में जीवाणु

• लेग्यूमिनस पादप (दलहनी पौधे)
ये मटर कुल के पौधे होते हैं। जैसे - मटर, चना, सोयाबीन, मूंग
दलहनी पौधों की जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीव पाए जाते हैं, जो कि सहजीवी के रुप में पाए जाते हैं।
जैसे - राइजोबियम जीवाणु।
ये जीवाणु कार्बोहाइड्रेट तथा अन्य पोषक पदार्थ पौधों से प्राप्त करते हैं तथा बदले में पौधे जीवाणु द्वारा संचित किए गए नाइट्रोजन का उपयोग अपनी वृद्धि के लिए करते हैं।

नोट:- वायुमंडल के नाइट्रोजन को नाइट्रोजन के यौगिक  (नाइट्रेट NO3) में बदलने की क्रिया को नाइट्रोजन का स्थिरीकरण अथवा यौगिकीकरण कहते हैं।

• लाइकेन :- शैवाल और कवक
लाइकेन शैवाल और कवक के बीच सहजीवी संबंध का सर्वोत्तम उदाहरण है।
शैवाल प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाता है जिसका उपयोग का कवक करता है तथा कवक शैवाल को जल तथा सुरक्षा प्रदान करता है।

 शैवाल (Algae)
 कवक (Fungs)
•कोशिश भित्ति- सेल्यूलोस
•हरितलवक उपस्थित
•प्रकाश संश्लेषण करते हैं।
• स्वपोषी
•अध्ययन - फाइकोलॉजी

शैवाल के अध्ययन को Algology भी कहते हैं।
•कोशिश भित्ति- काइटिन
•हरितलवक उपस्थित नहीं
•प्रकाश संश्लेषण नहीं करते
• परपोषी 
• अध्ययन - माइकोलॉजी

कवक का शरीर - कवकजाल (माइसीलियम)
माइसीलियम नमी (CO2+H2O) अवशोषित कर लेता है।

 
सामान्यता लाइकेन रेगिस्तान और ठंडे प्रदेशों में पाए जाते हैं।
सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) के कारण शैवाल और कवक के बीच सहजीवी संबंध स्थापित नहीं हो पाता। इसलिए वहां लाइकेन नहीं पाया जाता। 
इसलिए लाइकेन को वायु प्रदूषण का जैव संकेतक (Bio indicator of air pollution) कहते हैं।

• रोजेला नामक लाइकेन से लिटमस पेपर प्राप्त होता है, जो अम्ल-क्षार के मापन में काम आता है।
 
• माइकोराइजा (कवकमूल) :- पादप जड़ और कवक
कवक का किसी पौधे की जड़ के साथ सहजीवन माइकोराइजा कहलाता है।
बड़े पेड़-पौधों की जड़ों में मूल रोम (Hair root) नहीं पाई जाती है। इसलिए यह पेड़-पौधे मृदा के पानी को अवशोषित नहीं कर पाते।
इसलिए इन पेड़-पौधों की जड़ों में कवक/कवक जाल पाया जाता है, जो मृदा के पानी को अवशोषित करके बड़े पौधों को दे देता है। इस कारण बड़े पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेषण कर लेते हैं, जिससे बनने वाला भोजन कवक को भी मिल जाता है।
इसलिए माइकोराइजा कवक और उच्च पादपों की जड़ों के बीच पाया जाने वाला सहजीवी संबंध है।
जैसे - चीड़, आर्किड, लीची, रेफ्लेशियाव।

 • माइको - कवक                         • राइजा - जड़ (Root)
 
• परागण क्रिया
पुष्प का परागण तथा बीजों का प्रकीर्णन भ्रमर तथा मधुमक्खी जैसे जीव करते हैं। बदले में ये पौधों से परागरस, मकरंद (नेक्टर) तथा फल प्राप्त करते हैं।
 जैसे - मक्खी तथा आर्किड पुष्प।

• दीमक तथा ट्राईकोनिम्फा
दीमक सेल्यूलोस का पाचन नहीं कर पाती है। ट्राईकोनिम्फा सेल्यूलोस का पाचन कर देता है।

• आंत में जीवाणु
कुछ जीवाणु जंतुओं की आंत में पाए जाते हैं।
आंत में रहने वाले जीवाणु विटामिन बी तथा अन्य पदार्थों को स्त्रावित करते हैं, जो प्राणियों के लिए लाभदायक होते हैं जबकि प्राणी जीवाणुओं को पोषण प्रदान करते हैं।

B. प्राक्सहयोगिता (Proto-cooperation) (++)
दो प्रजातियों के बीच ऐसा संबंध जिसमें दोनों को लाभ होता है, परंतु ये अलग-अलग भी रह सकते हैं। 
यह विकल्पी अर्थात अअनिवार्य संबंध है।
उदाहरण:-
• हर्मिट क्रेब तथा सी-एनिमोन
हर्मिट क्रेब (केकडा) के ऊपर सी-एनिमोन बैठ जाता है।
सी-एनिमोन में बहुत सारी दंश कोशिकाएं (निमेटोसाइट) होती है, जिससे केकड़ा शत्रुओं से बच जाता है। बदले में केकड़ा एनिमोन को भोजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ नए स्थानों पर ले जाता है।

• टिक बर्ड तथा गैंडा
बर्ड, गैंडे के शरीर पर बैठकर जूं को खा जाती है।
भारत में गैंडा असम, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में मिलता है।
काजीरंगा नेशनल पार्क (असम) एक सींग वाले गैंडे के लिए प्रसिद्ध है।
आईयूसीएन ने इसे संकटग्रस्त जाति (Endangered) से निकालकर सुभेद्य जाति (Vulnerable) में डाल दिया है।
22 सितंबर को विश्व राइनो दिवस (World Rhino Day) मनाया जाता है।

• मगरमच्छ तथा पछी
क्रोकोडाइल बर्ड, मगरमच्छ के दांतों में फंसे भोजन को खा लेती है। और मगरमच्छ के दांतों की हो जाती है।

C. सहभोजिता (Commensalism) (+ 0)
दो प्रजातियों के बीच ऐसा संबंध जिसमें एक को लाभ होता है तथा दूसरी जाति अप्रभावित रहती है।
उदाहरण:-
• अधिपादप - बेल का पेड़ पर चढ़ना
आम के पेड़ पर अधिपादप के रूप में उगने वाले आर्किड।
• अधिजन्तु - ऐसे जंतु जो दूसरे जंतु तथा पादपों पर निर्भर रहते हैं।
कछुआ और शैवाल - कछुए के शरीर पर शैवाल बैठकर भोजन और आवास प्राप्त करती है। परंतु इससे कछुए को ना तो लाभ होता है ना कोई हानि होती है।
सी-एनिमोन और क्लोनफिश - समुद्री एनिमोन के छाते (दंश कोशिकाओं) के बीच रहने वाली मछली को सुरक्षा मिलती है लेकिन मछली से एनिमोन को कोई लाभ नहीं पहुंचता।
बगुला/चिड़िया और चढ़ने वाले पशु - चराई के दौरान पशु पौधों को हिलाते हैं, जिससे की ट बाहर हो जाते हैं, जिन्हें बगुले खा जाते हैं लेकिन पशुओं को बगुला से ना हानि और ना ही लाभ होता है।
E-कोलाई - ई-कोलाई जैसे बैक्टीरिया हमारे आंत में पाए जाते हैं, जो भोजन खाते हैं लेकिन उनसे हमें ना कोई लाभ होता है और ना ही हानि।
बहुत सारी गिलहरियां, बंदर, सांप, मेंढक, पक्षी आदि पेड़ों पर रहते हैं, आवास बनाते हैं, जनन करते हैं लेकिन पेड़ को इनसे ना कोई लाभ होता है और ना ही कोई हानि होती है।

 2.नकारात्मक संबंध - दो जातियों के बीच में ऐसा संबंध जिसमें एक प्रजाति या दोनों को प्रजातियों को हानि होती है।

A. शोषण (Exploitation) (+ -)
एक जाति के जीव द्वारा दूसरी जाति के जीव का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपयोग कर लाभान्वित होना शोषण कहलाता है।
शोषण दो प्रकार का होता है -
a. परजीविता (Parasitism) (->+)
b. परभक्षण (Predation) (-<+)

a. परजीविता (Parasitism)
दो प्रजातियों के बीच ऐसा संबंध जिसमें एक प्रजाति अपनी आवश्यकताओं हेतु दूसरी प्रजाति पर निर्भर रहती है।
जो प्रजाति निर्भर रहती है, उसे परजीवी तथा जिस पर निर्भर रहती है, उसे पोषक कहते हैं।
• परजीवी हमेशा छोटा होता हैं तथा लाभ में रहता हैं जबकि पोषक बड़ा होता हैं तथा हानि में रहता हैं।
परजीविता अनेक प्रकार की होती हैं -

• बाह्य परजीविता:- (Ecto parasitism)
ऐसी परजीविता जिसमें परजीवी पोषक की बाह्य सतह या त्वचा पर रहता हैं। जैसे- मानव के बालों पर जूं, कुत्तों पर चिचड़े (टिक्स), समुद्री मछलियों पर अरित्रपाद (कॉपिपोड्स)

नोट :- मादा मच्छर को बाह्य परजीवी नहीं माना जाता हालांकि जनन के लिए इसको हमारे रक्त की आवश्यकता पड़ती है।

 नोट :- मादा मच्छर को बाह्य परजीवी नहीं माना जाता हालांकि जनन के लिए इसको हमारे रक्त की आवश्यकता पड़ती है।
 

• अन्त: परजीविताः- (Endo parasitism)
ऐसी परजीविता जिसमें परजीवी पोषक के शरीर के भीतर रहता हैं।
जैसे:- एस्केरिस, टिनिआ, टेपवर्म, एन्टाअमीबा आदि मनुष्य के आंत्र में रहते हैं।

एस्केरिस के कारण एस्केरियेसिस रोग हो जाता है। (प्रमुख रुप से बच्चों में)
लक्षण - चेहरे पर सफेद चकते।
उपचार - डीवॉर्मिंग कराते हैं और एल्बेंडाजोल की टेबलेट

नवजात शिशुओं और स्कूली बच्चों को परजीवी कृमि संक्रमण से संरक्षित करने के लिए और इसके प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए प्रत्येक वर्ष 10 फरवरी को नेशनल डीवॉर्मिंग डे के रूप में मनाया जाता है।
 

• अण्ड-परजीविता:- (Brood parasitism)
ऐसी परजीविता जिसमें परजीवी पक्षी अपने अण्डे दूसरे पक्षी के घौंसले में देता हैं।
उदाहरण:- कोयल अपने अण्डे कौए के घोंसले में देती हैं।

• पर-परजीविता:- (Hyper parasitism)
ऐसी परजीविता जिसमें एक परजीवी दूसरे परजीवी पर निर्भर रहता हैं।
उदाहरण:- वैक्टीरियोफेज बेक्टिरिया पर

• पूर्ण परजीवी:- (Holo parasitism)
उदाहरण- कस्कुटा (अमरबेल)
अमरबेल में प्रकाश संश्लेषण नहीं होता।

अमरबेल को पूर्ण स्तंभ परजीवी भी कहते हैं।
रेफ्लेशिया पूर्ण मूल परजीवी का उदाहरण है।
इसका पुष्प संसार में सबसे बड़ा होता है।
संसार का सबसे छोटा पुष्प कौन-सा है ? - वुल्फिया 
 
• आंशिक परजीवी:- (Hemi parasitism)
उदाहरण- लोरेंथस आम के वृक्ष पर आशिंक रूप से निर्भर।
लोरेंथस में प्रकाश संश्लेषण होता है।

b. परभक्षण (Predation)
दो जातियों के बीच ऐसी क्रिया, जिसमें एक जीव दूसरी जाति के जीव को मारकर खा जाता है।
इसमें परभक्षी को लाभ होता है तथा शिकार (Prey) नष्ट हो जाता है।
जैसे - शेर द्वारा हिरण का भक्षण, शाकाहारियों (जैसे - गौरेया) द्वारा पौधों का भक्षण।
कीटाहारी पादप भी परभक्षिता के उदाहरण है। ये नाइट्रोजन की आपूर्ति हेतु कीटों का भक्षण करते हैं।

कुछ कीटाहारी पादप निम्न हैं:- नेपेन्थीज, ड्रोसेरा, यूट्रीकुलेरिया, डायोनिया

परभक्षण की प्रक्रिया द्वारा ऊर्जा एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर तक स्थानांतरित होती है।
परभक्षण पारितंत्र में जातियों का संतुलन एवं जैव विविधता बनाए रखने में उपयोगी है।
 
B. असहभोजिता/प्रतिजीविता (Ammensaoism)
इसमें एक प्रजाति रसायन उत्पन्न करती है, जो दूसरी प्रजाति के लिए हानिकारक होते हैं। जैसे - नील हरित शैवाल
इसमें रसायन स्त्रावित करने वाली प्रजाति अप्रभावित होती है।
प्रतिजीविता दो प्रकार की होती है - 

• एन्टीबायोसिस:- इसमें किसी जंतु द्वारा रसायन स्त्रावित किए जाते हैं, जो अन्य जीवों के लिए हानिकारक होते है। जैसे - पेनिसिलियम नोटैटम।
यह पेनिसिलीन रसायन स्त्रावित करता है, जो अनेक सूक्ष्म जीवों के लिए हानिकारक है।

• ऐलिलोपेथी:- इसमें एक पादप द्वारा रसायन स्त्रावित किए जाते हैं, जो अन्य पादपों के लिए हानिकारक होते है। 
जैसे - काले अखरोट।
काले अखरोट की जड़ों द्वारा स्त्रावित जुगलोन रसायन अन्य पादपों को नुकसाान पहुंचाता है।

C. प्रतिस्पर्धा (- -):- ऐसी प्रक्रिया जिसमें एक जाति की योग्यता (फिटनैस) किसी अन्य जाति की उपस्थिति के कारण कम हो जाती हैं, उसे प्रतिस्पर्धा कहते हैं।
प्रतिस्पर्धा अन्त:जातीय या अन्तरजातीय हो सकती हैं।
इसमें विभिन्न प्रजातियों के बीच भोजन, पानी, आवास हेतु प्रतिस्पर्धा होती हैं। 
इसमें दोनों प्रजातियों को हानि होती हैं।

प्रतिस्पर्धा बाह्राकरण का सिद्धांत
यह सिद्धांत रूसी वैज्ञानिक जी एफ गौस (Gause) ने दिया।
इसके अनुसार प्रतिस्पर्धा में एक जाति श्रेष्ठ है, तो उसके कारण दूसरी जाति उस आवास से बाहर हो जाती है।
 
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