आपका स्वागत है, डार्क मोड में पढ़ने के लिए ऊपर क्लिक करें यूट्यूब, टेलीग्राम, प्ले स्टोर पर DevEduNotes सर्च करें।

राष्ट्रीय आंदोलन का प्रथम चरण (1885-1905)

 
First phase of national movement


राष्ट्रीय आंदोलन का प्रथम चरण (1885-1905)


नरमपंथियों की विचारधारा। नरमपंथियों का योगदान। राष्ट्रीय आंदोलन का उदारवादी चरण। First phase of national movement.

 राष्ट्रीय आंदोलन का
काल 
 प्रभावी
 पहला चरण
 1885-1905
 नरम पंथी  
 दूसरा चरण
 1905-1919
 गरम पंथी
 तीसरा चरण
 1919-1947
 गांधीजी

राष्ट्रीय आंदोलन के प्रथम चरण (1885-1905) में नरम दल का प्रभाव रहा।
मुख्य नेता:- सुरेंद्रनाथ बनर्जी, दादा भाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, गोपाल कृष्ण गोखले, बदरुद्दीन तैयब्बजी आदि।


नरमपंथियों की विचारधारा :-

1. अंग्रेजों की न्यायप्रियता में विश्वास करते थे।
2. ब्रिटिश शासन को भारत के लिए दैवीय वरदान मानते थे।
क्योंकि अंग्रेज भारत में आधुनिक शिक्षा तथा आधुनिक मूल्य ले कर आये हैं तथा अंग्रेजों के जाने से भारत में राजनीतिक अस्थिरता आ सकती है।
3. भारतीय आम जनता में राजनीतिक चेतना का विकास नहीं हुआ है। इसलिए उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल नहीं करना चाहिए।
4. भारतीयों का शैक्षणिक विकास किया जाना चाहिए।
5. राष्ट्रीय आंदोलनों में सभी जाति-धर्म व लिंग के पढ़े-लिखे लोगों को शामिल करना चाहिए।
6. प्रार्थना पत्र, ज्ञापन व अधिवेशन के माध्यम से राष्ट्रीय आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहिए।


राष्ट्रीय आंदोलन में नरमपंथियों का योगदान

1. राष्ट्रीय आंदोलन को प्रारंभ किया, उसे संगठित किया और नेतृत्व प्रदान किया।
2. राष्ट्रीय आंदोलन को अंग्रेजों के दमन से बचाने में सफल रहे।
3. राष्ट्रीय आंदोलन को धर्मनिरपेक्ष स्वरूप प्रदान किया।
4. धन का निष्कासन सिद्धांत को लोकप्रिय किया। इससे अंग्रेजों का आर्थिक शोषणकारी चेहरा सामने आया।
इसलिए इस दौर को आर्थिक राष्ट्रवाद का दौर कहते है।
5. इनके कारण अंग्रेजों को भारत में कई सुधार करने पड़े।
जैसे - 1886 का लोक सेवा आयोग।
1892 का भारत परिषद अधिनियम।
1896 का व्यय सुधार आयोग (वेलबाई आयोग)


नरमपंथियों की कमियां

1. अंग्रेजी शासन के वास्तविक स्वरूप को उजागर नहीं कर पाए थे।
2. भारतीय जनता के सामर्थ्य को समझ नहीं पाए। इसलिए राष्ट्रीय आंदोलन को जन आंदोलन नहीं बना पाए थे।
3. इनकी अधिकतर मांगे उच्च वर्ग से संबंधित होती थी।
4. नरमपंथियों का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान अंशकालीन होता था।
5. इनकी अनुनय-विनय की नीति या राजनीतिक भिक्षावृत्ति नीति से युवा वर्ग को निराशा होती थी।

तिलक :- यदि हम मेंढक की तरह वर्ष में एक बार शोर मचाएंगे तो कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।

अश्विनी कुमार दत्त :- कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन 3 दिनों का तमाशा है।

गोखले:- हमारी असफलता में सफलता निहित है।

धन का निष्कासन
अर्थ - धन का एक पक्षीय प्रवाह।
धन का निष्कासन सिद्धांत दादाभाई नौरोजी ने दिया।
1867 ईस्वी में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन के लंदन अधिवेशन में दादा भाई नौरोजी ने इंग्लैंड डेब्ट टू इंडिया नामक लेख में यह सिद्धांत प्रस्तुत किया था।
• कालांतर में दादा भाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक पॉवर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया में इस सिद्धांत की व्याख्या की।
• 1896 के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस ने इस सिद्धांत को स्वीकार किया था।
• 1901 में गोपाल कृष्ण गोखले ने इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में इस सिद्धांत की चर्चा की।
• रमेश चंद्र दत्त ने अपनी पुस्तक इकोनामिक हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया में इस सिद्धांत का सविस्तार वर्णन किया।
• ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय धन ब्रिटेन को स्थानांतरित होता था तथा इसके बदले में भारत को कुछ भी प्राप्त नहीं होता था।
गंगा किनारे से सब कुछ सोखते थे और टेम्स नदी के किनारे ले जाकर निचोड़ दिया जाता था। (1-D)
• तरीके:- 
(A) गृह व्यय -
ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों के वेतन और पेंशन।
ईस्ट इंडिया कंपनी के शेयरधारकों का लाभांश।
कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स तथा बोर्ड ऑफ कंट्रोल के खर्चे।
कंपनी के कर्ज का भुगतान।
भारत परिषद के खर्चे।
सैनिक तथा गैर-सैनिक व्यय।
ब्रिटेन से आने वाला सामान।
(B)  ब्रिटिश निवेशकों को दिया जाने वाला लाभ
जैसे - रेल, बीमा, बैंक, चाय बागान, नील बागान।
 रेलवे में घाटे का नुकसान। (गारंटी योजना)
(C)  अंग्रेज भारत में निजी व्यापार करते थे।
(D)  भारतीय कुलीन वर्ग अंग्रेजों को उपहार देते थे।

 धन के निष्कासन के प्रभाव:-
1. धन के निष्कासन के कारण भारत में पूंजी निर्माण नहीं हो सका,  क्योंकि अतिरिक्त धन  ब्रिटेन चला जाता था। अतः भारत में बचत नहीं हो पाती थी।  परिणाम स्वरूप भारत में कृषि तथा उद्योगों का विकास नहीं हो पाया।
2. कृषि तथा उद्योगों की बर्बादी के कारण भारत में  भुखमरी, अकाल, सूखा तथा बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हो गई।
3. अतिरिक्त धन के कारण ब्रिटेन के लोगों का जीवन स्तर सुधरा
4. इसी अतिरिक्त भारतीय धन के फलस्वरूप ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति संभव हो पाई। तथा भारतीय के कुटीर उद्योगों का पतन हो गया।

1892 ईस्वी का भारत परिषद अधिनियम:-
•  गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में 1 सदस्य बढ़ा दिया गया। (1+7)
•  अतिरिक्त सदस्यों की संख्या भी बढ़ाई गई थी।
 न्यूनतम - 10 अधिकतम - 16
•  नगर निगम, सीनेट तथा व्यापार बोर्ड के सदस्यों द्वारा अतिरिक्त सदस्यों का चुनाव किया जाता था।  हालांकि चुनाव शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था।
•  अतिरिक्त सदस्यों को प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया था। हालांकि वे पूरक प्रश्न नहीं पूछ सकते थे।

प्रश्न.नरमपंथियों के आंदोलन की असफलता के कारण बताइए ?
उत्तर - कमियां
हालांकि पूरी तरह से उनकी राजनीति को असफल नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनका भी राष्ट्रीय आंदोलन में निम्नलिखित योगदान है - ......
परंतु वे राष्ट्रीय आंदोलन को एक सही दिशा में लेकर तो गए थे, लेकिन एक अंजाम तक नहीं पहुंचा पाए, इसलिए राष्ट्रीय आंदोलन का दूसरा चरण शुरू होता है और जनता गरम दल की तरफ आकर्षित होने लगी।

SAVE WATER

Post a Comment

0 Comments