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राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएं ।। राजस्थान के पुरातात्विक स्थल

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राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएं


पाषाण काल

(1) बागौर
भीलवाडा में कोठारी नदी के किनारे।
पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य यहाँ मिले हैं।
पाषाणकालीन औजारों के भडार यहां मिले हैं।
उत्खननकर्त्ता- विरेन्द्रनाथ मिश्र।

(2) तिलवाड़ा
बाड़मेर में लूनी नदी के किनारे ।
यहां भी पशुपालन के साक्ष्य प्राप्त हुये हैं।
अग्नि कुंड के साक्ष्य ।
उत्खननकर्ता- विरेन्द्रनाथ मिश्र

अन्य केन्द्र
(3) बुढ़ा पुष्कर - अजमेर
(4) जायल - नागौर
(5) डीडवाना - नागौर


सिंधु सभ्यता

(1) कालीबंगा
हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी के किनारे।
कालीबंगा का अर्थ - काली चूडियां।
1952 - सर्वप्रथम अमलानन्द घोष ने खोज की।

1961-1969 में विस्तृत उत्खनन बी के थापर और बीबी लाल ने किया (5 स्तरों तक )
कालीबंगा से प्राक् हड़प्पा और विकसित हड़प्पा के अवशेष मिले हैं।
सर्वप्रथम जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं।
कालीबंगा के लोग दो फसले उगाया करते थे। - चना, सरसों
अग्नि वेदिकाएँ प्राप्त हुयी हैं।
कालीबंगा में लकड़ी की नालियां बनी हैं।
मकान कच्ची इंटों व अलंकृत ईटों के बने थे।
युग्मित शवाधान प्राप्त हुये हैं।
भुकम्प के अवशेष मिले है।
1985-86 ई. में भारत सरकार ने एक सग्रंहालय बनवाया।
मेसोपोटामिया की बेलनाकार मुहर प्राप्त हुई है।
दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को हड़प्पा /सिन्धु घाटी सभ्यता की तीसरी राजधानी कहा है।
पहली राजधानी - हड़प्पा
दूसरी राजधानी - मोहनजोदडो
तीसरी राजधानी - कालीबंगा

(2) सोथी सभ्यता
बीकानेर के आस -पास की सभ्यता।
अमलानन्द घोष ने इसे सम्पूर्ण हड़पा सभ्यता का उदगम स्थल कहा हैं। इसे कालीबंगा प्रथम भी कहा जाता है।
दो केन्द्र - 1 सांवणिया      2 पूगल

(3) आहड़ सभ्यता
वर्तमान उदयपुर जिले में 'आहड़' स्थल बनास की सहायक नदी आयड़ / बेड़च नदी के किनारे बसा हुआ था।
चूंकि यह सभ्यता बनास नदी के आस-पास मिली हैं, इसलिए इसे बनास सभ्यता भी कहते हैं।
• इसे मृतकों के टीलों की सभ्यता भी कहते हैं।
• यहां एक घर में 6 से 8 चूल्हे मिले हैं। जिससे हमें संयुक्त परिवार व सामूहिक भोज की जानकारी मिलती हैं।
• आहड़ से एक यूनानी मुद्रा मिली हैं, जिस पर 'अपोलों का चित्र बना हुआ हैं।
• यहाँ काले व लाल मृदभांड मिले हैं, जिन्हें गोरे या कोठ कहते हैं।
आहडवासी उल्टी तपाई (Inverted firing) विधि से मृदभांडो का निर्माण करते थे
बिना हत्थे के जलपात्र मिले हैं। ऐसे जलपात्र हमें ईरान की सभ्यता से भी प्राप्त हुये थे। इनसे हमें आहड़ सभ्यता और ईरान की सभ्यता के बीच सम्बन्धों की जानकारी मिलती हैं।

• आहड़ सभ्यता का प्राचीनतम नाम आघाटपुर और स्थानीय नाम धूलकोट  है।
• आहड़ से तांबा गलाने की भट्टियाँ प्राप्त हुयी हैं। इसलिए इसे ताम्रवती नगरी भी कहते हैं।

उत्खननकर्ता- 
1. अक्षय कीर्ति व्यास   2. रतनचन्द अग्रवाल
3. विरेन्द्रनाथ मिश्र       4.हंस मुख धीरज सांकलिया

आहड़ सभ्यता के अन्य केन्द्र -
1. गिलुण्ड - राजसंमद
2. बालाथल - उदयपुर
3. ओझीयाणा - भीलवाड़ा


सोलह महाजनपद काल

इस काल में भारत की दूसरी नगरीय क्रांति हुई।


राजस्थान में महाजनपद

(1) मत्स्य महाजनपद
जयपुर तथा अलवर का दक्षिण पश्चिम भाग
राजधानी - विराटनगर
इसका ऋग्वेद में भी उल्लेख मिलता है

(2) कुरु महाजनपद
अलवर का उतरी भाग
राजधानी - इंद्रप्रस्थ (दिल्ली)

(3) शूरसेन महाजनपद
राजधानी - मथुरा
भरतपुर तथा अलवर का पूर्वी भाग , धौलपुर , करौली।

(4) शिवि जनपद
वर्तमान चित्तौड़गढ़ और उदयपुर जिलों में स्थित
राजधानी - माध्यमिका (वर्तमान नाम - नगरी)

यह राजस्थान का पहला उत्खनित स्थल है।
उत्खननकर्त्ता - डी. आर. भंडारकर (1904 ई.)

(5) मालव जनपद जाति
वर्तमान जयपुर और टोंक
राजधानी- नगर (टोंक) (इसे खेड़ा सभ्यता भी कहते हैं)
सर्वाधिक सिक्के मालव जनपद के प्राप्त होते हैं। ये सिक्के रैढ़ नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं। इन सिक्कों को धरण/पण कहते हैं।
रैढ़ को प्राचीन भारत का टाटानगर कहते हैं।

(6) यौद्धेय जनपद
वर्तमान गंगानगर व हनुमानगढ़ जिले में स्थित।
शक् शासक रूद्रदामन के गिरनार (जूनागढ़) शिलालेख से यह जानकारी मिलती हैं, कि कुषाणों की शक्ति को यौद्धेयों ने रोका।

(7) शाल्व जनपद - अलवर

(৪) अर्जुनायन जनपद - अलवर, भरतपुर जिलों में स्थित।

(9) राजन्य जनपद - भरतपुर

महाजनपद काल में बीकानेर और जोधपुर के आस-पास के क्षेत्र को जांगल प्रदेश कहा जाता था।

बीकानेर के शासकों ने 'जागंलधर बादशाह' की उपाधि का प्रयोग किया।


मौर्यकाल

बैराठ ( विराटनगर)
• 1837 ई. में कैप्टन बर्ट ने बीजक पहाड़ी से अशोक का भाब्रु शिलालेख खोजा। इसमें अशोक
द्वारा बौद्ध, संघ,धम्म के प्रति निष्ठा व्यक्त की गयी हैं। अशोक का भाब्रु शिलालेख वर्तमान में
कलकत्ता में म्यूजियम में रखा गया हैं।

• यहां से एक बौद्ध स्तूप और एक बौद्ध गोलाकार मंदिर
प्राप्त होता हैं।
• ह्वेनसांग भी यहां बौद्ध मठों की पुष्टि करता हैं।
कालान्तर में हुण शासक मिहिरकुल ने इन बौद्ध मठों को नष्ट कर दिया।

• जयपुर के राजा सवाई रामसिंह ने यहां खुदाई करवायी थी। जिसमें सोने की एक मंजूषा (संदूक)
प्राप्त हुयी। सम्भवतः इसमें भगवान बुद्ध के अवशेष रहे होगें।

• बैराठ से सर्वाधिक मात्रा में शैल चित्र प्राप्त होते हैं।
बैराठ में चट्टानों में लिखी लिपि को शंखलिपि कहते हैं।

• 1936 ई. में दयाराम साहनी ने यहां का उत्खनन किया था।

• 713 ई. के मान सरोवर लेख के अनुसार यहां राजा 'मान मौर्य' का शासन था। इस अभिलेख
में चार शासकों के नाम प्राप्त होते हैं -
1 महेश्वर
2 भीम
3 भोज
4 मान

• 738 ई. में कणसवा (कोटा) शिवालय के अभिलेख से मौर्य राजा धवल का जिक्र मिलता हैं।
इसके बाद राजस्थान में मौर्यों का कोई जिक्र नहीं मिलता हैं।


मौर्योत्तर काल / विदेशी आक्रमण

• मौर्यो का पतन होने के बाद राजस्थान छोटे-छोटे गणों में बंट गया। जिससे भारतीय भूमि पर विदेशी जातियों के आक्रमण बढ़ गए।

• यूनानी शासक 'मिनाण्डर ने 150 ई. में माध्यमिका पर अधिकार कर लिया था।
बैराठ से हमें मिनाण्डर की 16 यूनानी मुद्राएं प्राप्त होती हैं।
• भरतपुर के 'नोह से शुंगकालीन 5 मीटर ऊँची यक्ष की मुर्तिं मिली हैं। इसे 'जाख बाबा' की
मूर्ति कहा गया हैं।

• हनुमानगढ़ के रंगमहल से कुषाण कालीन मुद्राएं प्राप्त हुयी हैं।
एक गुरू - शिष्य की मूर्ति मिली हैं।
रंगमहल का उत्खनन स्वीडन के डॉक्टर 'हन्नारिड ने किया था।


गुप्तकाल

• समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार, उसने राजस्थान के गणतंत्रों को अपनी अधीनता
स्वीकार करवायी थी।

• कुमारगुप्त के समय बयाना (भरतपुर) में सर्वाधिक गुप्तकालीन सिक्के प्राप्त हुये हैं।
बयाना से नील की खेती के प्रमाण भी मिले हैं।

• बडवा (बारां) से गुप्तों का एक अभिलेख प्राप्त होता हैं, जिस में मोखरी शासकों का वर्णन हैं।
हुण शासक मिहिरकुल ने बाड़ोली में एक शिव मंदिर का निर्माण करवाया।

• चारचौमा (कोटा) का शिव मंदिर भी गुप्तकालीन स्थापत्य कला का उदारहण हैं।


गुप्तोत्तर काल

गुर्जर प्रतिहारों की राजधानी 'भीनमाल थी।
ह्वेनसांग भीनमाल को 'पी लो मो लो' लिखता हैं।

ब्रह्मगुप्त (भारत का न्यूटन) भीनमाल के थे।
ब्रह्मगुप्त की पुस्तकें - बह्यस्फुट सिद्धान्त, खंड खाद्यक

कवि माघ भी भीनमाल के थे। माघ की पुस्तक- शिशुपाल वध।

गुर्जर-प्रतिहारों ने अरबों को सिंध से आगे बढ़ने से रोका था।

राष्ट्रकूटों की एक शाखा कालान्तर में राजस्थान में राठौड़ के रूप में आयी थी।


अन्य पुरातात्विक स्थल

(1) गणेश्वर - सीकर जिले में कांतली नदी के किनारे।
गणेश्वर सभ्यता में सबसे प्राचीन तांबे के उपकरण मिले हैं इसलिए इस सभ्यता को ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी कहते हैं।
इस सभ्यता में तांबे के अधिक उपकरण मिलने का कारण खेतड़ी (झुंझुनू) ताम्र भंडार के निकट स्थित होना है।


(2) सुनारी - झुंझूनु जिलें में कांतली नदी के किनारे।
यहां लोहा गलाने की प्राचीनतम भट्टियां मिली है।

(3) कुराड़ा - नागौर जिले में 'औजारों की नगरी'

(4) ईसवाल - उदयपुर जिलें में 'औद्योगिक नगरी' (प्राचीनकाल में यहां से लोहा निकाला
जाता था)

(5) जोधपुरा - जयपुर में साबी नदी के किनारे

(6) नलियासर - सांभर ( जयपुर) में

(7) गरदड़ा - बूंदी में छाजा नदी के किनारे
प्राचीन भारत की बर्ड राइडर रॉक पेंटिंग मिली है। (पक्षी पर सवार मानव का शैल चित्र)

प्रश्न-उत्तर

आदिम संस्कृति का संग्रहालय किसे कहा जाता है ? - बागौर
एशिया का सबसे बड़ा सिक्कों का भंडार कहां मिला है ? - रैढ

राजस्थान का एकमात्र स्थल कौन सा है जहां से ताम्रयुगीन वैदिक एवं महाभारत कालीन सभ्यताओं के अवशेष मिले है ? - नोह (भरतपुर)
नोह से पांच सांस्कृतिक युगों के अवशेष मिले हैं।

पुरातत्व का पुष्कर किसे माना जाता है ? - खेतड़ी (झुंझुनू)

सिंधुवासी तांबा कहां से प्राप्त करते थे ? - खेतड़ी (झुंझुनू)

औजारों की नगरी किसे कहते हैं ? - कुराड़ा (नागौर)

पुरातत्वविद ओमप्रकाश कुक्की ने बूंदी से भीलवाड़ा तक 35 किलोमीटर लंबी विश्व की सबसे लंबी शैल चित्र श्रंखला खोजी।

बरोर (श्रीगंगानगर) से मिट्टी के बर्तनों में काली मिट्टी मिली है। पूरे भारत में ऐसे साक्ष्य कहीं नहीं मिले हैं।


 स्थल 
 नदी
 स्थान
 खोज
 खोजकर्ता
 कालीबंगा
 घग्घर
 हनुमानगढ़
 1952
अमलानंद घोष
 रंगमहल
 घग्घर
 हनुमानगढ़
 1952
डॉ. हन्नारिड
 आहड़
 आयड़
 उदयपुर
 1953
अक्षय कीर्ति व्यास





 बालाथल
 बनास
 उदयपुर
 1993
वीरेंद्रनाथ मिश्र
 गणेश्वर
 कांतली
 सीकर
 1972
आरसी अग्रवाल
 सुनारी
 कांतली
 झुंझुनू







 बागोर
 कोठारी
भीलवाड़ा 
1967-68 
वीरेंद्र नाथ मिश्र
 नोह
 रूपारेल
भरतपुर


 गरदडा
 छाजा
 बूंदी


 बैराठ
 जयपुर





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