आपका स्वागत है, डार्क मोड में पढ़ने के लिए ऊपर क्लिक करें अपडेट के लिए टेलीग्राम चैनल DevEduNotes से जुड़ेें

गिलगिट-बाल्टिस्तान विवाद क्या है ?



गिलगिट-बाल्टिस्तान विवाद क्या है ?

चर्चा में क्यों

हाल ही मई 2020 में पाक सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के प्रशासनिक आदेश में संशोधन की अनुमति देते हुए इमरान सरकार को गिलगिट-बाल्टिस्तान में आम चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की मंजूरी प्रदान की है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नई सरकार के गठन तक इमरान सरकार वहाँ अस्थायी सरकार का गठन भी कर सकती है।

गिलगिट-बाल्टिस्तान इलाके में चुनाव कराने के पाक सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर 4 मई को भारत ने बेहद सख्त आपत्ति जताते हुए पाकिस्तान सरकार को डेमार्श जारी किया।
सामान्य भाषा में कहें तो भारत ने पाक से अपनी गहरी नाराजगी जाहिर की है। दो टूक कहा है कि गिलगिट-बाल्टिस्तान क्षेत्र भारत का वैध और अभिन्न हिस्सा है। पाक की न्यायिक व्यवस्था को उसको लेकर फैसले का
अधिकार नहीं है।
पाक को यह इलाका खाली करने के लिए भी कहा गया है। साथ ही पाकिस्तानी उच्चायुक्त को तलब किया गया।

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के प्रादेशिक मौसम विज्ञान केंद्र ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के क्षेत्रों को भी मौसम पूर्वानुमान में शामिल कर लिया है।
डीडी न्यूज़ पर गिलगिट-बाल्टिस्तान और मुजफ्फराबाद का मौसम पूर्वानुमान जारी किया जा रहा है।

पाकिस्तान द्वारा कब्जा किए गए भारत के क्षेत्रों को दो भागों में बांटा जाता है -
1. पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके)
2. गिलगिट-बाल्टिस्तान

वर्तमान में गिलगिट-बाल्टिस्तान लद्दाख का क्षेत्र जबकि पीओके जम्मू-कश्मीर का क्षेत्र है।


गिलगिट-बाल्टिस्तान परिचय

क्षेत्रफल - 72,871 वर्ग किलोमीटर
जनसंख्या - लगभग 18 लाख

धर्म - मुस्लिम (शिया, सुन्नी, इस्माइली, नूरबख्शी)

क्षेत्र 3 संभागों में बांटा गया है - बाल्टिस्तान, दायमर, गिलगिट। इन संभागों में क्रमशः 5, 4, 5 जिलें शामिल किए जाते हैं।
गिलगिट और स्कार्दू (Skardu) यहां के प्रमुख प्रशासनिक केंद्र हैं।

भाषा - दार्दिक, बाल्टी, बुरूशास्की, खोवर, वाखी।
पहले क्षेत्र को दार्दिस्तान भी कहा जाता था।

भौगोलिक रूप से यह पाकिस्तान, अफगानिस्तान और चीन से घिरा हुआ क्षेत्र है।

गिलगित-बाल्टिस्तान ऐतिहासिक आयाम

गिलगित-बाल्टिस्तान 19 वीं शताब्दी में जम्मू के डोगरा शासकों द्वारा जीता गया था, उन्हें अंग्रेजों से कश्मीर मिला और वे कश्मीर के शासक बने जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान और अन्य छोटी रियासतें शामिल थीं।

यह ब्रिटेन और रूस की शाही सेनाओं के बीच 'ग्रेट गेम'का दौर था, ब्रिटेन रूस को दूर रखना चाहता था इसलिए इस क्षेत्र को बफ़र के रूप में इस्तेमाल करना चाहता था।

इस क्षेत्र के प्रशासन को संयुक्त रूप से जम्मू-कश्मीर के महाराजा और ब्रिटिश शासकों ने गिलगित एजेंसी नाम से किया था।
सुरक्षा के लिए 'कश्मीर इंपीरियल सर्विस ट्रूप्स की स्थापना 1889 में हुई।

1922, सोवियत संघ का गठन किया गया था, जिसमें मध्य एशिया का क्षेत्र भी था, ब्रिटिश सरकार भारत में बोल्शेविक क्रांतिकारियों के हस्तक्षेप के प्रति आशंकित थी। इस कारण अंग्रेजों ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा को 26 मार्च 1935 से 60 साल की अवधि के लिए गिलगित एजेंसी को पट्टे पर देने के लिए मजबूर किया।

3 जून 1947 (जिस दिन विभाजन की घोषणा की गई थी) अंग्रेजों ने गिलगित एजेंसी को जम्मू-कश्मीर के महाराजा को सौप दिया था।

1935 में, कश्मीर इंपीरियल सर्विस ट्रूप्स' को 'गिलगित स्काउट्स में बदल दिया गया, जो गिलगित की रक्षा और
आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार था।

विश्वासघात : ऑपरेशन दत्ता खेल

आजादी के समय, गिलगित एजेंसी के गवर्नर ब्रिगेडियर घनसारा सिंह थे।
मेजर विलियम ब्राउन गिलगित स्काउट्स के कमांडेंट थे।
22 अक्टूबर 1947 को, पाकिस्तानी सेना के समर्थन से पश्तून आदिवासियों ने जम्मू-कश्मीर की रियासत पर
हमला किया।
जम्मू कश्मीर के महाराजा ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, भारतीय सेना
27 अक्टूबर 1947 को श्रीनगर पहुंची।
1 नवंबर 1947 को मेजर विलियम ब्राउन के नेतृत्व में कर्नल मिर्जा हसन खान तथा अन्य मुस्लिम सैनिकों के
साथ विद्रोह किया गया और राज्यपाल घनसारा सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया।
2 नवंबर 1947 को, मेजर ब्राउन ने पाकिस्तानी झंडा फहराया और पाकिस्तान के साथ विलय की घोषणा की।
18 नवंबर 1947 को पाकिस्तान ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया।
1 जनवरी 1948 को भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठाया और 1 जनवरी 1949 को युद्ध विराम घोषित कर दिया गया, इसलिए इस क्षेत्र को वापस नहीं लिया जा सका।
यह क्षेत्र पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के अंतर्गत आता था।

मेजर विलियम ब्राउन की पुस्तक - Gilgit Rebellion: The Major Who Mutinied Over Partition of India.

कराची समझौता

28 अप्रैल 1949 को पाकिस्तान, आज़ाद जम्मू और कश्मीर और मुस्लिम कॉन्फ्रेन्स के बीच एक त्रिपक्षीय
समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसने गिलगिट-बाल्टिस्तान,पाकिस्तान को सौंप दिया।
यह समझौता जम्मू और कश्मीर में अप्रैल 1948 के यूएनएससी प्रस्ताव का घोर उल्लंघन था।
इस समझौते में गिलगिट-बाल्टिस्तान का कोई प्रतिनिधि नहीं था।
कराची समझौते की कोई प्रति आज तक उपलब्ध नहीं है।
यहां तक कि तथाकथित कराची समझौते को भी रद्द कर दिया गया जब राष्ट्रपति याह्या खान ने 1970 के
अधिनियम को रद्द कर दिया

पाकिस्तान के नियंत्रण में गिलगिट-बाल्टिस्तान

इस क्षेत्र को 'उत्तरी क्षेत्र' (शुमाली) नाम दिया गया था और 1970 तक पाकिस्तान के कश्मीर मामलों के मंत्रालय
द्वारा सीधे प्रशासित किया जाता था। बाद में उत्तरी क्षेत्र परिषद का गठन किया गया।
2 मार्च 1963 को, पाकिस्तान ने चीन के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए और चीन को 5180 वर्ग किमी
क्षेत्र की शक्सगाम घाटी दी गयी।
अगस्त 2009 में, गिलगिट-बाल्टिस्तान सशक्तिकरण और स्वशासन आदेश 2009, पाकिस्तान द्वारा
पारित किया गया। इस आदेश ने इस क्षेत्र का नाम उत्तरी क्षेत्र से बदल कर गिलगिट-बाल्टिस्तान' कर
दिया और एक विधान सभा और एक सरकार के लिए प्रावधान किया गया।

गिलगिट-बाल्टिस्तान ऑर्डर 2018 - पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने अपने हाथों में स्थानीय स्वायत्त परिषदों की
शक्तियां ले लीं, अदालत में चुनौती दी गई।

हाल ही सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि चुनाव हो सकता है और एक कार्यवाहक सरकार बनाई जा सकती है।

वर्तमान में, गिलगित-बाल्टिस्तान न तो एक प्रांत है और न ही एक राज्य है। इसकी स्थिति अर्ध-प्रांतीय है।

आधिकारिक तौर पर, पाकिस्तान सरकार ने पाकिस्तान के साथ एकीकरण के लिए गिलगित-बाल्टिस्तानी
कॉल को इस आधार पर खारिज कर दिया है कि यह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के अनुसार पूरे कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के दावे को कमजोर करेगा।

गिलगिट-बाल्टिस्तान में समस्याएं

• पाकिस्तान ने इस क्षेत्र पर अवैध कब्जा किया हुआ है। यह क्षेत्र पाकिस्तान के उपनिवेश की तरह कार्य करता है।
• यहां किसी प्रकार का संविधान नहीं है और पाकिस्तान की संसद और न्यायालयों में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं है।
• यह संवैधानिक रूप से पाकिस्तान का भाग नहीं है यद्यपि पाकिस्तान इसे पांचवा प्रांत बनाने के लिए कार्य कर रहा है।
गौरतलब है कि पाकिस्तान के चार प्रांत है - सिंध, पंजाब, बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा।
• यहां के नागरिकों के पास नागरिकता का अभाव है।

• लोकतंत्र का अभाव है तथा बड़ी मात्रा में मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जाता है।
चीन का हस्तक्षेप - चीन यहां आधारभूत ढांचे का निर्माण कर रहा है। जैसे - ट्रांस कराकोरम हाईवे, सीपीईसी परियोजना।
• खनिजों का अतिदोहन।

• 1974 में पाकिस्तान द्वारा स्टेट सब्जेक्ट रूल को समाप्त कर दिया गया जिससे इस क्षेत्र में सुन्नियों की संख्या बढ़ी है। परिणाम स्वरूप वहाबी विचारधारा और आतंकवाद को बढ़ावा मिला है।
सांस्कृतिक पहचान - इस क्षेत्र में उर्दू भाषा थोप दी गई है, जिससे स्थानीय भाषाओं को नुकसान हुआ है।

• इस क्षेत्र का नाम स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है।
• विकास गतिविधियों का अभाव है।

सीपीईसी



2015 में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की घोषणा की गई जो कि चीन के शिनजियांग प्रांत की राजधानी काश्गर से शुरू होकर ग्वादर बंदरगाह तक जाता है।
इस गलियारे के माध्यम से काश्गर से ग्वादर बंदरगाह तक मात्र 48 घंटे में पहुंचा जा सकता है। इसलिए चीन गिलगिट-बाल्टिस्तान क्षेत्र पर कब्जा चाहता है।

भारत की प्रतिक्रिया

• भारत ने हमेशा कहा है कि गिलगिट-बाल्टिस्तान और पीओके भारत का अभिन्न अंग हैं।
• भारत में J&K के पूर्ण एकीकरण के लिए भारत ने अस्थायी धारा 370 और 35A को हटा दिया।
• गृह मंत्री ने संसद में कहा कि जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, गिलगिट-बाल्टिस्तान और
अक्साई चिन शामिल हैं।
• पाकिस्तानी प्रशासन या सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किए गए किसी भी प्रकार के आदेश का भारतीय सरकार ने
विरोध किया हैं, जो पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जे में लिए गए क्षेत्र की स्थिति में कोई भी परिवर्तन
लाता है।
• भारत ने CPEC का विरोध किया और चीन की BRI परियोजना में शामिल नहीं हुआ क्योंकि इस क्षेत्र में
चीनी गतिविधियाँ भारत की संप्रभुता के लिए एक सीधी चुनौती है।

आगे की राह

• राजनीतिक और लोकतांत्रिक समर्थन देने की जरूरत है।
• भारत को इस क्षेत्र पर दृढ़ता से दावा करना चाहिए।
• विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठाया जाना चाहिए।

• हमें गिलगिट-बाल्टिस्तान के लोगों का समर्थन करना चाहिए और उनके अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि वे 'भारतीय नागरिक हैं।
• छात्रों को छात्रवृत्ति दी जानी चाहिए।

• जम्मू-कश्मीर विधानसभा और संसद में उन्हें सीटें देनी चाहिए।
• चीन की गतिविधियों का विरोध किया जाना चाहिए, यहां तक कि 'वन चाइना पॉलिसी का इस्तेमाल भी किया जा
सकता है।
• शिया उत्पीड़न के विरुध ईरान के साथ सहयोग किया जाना चाहिए।

SAVE WATER 

Post a Comment

0 Comments