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अध्याय- 16 निजी और सार्वजनिक जीवन में नीतिशास्त्र

नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC


निजी और सार्वजनिक जीवन में नीतिशास्त्र

निजी और सार्वजनिक जीवन में अंतर:-

(1)  निजी जीवन का प्रभाव सीमित लोगों तक ही होता है जबकि सार्वजनिक जीवन का प्रभाव व्यापक लोगों तक होता है।

(2)  निजी संबंधों में घनिष्ठता अधिक होती है जबकि सार्वजनिक संबंधों में घनिष्ठता कम और औपचारिकता अधिक होती है।

(3) निजी संबंध आपसी स्नेह और विश्वास पर आधारित होते हैं जबकि सार्वजनिक संबंध कानूनों और नियमों पर आधारित होते हैं ।

(4)  निजी संबंध आत्मनिष्ठ होते हैं जबकि सार्वजनिक संबंध वस्तुनिष्ठ होते हैं ।

(5) निजी संबंध नैतिक रूप से बाध्यकारी होते हैं जबकि सार्वजनिक संबंध कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं।

(6) निजी जीवन में कर्तव्य के उल्लंघन पर आलोचना होती है जबकि सार्वजनिक जीवन के कर्तव्यों के उल्लंघन पर कानूनी कार्यवाही  व अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है।

(7) निजी जीवन में प्रेम, त्याग, आपसी विश्वास आदि महत्वपूर्ण होते हैं जबकि सार्वजनिक जीवन में न्याय,धर्मनिरपेक्षता, समानता, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, जनसेवा आदि महत्वपूर्ण होते हैं।

 निजी जीवन
 सार्वजनिक जीवन
 प्रभाव सीमित लोगों तक
 सार्वजनिक जीवन का प्रभाव व्यापक लोगों तक
 घनिष्ठता अधिक
 घनिष्ठता कम और औपचारिकता अधिक
 आपसी स्नेह और विश्वास पर आधारित
 कानूनों और नियमों पर आधारित
 आत्मनिष्ठ
 वस्तुनिष्ठ होते हैं।
 नैतिक रूप से बाध्यकारी
 कानूनी रूप से बाध्यकारी
 उल्लंघन पर आलोचना
 कानूनी कार्यवाही  व अनुशासनात्मक कार्यवाही
 प्रेम, त्याग, आपसी विश्वास आदि महत्वपूर्ण
 न्याय,धर्मनिरपेक्षता, समानता, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा


 कोई भी संबंध पूर्ण रूप से निजी या सार्वजनिक नहीं होता है। निजी और सार्वजनिक संबंध एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। यदि निजी संबंध स्वस्थ है। तब सार्वजनिक जीवन के उत्तरदायित्व का निर्वहन दक्षता और प्रभावशीलता से किया जा सकता है। अन्यथा निजी जीवन का तनाव सार्वजनिक  जीवन में भी परिलक्षित होता है।

यदि व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में सफल होता है तब निजी जीवन के भी स्वस्थ रहने की संभावना अधिक है।

यदि व्यक्ति निजी जीवन में नैतिक है तब सार्वजनिक जीवन में भी नैतिकता परिलक्षित होगी अन्यथा सार्वजनिक जीवन अनैतिक और भ्रष्ट हो सकता है।

 यदि सार्वजनिक और निजी जीवन के उत्तरदायित्वों के बीच कोई टकराव हो तब यह देखा जाना चाहिए कि वह व्यक्ति सार्वजनिक पद पर है या नहीं यदि व्यक्ति सार्वजनिक पद पर आसीन है। तब सार्वजनिक उत्तरदायित्व को महत्व दिया जाना चाहिए। अन्यथा निजी जीवन को महत्व दिया जाना चाहिए

निजी और सार्वजनिक जीवन में संतुलन आवश्यक है। कुछ लोग सार्वजनिक पद पर आसीन नहीं है फिर भी वे सार्वजनिक उत्तरदायित्व को अधिक महत्व देते हैं। ऐसे लोगों की नैतिकता का स्तर उच्च होता है।

नारीवादी नीतिशास्त्रियों के अनुसार निजी और सार्वजनिक जीवन में भेद नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि अधिकतर शोषणकारी गतिविधियां निजी जीवन में ही होती है इसलिए निजी जीवन में सरकारी हस्तक्षेप को आवश्यक माना गया है।

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