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अध्याय- 12 नीतिशास्त्र : नव्य वेदांती विचारक

नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC


नव्य  वेदांती विचारक

महात्मा गांधी एक नव्य वेदांती विचारक है।
                       
 अन्य नव्य वेदांती विचारक
1. स्वामी विवेकानंद
 2. रविंद्र नाथ टैगोर
 3. महर्षि अरविंद

स्वामी विवेकानंद :-  

यह एक नव्य  वेदांती विचारक है।

इनके विचारों पर वेदांत के दर्शन, ब्रह्म समाज की शिक्षाएं, रामकृष्ण परमहंस, भगवद्गीता गीता आदि का प्रभाव रहा ।

इन्होंने ब्रह्मा को जगत का परम तत्व माना है जो कि पूर्ण रूप से आध्यात्मिक है। परंतु इन्होंने भौतिकतावाद को नकारा नहीं है। भौतिक विकास से ही आध्यात्मिक विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है।

इनके अनुसार प्रत्येक समाज में उसकी आवश्यकताओं के अनुसार कुछ मूल्यों का निर्माण होता है जिसका एक अपना महत्व है। जैसे पश्चिमी समाज में भौतिकतावाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के मूल्य विकसित हुए वहीं भारतीय समाज में आध्यात्मिकता का मूल्य विकसित हुआ दोनों समाजों को एक-दूसरे से सीखना चाहिए अर्थात् इनके विचारों में भौतिकतावाद और आध्यात्मिकतावाद का समावेशन है। इसलिए इन्होंने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विकास को सर्वाधिक महत्व दिया ।

इनके अनुसार सभी प्रकार की कमजोरियों को त्याग दिया जाना चाहिए।

गरीबी में कभी भी आध्यात्मिक विकास नहीं हो सकता। राजनीतिक रूप से गुलामी भी आध्यात्मिक विकास के लिए एक बाधा है इसलिए स्वतंत्रता प्राप्त की जानी चाहिए।

इन्होंने शारीरिक रूप से सशक्त होने पर बल दिया। यदि शरीर सशक्त होगा व्यक्ति तभी आध्यात्मिक संदेश को समझ सकता है इसीलिए भगवद्गीता को पढ़ने से पहले फुटबॉल खेलने की सलाह दी।

समाज में फैले भेदभाव और शोषण का इन्होंने विरोध किया। साथ ही कर्मकांड, धार्मिक कुरुतियों और अंधविश्वासों का भी विरोध किया।

इनके अनुसार  हिंदू धर्म सिर्फ रसोईघर तक सीमित हो गया है।

इन्होंने धार्मिक सहिष्णुता पर बल दिया सभी धर्म ईश्वर तक पहुंचने के अलग-अलग मार्ग है। इसीलिए एक सार्वभौमिक धर्म की संकल्पना की गई जो कि विभिन्न धर्मों का समावेशन है।

इनके अनुसार जन सेवा ही वास्तविक धर्म है। इन्होंने युवाओं को आत्मजागरूकता,आत्मनिर्भरता, आत्मकल्याण, आत्मनियमन और आत्म नियंत्रण की शिक्षाएं दी।

रवींद्र नाथ टैगोर :- 

ये एक नव्य  वेदांती विचारक है। इन्होंने अपने दार्शनिक विचारों के लिए कोई स्वतंत्र पुस्तक नहीं लिखी हमें इनके दार्शनिक विचारों का ज्ञान इनके उपन्यासों, कविताओं कहानियों आदि से होता है ।

रवींद्र नाथ टैगोर के प्रमुख विचार है:-

(A) रहस्यवाद - इन्होंने प्राकृतिक घटनाओं को रहस्यमयी तरीके से व्यक्त किया है जो कि अलग-अलग व्यक्तियों पर अलग-अलग प्रकार का प्रभाव डालती है। प्राकृतिक घटनाओं को ईश्वर या व्यक्ति के रूप में व्यक्त किया गया। मानवीय चरित्र के भी विभिन्न आयामों को प्रदर्शित किया है जिससे मानवीय जीवन रहस्यमयी प्रतीत होता है।

(B) आध्यात्मिक मानववाद - इन्होंने मनुष्य को सर्वाधिक महत्व प्रदान किया। मनुष्य में ही सर्वोच्च सत्ता है और यह आध्यात्मिक है। इस आध्यात्मिक पक्ष को जानने के लिए मनुष्य को दूसरे मनुष्यों के प्रति सद्भाव रखना चाहिए। मनुष्य को ईश्वर के समतुल्य माना गया है।
रवींद्र नाथ टैगोर ने मानव के साथ साथ प्रकृति को भी महत्व दिया है। मानव और प्रकृति के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों को व्यक्त किया गया है।

(C) शिक्षा संबंधी विचार - इन्होंने औपचारिक शिक्षा का विरोध किया क्योंकि औपचारिक शिक्षा मनुष्य की रचनात्मकता व स्वतंत्रता को समाप्त करती है । यह एक प्रकार का बोझ बन जाती है। इसलिए शिक्षा पद्धतियों में बदलाव की आवश्यकता है। शिक्षा पूर्ण रुप से स्वतंत्र होनी चाहिए अर्थात् व्यक्ति कुछ भी समझ और जान सके। शिक्षा प्रकृति और जीवन के साथ सामंजस्य पूर्ण होनी चाहिए। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति की रचनात्मक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
इन्होंने शांति निकेतन की स्थापना की।

 (D) भेदभाव रहित समाज -  इन्होंने सभी मनुष्यों को एक समान माना है इसलिए एक समतामूलक समाज का निर्माण किया जाना चाहिए। जो की जाति, धर्म, लिंग,  भाषा, रंग आधारित भेदभाव से मुक्त हो।

(E) अंतरराष्ट्रीय -  इनके अनुसार सभी मनुष्य एक समान है इसलिए उन्हें राष्ट्र की सीमाओं में बांधा नहीं जाना चाहिए। यह मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित करता है। इसलिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीयवाद का समर्थन किया अंतरराष्ट्रीय संबंधों में वसुधैव कुटुंबकम् को अपनाया जाना चाहिए।

महर्षि अरविंद :- 

ये एक नव्य  वेदांती विचारक है। इन्होंने आध्यात्मिकतावाद और भौतिकतावाद का समन्वय किया।

इनके अनुसार जगत का परम तत्व सच्चिदानंद (सत्+चित् + आनंद ) है जो कि जगत में विभिन्न प्रकार से अभिव्यक्त होता है।

 विकास की प्रक्रिया निरंतर चल रही है। अब तक यह मानस के स्तर तक पहुंच चुकी है। इसकी अगली अवस्था अतिमानस की होगी ।अतिमानस के माध्यम से व्यक्ति सच्चिदानंद को प्राप्त कर लेगा। इसी को मोक्ष कहा गया है परंतु इन्होंने व्यक्तिगत मोक्ष की बजाय सामूहिक मोक्ष पर अधिक बल दिया है। इसके लिए एकात्म योग का प्रयोग किया जाना चाहिए।
सामूहिक मोक्ष की प्राप्ति पर धरती पर दिव्य जीवन अवतरित होगा।

मुख्य पुस्तकें :- ( A) The life divine
                       (B) Synthesis of yoga

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