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अध्याय- 15 नैतिक सम्प्रत्यय

 नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC



नैतिक सम्प्रत्यय

 वे मापदंड जिनका प्रयोग नैतिक मूल्यांकन के लिए किया जाता है नैतिक संप्रत्यय कहलाते हैं। जैसे- ऋत, ऋण, कर्तव्य, शुभ और सद्गुण।

(1) ऋत:- यह एक वैदिक अवधारणा है जिसके माध्यम से जगत की भौतिक, नैतिक और कर्मकांडीय व्यवस्था को नियमित किया जाता है।

प्रारंभ में इसका प्रयोग भौतिक व्यवस्था के लिए किया गया परंतु बाद में नैतिक और कर्मकांडीय व्यवस्था को शामिल किया गया।

जगत की प्राकृतिक घटनाएं ऋत के कारण ही होती है, जैसे नक्षत्रों का परिक्रमण, दिन का बनना, ऋतु का परिवर्तन, भूख लगने पर भोजन की उपलब्धता, प्यास लगने पर पानी की उपलब्धता, सांस लेने के लिए वायु की उपलब्धता।

 जगत में नैतिक व्यवस्था ऋत पर आधारित है जैसे समाज में सभी के कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं। जिससे कि सामाजिक सौहार्द और व्यवस्था बनी रहे।

 कर्म का सिद्धांत ऋत पर आधारित है। यज्ञ आदि का फल भी ऋत के कारण ही मिलता है।

 इसका उल्लंघन करना संभव नहीं है। ऋत का रक्षक वरुण को बताया गया है और इसके लिए ऋतस्य गोपा शब्द का प्रयोग किया गया।

ईश्वर से प्रार्थना की जाती कि वह हमें ऋत के मार्ग पर रखे ।

धर्म की संकल्पना ऋत पर ही आधारित है।

प्रशासन में भी ऋत की अवधारणा प्रासंगिक है क्योंकि प्रशासकीय व्यवस्था संवैधानिक मूल्यों,  कानूनों,  नियमों, विनियमों आदि से नियमित होती है इस व्यवस्था का उल्लंघन करना संभव नहीं है। उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान है।
सिविल सेवक के निजी और सार्वजनिक जीवन को नियमित करने के लिए आचार संहिता का निर्माण किया गया।

(2) ऋण:- यह एक वैदिक अवधारणा है जिसके अनुसार व्यक्ति अपने भौतिक और सामाजिक जीवन के लिए माता-पिता, पूर्वजों और देवताओं का ऋणी है।

 जन्म से ही तीन प्रकार के ऋण होते हैं:-

(1) पितृ ऋण:- यह ऋण माता-पिता और पूर्वजों के प्रति होता है जिनके कारण व्यक्ति का अस्तित्व में आया है। माता पिता की सेवा, संतानोत्पत्ति, पूर्वजों का श्राद्ध आदि के माध्यम से यह ऋण चुकाया जा सकता है।

(2) गुरु ऋण:- यह ऋण गुरुजनों के प्रति होता है जिनके माध्यम से जीवन जीने के लिए ज्ञान प्राप्त होता है। वेद, उपनिषद्, भगवद्गीता आदि के अध्ययन और अध्यापन से यह ऋण चुकाया जा सकता है ।

(3) देव ऋण:- यह ऋण देवताओं के प्रति होता है जिनके कारण जगत की व्यवस्था चलती है। मंत्रोच्चारण, उपासना, यज्ञ आदि के आयोजन से यह ऋण चुकाया जा सकता है।

यदि इन तीनों को चुकाया नहीं जाता है तब व्यक्ति को तीन प्रकार के दुख भोगने पड़ते हैं:-

(A) आध्यात्मिक दुख:-  ये दुख स्वयं के शरीर और मन के कारण उत्पन्न होता है। जैसे बीमार होना ।
(B) अधि भौतिक दुख:- ये दुख दूसरों के द्वारा दिए जाते हैं। जैसे सांप के काटने से उत्पन्न दुख।
(C) अधि दैविक दुख:- ये दुख देवी-देवताओं के कारण होते हैं। जैसे बाढ़,  सूखा आदि।

 प्रशासन में  भी यह अवधारणा प्रासंगिक है। एक सिविल सेवक को स्वयं को समाज के प्रति ऋणी समझना चाहिए क्योंकि हमारे भौतिक और सामाजिक जीवन में समाज का अत्यधिक योगदान है। सिविल सेवा के माध्यम से समाज के इस ऋण को चुका सकते हैं और इसी से जन कल्याण सुनिश्चित होगा।

(3) कर्त्तव्य:-  संकीर्ण रूप से कर्तव्य का अर्थ है - कानूनी उत्तरदायित्व परंतु व्यापक अर्थों में कर्तव्य में वे सभी कर्म शामिल है जो कि नैतिक रूप से किए जाने चाहिए चाहे वह कानूनी रूप से बाध्यकारी हो या नहीं या ऐच्छिक  हो या अनैच्छिक ।

परिणामनिरपेक्षवादी नीतिशास्त्रियों ने कर्तव्य पालन पर सर्वाधिक बल दिया है। जैसे कांट के अनुसार वे कार्य नैतिक है जो कि कर्तव्य चेतना से किए गए हो।
भगवद्गीता के अनुसार स्वधर्म का पालन कर्तव्य है।
अंतःप्रज्ञावादियों के अनुसार अंतरात्मा के अनुसार कार्य करना कर्तव्य है।
भारतीय परंपरा में चार पुरुषार्थ को प्राप्त करना कर्तव्य है।

सिविल सेवकों के लिए जनसेवा कर्तव्य है।

कर्तव्यों का वर्गीकरण चार प्रकार से किया जा सकता है:- 

(A) सकारात्मक कर्त्तव्य और नकारात्मक कर्त्तव्य:- 
सकारात्मक कर्तव्य- वे  कार्य जो किए जाने चाहिए।
नकारात्मक कर्तव्य - वे कार्य जो नहीं किए जाने चाहिए।

(B) पूर्ण और अपूर्ण कर्तव्य:-  
पूर्ण कर्तव्य वे कर्तव्य हैं जिनमें किसी भी प्रकार का अपवाद  स्वीकार नहीं किया जा सकता है और कर्तव्यों के अनुपात में अधिकार भी प्रदान किए जाते हैं।
अपूर्ण कर्तव्य वे कर्तव्य हैं जिनमें अपवाद को स्वीकार किया जाता है और  कर्तव्य के अनुपात में अधिकार प्रदान नहीं है।

(C) आत्मनिष्ठ और वस्तुनिष्ठ कर्तव्य:-
आत्मनिष्ठ कर्तव्य वे कर्तव्य हैं जिनकी व्याख्या व्यक्ति के द्वारा की जाती है।
वस्तुनिष्ठ कर्तव्य वे कर्तव्य हैं,  जिनकी व्याख्या व्यक्ति द्वारा नहीं की जा सकती सभी लोगों के लिए ये कर्तव्य एक समान होते हैं।

(D) कानूनी और नैतिक कर्तव्य:-
कानूनी कर्तव्य, कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं इन के उल्लंघन पर दंड का प्रावधान होता है।
नैतिक कर्तव्य नैतिक रूप से बाध्यकारी होते हैं इन के उल्लंघन पर सामाजिक निंदा हो सकती है।

 व्यक्ति के कर्तव्य:-

 व्यक्ति के कर्तव्यों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:-

(1)  स्वयं के प्रति कर्तव्य, जैसे -
(A) शारीरिक कर्तव्य (शरीर को स्वस्थ रखना )
(B) बौद्धिक कर्तव्य (ज्ञान अर्जित करना और तार्किकता विकसित करना)
(C) आर्थिक कर्तव्य ( स्वयं की आजीविका के लिए धन अर्जित करना)
(D) नैतिक कर्तव्य (स्वयं की इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित करना)

(2)  दूसरों के प्रति कर्तव्य:-
(A) परिवार के प्रति कर्तव्य
(B) समाज के प्रति कर्तव्य
(C)  देश के प्रति कर्तव्य
(D) प्रकृति के प्रति कर्तव्य

(3) ईश्वर के प्रति कर्तव्य:- इसमें धार्मिक कर्तव्य को शामिल किया गया है। आध्यात्मिकता को विकसित किया जाना चाहिए।

कर्तव्य में टकराव (विरोधाभास) की स्थिति हो तो निम्नलिखित क्रम को अपनाया जाना चाहिए:-
                  प्राकृतिक न्याय
                         ⬇
                संवैधानिक मूल्य और प्रावधान
                         ⬇
                        कानून
                         ⬇
               विभागीय नियम और विनियम
                         ⬇
                      अंतरात्मा

अधिकार और कर्तव्यों में संबंध:-

साम्यवादी विचारकों ने कर्तव्य पर अधिक बल दिया है। भारतीय संविधान में मूल कर्तव्य सोवियत संघ से लिए गए हैं। पूंजीवादी विचारकों ने अधिकारों पर बल दिया है। भारतीय संविधान में मूल अधिकार यूएसए से लिए गए हैं।
अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन आवश्यक है। अधिकार विहीन कर्तव्य तथा कर्तव्य विहीन अधिकार अव्यवस्था को ही उत्पन्न करते हैं।
महात्मा गांधी ने अधिकार और कर्तव्य के बीच भेद को स्वीकार नहीं किया है। यह दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि सभी व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं तब अन्य सभी के अधिकारों की रक्षा स्वतः ही हो जाएगी।

(4) शुभ  (Good):-
 वांछनीय गुणों को शुभ कहा जाता है इसके माध्यम से व्यक्ति की इच्छाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। इसी से व्यक्ति के चरित्र का मूल्यांकन किया जा सकता है।

शुभ का प्रयोग संज्ञा और विशेषण दोनों के ही रूप में किया जा सकता है।

शुभ अनेक है। इनको दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है :-

(A) सापेक्ष शुभ :-  यहाँ शुभ का प्रयोग साधन के रूप में किया जाता है। यह अधीनस्थ शुभ है जिसके माध्यम  उच्चतम सुख की प्राप्ति की जा सकती है। जैसे- व्यायाम करना एक  शुभ है जिसके माध्यम से स्वस्थ शरीर को प्राप्त किया जा सकता है। अच्छे स्वास्थ्य से कर्तव्यों का निर्वहन किया जा सकता है।

(B) निरपेक्ष शुभ:-  यहां शुभ को साध्य  दें के रूप में लिया गया है। यह परम शुभ है जीवन की सभी गतिविधियां इस सुख की प्राप्ति के लिए ही की जाती है। अलग-अलग विचारकों ने इसकी व्याख्या अलग-2 तरीके से की है। जैसे -सुखवादियों के लिए सुख परम शुभ है। उपयोगितावादियों के लिए अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख शुभ है। कांट के लिए कर्तव्य पालन परम शुभ है। बौद्ध धर्म में निर्वाण, जैन धर्म में कैवल्य  और भारतीय परंपरा में मोक्ष परम शुभ है। महात्मा गांधी के लिए सत्य परम शुभ है।

 विचारक
 परम शुभ
 सुखवादी 
 सुख
 उपयोगितावादी 
 अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख
 कांट
 कर्तव्य पालन
 बौद्ध धर्म
 निर्वाण
 जैन धर्म
 कैवल्य
 भारतीय परंपरा
 मोक्ष 
 महात्मा गांधी
 सत्य

(5) सद्गुण:- श्रेष्ठ गुणों को सद्गुण कहा जाता है। इन्हें मानवीय जीवन की उत्कृष्टता के रूप में वर्णित किया गया सद्गुण जन्मजात नहीं होते हैं।
यह जन्मजात परिवर्तन जैसे भूख, प्यास, निद्रा, भय आदि से भिन्न होते हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य को विशेष प्रयास करने पड़ते हैं।

सद्गुणों से युक्त व्यक्ति का व्यवहार नैतिक होता है अर्थात सद्गुण व्यवहार में ही परिलक्षित होते हैं।

ग्रीक विचारकों ने सद्गुणों पर विशेष बल दिया।

मानव कल्याण के लिए सद्गुणी जीवन आवश्यक है।

विभिन्न विचारकों ने सद्गुणों के प्रति विभिन्न मत प्रकट किए हैं। जैसे - सुकरात के अनुसार सद्गुण एक है और वह ज्ञान है। प्लेटो के अनुसार सद्गुण चार है विवेक, साहस, संयम और न्याय। इनमें से न्याय सबसे महत्वपूर्ण है।
            प्लेटो ने सद्गुणों को जन्मजात माना है। अरस्तू के अनुसार सद्गुण अनेक है। यह जन्मजात नहीं होते हैं। सद्गुणों को अर्जित किया जाता है। मध्यम मार्ग सबसे महत्वपूर्ण सद्गुण है।

 सद्गुणों को दो अर्थों में लिया जाता है :-
   (A) सद्गुणों को चरित्र के भाग के रूप में देखना
   (B) सद्गुणों को व्यवहार में देखना

सद्गुणों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:-
a. स्वयं के प्रति सद्गुण जैसे- विवेक, साहस, संयम
b. दूसरों के प्रति सद्गुण जैसे - क्षमा, दया आदि
c. आदर्श के रूप में सद्गुण जैसे- सत्य, अहिंसा, स्वतंत्रता, समानता।

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