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कालापानी-लिपुलेख विवाद ।। भारत-नेपाल संबंध



कालापानी-लिपुलेख विवाद

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नवंबर 2019 में कालापानी को लेकर नेपाल में भारतीय नक्शे का विरोध किया।

चर्चा में क्यों

हाल ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 8 मई 2020 को सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में निर्मित धारचूला-लिपुलेख सड़क मार्ग का उद्घाटन किया है।
यह सड़क कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग को 17,060 फीट की ऊंचाई पर स्थित लिपुलेख दर्रे से जोड़ती है।
• इस सड़क से सीमावर्ती गांव पहली बार सड़क मार्ग से जुड़ेंगे। (कोविड-19 के मद्देनजर महत्वपूर्ण)
• इस सड़क मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा, चीन के बॉर्डर तक पहुंच और भारत-चीन व्यापार की राह आसान होगी। अर्थात यह तीर्थ यात्रियों, भारतीय रक्षा बलों एवं व्यापारियों के लिए महत्वपूर्ण है।
• यह सड़क पिथौरागढ़-तवाघाट-घाटियाबागड़ (घटटाबगड़) सड़क का विस्तार है।
• यह 80 किलोमीटर लंबी तथा 6000 फीट से 17,060 फीट की ऊंचाई तक स्थित है।
• इस सड़क के बनने के बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए तीन मार्ग है -
1. नाथूला (सिक्किम) से मानसरोवर
2. गंगटोक से मानसरोवर
3. लिपुलेख (उत्तराखंड) से मानसरोवर - सबसे अच्छा।

सुगौली की संधि - 1816

1814 में अंग्रेजों ने नेपाल पर आक्रमण किया।
युद्ध में नेपाल की हार हुई।
अंग्रेजों ने नेपाल के साथ सुगौली (बिहार के चंपारण में गांव) की संधि की। (1816 में)
संधि के अनुच्छेद 5 के अनुसार - काली नदी को भारत और नेपाल के बीच सीमा माना गया। काली नदी का पश्चिमी भाग भारत को एवं पूर्वी भाग नेपाल को दिया गया।
काली नदी को महाकाली (मध्य भाग) , सरयू या गोगरा नदी (नचले हिस्से में) भी कहा जाता है।
काली नदी अपने प्रवाह क्षेत्र को बदलती रहती है।
काली नदी का निश्चित उद्गम स्थल ना होने के कारण भारत नेपाल के बीच विवाद रहता है।
भारत लिपुलेख को पिथौरागढ़ जिले का तथा नेपाल धारचूला का हिस्सा बताता है।

नेपाल में दो समूह है -

1. नेपाल का कुलीन समुदाय: - वे इस विचार के हैं कि नदी जो कालापानी के पश्चिम में बहती है, मुख्य नदी काली (कुटीयांग्टी नदी) है, जो कि लिम्पियाधुरा या पास के लिपुलेख दर्रे से निकलती है, जो कि दोनों ही नेपाली क्षेत्र के भीतर हैं। इस प्रकार यह क्षेत्र नेपाल का एक अंतर्निहित हिस्सा है। (ये लिम्पियाधुरा को काली नदी का उद्गम स्थल मानते हैं और संपूर्ण क्षेत्र पर नेपाल का दावा करते हैं।)



2. नेपाल-भारत तकनीकी स्तर का संयुक्त सीमा कार्य समूहः- इनका तर्क है कि काली नदी की उत्पत्ति पंखागड नामक एक छोटे से नाले से हुई है, जो कालापानी के दक्षिणी भाग में स्थित है और इस क्षेत्र के पूर्वी भाग पर स्थित रिज वास्तविक सीमा है, और इसलिए यह भारत का हिस्सा है।

हाल ही 18 मई 2020 को नेपाली कैबिनेट ने एक नए राजनीतिक नक्शे को मंजूरी दी है जिसमें कालापानी, लिपुलेख एवं लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताया गया है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

•1911 का अल्मोड़ा गजेटियर भारत की स्थिति का पक्षधर है, जो 1817 में ब्रिटिश स्टैंड के साथ तालमेल के साथ है।

•भारत और नेपाल ने 1950 के बाद के औपनिवेशिक युग में प्राचीन संबंधों को औपचारिक बनाने के लिए एक मित्रता संधि पर हस्ताक्षर किए। पर नेपाल ने इस मुद्दे को नहीं उठाया।
•1954 में, भारत और चीन ने एक व्यापार संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसमें लिपुलेख पास को भारतीय प्रवेश द्वार माना गया।

• 1961 में नेपाल और चीन ने एक संधि पर हस्ताक्षर किए जिसमें टिंकर पास को नेपाली बिंदु के रूप में मान्यता दी गई। नेपाल-चीन सीमा स्तंभ नंबर -1 अभी भी वहीं खड़ा है।
•1962 में, भारत ने अधिक चीनी घुसपैठ के डर से लिपुलेख दर्रा बंद कर दिया। नेपाल को इसके बंद करने पर कोई आपत्ति नहीं हुई।
• 1962 के युद्ध के दौरान भारतीय सेनाओं ने कालापानी क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। इस क्षेत्र में ITBP की एक चेकपोस्ट है।

• 1990 के दशक में नेपाल में माओवादी विद्रोह ने भी कालापानी विवाद को जन्म दिया।
• 1996 में, भारत और नेपाल ने महाकाली नदी के लिए जल साझाकरण समझौते पर हस्ताक्षर किए।
• भारत और नेपाल ने 1998 में एक और समझौते पर हस्ताक्षर किए जब उन्होंने द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से कालापानी विवाद सहित सभी सीमा विवादों को निपटाने का निर्णय लिया।

भारत के लिए कालापानी का महत्व

• संप्रभुता के लिए
• क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
• भारत की नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी को बनाए रखने हेतु। जिसके तहत पड़ोसी देशों के साथ किसी भी तरह के विवाद नहीं होने चाहिए
• सामरिक महत्व - ऊंचाई पर स्थित क्षेत्र है जिससे नेपाल एवं चीन दोनों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है।
तिब्बत के पास होने के कारण भी यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है ताकि चीन पर दबाव बनाया जा सके।

नेपाल में कम्युनिस्ट सरकार है, जिसका झुकाव चीन की ओर है। हाल ही में चीन का नेपाल में प्रभाव बढ़ा है। इस कारण नेपाल की भारत विरोधी गतिविधियां बढ़ी है।

हाल ही 20 मई 2020 को नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कहा है कि भारत से आने वाला कोरोना वायरस संक्रमण चीन और इटली से आने वाले संक्रमण से अधिक घातक है। यह बयान दर्शाता है कि वर्तमान में नेपाल, चीन के एजेंट की तरह कार्य कर रहा है।

इस विवाद को सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच सार्थक वार्ता होनी चाहिए। साथ ही भारत के द्वारा नेपाल में किए जा रहे सकारात्मक कार्यों का उचित प्रचार किया जाना चाहिए।

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