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भारत-चीन सीमा विवाद



भारत-चीन सीमा विवाद

हाल ही भारत और चीन के सैनिकों के बीच मामूली झड़प हुई है -
5 मई 2020 - पूर्वी लद्दाख में पेंगौंग त्सो झील के पास
9 मई 2020 - उत्तरी सिक्किम के नाकूला क्षेत्र में

अक्साई चिन की गलवान नदी घाटी में दोनों देशों ने अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी है।

भारत-चीन सीमा विवाद :-


भारत चीन के मध्य 3488 किलोमीटर की सीमा है ,इस सीमा को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है -
1. पश्चिमी भाग
2. मध्य भाग
3. पूर्वी भाग

1. पश्चिमी भाग :-


इस क्षेत्र में मुख्य विवाद अक्साई चीन के आधिपत्य को लेकर है।
भारत का दावा जॉनसन रेखा से है यह रेखा 1865 ई. में ब्रिटिश सर्वेक्षक डब्ल्यू एच जॉनसन द्वारा खींची गई थी।
 इसका आधार लद्दाख रियासत के राजस्व खाते हैं चीन इस रेखा को वैद्य नहीं मानता है क्योंकि चीन को इसके निर्माण के बारे में सूचना नहीं दी गई थी।
एक अन्य रेखा मैकडॉनल्ड रेखा है, जो अक्साई चीन को दो भागों में विभाजित करती है।
1962 ई. के युद्ध में चीन ने अक्साई चीन पर अधिकार कर लिया था।
चीन का वर्तमान आधिपत्य वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से प्रदर्शित किया जाता है।
यह रेखा पूर्ण रूप से परिभाषित नहीं है। इसलिए समय-2 पर दोनों देशों के मध्य तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है।

2. मध्य भाग :-

इसमें हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड का लगभग 2000 वर्ग किलोमीटर का पहाड़ी क्षेत्र विवादित है ।
सिक्किम के भारत में विलय को चीन ने शुरुआत में नहीं माना परंतु 2003 तक आते-2 चीन द्वारा सिक्किम को भारत का अभिन्न अंग मान लिया गया।
अभी भी उत्तरी सिक्किम का फिंगर टिप क्षेत्र विवादित है।

3. पूर्वी क्षेत्र :- 
इस क्षेत्र में अरुणाचल प्रदेश को लेकर विवाद है।
चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का भाग मानता है।
इस क्षेत्र में भारत का दावा मेकमेहन रेखा से दिखाया जाता है।
यह रेखा 1914 ईस्वी में शिमला सम्मेलन में खींची गई थी, जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधि हेनरी मेक मेहन थे।
चीन इस रेखा को वैद्य नहीं मानता है तथा लगभग पूरे अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता है।

 चीन के द्वारा निम्न तर्क दिए जाते हैं-

1.यह रेखा साम्राज्यवादियों के द्वारा खींची गई है।
2. शिमला सम्मेलन में अंतिम समझौता भारत व तिब्बत के मध्य किया गया इसमें चीन की सहमति नहीं  ली गई।

भारत के तर्क :-
1. चीन साम्राज्यवादियों के द्वारा बनाई गई अन्य रेखाओं को स्वीकार करता है। जैसे - चीन-म्यांमार
2. 1914 में तिब्बत एक स्वतंत्र व संप्रभु राष्ट्र था इसलिए वह किसी भी प्रकार का समझौता कर सकता था।

पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र पर चीन का दावा बढ़ा है -

अरुणाचल प्रदेश के निवासियों को चीन के द्वारा नत्थी वीजा जारी किया गया।
चीन अरुणाचल प्रदेश में स्थित तवांग मठ पर भी अधिकार करना चाहता है। यह तिब्बती बौद्धों का दूसरा सबसे बड़ा मठ है।
ऐसी संभावना है कि अगला दलाई लामा तवांग मठ से हो सकता है।
ऐसी परिस्थिति में तवांग तिब्बती विद्रोह का केंद्र बन सकता है

पेंगौंग त्सो झील


लद्दाखी भाषा में पैंगोंग का अर्थ है समीपता (Concavity) और तिब्बती भाषा में त्सो का अर्थ है - झील।
पैंगोंग त्सो लद्दाख हिमालय में 14,000 फुट से अधिक की ऊँचाई पर स्थित एक लंबी, संकरी, गहरी, एंडोर्फिक (लैंडलॉक) झील है।
पैंगोंग त्सो का पश्चिमी छोर लेह के दक्षिण-पूर्व में 54 किमी. दूर स्थित है।
135 किमी. लंबी यह झील बुमेरांग (Boomerang) के आकार में 604 वर्ग किमी. में फैली हुई है और अपने सबसे विस्तारित बिंदु पर यह 6 किमी. चौड़ी है।
खारे पानी की यह झील शीत ऋतु में जम जाती है, यह आइस स्केटिंग (Ice Skating) और पोलो के लिये एक उत्तम स्थान है।
इसका जल खारा होने के कारण इसमें मछली या अन्य कोई जलीय जीवन नहीं है।
परंतु यह कई प्रवासी पक्षियों के लिये एक महत्त्वपूर्ण प्रजनन स्थल है।
इस झील का 45 किलोमीटर क्षेत्र भारत में स्थित है, जबकि 90 किलोमीटर क्षेत्र चीन में पड़ता है। वास्तविक नियंत्रण रेखा इस झील के मध्य से गुज़रती है।

नोट:- कहा जाता है कि 19 वीं सदी के महान डोगरा जनरल जोरावर सिंह ने तिब्बत पर आक्रमण करने से पहले अपने सैनिकों और घोड़ों को जमी हुई पेंगौंग झील पर प्रशिक्षित किया था।

झील का रणनीतिक महत्व

LAC रेखा झील के मध्य से होकर गुजरती है, लेकिन भारत और चीन इसकी सटीक स्थिति के विषय में सहमत नहीं हैं।
दोनों सेनाओं के बीच अधिकांश झड़पें झील के विवादित हिस्से में होती हैं।
हालांकि इसके इतर झील का कोई विशेष सामरिक महत्त्व नहीं है।
लेकिन यह झील चुशूल घाटी के मार्ग में आती है, जो एक मुख्य मार्ग है जिसका उपयोग चीन द्वारा भारतीय अधिकृत क्षेत्र में आक्रमण के लिये किया जा सकता है।
वर्ष 1962 के युद्ध के दौरान यही वह स्थान था जहाँ से चीन ने अपना मुख्य आक्रमण शुरू किया था, भारतीय सेना ने चुशूल घाटी (Chushul Valley) के दक्षिण-पूर्वी छोर के पहाड़ी दर्रे रेजांग ला (Rezang La) से वीरतापूर्वक युद्ध लड़ा था।
पिछले कुछ वर्षों में चीनियों ने पैंगोंग त्सो के अपनी ओर के किनारों पर सड़कों का निर्माण भी किया है।

क्षेत्र में विवाद

झील के उत्तरी क्षेत्र में LAC की स्थिति को लेकर विवाद है इसीलिए यह क्षेत्र विवादित बन जाता है।
वर्ष 1999 में जब ऑपरेशन विजय के लिये इस क्षेत्र से सेना की टुकड़ी को कारगिल के लिये रवाना किया गया, तो चीन को भारतीय क्षेत्र के अंदर 5 किमी. तक सड़क बनाने का अवसर मिल गया। यह स्पष्ट रूप से चीन की आक्रामकता को इंगित करता है।
वर्ष 1999 में चीन द्वारा निर्मित सड़क इस क्षेत्र को चीन के व्यापक सड़क नेटवर्क से जोड़ती है, यह G219 काराकोरम राजमार्ग से भी जुड़ती है।
इन सड़कों के माध्यम से चीन की स्थिति भौगोलिक रूप से पैंगोंग झील के उत्तरी सिरे पर स्थित भारतीय स्थानों की उपेक्षा अधिक मज़बूत बनी हुई है।

'फिंगर्स' क्या हैं?

Indo-china-dispute

झील के उत्तरी किनारे पर पहाड़ यहाँ एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं, जिन्हें सेना "फिंगर्स" के रूप में संदर्भित करती है।
भारत का दावा है कि LAC फिंगर 8 के साथ समरूप है, लेकिन यह केवल फिंगर 4 तक के भौतिक क्षेत्र को नियंत्रित करता है।
चीनी सीमा चौकियां फिंगर 8 पर हैं, चीन का यह मानना है कि एलएसी फिंगर 2 से गुजरती है। लगभग छह साल पहले चीन ने फिगर 4 में एक स्थायी निर्माण का प्रयास किया था, जिसे भारतीयों द्वारा कड़ी आपति करने के बाद ध्वस्त कर दिया गया था।
चीनी सड़क पर हल्के वाहनों का उपयोग फिंगर 2 तक गश्त करने के लिए करते हैं, जो उनके वाहनों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है।
यदि उन्हें भारतीय गश्ती दल के द्वारा बीच में रोक दिया जाता है, तो उन्हें वापस लौटने के लिए कहा जाता है, इससे मतभेद होता है, क्योंकि वाहन बीच में वापस नहीं मुड़ सकते है।
भारतीय पक्ष पैदल गश्त करता है और हाल के तनाव से पहले, फिंगर 8 तक जा सकता है। भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच इस महीने की शुरुआत में फिंगर 5 में तकरार हई, जिसके कारण दोनों पक्षों के बीच मतभेद पैदा हो गया।
चीनियों ने अब भारतीय सैनिकों को फिंगर 2 से आगे बढ़ना बंद कर दिया है।

पानी में आक्रामकता

पानी पर, चीन को कुछ साल पहले तक एक बड़ा फायदा था - उनकी बेहतर नावें भारतीय नौकाओं को चारों ओर से घेर सकती थीं।
लेकिन भारत ने लगभग आठ साल पहले बेहतर ताम्पा नौकाएं (Tampa Boats) खरीदी, जिससे तेजी से और अधिक आक्रामक प्रतिक्रिया हुई।
पिछले महीने से इस क्षेत्र में बढ़े तनाव के बाद झील में चीन द्वारा एलएक्स सीरीज़ की नौकाओं को स्थापित किया जा रहा है।

मानक संचालन प्रक्रिया: "बैनर ड्रिल"

• नौकाएं लगभग 20 फीट की दूरी पर रुकती हैं और दोनों तरफ से बैनर दिखाए जाते हैं।
दोनों बैनर लाल कपड़े पर, सफेद अक्षर के साथ हैं।
 “आप भारतीय जल में हैं। शांति और शांति के हित में, हम आपसे वापस लौटने का आग्रह करते हैं, “भारतीय बैनर पर अंग्रेजी और मंदारिन में पढ़ा जाता है।
• "आप एक अंतर्देशीय चीनी जलमार्ग में हैं," चीनी अंग्रेजी और हिंदी में कहते हैं।
• संबंधित नावों पर गश्ती नेताओं ने लाउडस्पीकर का उपयोग करके समान संदेशों को चिल्लाया।
• गतिरोध लगभग 10 मिनट तक जारी रहता है, प्रत्येक पक्ष अपने बैनर को उठाने के लिए कहता है। बैनर का एक और सेट दोनों तरफ से सामने आया है, जिसमें लिखा है: "शांति और शांति के हित में हम अपनी तरफ लौट रहे हैं और हमें भरोसा है कि आप भी ऐसा ही करेंगे"।
नौकाएँ तब दूर चली जाती हैं और अपने संबंधित पक्षों में लौट जाती हैं।

लेकिन क्या होता है अगर चीनी नौकाओं में से एक अचानक आक्रामक कदम उठाना शुरू कर देती है, जैसे कि भारतीय जल में उतरने की कोशिश करना?
• एक भारतीय नाव तब उसे रोकती है, उसका पीछा किया जाता है और फिर उच्च गति के साथ चीनी नौका के चक्कर लगाए जाते है। जिसे "व्हर्लपूल" (Whirpool) कहा जाता है।
यह सामरिक प्रयास चीनी नौका को उच्च धाराओं में फंसा देता है और उसे वापस लौटने के लिए मजबूर करता है क्योंकि वह नौका अब डूबने लगती है।

चीनी अतिक्रमण

• एक चीनी संक्रमण हवा, भूमि या पैंगोंग त्सो झील के पानी में दर्ज किया जा सकता है।
• निगरानी उपकरणों के उपयोग के माध्यम से पता लगाकर, सीमा चौकियों द्वारा देखकर, गश्ती दल द्वारा आमना-सामना, स्थानीय लोगों द्वारा विश्वसनीय रूप से संकेत देकर या चीनियों द्वारा रैपर, बिस्किट पैकेट आदि के रूप में छोड़े गए सबूतों के आधार पर मानवरहित क्षेत्र में चीनी अतिक्रमण की उपस्थिति दर्ज की जा सकती है।

हाल ही में चीनी अतिक्रमण बढ़ा है।
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डीबीओ = दौलत बेग ओल्डी
बीआरओ = बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (सीमा सड़क संगठन)

वर्तमान तनाव का कारण

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• भारत की बेहतर कनेक्टिविटी (डीबीओ हवाई पट्टी, वायु सेना के सी-130 जे मध्यम एयरलिफ्ट विमान की लैंडिंग करने में सक्षम है) का मतलब है कि क्षेत्र में अब चीनियों की राह आसान नहीं है।

बीआरओ 3346 किलोमीटर (हिमालयी सीमा के पार) की लंबाई के साथ 61 भारत-चीन बॉर्डर रोड (ICBR) का निर्माण कर रहा है।
अप्रैल 2018 में, केवल 28 सड़कें पूरी हई। हाल के ठोस प्रयासों के कारण, 2019 में पांच सड़कों को पूरा किया गया और को इस साल पूरा किया जा रहा है। 
नौ सड़कों को 2021 में पूरा किया जाएगा, जबकि छह और सड़कों को मार्च 2022 तक पूरा किया जाएगा।

• 2009 से 2014-15 के बीच समग्र बीआरओ बजट लगभग 4000 करोड़ रुपये पर स्थिर रहा।
यह पिछले कुछ वर्षों में बढ़ गया है:-
2018 में 5400 करोड़
2019-20 में 8000 करोड़
2020-21 में 10000 करोड़ को पार करने की संभावना है।

सीमा विवाद को हल करने के लिए किए गए प्रयास -

1976 ईस्वी में भारत और चीन के मध्य कूटनीतिक संबंधों को पुनः स्थापित किया गया।
1988 ईस्वी में भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन की यात्रा की इस यात्रा के दौरान दो प्रकार के समूह बनाए गए -
1.संयुक्त कार्य दल- सीमा विवाद हल हेतु।
2.संयुक्त आर्थिक दल -आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करने हेतु।

1993 ईस्वी में सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए समझौता किया गया। (Agreement of Peace and Tranquility on Border)
2003 ईस्वी में विशेष प्रतिनिधियों की नियुक्ति की गई।
बृजेश मिश्रा को पहला विशेष प्रतिनिधि नियुक्त किया गया।
वर्तमान में अजीत डोभाल विशेष प्रतिनिधि है।
चीन की तरफ से वैंग यी (Wang Yi) विशेष प्रतिनिधि है।
अब तक 22 दौर की बातचीत हो चुकी है।

2005 ईस्वी में एक सामरिक साझेदारी का समझौता किया गया जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे के सामरिक हितों की रक्षा करेंगे।
इसी समय सीमा-विवाद के समाधान हेतु राजनीतिक मापदंड और निर्देशक सिद्धांतों पर सहमति बनी इसके तहत जब भी सीमा विवाद हल किया जाएगा तब स्पष्ट  व पहचानने योग्य भौगोलिक संकेतकों का प्रयोग किया जाएगा तथा सीमा पर रह रहे लोगों के हितों का ध्यान रखा जाएगा।

2013 ईस्वी में सीमा सुरक्षा व सहयोग समझौता किया गया जिसके तहत जब तक सीमा विवाद हल नहीं हो जाता तब तक सीमावर्ती क्षेत्रों में यथास्थिति में कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा।
2018 ईस्वी में वुहान में अनौपचारिक वार्ता।
2019 ईस्वी में महाबलीपुरम (चेन्नई) में अनौपचारिक वार्ता।

हाल ही 22 मई 2020 को भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे लेह में 14वीं कोर के मुख्यालय पहुंचे और सेना कमांडरों के साथ सुरक्षा को लेकर चर्चा की।

आगे की राह
1. भारत द्वारा कूटनीतिक वार्ता के साथ-2 जमीनी स्तर पर अपना पक्ष मजबूती से रखा जाना चाहिए।
2. वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को परिभाषित करने के लिए चीन पर दबाव बनाया जाए।

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