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भारत - चीन संबंध

India china relation, www.devedunotes.com



भारत-चीन संबंध

चीन की विदेश नीति अत्यधिक आक्रामक, अपारदर्शी तथा व्यवहारिक है।
चीन विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
विश्व का सबसे बड़ा आयातक तथा निर्यातक देश है।
चीन का पूर्वी भाग अधिक विकसित है तथा पश्चिमी भाग कम विकसित है।
यहां के समाज में हान मूल के लोग बहुसंख्यक हैं तथा मंगोल उईघुर मुस्लिम तथा तिब्बती बौद्ध अल्पसंख्यक है।

चीन की राजनीतिक पृष्ठभूमि

1911 ईस्वी में चीन में गणतंत्रात्मक क्रांति हुई , राजतंत्र को समाप्त किया गया तथा गणतंत्र की स्थापना की गई।
यह क्रांति कुओमिनताग पार्टी के नेतृत्व में की गई जिसका मुख्य नेता चियांग काई शेक था।

1917 ईस्वी में रूस में साम्यवादी क्रांति हुई जिसके बाद विश्व के बहुत से देशों में साम्यवाद की ओर झुकाव बढ़ा।
चीन में साम्यवादी नेता माओ त्से तुंग था जिसने साम्यवादी दल का गठन किया।
साम्यवादी दल व कुओमिनताग पार्टी  के मध्य सत्ता संघर्ष हुआ जिसके कारण चीन में गृह युद्ध छिड़ गया ।
यह  युद्ध 1949 ईस्वी तक चला जिसमें साम्यवादी दल की जीत हुई ।
इसने मुख्य चीन पर कब्जा कर लिया और ताइवान द्वीप पर कुओमिनताग  पार्टी का शासन स्थापित हुआ, इसे  रिपब्लिक ऑफ चाइना (ROC) कहा गया ।

वहीं मुख्य चीन को पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PROC) कहा गया।
प्रारंभ में पश्चिमी देशों ने पीआरओसी को मान्यता नहीं दी।
भारत उन पहले देशों में से था जिसने पीआरओसी को मान्यता दी।
सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता भी पीआरओसी को दी गई। तब से मुख्य चीन पर साम्यवादी दल का ही शासन है ।
हाल ही में चीन के संविधान को संशोधित किया गया तथा राष्ट्रपति को अनिश्चितकाल के लिए चुना जा सकता है इसका अर्थ है कि शी जिनपिंग आजीवन  राष्ट्रपति रह सकते हैं।

तिब्बत का मुद्दा :-

1911 ईस्वी तक तिब्बत चीन के अधीन था गणतंत्र क्रांति के दौरान तिब्बत ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की।1949 ईस्वी तक यह है स्वतंत्र रहा 1949 ईस्वी में साम्यवादी सरकार ने घोषणा की की तिब्बत पर अधिकार करना उसका परम कर्तव्य है 1950 ईस्वी में तिब्बत पर आक्रमण किया गया तथा चीन ने इस पर अधिकार कर लिया।
इस अधिकार के निम्नलिखित प्रभाव हुए -

1. भारत और चीन के मध्य एक लंबी सीमा (3,488 km) अस्तित्व में आई तथा ब्रिटिश काल की बफर स्टेट नीति समाप्त हुई।
2. यह अधिकार चीन की विस्तारवादी नीति को प्रदर्शित करता है।
3. तिब्बत में भारत को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे।  जैसे -A.एक ब्रिटिश प्रतिनिधि तिब्बत में नियुक्त किया जाएगा।
B. तिब्बत की डाक व तार व्यवस्था भारत के अधीन होगी।
3. भारत द्वारा तिब्बत में व्यापारिक केंद्र स्थापित करने का अधिकार।
इन विशेषाधिकारों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग गया।

पंचशील समझौता (1954 ईस्वी) -

1954 ईस्वी में तिब्बत के मुद्दे पर भारत और चीन के मध्य पंचशील समझौता किया गया। इस समझौते में भारत ने तिब्बत पर चीन का आधिपत्य स्वीकार किया तथा तिब्बत में मिले विशेषाधिकारों को त्याग दिया।
इस समझौते की प्रस्तावना में पंचशील के सिद्धांत लिखे गए इसलिए इसे पंचशील समझौता कहा जाता है ।

पंचशील सिद्धांत -
1.दूसरे देशों की क्षेत्रीय अखंडता व संप्रभुता का सम्मान किया जाएगा।
2. दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।
3. दूसरे देशों के साथ संबंध परस्पर लाभ व सम्मान पूर्ण होने चाहिए।
 4.अनाक्रणमता का सिद्धांत।
5. शांतिपूर्वक सह अस्तित्व ।

चीन और तिब्बत के मध्य एक समझौता हुआ जिसके तहत तिब्बत ने चीन के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया परंतु तिब्बत को स्वायत्तता दी गई।
चीन ने समझौते का उल्लंघन किया तथा तिब्बत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया ।
इसी कारण 1959ई. में यहां बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए ,चीन ने प्रदर्शनों को दबा दिया ,ऐसी परिस्थिति में तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने चीन छोड़ कर भारत में शरण ली।
इस घटना के बाद ही पहली बार सीमा विवाद का मुद्दा उठाया गया ।

भारत-चीन सीमा विवाद :-


भारत चीन के मध्य 3488 किलोमीटर की सीमा है ,इस सीमा को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है -
1. पश्चिमी भाग
2. मध्य भाग
3. पूर्वी भाग

1. पश्चिमी भाग :-


इस क्षेत्र में मुख्य विवाद अक्साई चीन के आधिपत्य को लेकर है।
भारत का दावा जॉनसन रेखा से है यह रेखा 1865 ई. में ब्रिटिश सर्वेक्षक डब्ल्यू एच जॉनसन द्वारा खींची गई थी।
 इसका आधार लद्दाख रियासत के राजस्व खाते हैं चीन इस रेखा को वैद्य नहीं मानता है क्योंकि चीन को इसके निर्माण के बारे में सूचना नहीं दी गई थी।
एक अन्य रेखा मैकडॉनल्ड रेखा है, जो अक्साई चीन को दो भागों में विभाजित करती है।
1962 ई. के युद्ध में चीन ने अक्साई चीन पर अधिकार कर लिया था।
चीन का वर्तमान आधिपत्य वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से प्रदर्शित किया जाता है।
यह रेखा पूर्ण रूप से परिभाषित नहीं है। इसलिए समय-2 पर दोनों देशों के मध्य तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है।

2. मध्य भाग :-

इसमें हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड का लगभग 2000 वर्ग किलोमीटर का पहाड़ी क्षेत्र विवादित है ।
उत्तरी सिक्किम का फिंगर टिप क्षेत्र विवादित है।

3. पूर्वी क्षेत्र :-  इस  क्षेत्र में भारत का दावा मेकमेहन रेखा से दिखाया जाता है।
यह रेखा 1914 ईस्वी में शिमला सम्मेलन में खींची गई थी, जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधि हेनरी मेक मेहन थे।
चीन इस रेखा को वैद्य नहीं मानता है तथा लगभग पूरे अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता है।

 चीन के द्वारा निम्न तर्क दिए जाते हैं-

1.यह रेखा साम्राज्यवादियों के द्वारा खींची गई है।
2. शिमला सम्मेलन में अंतिम समझौता भारत व तिब्बत के मध्य किया गया इसमें चीन की सहमति नहीं  ली गई।

भारत के तर्क :-
1. चीन साम्राज्यवादियों के द्वारा बनाई गई अन्य रेखाओं को स्वीकार करता है। जैसे - चीन-म्यांमार
2. 1914 में तिब्बत एक स्वतंत्र व संप्रभु राष्ट्र था इसलिए वह किसी भी प्रकार का समझौता कर सकता था।

पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र पर चीन का दावा बढ़ा है -

अरुणाचल प्रदेश के निवासियों को चीन के द्वारा नत्थी वीजा जारी किया गया।
चीन अरुणाचल प्रदेश में स्थित तवांग मठ पर भी अधिकार करना चाहता है। यह तिब्बती बौद्धों का दूसरा सबसे बड़ा मठ है।
ऐसी संभावना है कि अगला दलाई लामा तवांग मठ से हो सकता है।
ऐसी परिस्थिति में तवांग तिब्बती विद्रोह का केंद्र बन सकता है

डोकलाम विवाद


चीन व भूटान के बीच तीन पठारी क्षेत्र पासमलुंग पठार, जाकरलुंग  पठार, डोकलाम पठार विवादित है।
चीन व अंग्रेजों के मध्य 1890 ईस्वी में एक संधि की गई चीन के अनुसार यह संधि इन तीनों क्षेत्रों को चीन के क्षेत्र बताती है परंतु भारत व भूटान इस दावे का खंडन करते हैं।

2017 में चीन के द्वारा डोकलाम में सड़क निर्माण कार्य किया जा रहा था जिसका भारत ने विरोध किया क्योंकि -
1. 2007 ईस्वी में भारत और भूटान के मध्य एक मित्रता संधि की गई जिसके अनुसार भूटान की रक्षा की जिम्मेदारी भारत की है।

2. चीन व भारत के मध्य 2013 ईस्वी में सीमा सुरक्षा व सहयोग समझौता किया गया जिसके तहत जब तक सीमा विवाद हल नहीं हो जाता तब तक सीमावर्ती क्षेत्रों में यथास्थिति में कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा।

3. डोकलाम सिलीगुड़ी गलियारे (चिकन नेक गलियारा) के नजदीक है।
यह गलियारा सामरिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उत्तर-पूर्व के राज्यों को शेष भारत से जोड़ता है।
लगभग 4 महीने तक यह गतिरोध चलता रहा अंततः सैन्य व कूटनीतिक वार्ता से इस विवाद को हल किया गया।
दोनों देशों की सेनाएं पीछे हटा ली गई।

सीमा विवाद को हल करने के लिए किए गए प्रयास -

1976 ईस्वी में भारत और चीन के मध्य कूटनीतिक संबंधों को पुनः स्थापित किया गया ।
1988 ईस्वी में भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन की यात्रा की इस यात्रा के दौरान दो प्रकार के समूह बनाए गए -
1.संयुक्त कार्य दल- सीमा विवाद हल हेतु।
2.संयुक्त आर्थिक दल -आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करने हेतु।

1993 ईस्वी में सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए समझौता किया गया।
2003 ईस्वी में विशेष प्रतिनिधियों की नियुक्ति की गई।
बृजेश मिश्रा को पहला विशेष प्रतिनिधि नियुक्त किया गया।
वर्तमान में अजीत डोभाल विशिष्ट प्रतिनिधि है।
अब तक 22 दौर की बातचीत हो चुकी है।

2005 ईस्वी में एक सामरिक साझेदारी का समझौता किया गया जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे के सामरिक हितों की रक्षा करेंगे।
इसी समय सीमा-विवाद के समाधान हेतु राजनीतिक मापदंड और निर्देशक सिद्धांतों पर सहमति बनी इसके तहत जब भी सीमा विवाद हल किया जाएगा तब स्पष्ट  व पहचानने योग्य भौगोलिक संकेतकों का प्रयोग किया जाएगा तथा सीमा पर रह रहे लोगों के हितों का ध्यान रखा जाएगा।

2013 ईस्वी में सीमा सुरक्षा व सहयोग समझौता संपन्न हुआ।

सीमा विवाद हल हेतु सुझाव -

1. यह विवाद अत्यधिक जटिल व ऐतिहासिक है। अतः  इसे हल करने में समय लगेगा ,दोनों देशों को धैर्य बनाए रखना चाहिए।
2. विवाद के उस भाग को सबसे पहले हल किया जाना चाहिए जो  सबसे कम विवादित है। जैसे- मध्य भाग
3. वास्तविक नियंत्रण रेखा को पूर्णत: परिभाषित किया जाना चाहिए।
4. अन्य क्षेत्रों के विवादों को समाप्त किया जाना चाहिए।
5. सामरिक साझेदारी को वास्तविक अर्थों में लागू किया जाना चाहिए।

भारत व चीन के मध्य समुद्री विवाद-

हिंद महासागर की महत्ता -
1. भारत की 7516 किलोमीटर लंबी तटीय सीमा है, जो कि हिंद महासागर में स्थित है। इसकी रक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
2. आयतन की दृष्टि से भारत का 94 % विदेशी व्यापार हिंद महासागर से होता है।
3. भारत अपने ऊर्जा आयातों के लिए हिंद महासागर पर आश्रित है।
4. हिंद महासागर में विभिन्न प्रकार के संसाधन मिलते हैं। जैसे - तेल , गैस , मछली आदि।
5. ऐतिहासिक रूप से हिंद महासागर पर भारत का प्रभुत्व रहा है।

हिंद महासागर में चीन की गतिविधियां बढ़ रही है, जो कि भारतीय हितों के लिए चिंताजनक है।

हिंद महासागर में चीन की गतिविधियां -

1. मोतियों की माला की नीति String of pearls policy.




यह भारत को घेरने की नीति है। भारत के चारों और सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण स्थानों पर चीन के द्वारा बंदरगाहों का निर्माण किया जा रहा है। जैसे - म्यांमार में क्याकप्यु,  बांग्लादेश में पायरा व  चिटगांव, श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह ,पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह

चीन द्वारा हिंद महासागर में  नौसैनिक अड्डों का विकास किया जा रहा है। जैसे- म्यांमार  के कोको द्वीप पर, जिबूती में तथा पाकिस्तान के जिवानी में।

हिंद महासागर में चीन की पनडुब्बियों की गतिविधियां बढ़ी है। यह पनडुब्बियां श्रीलंका के कोलंबो बंदरगाह तथा पाकिस्तान के कराची बंदरगाह पर देखी गई है।

2008 ईस्वी से चीन समुद्री लुटेरों के विरूद्ध अभियानों में भाग ले रहा है परंतु चीन द्वारा आवश्यकता से अधिक क्षमता के जहाजों का प्रयोग किया जा रहा है।

नोट - भारत प्रशांत महासागर के छोटे-छोटे देशों के साथ इंडिया-पैसिफिक आईलैंड कोऑपरेशन नाम से एक संगठन का निर्माण कर चुका है।

दक्षिण चीन सागर विवाद -


पारासल, स्प्रैटली और स्कारबोरो द्वीप समूह दक्षिण चीन सागर में स्थित है।

यह क्रमशः वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई व  फिलिपींस के अनन्य आर्थिक क्षेत्र के भाग है परंतु इन द्वीप समूहों पर चीन द्वारा अधिकार कर लिया गया है।
चीन इन द्वीप समूहों का सैन्यकरण भी कर रहा है। जैसे - मिसाइल प्रक्षेपण तंत्र की स्थापना करना।
चीन ने लगभग 80% दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा किया है। यह दावा ऐतिहासिक 9 Dash line theory के आधार पर किया गया है।

इस दावे से अंतरराष्ट्रीय वायु परिवहन व नौवहन की स्वतंत्रता बाधित होती है।
इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित होगा।
चीन द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानूनों की भी अवहेलना की जा रही है। जैसे - UNCLOS (1982)
UNCLOS = United Nations Convention for Law Of Sea.
इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था प्रभावित होगी। अंतरराष्ट्रीय महाशक्तियों के मध्य टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती हैं। जैसे - यूएसए एवं चीन।

स्कारबोरो द्वीप समूह का मामला फिलिपींस द्वारा मध्यस्थता के स्थाई न्यायालय में उठाया गया, जिसने फैसला फिलीपींस के पक्ष में दिया परंतु चीन ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया।
इस प्रकार चीन अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की भी अवहेलना कर रहा है।

ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ONGC) विवाद  -

1988 ईस्वी से ओएनजीसी दक्षिण चीन सागर में तेल संसाधनों की खोज के लिए कार्य कर रही है।
ओएनजीसी  व वियतनाम के मध्य तेल दोहन हेतु एक समझौता हुआ परंतु चीन द्वारा ओएनजीसी की गतिविधियों को बाधित किया गया।

भारत-चीन आर्थिक संबंध -

भारत और चीन के मध्य द्विपक्षीय व्यापार लगभग 84 बिलियन डॉलर का है, इसमें चीन का निर्यात 68 बिलियन डॉलर है तथा भारत का निर्यात लगभग 16 बिलियन डॉलर है।
यह व्यापार चीन की ओर झुका हुआ है तथा व्यापार घाटा 52 बिलियन डॉलर है।

व्यापार घाटा के प्रभाव

1. भारत के चालू खाते का घाटा बढ़ जाता है ।
2. विदेशी मुद्रा भंडार कम होता है।
3. घरेलू विनिर्माताओं को नुकसान होता है।
4. भारत में रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं।
5. चीन के उत्पादों की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती है। इससे उपभोक्ताओं के हित नकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं।
6. चीन के उत्पाद भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु भी खतरा है। जैसे - टेलीकॉम के क्षेत्र में।
7. भारत के द्वारा अधिकतर कच्चा माल निर्यात किया जाता है जबकि चीन से तैयार माल प्राप्त होता है ।

व्यापार असंतुलन के कारण

चीन के उत्पाद अत्यधिक सस्ते हैं क्योंकि -
1. चीन के द्वारा अनैतिक व्यापार नीतियां अपनाई जाती है। जैसे- उत्पादों की डंपिंग
2. चीन द्वारा समय-2 पर मुद्रा अवमूल्यन किया जाता है। जिससे  निर्यात सस्ते होते हैं।
3. चीन द्वारा बड़े स्तर पर उत्पादन किया जाता है जिसके कारण प्रति उत्पाद लागत कम होती है ।
4. चीन में आधारभूत ढांचा अत्यधिक सशक्त है।
5. चीन में पर्यावरण व मजदूरों संबंधी नियम अत्यधिक लचीले हैं।
6. चीन की सरकार द्वारा उद्योगों की सहायता की जाती है।
7. चीन में पूंजी की उपलब्धता अत्यधिक सस्ती है।

भारत के निर्यात कम है क्योंकि -
1. भारत की अर्थव्यवस्था में कुछ संरचनात्मक कमियां है जिसके कारण निर्यात अधिक नहीं है।
2. भारतीय उत्पादों को चीन में पर्याप्त बाजार पहुंच उपलब्ध नहीं होती है।
3. डब्ल्यूटीओ के सेनिटरी एंड फाइटोसेनिटरी मिजर्स के तहत भारतीय उत्पादों पर समय-2 पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है।  जैसे - बासमती चावल।
4. भारत के निर्यातों में विविधता की कमी है।

व्यापार असंतुलन को दूर करने के लिए किए गए समाधान -

भारत और चीन के मध्य एक सामरिक एवं आर्थिक वार्ता आयोजित की जाती है।  इसमें भारत द्वारा व्यापार असंतुलन का मामला उठाया गया ,चीन ने आश्वासन दिया कि भारतीय उत्पादों को पूर्ण बाजार पहुंच उपलब्ध करवाई जाएगी।
 भारत निर्यात में विविधता लाने का प्रयास कर रहा है।
 चीन के निवेश को भी आकर्षित किया जा रहा है।

 बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई )

यह चीन की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है जिसमें चीन को समुद्र मार्ग से यूरोप, अफ्रीका, एशिया, हिंद महासागर, प्रशांत महासागर से जोड़ा जा रहा है।

इसके दो घटक है -

1. सिल्क रोड इकोनामिक बेल्ट -

यह थल पर विकसित किया जाएगा।
इसमें रेलवे, हाईवे ,इंडस्ट्रियल पार्क ,ऊर्जा परियोजनाएं ,ट्रांसमिशन लाइन, ब्रॉडबैंड लाइन ऑयल व गैस पाइपलाइन आदि बिछाई जाएंगी।

2. मेरीटाइम सिल्क रोड -

 इसे समुद्र में विकसित किया जा रहा है।
 इसमें बंदरगाह, माल गोदाम, जहाज मरम्मत केंद्र, रिफाइनरी आदि विकसित किए जाएंगे।

बीआरआई परियोजना के उद्देश्य -

 इस परियोजना के आर्थिक व सामरिक उद्देश्य हैं।

A. आर्थिक उद्देश्य -

1. निर्यात के लिए चीन को नए बाजार उपलब्ध होंगे ।
2. चीन की कंपनियों को निवेश के नए अवसर उपलब्ध होंगे ।
3. चीन के वित्तीय संस्थान वैश्विक स्तर पर सशक्त होंगे।
4. चीन की मुद्रा की स्वीकार्यता बढ़ेगी ।
5. चीन में आंतरिक जुड़ाव सुनिश्चित हो सकेगा ।

2. सामरिक उद्देश्य -

1. चीन स्वयं को एक अंतरराष्ट्रीय महाशक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है।
2. चीन सदस्य देशों के निर्णय को प्रभावित कर सकता है।
3. चीन इस परियोजना का प्रयोग एक सॉफ्ट पावर के रूप में कर रहा है।
4. चीन रूस भारत व यूएसए के प्रभुत्व को कम करना चाहता है।
5. चीन अपने आयातों के लिए मलक्का जलसंधि पर अत्यधिक निर्भर है। यह परियोजना चीन को वैकल्पिक मार्ग प्रदान करवाती है।

बीआरआई के प्रभाव -

1. सकारात्मक प्रभाव -

इस परियोजना से बड़े स्तर पर आधारभूत ढांचे का निर्माण होगा। जिससे आर्थिक गतिविधियां बढ़ेगी तथा रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे।

2. नकारात्मक प्रभाव-

1. सदस्य देशों की संप्रभुता प्रभावित होगी।
2. सदस्य देश ऋण जाल में फंस सकते हैं।  जैसे - श्रीलंका और पाकिस्तान।
 श्रीलंका ने हंबनटोटा बंदरगाह  99 साल की लीज पर चीन को सुपुर्द किया है।
3. इस परियोजना से मानवाधिकारों का हनन होगा।
4. पर्यावरण को नुकसान हो सकता है।
5. वैश्विक शक्तियों के बीच टकराव की स्थितियां बनेंगी।

भारत की प्रतिक्रिया -

भारत ने इस परियोजना का बहिष्कार किया है क्योंकि इसका एक भाग चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित बाल्टिस्तान से गुजरता है। इस क्षेत्र में चीन की गतिविधियां भारत की संप्रभुता के विरुद्ध है।

परियोजना के नकारात्मक प्रभावों पर भी भारत के द्वारा प्रकाश डाला गया।
भारत में प्रोजेक्ट मौसम, प्रोजेक्ट कोटन, प्रोजेक्ट स्पाइस रूट की चर्चा की गई परंतु इनके बारे में स्पष्टता का अभाव है।

भारत, यूएसए व जापान मिलकर एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का निर्माण कर रहे हैं।

 ब्रह्मपुत्र नदी विवाद -


ब्रह्मपुत्र नदी मानसरोवर के चेमायुंगडुंग ग्लेशियर से निकलती है।
तिब्बत में इसे सांगपो कहा जाता है। (Tsangpo)
चीन द्वारा इस नदी पर चार जलविद्युत परियोजनाओं (दागु ,जिक्षु ,जियाचा, जांगमो) का निर्माण किया जा रहा है।
भारत इन परियोजनाओं का विरोध कर रहा है क्योंकि -
1. भारत में बाढ़ व सूखे की स्थिति उत्पन्न की जा सकती है।
2. भारत में चल रही जल विद्युत परियोजनाएं प्रभावित होंगी।
3. बांग्लादेश के साथ जल बंटवारे को लेकर विवाद हो सकता है।
4. नौवहन प्रभावित होगा।
5. नदी का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होगा।

एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक

Asian infrastructure and investment bank (AIIB) 
यह एक बहुउद्देशीय बैक है जो कि आधारभूत ढांचे की परियोजनाओं को वित्त उपलब्ध करवाता है।
स्थापना - 2016         मुख्यालय - बीजिंग
सदस्य - 73
पूंजी - 100 बिलियन डॉलर
सहयोग - 1.चीन  2. भारत   3. रूस

चीन-पाकिस्तान संबंध


1963 ईस्वी में चीन और पाकिस्तान के मध्य समझौता हुआ ,पाकिस्तान ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में से शख्शगाम घाटी चीन को दे दी।
पाकिस्तान का मिसाइल कार्यक्रम व न्यूक्लियर प्रोजेक्ट चीन द्वारा प्रायोजित है।
1978 ईस्वी से चीन, पाकिस्तान में आधारभूत ढांचे का निर्माण कर रहा है। जैसे - ट्रांस कराकोरम हाईवे
2015 ईस्वी में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की घोषणा की गई जो कि चीन के शिनजियांग प्रांत की राजधानी काश्गर से शुरू होकर पाकिस्तान के ग्वादर तक जाता है।
शुरुआत में इसमें 46 बिलियन डॉलर निवेश की घोषणा की गई थी, जिसे वर्तमान में बढ़ाकर 62 बिलियन डॉलर कर दिया गया है।
यह बीआरआई परियोजना का मुख्य भाग है, इसमें रेल,रोड, बंदरगाह, ऊर्जा परियोजनाएं ,औद्योगिक पार्क आदि बनाए जा रहे हैं।

 मुख्य परियोजनाएं हैं -

कारोट बाध
कायदे आजम सौर ऊर्जा पार्क
साहिवाल कोयला संयंत्र
कराची पेशावर रेल लाइन।
चीन पाकिस्तान में स्थित आतंकवादी समूहों को संरक्षण प्रदान करता है। जैसे - मसूद अजहर, जैश-ए-मोहम्मद आतंकवादी संगठन का प्रमुख।
न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में भारत की सदस्यता का चीन द्वारा विरोध किया जा रहा है। चीन के अनुसार पाकिस्तान को भी एनएसजी का सदस्य बनाया जाना चाहिए ।

वुहान  शिखर सम्मेलन

2018 ईस्वी में यह अनौपचारिक वार्ता आयोजित की गई जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री व चीन के राष्ट्रपति ने भाग लिया।
डोकलाम विवाद के बाद उत्पन्न तनाव को कम करने का प्रयास किया गया। साथ ही व्यापार घाटे ,आतंकवाद के विरोध में सहयोग पर भी चर्चा हुई।

भारतीय प्रधानमंत्री ने स्ट्रैंथ नामक मंत्र दिया - (STRENGTH)
S - Spirituality
T - Trade, Tradition and Technology
R - Relationship
E - Entertainment
N - Nature
G - Games
T - Tourism
H - Health

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