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अध्याय- 11 महात्मा गांधी का नीतिशास्त्र

नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC


महात्मा गांधी का नीतिशास्त्र

महात्मा गांधी एक नव्य वेदांती विचारक है।

वेदांत के अनुसार ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है परंतु नव्य वेदांतियों के अनुसार ब्रह्मा भी सत्य है और जगत भी सत्य है इसलिए जगत की समस्याएं भी सत्य हैं। इन समस्याओं को हल किया जाना चाहिए।
                           
 अन्य नव्य वेदांती विचारक
1. स्वामी विवेकानंद
 2. रविंद्र नाथ टैगोर
 3. महर्षि अरविंद


महात्मा गांधी के विचारों पर भारतीय दर्शन तथा पाश्चात्य दर्शन का प्रभाव रहा। उपनिषदों से इन्होंने ईशा वास्यम इदं सर्वं का कथन लिया। भगवद्गीता से स्वधर्म की शिक्षा ली। जैन और बौद्ध धर्म से पंच महाव्रत की शिक्षा दी।
         इनके विचारों पर योग दर्शन का प्रभाव भी रहा। पश्चिमी विचारकों में गांधीजी ने ईसा मसीह से दया और करुणा की शिक्षा ली। इनके अलावा अराजकतावादी विचारों पर टॉलस्टॉय और हेनरी डेविड थोरो का प्रभाव रहा ।सर्वोदय और स्वराज के विचारों पर जॉन रस्किन की पुस्तक Unto this last  का प्रभाव है।

 महात्मा गांधी के अनुसार पंच महाव्रत
 महात्मा गांधी के अनुसार पंच महाव्रत
 (A)  सत्य
 (B) अहिंसा
 (C) अस्तेय
 (D) अपरिग्रह
 (E) ब्रह्मचर्य



(A)  सत्य

सामान्य अर्थों में किसी भी तथ्य को  जैसे देखा, सुना समझा गया है उसको बिना किसी संशोधन के वैसा ही व्यक्त कर देना सत्य कहलाता है परंतु गांधी जी ने इसके व्यापक अर्थ को भी स्वीकार किया है।
            इनके अनुसार सत्य ईश्वर है यह कथन ईश्वर सत्य है से अधिक व्यापक है क्योंकि नास्तिक व्यक्ति भी इस कथन में विश्वास कर सकता है। यह ईश्वर की प्राप्ति का एक सहज मार्ग है।
          इनके अनुसार सत्य की प्राप्ति ही जीवन का साध्य है। इसीलिए उन्होंने अपनी जीवनी का शीर्षक सत्य के साथ मेरे प्रयोग रखा। उन्होंने सामान्य और व्यापक दोनों अर्थों को स्वीकार किया है।

सत्य की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए:-
(a) अनावश्यक अभिव्यक्तियों से बचना चाहिए।
(b) कष्ट, निंदा और दूसरों का क्रोध सहन करने की क्षमता होनी चाहिए क्योंकि यह सत्य के मार्ग पर चलने के स्वभाविक परिणाम है।
(c) व्यक्ति को अनावश्यक दार्शनिक उलझनों से बचना चाहिए तथा सहज जीवन जिया जाना चाहिए और सत्याग्रह को अपनाया जाना चाहिए।
           सत्य  की प्राप्ति के लिए किए गए प्रयासों को सत्याग्रह कहा जाता है। स्वतंत्रा आंदोलन में सत्याग्रह का प्रयोग किया गया। इसमें व्यक्ति स्वयं कष्ट सहन करता है तथा इसके माध्यम से दूसरे व्यक्ति का हृदय परिवर्तन किया जाता है।  यह सिर्फ एक राजनीतिक आंदोलन का शस्त्र मात्र नहीं है। यह आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक शर्त है।
             
 सत्याग्रह के लिए निम्नलिखित गुण होने आवश्यक है:-   
 अहिंसा
  त्याग
 कष्ट सहन करने की क्षमता

 दृढ़ता
 ईश्वर में विश्वास
 साहस
 ईमानदारी
 धैर्य
 करुणा














(B)  अहिंसा 

नकारात्मक अर्थ में अहिंसा का अर्थ है मन, कर्म और वचन से किसी को भी कष्ट नहीं पहुंचाना । गांधीजी ने इसके सकारात्मक अर्थ को भी स्वीकार किया है। सकारात्मक अर्थ में अहिंसा का अर्थ है  दूसरों के प्रति दया,करुणा, सेवा, प्रेम आदि का भाव रखना।
        गांधीजी ने ईशा वास्यम इदं सर्वं को स्वीकार किया अर्थात इस जगत में जो कुछ भी है वह ईश्वर की ही अभिव्यक्ति है अतः जगत के सभी प्राणियों के बीच स्वस्थ संबंध होने चाहिए और इसके लिए अहिंसा आवश्यक है।
गांधीजी के अनुसार सत्य साध्य  है और अहिंसा साधन। गांधीजी के अनुसार अहिंसा कोई आदर्श नहीं है। यह जीवन जीने का एक मूलभूत तरीका है। मनुष्य की मूल प्रवृत्ति अहिंसा है जिस प्रकार पशु की मूल प्रवृत्ति हिंसा है।                 
यदि मनुष्य हिंसा करता है तब इसका अर्थ है कि वह पशु बनता जा रहा है। यदि किसी समस्या का हल हिंसा के माध्यम से निकाला जाता है। तब समाधान अल्पकालिक और एकपक्षीय होगा परंतु अहिंसा से निकाले गए समाधान दीर्घकालिक होते हैं और बहुपक्षीय होते हैं।

अहिंसा और कायरता समानार्थक नहीं है। कायरता एक निकृष्ट मूल्य है जो की दुर्बलता और विवशता  पर आधारित है जबकि अहिंसा एक उत्कृष्ट मूल्य है जो कि नैतिकता और आध्यात्मिकता पर आधारित है। यदि कायरता और हिंसा में से किसी एक को चुना जाना है तब हिंसा को चुना जाना चाहिए।
स्वतंत्रता आंदोलन में अहिंसा का प्रयोग साधन के रूप में किया गया।

(C) अस्तेय

इसका सामान्य अर्थ है चोरी ना करना। व्यापक अर्थों में किसी भी व्यक्ति को ऐसी किसी वस्तु से वंचित ना करना जिस पर वास्तविक रूप से उसका अधिकार हो।
गांधीजी के अनुसार चोरी तीन प्रकार की होती है :-
a. भौतिक चोरी अर्थात किसी वस्तु की चोरी
b.  मानसिक चोरी अर्थात चोरी का विचार मन में लाना
c.वैचारिक चोरी अर्थात किसी अन्य के विचारों को स्वयं का बताकर प्रचारित करना।
यदि व्यक्ति सत्य और अहिंसा का पालन करता है तब अस्तेय का पालन स्वत ही हो जाता है क्योंकि अगर सत्य का पालन किया जा रहा है तो वैचारिक चोरी नहीं होगी और यदि अहिंसा का पालन करता है तब बौद्धिक और मानसिक चोरी नहीं करेगा।

(D) अपरिग्रह

इसका सामान्य अर्थ है एकत्रित ना करना। व्यापक अर्थों में बिना श्रम किए कोई भी वस्तु या संसाधन स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए तथा अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद जो कुछ भी बचे उसका प्रयोग समाज के लिए किया जाना चाहिए। इसे ही न्यासधारिता का सिद्धांत कहा जाता है।

न्यासधारिता का सिद्धांत :- यह गांधीजी का आर्थिक दर्शन है। इन्होंने मार्क्स के वर्ग संघर्ष की अवधारणा को नकार दिया तथा वर्ग सहयोग पर बल दिया । इनके अनुसार पूंजीपति वर्ग को यह समझाया जाना चाहिए कि वे संपत्ति के मालिक नहीं है वे  सिर्फ संपत्ति के ट्रस्टी है इसीलिए अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद जो कुछ भी बचे उसका प्रयोग सामाजिक उत्थान के लिए किया जाना चाहिए क्योंकि यह संपत्ति समाज से ही प्राप्त की गई है। इस प्रकार असमानता की समस्या को दूर किया जा सकता है।
न्यासधारिता के सिद्धांत का प्रयोग  विनोबा भावे द्वारा भूदान आंदोलन में किया गया।  वर्तमान में CSR की अवधारणा भी इसी पर आधारित है।

(E) ब्रह्मचर्य

इसका अर्थ है मन, कर्म, वचन से इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित करना । इस सामान्य अर्थ में ही ब्रह्मचर्य को स्वीकार किया गया। यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण नहीं है। ब्रह्मचर्य की प्राप्ति के लिए निरंतर अभ्यास और वैराग्य की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त मन में पवित्र भाव रखना,  ईश्वर की उपासना, स्वाध्याय, जनसेवा आदि का प्रयोग भी किया जा सकता है।

गांधीजी के साधन और साध्य संबंधी विचार:-  

यहां मूल प्रश्न है कि क्या साधन का नैतिक मूल्य साध्य पर निर्भर करता है या नहीं ? बहुत से विचारकों ने यह माना कि यदि साध्य पवित्र हो तो साधन स्वतः ही पवित्र हो जाता है। जैसे मार्क्स के अनुसार समानता साध्य है और इसके लिए हिंसा का प्रयोग भी किया जा सकता है। उपयोगितावादियों के लिए अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख साध्य है और उसकी प्राप्ति के लिए अल्पसंख्यकों का अहित भी नैतिक है। गांधीजी इन विचारों से सहमत नहीं है।
इनके अनुसार साधन और साध्य दोनों ही पवित्र होने चाहिए। यदि साधन अपवित्र है तब साध्य भी अपवित्र हो जाता है इसलिए पवित्र साधनों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
स्वतंत्रता एक साध्य थी और इसको प्राप्त करने के लिए साधन के रूप में अहिंसा का प्रयोग किया गया। (जैसा हम बोते हैं वैसा ही हम काटते हैं)

गांधीजी के हृदय परिवर्तन संबंधी विचार :- 

कुछ विचारकों का मानना है कि परिस्थितियों में परिवर्तन किए बगैर विचारों में परिवर्तन संभव नहीं है। जैसे मार्क्स परिस्थितियों में परिवर्तन के लिए हिंसक क्रांति का समर्थन करता है। परंतु गांधीजी के अनुसार परिस्थितियां विचारों पर निर्भर करती है इसलिए यदि विचारों में परिवर्तन कर दिया जाए तो परिस्थितियां अपने आप ही परिवर्तित हो जाएगी अर्थात यह हृदय परिवर्तन को स्वीकार करते हैं।
 इनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वरीय तत्व उपस्थित है और यदि कोई व्यक्ति अत्याचार कर रहा है तब इसका अर्थ है कि उसमें ईश्वरीय तत्व जागृत नहीं है। यदि हृदय परिवर्तन के माध्यम से ईश्वरीय तत्व को जागृत कर दिया जाए तब है व्यक्ति अत्याचार के मार्ग को छोड़ देगा ।
गांधी जी ने स्विजरलैंड के एक समूह को सलाह दी कि उन्हें हिटलर के हृदय परिवर्तन का प्रयास करना चाहिए।

गांधीजी के प्रकृति संबंधी विचार:- 

मानववादी विचारकों ने मानव को सबसे महत्वपूर्ण माना है इसलिए मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रकृति का दोहन किया जा सकता है। जैसे - पूंजीवाद तथा मार्क्सवाद।
                गांधीजी के अनुसार मनुष्य और प्रकृति के बीच सहअस्तित्व  के संबंध होने चाहिए क्योंकि प्रकृति भी ईश्वर की ही अभिव्यक्ति है इसलिए प्रकृति को मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति करनी चाहिए तथा मनुष्य को प्रकृति की देखभाल करनी चाहिए।
                 मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं को सीमित करना चाहिए। प्रकृति के द्वारा मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है परंतु उसके लालच की पूर्ति नहीं की जा सकती इसी कारण गांधी जी ने औद्योगिकरण और पूंजीवाद का विरोध किया।
नोट:- एक पश्चिमी विचारक आर्ने नेस ने अपनी पुस्तक गांधी एंड न्यूक्लियर एज में लिखा है कि वर्तमान की पर्यावरणीय समस्याओं का हल गांधी जी के विचारों से किया जा सकता है।

गांधीजी के अनुसार सात पाप:-

 A. बिना नैतिकता के वाणिज्य
 B.अंतरात्मा के बिना सुख
 C. काम के बिना धन
 D. मानवता के बिना विज्ञान
 E.चरित्र के बिना ज्ञान
 F. सिद्धांत के बिना राजनीति
 G. त्याग के बिना पूजा

 गांधीजी के सामाजिक विचार:-

 (A)  सर्वोदय:-  यह गांधीजी का सामाजिक दर्शन है जो कि जॉन रस्किन की पुस्तक Unto this last  से प्रभावित है। सर्वोदय का अर्थ है सभी का भौतिक, नैतिक, आध्यात्मिक विकास।
      यह विचार उपयोगितावाद से श्रेष्ठ है क्योंकि उपयोगितावाद सिर्फ अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख की चर्चा करता है। मार्क्स भी सिर्फ मजदूर वर्ग के हितों की चर्चा करता है। आधुनिक विचारक भी सिर्फ सभी के बौद्धिक विकास की चर्चा करते हैं। जबकि सर्वोदय सभी के भौतिक, नैतिक, आध्यात्मिक विकास की चर्चा करता है।
              सिविल सेवकों के लिए यह एक मार्गदर्शक सिद्धांत है कोई भी निर्णय लेते समय यह सोचा जाना चाहिए कि यह निर्णय अंतिम पंक्ति में खड़े सबसे कमजोर व्यक्ति को किस प्रकार लाभान्वित करेगा ।

(B)  गांधीजी ने अस्पृश्यता  का विरोध किया क्योंकि सभी मनुष्य ईश्वर की अभिव्यक्ति है इसलिए स्पृश्यता को किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
         इन्होंने स्पृश्य लोगों के लिए हरिजन शब्द का प्रयोग किया हरिजन सेवक संघ की स्थापना की और हरिजन नामक समाचार पत्र प्रकाशित किया है। अस्पृश्यता  को दूर करने के लिए पूरे भारतवर्ष का दौरा किया।

(C) गांधीजी महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता के समर्थक थे महिला सशक्तिकरण के लिए कार्य किया तथा महिलाओं को राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ा।

(D) गांधीजी ने वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था का समर्थन किया । इनके अनुसार वर्ण व्यवस्था श्रम विभाजन की एक प्रणाली थी। उन्होंने सभी प्रकार के श्रम को एक समान माना है। शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम में भी भेद नहीं किया जाना चाहिए।
               उन्होंने जन्म आधारित जाति व्यवस्था का समर्थन किया क्योंकि इससे व्यक्ति परिवार से ही कौशल सीख सकता है। इससे व्यक्ति के समक्ष आजीविका का संकट उत्पन्न नहीं होता इसलिए वह अपने आध्यात्मिक विकास के लिए भी समय निकाल सकता है। परंतु गांधी जी जाति आधारित भेदभाव का समर्थन नहीं करते।

(E) गांधीजी ने समाज में धार्मिक कुरीतियों और अंधविश्वासों का विरोध किया । इन्होंने एक आत्मनिर्भर ग्रामीण व्यवस्था का समर्थन किया और औद्योगिकरण और पूंजीवाद का विरोध किया।

गांधीजी के धर्म संबंधी विचार :- 

पश्चिमी विचारकों ने माना है कि धर्म और राजनीति को अलग-2 किया जाना चाहिए। जैसे सबसे पहले मैकियावेली ने अपनी पुस्तक द प्रिंस में धर्म को राजनीति से अलग करने का समर्थन किया। मार्क्स ने निजी जीवन में भी धर्म का निषेध किया ।
               गांधीजी ने इन विचारों का विरोध किया इनके अनुसार धर्म और राजनीति को अलग-2 नहीं किया जा सकता है। इनके अनुसार धर्मविहीन राजनीति मृत देह के समान है जिसे नष्ट कर दिया जाना चाहिए।
           यहां धर्म का अर्थ पंथ या संप्रदाय से नहीं है। धर्म का अर्थ है स्व कर्तव्य का पालन। यदि राजनीति को धर्मवीर विहीन किया गया तब वह कर्तव्य विहीन भी हो जाएगी और ऐसी राजनीति जनकल्याण सुनिश्चित नहीं कर सकती।

गांधीजी ने सर्वधर्म समभाव के विचार का समर्थन किया अर्थात सभी धर्म एक समान है तथा ईश्वर तक पहुंचने के अलग-अलग मार्ग है। यह विचार धार्मिक सहिष्णुता के विचार से श्रेष्ठ है क्योंकि सहिष्णुता का अर्थ है दूसरे धर्म को अस्तित्व में रहने देना। यह आवश्यक नहीं है कि आप उससे सहमत हो या नहीं । यह विचार सर्व धर्म सद्भाव के विचार से भी श्रेष्ठ है क्योंकि सद्भाव का अर्थ है दूसरे धर्मों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। यहां भी समानता का दृष्टिकोण नहीं है। परंतु सर्वधर्म समभाव में सभी धर्मों को एक समान माना गया है। इसी कारण से गांधीजी धर्म परिवर्तन का विरोध करते हैं क्योंकि धर्म परिवर्तन धार्मिक श्रेष्ठता के विचार पर आधारित है।

गांधीजी के राजनीतिक विचार :- 

राजनीतिक दृष्टिकोण से गांधीजी अराजकतावाद का समर्थन करते हैं अर्थात् राज्य के अस्तित्व को समाप्त किया जाना चाहिए परंतु गांधीजी मार्क्स की तरह हिंसक अराजकतावादी नहीं है अर्थात् वे राज्य को समाप्त करने के लिए हिंसा का समर्थन नहीं करते हैं वे टोलस्टॉय की तरह प्रबुद्ध तथा प्रशांत अराजकतावादी है।
गांधीजी ने राज्य का विरोध किया क्योंकि :-
A. राज्य हिंसा पर आधारित होता है क्योंकि राज्य अपने कानूनों और निर्णयों को लागू करने के लिए हिंसा का प्रयोग करता है।
B. राज्य के कारण व्यक्ति आत्मनिर्भर नहीं बन पाता है तथा वह राज्य पर निर्भर होने लगता है।

प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वरीय तत्व विद्यमान है। जब सभी लोगों में ईश्वरीय तत्व जागृत हो जाएगा तब लोगों का व्यवहार नैतिक होगा और राज्य की आवश्यकता नहीं होगी। यदि कोई छोटी मोटी घटना होती है तब सामाजिक दबाव से उसका हल निकाला जा सकता है।
             ईश्वरीय तत्व की पूर्ण जागृत अवस्था को रामराज्य अथवा स्वराज्य कहा जाएगा। यह एक आदर्श स्थिति है जिसे वर्तमान में प्राप्त नहीं किया जा सकता है।
अतः निम्नलिखित शासन व्यवस्था को अपनाया जाना चाहिए:-
a. न्यूनतम राज्य की अवधारणा को अपनाया जाना चाहिए। अर्थात् राज्य की शक्तियां अत्यधिक सीमित होनी चाहिए।
b. पंचायती राज व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए जिसमें ग्राम पंचायत को विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका की शक्तियां होनी चाहिए। ग्राम पंचायत का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से किया जाना चाहिए। इसके ऊपर तालुका, जिले, राज्य और देश की पंचायत होनी चाहिए। इनके चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से किए जाने चाहिए।
c. गांधीजी ने दल विहीन राजनीति का समर्थन किया।

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