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अध्याय- 20 नीतिशास्त्र : भावनात्मक बुद्धिमत्ता

नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC



 भावनात्मक बुद्धिमत्ता

सामान्यतः स्वयं की भावनाओं को समझना और उन्हें प्रबंधित करना, दूसरों की भावनाओं को समझना और उन्हें प्रबंधित करना भावनात्मक बुद्धिमत्ता कहलाता है।

भावनात्मक बुद्धिमत्ता का विकास:-

 शुरुआती दार्शनिकों ने भावनाओं की बजाय बुद्धि को अधिक महत्व दिया है। यद्यपि किर्केगार्ड ने  भावनाओं को भी महत्व दिया परंतु इसकी बातों को अधिक महत्व नहीं दिया गया।

20वीं शताब्दी में बहुत से मनोवैज्ञानिकों ने सफलता में भावनाओं के महत्व को रेखांकित किया। जैसे - अब्राहिम मेस्लो, हार्वर्ड गार्डनर आदि।

 1990 में पीटर सेलोवी और जॉन मेयर नामक दो अमेरिकी मनोवैज्ञानिकों ने इमोशनल इंटेलिजेंस शीर्षक से एक निबंध लिखा।
          1997 ईस्वी में इन्होंने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था What is E.I ? इसमें बुद्धिमता को व्यवस्थित रूप से परिभाषित किया गया और इसे मनुष्य की योग्यता बताया गया।

 1995 में डेनियल गोलमैन ने एक पुस्तक लिखी Emotional intelligence:why it can matter more than I.Q.? 
इस पुस्तक के मुख्य निष्कर्ष थे:-

(1) व्यक्ति की सफलता में I.Q. की भूमिका 15 से 20% होती है जबकि 80% भूमिका E.Q. की होती है।
(2) भावनात्मक बुद्धिमत्ता को सीखा जा सकता है यद्यपि सीखने की क्षमता जैविक संरचना से सीमित होती है ।(3) महिलाओं में भावनात्मक बुद्धिमत्ता अधिक होती है इसलिए भविष्य में महिलाएं अधिक सफल होंगी।

 2001 में पेट्राइड्स नामक मनोवैज्ञानिक ने भावनात्मक बुद्धिमत्ता का ट्रेट मॉडल दिया।

सेलोवी और मेयर का मॉडल:- 

इसे योग्यता मॉडल भी कहा जाता है।
इसमें भावनात्मक बुद्धिमत्ता को व्यवस्थित रूप से परिभाषित किया गया "वह योग्यता जिसके माध्यम से भावनाओं को प्रत्यक्ष किया जा सके, इन्हें चिंतन प्रक्रिया से जोड़ा जा सकता है तथा भावनाओं को समझा तथा प्रबंधित किया जा सकता है।

इस परिभाषा के 4 मुख्य भाग है:-

(1) भावनाओं को प्रत्यक्ष करने की योग्यता:- चेहरे के हाव-भाव, शारीरिक अभिव्यक्ति, आवाज, चित्र आदि को देखकर, सुनकर, समझ कर सटीक रूप से भावनाओं का पता लगाने की योग्यता ।व्यक्ति स्वयं की तथा दूसरों की भावनाओं को जान सकें।

(2) भावनाओं को चिंतन प्रक्रिया से जोड़ने की योग्यता:- भावनाओं के उद्गम, तीव्रता और प्रभाव का चिंतन किया जाना चाहिए। भावनाओं के प्रति तत्काल प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए। जैसे यदि कोई मित्र को  क्रोधित है तब तत्काल प्रतिक्रिया ना करते हुए क्रोध के कारण के बारे में विचार करना चाहिए।

(3) भावनाओं को समझने की योग्यता:- मिश्रित भावों को अलग-2 किया जाना चाहिए तथा प्रत्येक भाव को अलग से समझा जाना चाहिए। जैसे यदि माता-पिता बच्चों को डांटते हैं। तब इसमें क्रोध और स्नेह दोनों के भाव  मिश्रित है।

(4) भावनाओं को प्रबंधित करने की योग्यता:- यह भावनात्मक बुद्धिमत्ता की चरम अवस्था है। भावनाओं को दो स्तर पर प्रबंधित किया जा सकता है:-
A. अभिव्यक्ति से पूर्व प्रबंधन करना
B. भावनाओं को अभिव्यक्त करते समय प्रबंधित करना।

डेनियल गोलमैन का मॉडल:- 

गोलमैन  के अनुसार भावनात्मक बुद्धिमत्ता के 5 पक्ष होते हैं:-
1. आत्मजागरूकता
2. आत्मनियमन
3. आत्मा अभिप्रेरणा
4. समानुभूति
5. सामाजिक दक्षता

1.आत्म जागरूकता:- व्यक्ति को स्वयं की भावनाओं, योग्यताओं कमजोरी तथा स्वभाव का ज्ञान होना चाहिए तथा समाज पर इनके प्रभाव का भी ज्ञान होना चाहिए।

2. आत्म नियमन:- भावनाओं की तीव्रता, प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति को नियमित किया जाना चाहिए। यदि भावनाओं की प्रवृत्ति सही नहीं है तब ऐसी भावनाओं को उसी समय रोक दिया जाना चाहिए। जैसे - हिंसा की भावना। यदि भावनाओं की प्रवृत्ति है तब उसकी तीव्रता को नियमित किया जाना चाहिए। भावनाओं की अभिव्यक्ति बार-बार होती है तब यह एक समस्या बन जाती है जैसे क्रोध की अभिव्यक्ति ।

3. आत्म अभिप्रेरणा:- जब लक्ष्य अत्यधिक दूरगामी और चुनौतीपूर्ण होता है। तब बाहर से पर्याप्त अभिप्रेरणाएँ उपलब्ध नहीं होती है। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति में स्वयं को अभिप्रेरित करने की क्षमता होनी चाहिए। जैसे- नकारात्मक विचारों से बचना तथा सुधारात्मक प्रयास करना, मार्ग में आने वाले तात्कालिक लाभ से बचना, थकान व बोरियत से जूझते रहना, नकारात्मक भावों को अभिव्यक्त करना ।

4. समानुभूति:- दूसरों की भावनाओं और अनुभूतियों को सटीक तरीके से पढ़ने की क्षमता होनी चाहिए। दूसरों का मूल्यांकन करते समय स्वयं को उनके स्थान पर सोचा जाना चाहिए।

5. सामाजिक दक्षता:- समाज में लोगों से संबंधों को प्रबंधित करने की क्षमता को सामाजिक दक्षता कहा जाता है। अन्य लोगों से संबंध आपसी सम्मान के होने चाहिए। दूसरों के प्रति व्यवहार सकारात्मक होना चाहिए। यदि संबंध में कोई समस्या उत्पन्न होती है तब उसे सकारात्मक रूप से हल किया जाना चाहिए। दूसरों की उपलब्धियों पर उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए तथा गलतियों के बारे में उचित फीडबैक दिया जाना चाहिए। कार्यालय में न्यूनतम औपचारिक संबंधों को सदैव बनाए रखा जाना चाहिए

 भावनात्मक बुद्धिमत्ता की प्रशासन में भूमिका:-

(1) सिविल सेवकों के जीवन में तनाव का स्तर लगातार बढ़ रहा है। जिसे प्रबंधित करने के लिए भावनात्मक बुद्धिमत्ता आवश्यक है।
(2) सिविल सेवकों को ऐसे कर्मचारियों के साथ कार्य करना पड़ता है जिनके चयन में उनकी कोई भूमिका नहीं होती भावनात्मक बुद्धिमत्ता से उनकी क्षमताओं, कमजोरियों और प्रवृत्ति के बारे में जाना जा सकता है। कार्य का आवंटन उसी आधार पर किया जाना चाहिए।
(3) कार्यालय में स्वस्थ कार्य संस्कृति के निर्माण के लिए भावनात्मक बुद्धिमत्ता आवश्यक है। जैसे अन्य कर्मचारियों से सकारात्मक संबंध रखना, अधीनस्थ कर्मचारियों के सुख और दुख में भागीदार होना, औपचारिक नियमों की बजाय कार्य दक्षता एवं उत्पादकता पर बल देना, टीम भावना को प्रोत्साहित करना।
(4) इसके माध्यम से स्वयं को और अन्य को प्रेरित कर सकता है।
(5) यदि किसी मुद्दे पर  जनता उग्र है तो इस उग्रता को प्रबंधित करना और उसे सकारात्मक दिशा में मोड़ देना।
(6) सिविल सेवकों को विभिन्न जातीय और धार्मिक समूह के साथ कार्य करना पड़ता है। जिनके बीच सामंजस्य और सहयोग के लिए भावनात्मक बुद्धिमत्ता आवश्यक है।
(7) निजी और सार्वजनिक जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए ।
(8) स्वयं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए।

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