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अध्याय- 13 भगवद्गीता गीता का नीतिशास्त्र

नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC


भगवद्गीता गीता और प्रशासन में उसकी भूमिका

यह एक धार्मिक ग्रंथ है परंतु इसकी शिक्षाएं जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आज भी प्रासंगिक है। यह वेदों और उपनिषदों का सार है। इसमें ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग की शिक्षाएं दी गई है।

शंकराचार्य ने इससे ज्ञान योग की शिक्षा ली। रामानुजाचार्य और माधवाचार्य ने इससे भक्ति योग  की शिक्षाएं ली। तिलक और गांधी जैसे नव्य वेदांतियों ने कर्मयोग की शिक्षा ली।

 भगवद्गीता ने बहुत से महान समाज सुधारकों, विचारकों और नेताओं को प्रभावित किया है।

 यह महाभारत महाकाव्य के भीष्म पर्व का हिस्सा है। इसमें कुल 700 श्लोक है जिन्हें 18 अध्यायों में बांटा गया है। मूलतः यह नैतिक दुविधा को हल करती है।
              अर्जुन के समक्ष एक नैतिक दुविधा थी कि वह परिवारजनों से युद्ध करें या नहीं, युद्ध का परिणाम क्या होगा, इससे सुख मिलेगा या नहीं तथा युद्ध क्यों किया जाए।

महाभारत में कौरव बुराई के प्रतीक है और पांडव अच्छाई के प्रतीक है। अच्छाई और बुराई का यह संघर्ष आज भी चल रहा है। समाज में भी और व्यक्ति के भीतर भी इससे भगवद्गीता की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक है।

एक सिविल सेवक के लिए अच्छाई और सकारात्मकता का समर्थन करना जरूरी है तथा नकारात्मक शक्तियों का नाश किया जाना चाहिए।

भगवद्गीता की प्रमुख शिक्षाएं :-

(1) निष्काम कर्मयोग:-

 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।             मा कर्मफलहेतुभुर्मा तेसंगऽस्त्व कर्मणि।।
 (अर्थात कर्म पर अधिकार तेरा फल पर कदापि नहीं कर्म को फल की आशा से  न कर और कर्म को त्यागा भी नहीं जा सकता।)

भगवद्गीता गीता के अनुसार फल व्यक्ति के नियंत्रण में नहीं है इसलिए फल के बारे में अधिक चिंतन नहीं किया जाना चाहिए। यद्यपि कर्म के सिद्धांत के अनुसार फल मिलेगा (अच्छे कर्म अच्छा फल , बुरे कर्म बुरा फल) परंतु फल को ध्यान में रखते हुए कर्म नहीं किया जाना चाहिए इसी को निष्काम कर्म कहा जाता है।
     
यहां कर्म की भी व्याख्या की गई है। कर्म का अर्थ है-स्वधर्म का पालन अर्थात् व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन सदैव करना चाहिए।
भगवद्गीता में स्वधर्म  को वर्णाश्रम व्यवस्था से समझाया गया है। जिसके अनुसार समाज चार वर्णों में बटा हुआ है और जीवन चार आश्रमों में व्यक्ति को अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार कर्म करने चाहिए।
भगवद्गीता में वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित न होकर कर्म आधारित है।

 निष्काम कर्म के लिए अभ्यास और वैराग्य आवश्यक है।

एक सिविल सेवक को भी अपने कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करना चाहिए। अन्यथा वह लोभ, भय और पूर्वाग्रहों से प्रभावित होगा।

भगवद्गीता निष्क्रियता को नकारती है कोई भी व्यक्ति कर्म किए बिना नहीं रह सकता। व्यक्ति निरंतर कर्म कर रहा है। यहां तक कि सोते हुए भी कर्म चल रहे है।

व्यक्ति में तीन प्रकार के गुण होते हैं - सत, रज और तम
सत सद्गुणों को प्रदर्शित करता है और तम, दुर्गुणों को जबकि रज, ऊर्जा को प्रदर्शित करता है।
ऊर्जा का प्रयोग सकारात्मक दिशा में किया जाना चाहिए। अन्यथा नकारात्मकता फैलेगी ।
              इसी प्रकार एक सिविल सेवक को भी अपनी ऊर्जा का प्रयोग समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए करना चाहिए। अन्यथा नकारात्मकता फैलेगी।

प्रत्येक परिस्थिति में स्वधर्म का ही पालन किया जाना चाहिए भले ही इसमें कोई कमी भी हो। परधर्म का पालन श्रेष्ठता के साथ भी नहीं किया जाना चाहिए। स्वधर्म का पालन करते हुए मृत्यु भी श्रेष्ठ है परंतु परधर्म सदैव ही भयावह है।
श्रेयान स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वधर्मे निधनं श्रेयः  परधर्मो भयावह।।
भगवद्गीता के अनुसार कर्म तीन प्रकार के हैं :-
(A) संचित कर्म - पिछले जन्म में संचित किए गए कर्म
(B) प्रारब्ध कर्म - वर्तमान जन्म की शुरुआत में उपस्थित कर्म
(C) संचियमान/ आगामी कर्म - वर्तमान जन्म में अर्जित कर्म

निष्काम भाव से कर्म करने के लिए व्यक्ति को स्वयं को एक निमित मात्र मानना चाहिए तथा कर्म का श्रेय नहीं लेना चाहिए।
इसी प्रकार एक सिविल सेवक को भी  श्रेय के पीछे नहीं भागना चाहिए।

(2)  अनासक्ति  एवं स्थितप्रज्ञ:-

जब व्यक्ति इंद्रिय विषयों के बारे में अधिक चिंतन करता है। तब उन विषयों के प्रति आसक्ति उत्पन्न होता ही है। आसक्ति से काम में बाधा उत्पन्न होती है। यदि कामनाओं की पूर्ति ना हो तो क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से विवेक समाप्त हो जाता है। जिससे स्मृति का नाश होता है। इससे बुद्धि का नाश होता है और इसी से मनुष्य का नाश होता है इसलिए इन्द्रिय विषयों का चिंतन नहीं किया जाना चाहिए इसी को अनासक्ति कहा गया है।

स्थितप्रज्ञ:- यह एक मानसिक अवस्था है जिसमें एक व्यक्ति पूर्ण बौद्धिक स्थिरता को प्राप्त करता है। भगवद्गीता के अनुसार वह व्यक्ति स्थितप्रज्ञ है जो कि सुख-दुख, सफलता -असफलता, हार-जीत, प्रशंसा -निंदा आदि में एक समान भाव रखता है।

अर्जुन को सलाह दी गई कि वह स्थितप्रज्ञ बने। अनासक्ति से स्थितप्रज्ञता को प्राप्त किया जा सकता है। इससे कर्तव्यों का निर्वहन पूर्ण दक्षता से किया जा सकता है क्योंकि भावनाएँ व्यक्ति  के नियंत्रण में रहती है।

एक सिविल सेवक को भी स्थितप्रज्ञता को प्राप्त  करना चाहिए। संकटकालीन परिस्थिति में इसके माध्यम से विवेकपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं।

(3)  प्रवृति एवं निवृत्ति के बीच समन्वय :-

प्रवृत्ति का अर्थ है भौतिकवादी जीवन। निवृत्ति का अर्थ है लौकिक जीवन को त्याग देना। भगवद्गीता इन दोनों ही अतिवादी विचारों का समर्थन नहीं करती है। इसके अनुसार व्यक्ति को सांसारिक जीवन में रहते हुए कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए। कर्तव्य से भागना सन्यास का मार्ग नहीं है। अनासक्ति सन्यास का मार्ग है अर्थात् कर्तव्य का पालन अनासक्त भाव से करना चाहिए।
       सिविल सेवकों को भी अनासक्त भाव से कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए। कर्तव्य से भागने का मार्ग सही नहीं है।

(4) लोक संग्रह:- 

इसका शाब्दिक अर्थ है - जनकल्याण। कर्तव्य का निर्वहन जन कल्याण सुनिश्चित करने के लिए किया जाना चाहिए।
            एक सिविल सेवक समाज में रोल मॉडल होता है तथा अन्य जन उसके आचरण का अनुसरण करते हैं इसलिए यदि सिविल सेवक कर्तव्यों का निर्वहन ना करें तो समाज कर्तव्य पथ से विचलित हो जाएगा और इससे जनकल्याण सुनिश्चित नहीं हो सकता।

(5)  आपद धर्म:-  

यह एक विशेष परिस्थिति है। इस अवधारणा के अनुसार संकटकालीन परिस्थितियों में परधर्म का पालन भी किया जा सकता है।
                 एक सिविल सेवक के लिए भी आवश्यक है कि वह संकटकालीन परिस्थिति में किसी भी प्रकार का कार्य करने के लिए तैयार रहें। जैसे प्राकृतिक आपदा, सांप्रदायिक दंगे आदि।

(6) आत्मा की अमरता :-

भगवद्गीता में आत्मा को अमर माना गया है। इसे ना तो शस्त्रों से काटा जा सकता है,  ना ही इसे अग्नि जला सकती है, ना ही जल इसे गला सकता है और ना ही वायु इसे सुखा सकती है अर्थात् यह भौतिक  जगत से परे है।

भगवद्गीता पुनर्जन्म के सिद्धांत को भी स्वीकार करती है। इसके अनुसार जिस प्रकार व्यक्ति पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है। उसी प्रकार शरीर के कमजोर होने पर आत्मा नए शरीर को धारण कर लेती है।

भगवद्गीता अवतारवाद को भी स्वीकार करती है। जब-जब धर्म की हानि होती है तथा अधर्म का उत्थान  होता है। तब तक ईश्वर के द्वारा अवतार लिया जाता है तथा वह अच्छाई की रक्षा करता है तथा बुराई का नाश करता है।

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मनम् सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधुनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय   संभवामि   युगे युगे।। 

(7)  राजर्षि:-  यह दो शब्दों से मिलकर बना है राजा + ऋषि। राजा निस्वार्थ जन कल्याण को प्रदर्शित करता है तथा ऋषि दिव्यता को। अतः निस्वार्थ भाव से जन कल्याण के लिए कर्तव्य का पालन किया जाना चाहिए।

(8) जगत को ईश्वर की अभिव्यक्ति बताया गया है । इसके लिए ममैवांशो जीवलोके का प्रयोग किया गया है।

 भगवद्गीता से सीखे जाने वाले गुण:-

(1) स्थितप्रज्ञता से सीखे जाने वाले गुण :-
सहिष्णुता                      सत्यनिष्ठता         वस्तुनिष्ठता
निष्पक्षता                      ईमानदारी           धैर्य
सहानुभूति         
         

(2) निष्काम कर्म योग से सीखे जाने वाले मूल्य:-
कर्तव्यपरायणता            अनासक्ति
         
(3) लोक संग्रह से सीखे जाने वाले गुण:-
लोक कल्याण              जनसेवा
करुणा                        समर्पण

भगवद्गीता और इमैन्युअल कांट की तुलना :-

समानताएं-
(1) दोनों ही परिणामनिरपेक्ष नीति शास्त्र का समर्थन करते हैं।
(2) दोनों ही कर्तव्य पालन को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। कर्तव्य पालन के लिए इंद्रियों और भावनाओं पर नियंत्रण आवश्यक मानते हैं।
(3) दोनों ही आत्मा की अमरता पुनर्जन्म और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं।
(4) दोनों ही संकल्प स्वातंत्र्य को स्वीकार करते हैं।

असमानताएँ:-

(1) भगवद्गीता  एक धार्मिक ग्रंथ है जबकि कांट का नीतिशास्त्र धर्म की अवधारणा से स्वतंत्र है।

(2) भगवद्गीता का नीतिशास्त्र लचीला है परंतु कांट का नीतिशास्त्र अत्यधिक कठोर है।

(3) भगवद्गीता में नैतिकता ईश्वर पर आधारित है अर्थात् ईश्वर सत्य है और नैतिकता साधन जबकि कांट के नीति शास्त्र में नैतिकता साध्य है और ईश्वर साधन।

(4) भगवद्गीता कर्म के सिद्धांत को स्वीकार करती है अर्थात् कर्म के अनुसार फल मिलेगा परंतु कांट के नीति शास्त्र में फल मात्र एक संभावना है।

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