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अध्याय- 17 नीतिशास्त्र : प्रशासकों का व्यवहार

नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC


प्रशासकों का व्यवहार

प्रशासकों के निजी और सार्वजनिक जीवन को नियमित करने के लिए आचार संहिता का निर्माण किया गया है।

निजी जीवन की आचार संहिता:-

(1)  एक से अधिक विवाह नहीं किए जाने चाहिए।
(2) दहेज नहीं लिया जाना चाहिए और ना दिया जाना चाहिए
(3) माता-पिता, बच्चों और जीवन साथी की देखभाल करनी चाहिए।
(4) बाल मजदूरी को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए।
(5) भाई भतीजावाद को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए।

सार्वजनिक जीवन की आचार संहिता:-

(1) बिना सरकार की अनुमति के कोई भी सम्मान या पुरस्कार नहीं लिया जाना चाहिए।
(2) आधिकारिक क्षमता में प्राप्त की गई सूचनाओं को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। यद्यपि आरटीआई के तहत मांगी गई सूचनाओं को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
(3) सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों की सार्वजनिक आलोचना नहीं की जानी चाहिए।
(4) आधिकारिक कार्यों में निजी व्यक्तियों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
(5) सामाजिक कुरीतियों को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। (6) सांप्रदायिकता और जातिवाद को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।

सिविल सेवकों के आचरण को सुधारने के लिए निम्नलिखित समितियां बनाई गई है:-

(1) ली आयोग
(2) A.D. गोरवाला आयोग
(3) होता आयोग
(4) संथानम समिति
(5) प्रशासनिक सुधार आयोग प्रथम और द्वितीय
(6) नोलन समिति (यू.के., 1994)

नोलन समिति ने सिविल सेवकों में सात आधारभूत मूल्यों को स्वीकार किया है:-

(1) वस्तुनिष्ठता
(2) नि:स्वार्थता
(3) पारदर्शिता
(4) ईमानदारी
(5) जवाबदेहिता
(6)  सत्यनिष्ठता
(7) नेतृत्व

(1) वस्तुनिष्ठता :- एक सिविल सेवा को सभी प्रकार के वैचारिक, काल्पनिक तथा रूढिगत पूर्वाग्रहों से मुक्त होना चाहिए। तभी व्यक्ति न्यायपूर्ण निर्णय ले सकता है।
           समाज और परिवार से सीखे गए मूल्यों के कारण पूर्वाग्रह उत्पन्न होते हैं व्यक्ति को समय-समय पर अंतरावलोकन करना चाहिए तथा पूर्वाग्रहों की पहचान करके उन्हें समाप्त किया जाना चाहिए।

(2) नि:स्वार्थता:-  सिविल सेवकों को कर्तव्यों का निर्वहन नि:स्वार्थ भाव से करना चाहिए। स्वयं को समाज के प्रति ऋणी समझना चाहिए। वेतन तथा सुविधाओं को अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। सिविल सेवा एक प्रकार की जनसेवा है।

(3) पारदर्शिता:- निर्णय, कार्य और प्रक्रियाओं में पारदर्शिता होनी चाहिए। इससे भ्रष्टाचार कम होता है और जन सहभागिता बढ़ती है। इससे लोकतांत्रिक मूल्य सशक्त होते हैं।
वर्तमान में आरटीआई ओर ई-गवर्नेंस के माध्यम से पारदर्शिता को बढ़ावा दिया जा रहा है।

(4) ईमानदारी:- अधिकारों का प्रयोग सिर्फ कर्तव्य के प्रभावी और दक्ष निर्वहन के लिए किया जाना चाहिए। रिश्वत ना ली जानी चाहिए और ना दी जानी चाहिए।

(5) जवाबदेहिता:- सिविल सेवकों को अपने निर्णयों तथा कार्यों की व्याख्या करनी चाहिए। इसे जवाबदेही कहा जाता है। इसके माध्यम से अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है। जवाबदेहिता के आधार पर ही विभागीय कार्यवाही की जाती है।

(6)सत्यनिष्ठता:- व्यक्ति के विचारों में विरोधाभास नहीं होना चाहिए। विचारों और सिद्धांतों के अनुसार ही आचरण होना चाहिए। नैतिक मूल्यों के सोपान क्रम का ज्ञान होना चाहिए जिससे कि नैतिक दुविधा को दूर किया जा सके।

  सत्यनिष्ठता के प्रकार:-

(A) व्यक्तिगत सत्यनिष्ठता:- व्यक्ति के विचारों में विरोधाभास नहीं होना चाहिए और विचारों के अनुसार ही आचरण होना चाहिए। दूसरों की गलतियों से सीखा जाना चाहिए।

(B) बौद्धिक सत्यनिष्ठता:- स्वयं का मूल्यांकन उन्हीं मापदंडों तथा उतनी ही  कठोरता से किया जाना चाहिए जिसका प्रयोग दूसरों के मूल्यांकन के लिए किया जाता है। दूसरों का मूल्यांकन करते समय स्वयं को उस परिस्थिति में रखकर सोचना चाहिए। स्वयं के वैचारिक विरोधाभासों की पहचान की जानी चाहिए।

(C) व्यवसायिक सत्यनिष्ठता:- व्यक्ति का आचरण व्यवसाय की आचार संहिता के अनुसार होना चाहिए।

सत्यनिष्ठता का दार्शनिक आधार:- 

परिणामनिरपेक्षवादी नीतिशास्त्रियों ने सत्यनिष्ठा को दार्शनिक आधार उपलब्ध करवाया है।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण इमैनुएल कांट है।कांट के अनुसार नैतिक नियमों का पालन प्रत्येक परिस्थिति में किया जाना चाहिए। नैतिक नियमों को निरपेक्ष आदेश के रूप में लिया जाना चाहिए। इनमें किसी प्रकार का अपवाद  स्वीकार नहीं किया जा सकता।

भगवद्गीता के अनुसार प्रत्येक परिस्थिति में स्वधर्म का पालन किया जाना चाहिए।
अंतःप्रज्ञावादियों  के अनुसार प्रत्येक परिस्थिति में अंतर आत्मा के अनुसार आचरण होना चाहिए।
गांधीजी के अनुसार साधन और साध्य दोनों ही पवित्र होने चाहिए ।सत्य, अहिंसा जैसे मूल्यों का प्रयोग प्रत्येक परिस्थिति में करना चाहिए।
व्यवसायिक  नीतिशास्त्र के अनुसार व्यक्ति को व्यवसाय की आचार संहिता का पालन सदैव करना चाहिए।

सत्यनिष्ठता  के लाभ:-
A. सत्यनिष्ठता से नैतिक दुविधा को हल किया जा सकता है।
B. निर्णय लेने की प्रक्रिया तीव्र और आसान हो जाती है।
C. व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है ।
D. व्यक्ति की विश्वसनीयता बढ़ जाती है।

(7)  नेतृत्व:- एक सिविल सेवक  को टीम भावना से कार्य करना चाहिए। सफलता का श्रेय टीम के साथ बांटना चाहिए तथा असफलता और आलोचनाओं का सामना स्वयं को करना चाहिए।
नेतृत्वकर्ता दूरदर्शी होना चाहिए जिससे कि वह भविष्य की संभावनाएं और चुनौतियां का सही आकलन कर सके तथा इसके अनुसार सही निर्णय ले सके।
नेतृत्वकर्ता में पहल करने की क्षमता होनी चाहिए। एक अच्छा अनुयायी ही एक अच्छा नेतृत्वकर्ता होता है।

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