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अध्याय- 18 नीतिशास्त्र : प्रशासकों की अभिवृत्ति

नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC


प्रशासकों की राजनीतिक एवं नैतिक अभिवृत्ति

 किसी मनोवैज्ञानिक विषय जैसे व्यक्ति, वस्तु, स्थान या विचार के प्रति सकारात्मक  अथवा नकारात्मक दृष्टिकोण अभिवृत्ति कहलाता है। जैसे - किसी व्यक्ति के प्रति सकारात्मक होना।

अभिवृत्ति के तीन मुख्य घटक है:-

(1) भावनात्मक पक्ष:- जब व्यक्ति किसी मनोवैज्ञानिक विषय के संपर्क में आता है या उसके बारे में सोचता है तक जिस प्रकार की भावनाएं उत्पन्न होती है वैसी ही अभिवृत्ति बन जाती है। जैसे यदि कोई व्यक्ति किसी शहर से गुजरता है और उसके मन में अच्छे विचार आते हैं तब उस शहर के प्रति अभिवृत्ति सकारात्मक होगी।

(2) संज्ञानात्मक पक्ष:- अभिवृत्ति का निर्धारण इस बात से होता है कि  मनोवैज्ञानिक विषय के बारे में किस प्रकार की सूचनाएं उपलब्ध है। यदि सकारात्मक सूचनाएं उपलब्ध है तब अभिवृत्ति भी सकारात्मक होगी और यदि नकारात्मक सूचनाएं उपलब्ध है तो अभिवृत्ति भी नकारात्मक होगी।

(3) व्यवहारात्मक पक्ष:-  अभिवृत्ति का निर्धारण इस बात से भी होता है कि मनोवैज्ञानिक विषय के संपर्क में आने पर व्यक्ति किस प्रकार का व्यवहार करता है।
                  यह आवश्यक नहीं है कि तीनों घटक एक साथ उपस्थित हो। कई मामलों में भावनात्मक तथा संज्ञानात्मक पक्ष तो उपस्थित होते हैं परंतु व्यवहारात्मक पक्ष उपस्थित नहीं होता है।

अभिवृत्ति तीन प्रकार की होती है:-
(1) सकारात्मक अभिवृत्ति
(2)नकारात्मक अभिवृत्ति
(3)सकारात्मक व नकारात्मक दोनों।

सामान्यतया अभिवृत्ति को सीखा जाता है परंतु कुछ मामलों में यह जन्मजात भी होती है।
अभिवृत्ति सामान्यतः स्थायी होती है। परंतु इसमें परिवर्तन भी किया जा सकता है।

अभिवृत्ति का संबंध मत, विश्वास, मूल्य तथा व्यवहार से होता है।

राजनीतिक अभिवृत्ति:-  

राजनीतिक विषय जैसे राजनीतिक दल,  उम्मीदवार, मुद्दों, विचारधारा, राजनीतिक संस्थाओं के प्रति सकारात्मक या नकारात्मक दृष्टिकोण राजनीतिक अभिवृत्ति कहलाता है।

राजनीतिक अभिवृत्ति के प्रकार:-

(1) परिवर्तनवादी :- ये वर्तमान की व्यवस्था से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं होते हैं। मुख्यतः सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को अधिक उठाते हैं। वर्तमान व्यवस्था को समाप्त करके नई व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं। इसके लिए हिंसा का भी समर्थन करते हैं।

(2) उदारवादी:- ये भी वर्तमान की व्यवस्था से संतुष्ट नहीं होते हैं तथा व्यवस्था में बड़े परिवर्तन चाहते हैं। परंतु यह हिंसा का समर्थन नहीं करते हैं ।

(3) नरमपंथी:- ये कुछ मामलों में वर्तमान व्यवस्था से संतुष्ट नहीं होते हैं। परंतु व्यवस्था में बड़े परिवर्तन के समर्थक नहीं होते हैं। छोटे-2 परिवर्तनों के समर्थक है।

(4) रूढ़िवादी:- ये वर्तमान व्यवस्था से संतुष्ट होते हैं तथा इसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं चाहते हैं। ये मुख्यतः सांस्कृतिक मुद्दों पर अधिक ध्यान देते हैं।

(5) प्रतिक्रियावादी:- ये वर्तमान व्यवस्था से संतुष्ट नहीं होते हैं तथा पुरानी व्यवस्था को स्थापित करना चाहते हैं इसके लिए हिंसा का भी समर्थन करते हैं।

सिविल सेवकों की राजनीतिक अभिवृत्ति:- 

राजनीतिक दृष्टिकोण से सिविल सेवक तटस्थ होने चाहिए क्योंकि भारत जैसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में सिविल सेवकों को विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ काम करना पड़ता है। परंतु चीन जैसे साम्यवादी व्यवस्था में सिविल सेवकों को साम्यवाद के प्रति प्रतिबद्ध माना गया है।
                 भारत में सिविल सेवकों का झुकाव किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा के प्रति नहीं होना चाहिए। किसी राजनीतिक दल को कोई चंदा नहीं दिया जाना चाहिए। राजनीतिक दल के प्रतीक को वाहन, कार्यालय, घर पर प्रदर्शित नहीं किया जाना चाहिए। सिविल सेवकों को  मत देने का अधिकार है परंतु मत प्राथमिकता को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। किसी राजनीतिक दल या नेता के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होना चाहिए। प्रतिबद्धता संविधान के प्रति होनी चाहिए।

 निम्नलिखित मूल्यों के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति होनी चाहिए:-
(1) धर्मनिरपेक्षता                   (2) समानता
(3) स्वतंत्रता                          (4) जनसहभागिता
 (5) सर्वोदय                          (6) लोकतंत्र
(7) विधि का शासन                (8) सत्ता का विकेंद्रीकरण

 राजनीतिक अभिवृत्ति को प्रभावित करने वाले कारक:-

(1) आर्थिक स्थिति:- यदि देश व व्यक्ति की आर्थिक स्थिति सशक्त है तब वह बड़े परिवर्तनों का समर्थन नहीं करता है। यदि आर्थिक स्थिति कमजोर है तो व्यवस्था में परिवर्तन का समर्थक होगा।

(2) आयु:- युवा व्यक्ति बड़े परिवर्तनों का समर्थक होता है क्योंकि वह एक अच्छे भविष्य की कल्पना करता है। जबकि वृद्ध व्यक्ति बड़े परिवर्तनों का समर्थक नहीं होता है क्योंकि वृद्ध व्यक्त के लिए नई व्यवस्था के अनुकूल बनना मुश्किल होता है।

(3) मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति:- यदि व्यक्ति आक्रामक प्रवृत्ति का है तब परिवर्तनवादी व प्रतिक्रियावादी विचारों का समर्थन करेगा। यदि व्यक्ति शांत प्रवृत्ति का है तब उदारवादी या नरमपंथी विचारों का समर्थन करेगा। यदि व्यक्ति अंतर्मुखी है तब बड़े परिवर्तनों का समर्थक नहीं होगा।

(4) परिवार:- यदि परिवार उदारवादी है तो व्यक्ति राजनीतिक विचारधारा के लिए स्वतंत्र होगा तथा उदारवादी विचारों का समर्थन करेगा परंतु यदि परिवार में सांस्कृतिक मूल्य अधिक सशक्त होते हैं। तब व्यक्ति रूढ़िवादी विचारधारा का समर्थन करता है।

(5) लिंग:- पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं संबंधी मुद्दे राजनीति में अधिक प्रभावी रहे हैं। जिसमें महिलाओं का आरक्षण, महिलाओं की सुरक्षा, समान वेतन आदि है। जो राजनीतिक दल इन मुद्दों का समर्थन करता है उस दल के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति होती है।

(6) धर्म:- जिन लोगों में धार्मिक आस्था अधिक होती है। उनके लिए धार्मिक मुद्दों का राजनीतिक महत्व होता है। जैसे - राम मंदिर, तीन तलाक।

इनके अतिरिक्त क्षेत्र, भाषा, जाति आदि भी महत्वपूर्ण राजनीतिक कारक है।

 सिविल सेवकों की नैतिक अभिवृत्ति:-

नैतिक मुद्दों के प्रति सकारात्मक और नकारात्मक दृष्टिकोण को नैतिक अभिवृत्ति कहा जाता है।

नैतिक अभिवृत्ति सकारात्मक नैतिक मूल्यों से प्रेरित होनी चाहिए।

भावनात्मक स्तर पर निम्नलिखित मूल्यों के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति होनी चाहिए:-
1. सहानुभूति
2. समानुभूति
3. करुणा
4. दया
5. जनसेवा
6. निःस्वार्थता
7. कर्तव्यपरायणता
8. भावनात्मक बुद्धिमत्ता
9. अंतरात्मा की आवाज सुनना

संज्ञानात्मक स्तर पर निम्नलिखित मूल्यों के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति होनी चाहिए:-
1. तार्किकता
2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण
3.अनासक्ति
4.सीखने की भावना

 व्यवहारात्मक स्तर पर निर्मित मूल्यों के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति होनी चाहिए:-
1 . कठोर परिश्रम
2. निष्काम कर्म
3. पारदर्शिता
4. नेतृत्व
5. निष्पक्षता
6. जवाबदेहिता
7. वस्तुनिष्ठता

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