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अध्याय- 3 नीतिशास्त्र : सुखवाद और उपयोगितावाद

नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC


सुखवाद  (Hedonism)

सुखवाद के प्रकार :-

(1) मनोवैज्ञानिक सुखवाद :-   प्रत्येक व्यक्ति जन्म से ही स्वार्थी है और स्वयं का सुख चाहता  है

(2) नैतिक सुखवाद :- चूंकि सभी लोग सुख चाहते है इसलिए सुख प्राप्त करने के लिए किए गए सभी कार्य नैतिक है।

(3) स्वार्थमूलक सुखवाद :-  व्यक्ति को स्वयं के सुख को प्राप्त करने के लिए कार्य करना चाहिए।

(4) परार्थमूलक सुखवाद :-  वे कार्य नैतिक है जिससे अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख सुनिश्चित होता हो।

(5) निकृष्ट सुखवाद :-  इनके अनुसार सुख में सिर्फ मात्रात्मक भेद होता है। गुणात्मक नहीं अर्थात सुख अधिक या कम हो सकता है यह उच्च कोटि और निम्न कोटि का नहीं होता है।

(6) उत्कृष्ट सुखवाद :- सुख में मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों प्रकार के भेदों को स्वीकार करते हैं। अर्थात सुख अधिक और कम हो सकता है और यह उच्च कोटि और निम्न कोटि का भी हो सकता है।

उपयोगितावाद  (Utilitarianism)

प्रमुख उपयोगितावादी विचारक :-
                                              (1) जेरेमी बेंथम
                                              (2) जे एस मिल

(1) जेरेमी बेंथम :- 

यह है एक उपयोगितावाद विचारक है अर्थात वे कार्य किए जाने चाहिए जो कि उपयोगी है ।

उपयोगिता का निर्धारण सुखवाद से किया जाता है।

यह मनोवैज्ञानिक सुखवाद , नैतिक सुखवाद और परार्थमूलक सुखवाद को स्वीकार करते हैं। अर्थात वे कार्य नैतिक है जिससे अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख सुनिश्चित होता हो।

 यहां मनोवैज्ञानिक सुखवाद तथा परार्थमूलक सुखवाद  विरोधाभासी है क्योंकि यदि व्यक्ति जन्म से ही स्वार्थी है तब वह अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख के लिए कार्य क्यों करेगा ?

         इस विरोधाभास को दूर करने के लिए बेंथम के द्वारा दबाव का सिद्धांत दिया गया। इसके अनुसार व्यक्ति चार प्रकार के बाहरी दबाव के कारण अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख के लिए कार्य करता है :-
(1) भौतिक दबाव - व्यक्ति की भौतिक क्षमता सीमित होती है।
(2) सामाजिक दबाव - व्यक्ति को समाज से प्रशंसा और निंदा प्राप्त होती है।
(3) राजनीतिक दबाव - राज्य के द्वारा कानून और नियमों का निर्माण किया जाता है और दंड व प्रशंसा का प्रावधान किया जाता है।
(4) धार्मिक दबाव - धर्म में स्वर्ग - नरक , पाप -पुण्य जैसी अवधारणाएं हैं। ईश्वर व्यक्ति के प्रत्येक कार्य को देख रहा है।

बेंथम  एक निकृष्ट सुखवादी है अर्थात सुखवाद  में सिर्फ मात्रात्मक भेद को ही स्वीकार करता है

सुख की मात्रा की गणना की जा सकती है और इसके लिए बेंथम ने  सुख कलन का सिद्धांत दिया।

सुख को सात कारकों के आधार पर मापा जा सकता है :-
(A) अवधि
(B) तीव्रता
(C)निश्चितता
(D) शुद्धता - सुख में दुख का मिश्रण नहीं होना चाहिए ।
(E) उत्पादकता - सुख का परिणाम भी सुख होना चाहिए।
(F) व्यापकता - अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख सुनिश्चित होना चाहिए ।
(G) निकटता

(2) जे एस मिल :- 

यह एक उपयोगितावादी विचारक है अर्थात वे कार्य किए जाने चाहिए जो कि उपयोगी है । उपयोगिता का निर्धारण सुखवाद से किया जाता है।

यह मनोवैज्ञानिक सुखवाद , नैतिक सुखवाद और परार्थमूलक सुखवाद को स्वीकार करता है अर्थात वे कार्य नैतिक है जिससे अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख सुनिश्चित होता हो।
   
यहां मनोवैज्ञानिक सुखवाद और परार्थमूलक सुखवाद  के बीच एक विरोधाभास है। इसे दूर करने के लिए इसने दबाव के सिद्धांत को अपनाया।
                       बेंथम के द्वारा दिए गए चार बाहरी दबाव को स्वीकार किया तथा इसके अतिरिक्त इसने एक  पांचवा आंतरिक दबाव भी स्वीकार किया है क्योंकि जब व्यक्ति अन्य लोगों को दुख में देखता है तो उसे पीड़ा होती है और इसलिए वह अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख के लिए कार्य करता है।

मिल एक उत्कृष्ट सुखवादी है क्योंकि यह सुख में मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों प्रकार के भेदों को स्वीकार करता है।

मिल का प्रसिद्ध कथन है -
"संतुष्ट सूअर से असंतुष्ट मनुष्य अधिक बेहतर है और संतुष्ट मुर्ख से असंतुष्ट सुकरात अधिक बेहतर है।"

 उपयोगितावाद की आलोचना -

(A ) अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख सुनिश्चित करने से अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा नहीं की जा सकती  ।
(B) सुख को मापा नहीं जा सकता यह एक आत्मनिष्ठ अवधारणा है।
(C) दबाव में किए गए कार्यों को नैतिक नहीं कहा जा सकता है।
(D) यदि व्यक्ति सुख के बारे में सोचता है तब वह कभी भी सुख प्राप्त नहीं कर सकता।

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