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शेखावाटी किसान आंदोलन



शेखावाटी किसान आंदोलन

जयपुर रियासत के पश्चिमी भाग (शेखावाटी क्षेत्र) में किसान आंदोलन हुए।
जयपुर में कछवाहा वंश का शासन था। इस वंश की शेखावत शाखा ने पश्चिम भाग में शासन किया था इसलिए इस क्षेत्र का नाम शेखावाटी क्षेत्र पड़ गया।

शेखावाटी क्षेत्र के दो प्रमुख ठिकाने थे -

1. सीकर - अर्द्ध स्वतंत्र राज्य

2. पंचपाने (झुंझुनू) - नवलगढ़, डूंडलोद, मंडावा, बिसाऊ, मलसीसर

जाट किसानों की अधिक आबादी के कारण शेखावाटी क्षेत्र के किसान आंदोलनों को जाट किसान आंदोलन कहा जाता है।

1922 में सीकर में सामंत राव राजा कल्याण सिंह के समय आंदोलन शुरू हुआ।

कारण - 1. भू-राजस्व अधिक लिया जा रहा था।
2. अकाल के समय लगान में रियायत नहीं दी जाती थी।
3. लाटा-कून्ता (लुटेरी व्यवस्था)
4. असिंचित भूमि पर भी सिंचित भूमि के समान टैक्स लिया जा रहा था।
5. भूमि बंदोबस्त में जरीब की लंबाई 165 फीट से घटाकर 82.5 फीट कर दी गई। (जरीब - भूमि नापने की रस्सी)
6. एक नया कर इजाफा लगाया गया जिसके तहत प्रति बीघा भूमि पर 2 आना कर बढ़ा दिया गया।
7. जकात कर बढ़ा दिया गया।
8. बेगार प्रथा
9. किसानों के साथ जातीय भेदभाव किया जाता था।

राजस्थान सेवा संघ के तत्कालीन सचिव रामनारायण चौधरी और हरि ब्रह्मचारी ने आंदोलन का नेतृत्व किया और रामनारायण चौधरी ने तरुण राजस्थान समाचार पत्र के माध्यम से आंदोलन का प्रचार-प्रसार किया।

सीकर ठिकाने ने रामनारायण चौधरी को निष्कासित कर दिया और तरुण राजस्थान पर प्रतिबंध लगा दिया।

 रामनारायण चौधरी के प्रयासों से आंदोलन की खबरें लंदन के डेली हेराल्ड नामक समाचार पत्र में प्रकाशित हुई। साथ ही पैट्रिक लॉरेंस ने हाउस ऑफ कॉमंस में आंदोलन का मुद्दा उठाया।

भरतपुर के किसान नेता ठाकुर देशराज इस आंदोलन से जुड़े और 1931 में राजस्थान जाट क्षेत्रीय महासभा का गठन किया।

1932 में झुंझुनू में अखिल भारतीय जाट महासभा का अधिवेशन हुआ।

1933 में पलथाना (सीकर) में राजस्थान क्षत्रिय महासभा का पहला अधिवेशन हुआ।

20 जनवरी 1934 को बसंत पंचमी के अवसर पर ठाकुर देशराज ने जाट प्रजापति महायज्ञ का आयोजन करवाया।
यज्ञ के पुरोहित - खेमराज शर्मा
यज्ञमान - कुंवर हुकुम सिंह

 दीनबंधु सर छोटूराम चौधरी (पंजाब प्रांत) और रतन सिंह (भरतपुर) के प्रयासों से 15 मार्च 1935 को किसानों एवं सामंत के बीच समझौता हो गया।

1938 में जमनालाल बजाज  जयपुर प्रजामंडल के अध्यक्ष बने और प्रजामंडल ने आंदोलन को नैतिक समर्थन प्रदान किया।

1947 में उत्तरदायी सरकार के गठन होने पर किसानों की मांगे मान ली गई।
उत्तरदायी सरकार के मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री और राजस्व मंत्री टीकाराम पालीवाल थे।

 सरदार हरलाल सिंह, नेतराम सिंह, पन्ने सिंह, मास्टर चंद्रभान सिंह, तारकेश्वर शर्मा, नरोत्तम लाल जोशी सीकर किसान आंदोलन के स्थानीय नेता थे।
तारकेश्वर शर्मा ग्राम नामक एक हस्तलिखित समाचार पत्र निकालते थे।
साथ ही तारकेश्वर शर्मा ठाकुर देशराज के साथ मिलकर आगरा से गणेश नामक समाचार पत्र निकालते थे।

नरोत्तम लाल जोशी द्वारा शेखावाटी जकात आंदोलन का नेतृत्व किया गया।
नरोत्तम लाल जोशी राजस्थान विधानसभा के प्रथम अध्यक्ष बने थे।

1918 में मास्टर प्यारेलाल गुप्ता ने चिड़ावा (झुंझुनू) में अमर सेवा समिति की स्थापना की।
मास्टर प्यारेलाल गुप्ता को चिड़ावा का गांधी कहा जाता है।

अमर सेवा समिति के मुख्य कार्य -
1. अकाल राहत कार्य चलाए गए।
2. सामंती अत्याचारों का विरोध किया।
3. असहयोग आंदोलन में भाग लेकर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया।
4. शराबबंदी हेतु कार्य किया।

कटराथल सम्मेलन (सीकर)
सिहोट के सामंत मानसिंह ने सोतिया का बास नामक गांव की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया जिसके विरोध में 10,000 से अधिक महिलाओं ने 25 अप्रैल 1934 को कटराथल में सम्मेलन आयोजित किया।
इस सम्मेलन की अध्यक्षा - किशोरी देवी (सरदार हरलाल सिंह की पत्नी) तथा मुख्य वक्ता उत्तमा देवी (ठाकुर देशराज की पत्नी) थी।

कूदन हत्याकांड (सीकर) - 25 अप्रैल 1935

धापी देवी के कहने पर किसानों ने लगान देने से मना कर दिया। कैप्टन वेब ने फायरिंग करवा दी जिसमें चेतराम,  तुलसीराम, टीकूराम और आशाराम नामक 4 किसान शहीद हो गए। इस घटना को कूदन हत्याकांड कहा जाता है।
लंदन के हाउस ऑफ कॉमंस में इस हत्याकांड की चर्चा हुई।


जयसिंहपुरा हत्याकांड (झुंझुनू) - 21 जून 1934

डूंडलोद के सामंत के भाई ईश्वर सिंह नेे किसानों पर फायरिंग कर दी।
यह पहला किसान हत्याकांड था, जिसमें हत्यारों को सजा मिली थी।

खूडी हत्याकांड - 22 मार्च 1935
यह हत्याकांड बारात के समय हुआ।

कैप्टन वेब ने 28 अप्रैल 1935 को गोठडा भूकरका/पलथाना में फायरिंग करवा दी।

हनुमानपुरा कांड -16 मई 1934 को किसानों के घरों में आग लगा दी गई।

1939 के आस-पास जयपुर के हिंडौन और तोरावाटी खालसा क्षेत्रों में भी आंदोलन किए गए।
सीकर में नीमकाथाना के आस-पास के क्षेत्र को तंवर शासकों के कारण तोरावाटी कहा जाता है।

1945 में जयपुर के उणियारा ठिकाने की बैरवा जाति ने नागरिक असमानता विरोधी आंदोलन चलाया।

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