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अध्याय- 6 नीतिशास्त्र : आत्मपूर्णतावाद

 नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC



नीतिशास्त्र में आत्मपूर्णतावाद

(Perfectionism )

प्रमुख आत्मपूर्णतावादी विचारक :-
                                            (1) हीगल
                                             (2) ब्रेडले

(1)  हीगल :-

हीगल के अनुसार जगत का मूल तत्व पूर्ण चैतन्य है , हीगल इसे निरपेक्ष प्रत्यय कहता है ।
यह जड़ तत्व, वनस्पति, पशु, पक्षी आदि में उपस्थित है परंतु इन सब में निरपेक्ष प्रत्यय के विकास का स्तर अलग-2 है। जड़ तत्व में यह सुषुप्त अवस्था में है तथा अन्य सभी में अधिक जागृत अवस्था में है।

विकास की प्रक्रिया निरंतर चल रही है यह प्रक्रिया वर्तमान में मनुष्य  तक पहुंची है । जब निरपेक्ष प्रत्यय पूर्ण रूप से जागृत होता  है, तो इस अवस्था को ईश्वर कहा जाता है अर्थात ईश्वर मनुष्य की ही अधिक जागृत अवस्था है।


हीगल के अनुसार नैतिकता के तीन स्तर होते हैं :-
(A)  आरंभिक अवस्था :- इस अवस्था में व्यक्ति, व्यक्तिगत हितों और  सामाजिक हितों को विरोधाभासी मानता है तथा व्यक्तिगत हितों को अधिक वरीयता देता है। सामाजिक हितों की अवहेलना करता है। सामाजिक हितों की पूर्ति के लिए राज्य के द्वारा दंड या पुरस्कार का प्रावधान किया जाता है।

(B) अंतः प्रेरणा की अवस्था :-  इस अवस्था में व्यक्ति को ज्ञान हो जाता है कि व्यक्तिगत हित और सामाजिक हित विरोधाभासी नहीं है और सामाजिक हितों से ही व्यक्तिगत हितों की पूर्ति होती है। अतः वह स्वप्रेरणा से सामाजिक हितों के लिए कार्य करता है। परंतु इस अवस्था में भी व्यक्ति, व्यक्तिगत हितों के बारे में भी जागरूक रहता है। इसलिए यह आत्मपूर्णता की अवस्था नहीं है।

(C) अंतिम अवस्था :- यह आत्मपूर्णता की अवस्था है। यहां सामाजिक हित स्वतः साध्य  हो जाते हैं इसलिए व्यक्ति सिर्फ  सामाजिक हितों के लिए कार्य करता है उसे व्यक्तिगत हितों का ज्ञान भी नहीं होता।

हीगल का द्वंद्वात्मक सिद्धांत :- 

विकास  की प्रक्रिया को समझाने के लिए हीगल ने द्वंद्वात्मक सिद्धांत का प्रयोग किया ।
इसके अनुसार शुरुआती स्तर पर कोई वस्तु विचार या व्यवस्था वाद (Thesis) कहलाती है । उसमें कुछ कमियां होती है इसलिए एक प्रतिवाद (Anti- thesis) अस्तित्व में आता है। इनके बीच संघर्ष होता है तथा विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तथा संवाद (Synthesis) अस्तित्व में आता है ।

अगले स्तर के लिए संवाद पुनः वाद बन जाता है। इसकी कमियों के कारण प्रतिवाद अस्तित्व में आता है। विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और फिर से संवाद अस्तित्व में आता है यह प्रक्रिया तब तक चलती रहेगी जब तक की पूर्णता को प्राप्त नहीं कर लिया जाएगा।

राज्य के अस्तित्व को समझाने के लिए हीगल ने द्वंद्वात्मक सिद्धांत का प्रयोग किया । सर्वप्रथम परिवार अस्तित्व में आता है इसमें परार्थ तथा सीमितता के गुण होते हैं। इसमें कमियों के कारण समाज अस्तित्व में आता है जिसमें स्वार्थ और सार्वभौमिकता के गुण होते हैं। इनके बीच द्वंद्व  के कारण विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और राज्य अस्तित्व में आता है जिसमें परार्थ और सार्वभौमिकता दोनों ही गुण होते हैं। इसलिए राज्य एक पूर्ण नैतिक संस्था है ।
हीगल के अनुसार राज्य धरती पर ईश्वर का अवतार है।
Note- कार्ल मार्क्स द्वारा भी द्वंद्वात्मक सिद्धांत का प्रयोग किया गया परंतु उसने  इसका प्रयोग भौतिकतावाद के लिए किया।

हीगल के प्रमुख कथन :-
(A) "जीने के लिए मरो" 
इस कथन का प्रयोग ईसाई धर्म में किया गया जहां इसका अर्थ था कि शारीरिक पक्ष का दमन किया जाना चाहिए तथा आध्यात्मिक पक्ष को विकसित किया जाना चाहिए। परंतु हीगल के अनुसार मनुष्य में बुद्धि और भावनाएं दोनों ही होती है। यहां जीने का अर्थ है भावनात्मक पक्ष का दमन
(B) "मनुष्य बनो और अन्य मनुष्यों का सम्मान करो।" 
मनुष्य का भावनात्मक पक्ष उसे पशुता की ओर ले जाता है। जबकि बौद्धिक पक्ष उसे मनुष्यता की ओर ले जाता इसलिए मनुष्य बनने का अर्थ है बौद्धिक पक्ष का विकास तथा भावनात्मक पक्ष का दमन

 (2) ब्रेडले :- 

इसके अनुसार जगत का परम तत्व पूर्ण चैतन्य है ।

बौद्धिकता के विकास से आत्मपूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है। आत्मपूर्णता की अवस्था पूर्ण नैतिकता की अवस्था है। इस अवस्था में व्यक्ति सिर्फ सामाजिक हितों के लिए कार्य करता है।
 ब्रेडले के अनुसार आत्म सिद्धि और आत्म त्याग में कोई अंतर नहीं है।

"मेरा स्थान मेरा कर्तव्य" यह ब्रेडले के  निबंध का शीर्षक है। ब्रेडले  के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की क्षमताएं,  भावनाएं, इच्छाएं अलग-2 होती है। व्यक्ति को इन क्षमताओं को पहचानना चाहिए और उसी के अनुसार समाज में अपनी भूमिका को तैयार करना चाहिए। एक बार भूमिका के निर्धारण के बाद पूर्ण निष्ठा से अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
          समाज में कोई भी भूमिका छोटी या बड़ी नहीं होती सामाजिक विकास के लिए सभी भूमिकाओं का अपना एक महत्व है जिस प्रकार एक मशीन के कार्य करने में सभी विकल्पों का योगदान होता है उसी प्रकार समाज में भी सभी का योगदान होता है।

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