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अलवर एवं भरतपुर के किसान आंदोलन



अलवर एवं भरतपुर के किसान आंदोलन

अलवर में 20% जागीर भूमि तथा 80% खालसा भूमि थी।
अलवर में खालसा क्षेत्र में दो आंदोलन हुए -

1. नींमूचणा किसान आंदोलन - 1924-25
राजपूत किसानों द्वारा किया गया।

2. मेव किसान आंदोलन - 1932-34
मेव किसानों द्वारा किया गया।

  नींमूचणा आंदोलन - 1924-25


अलवर में तीन भूमि बंदोबस्त किए गए -
पहला - 1876 में - पाउलेट द्वारा
दूसरा -  1900 में - डायर द्वारा
तीसरा - 1924 में - N L Tikko द्वारा
तीसरे भूमि बंदोबस्त में भू-राजस्व 40% बढ़ा दिया गया।
राजा द्वारा राजपूत और ब्राह्मण किसानों के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए।

अक्टूबर 1924 में राजपूत किसानों ने बानसूर एवं थानागाजी क्षेत्र में आंदोलन शुरू किया।
प्रमुख नेता - माधोसिंह, गोविंद सिंह, अमर सिंह, गंगा सिंह

जनवरी 1925 में दिल्ली में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अधिवेशन में 200 राजपूत किसानों ने पुकार नामक पर्चे के माध्यम से अपनी समस्याओं से अवगत कराया।

अलवर महाराजा जयसिंह के समक्ष किसानों ने अपनी मांगे रखी -
1. बढ़ा हुआ भू-राजस्व कम किया जाए।
2. जिन लोगों के पशु सार्वजनिक चारागाह में चरने नहीं जाते हैं उनसे चराई कर ना लिया जाए।
3. बेगार ना ली जाए।
4. माफी की भूमि जब्त नहीं की जाए।
5. आरक्षित क्षेत्र (रोध) में जंगली सूअर को मारने की अनुमति दी जाए।

राजा ने किसानों की मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया।

7 मई 1925 को राजा ने जनरल रामभद्र ओझा को किसानों को समझाने के लिए नींमूचणा (बानसूर, अलवर) भेजा परंतु बात नहीं बनी।

14 मई 1925 को छाजू सिंह ने किसानों की सभा पर फायरिंग कर दी। इस हत्याकांड में 156 किसान शहीद हो गए और 39 किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया।

गांधीजी ने अपने यंग इंडिया समाचार पत्र में इस घटना को जलियांवाला हत्याकांड से भी वीभत्स बताया और इसे दोहरी डायरशाही की संज्ञा दी। (Dyrism double distilled)

रियासती समाचार पत्र ने इस हत्याकांड की तुलना जलियांवाला हत्याकांड से की।

31 मई 1925 को राजस्थान सेवा संघ के तरुण राजस्थान समाचार पत्र में इस घटना को सचित्र प्रकाशित किया गया।

राजस्थान सेवा संघ ने संपूर्ण घटनाक्रम का पता लगाने के लिए कन्हैयालाल कलंत्री, हरिभाई किंकर, लादूराम जोशी को भेजा।

वल्लभ भाई पटेल ने बॉम्बे में एक सभा में इस हत्याकांड की सार्वजनिक आलोचना की।

भरुचा ने कहा कि राजा जयसिंह आपको प्रतिदिन रूसी क्रांति को याद रखना चाहिए।

राष्ट्रीय स्तर पर मणिलाल कोठारी की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई, जिसके सचिव रामनारायण चौधरी थे।
रामनारायण चौधरी ने सर्वप्रथम इस घटना को हत्याकांड कहा

राजा जयसिंह ने 3 सदस्यीय जांच आयोग गठित किया जिसके सदस्य छाजू सिंह, लाला रामचरण और सुल्तान सिंह थे।

18 नवंबर 1925 को राजा स्वयं नींमूचणा गए और किसानों से बात की। पुराना भूमि बंदोबस्त लागू कर दिया गया और गिरफ्तार किसान नेताओं को छोड़ दिया गया और जिन परिवारों को जन हानि हुई उन्हें ₹128 मुआवजा दिया गया।
इस प्रकार यह आंदोलन समाप्त हो गया।

कुछ इतिहासकार इस आंदोलन को केवल राजपूत किसानों का आंदोलन मानते हैं और उनके अनुसार इस आंदोलन में राष्ट्रीय भावना का अभाव था।

मेव किसान आंदोलन - 1932-34


अलवर, भरतपुर, गुड़गांव (तत्कालीन पंजाब) के क्षेत्र में मेव किसान रहते थे इसलिए इस क्षेत्र को सम्मिलित रूप से मेवात कहा जाता था।
ये मेव पूर्व में हिंदू थे, जिनके पूर्वजों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था परंतु इन्होंने अपनी जीवनशैली में हिंदू  तौर-तरीकों को ही अपनाया हुआ था।

1932 में अलवर में तिजारा, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, किशनगढ़ क्षेत्र के मेव किसानों ने आंदोलन शुरू कर दिया।
इनकी निम्नलिखित मांगे थी -

1. भू-राजस्व कम किया जाए।
2. अकाल के समय भू-राजस्व में छूट दी  जाए।
3. आयात-निर्यात कर में कमी की जाए।
4. बेगार समाप्त की जाए।
5. जंगली सूअरों की समस्या को समाप्त किया जाए।
6. सार्वजनिक कार्य के लिए भूमि अधिग्रहण पर किसानों को क्षतिपूर्ति दी जाए।

अंजुमन खादिम उल इस्लाम (स्थापना 1923) और जमीयत तबलीग उल इस्लाम (स्थापना 1927) नामक संगठनों ने किसानों का साथ दिया और 4 अतिरिक्त मांगे रखी गई -
1. मस्जिदों को सरकारी नियंत्रण से बाहर किया जाए।
2. राज्य में उर्दू को बढ़ावा दिया जाए।
3. राजकीय नौकरियों में मुसलमानों की संख्या बढ़ाई जाए।
4. मुसलमानों के लिए अलग से स्कूलें खोली जाए।

इस प्रकार आंदोलन सांप्रदायिक हो गया और इसने हिंसक रूप धारण कर लिया।

यासीन खां (गुड़गांव), सैय्यद भीक नारंग (अम्बाला), मोहम्मद अली (अलवर) के नेतृत्व में काउंसिल ऑफ एक्शन का गठन किया गया।

आंदोलन के बढ़ने पर राजा ने एक आयोग भेजा जिसके सदस्य दुर्जन सिंह, गजनाफर अली और गणेशी लाल थे।
किसानों ने आयोग का बहिष्कार किया और किशनगढ़ के नाजिम पर हमला कर दिया।
परिस्थितियां बेकाबू होने के कारण 1933 में अंग्रेजों ने हस्तक्षेप किया और राजा जयसिंह को हटा दिया गया।
राजा जयसिंह पेरिस (फ्रांस) चले गए और कालांतर में वहीं पर उनकी मृत्यु हो गई।

अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में सुधार लागू किए -
1. मेवात क्षेत्रों के लिए एक विशेष अधिकारी नियुक्त किया जाएगा।
2. लगान कम कर दिया गया।
3. आयात-निर्यात कर को कम कर दिया गया।
4. आरक्षित क्षेत्रों (रोधों) की संख्या कम कर दी गई।

भरतपुर किसान आंदोलन

1933 में भरतपुर में किसानों ने आंदोलन कर दिया।

प्रमुख मांगे - 1. भू-राजस्व में कमी की जाए।
2. आबियाना (सिंचाई कर) में कमी की जाए।
3. राजकीय नौकरियों में मुसलमानों की संख्या बढ़ाई जाए।

किसानों की मांगे मान ली गई। रबी की फसल पर लगान कम कर दिया गया और मेवात क्षेत्र से संबंधित सिफारिशों के लिए  काजी अजीजुद्दीन बिलग्रामी की अध्यक्षता में राज्य कौंसिल का गठन किया गया।

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