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मारवाड़ किसान आंदोलन



मारवाड़ किसान आंदोलन


मारवाड़ राजस्थान की सबसे बड़ी रियासत थी। यह राजस्थान के 26% क्षेत्र में फैली हुई थी। मारवाड़ रियासत की राजधानी जोधपुर होने के कारण इसे जोधपुर रियासत भी कहा जाता है।

NOTE - मारवाड़ रियासत में 87% भूमि जागीर भूमि थी जो कि जागीरदारों के नियंत्रण में थी। जबकि 13% खालसा भूमि थी, जिस पर राजा का नियंत्रण होता था।

अतः जागीर भूमि होने के कारण यहां के किसानों पर तिहरा नियंत्रण था। (अंग्रेज, राजा, जागीरदार)

1930-31 में मारवाड़ किसान आंदोलन शुरू हुआ था जिसके निम्नलिखित कारण थे -
1. किसानों पर तिहरा नियंत्रण था।
2. जागीरदारों का नियंत्रण अधिक था, क्योंकि उनके पास भूमि अधिक थी।
3. अनेक प्रकार के टैक्स लिए जा रहे थे। (लगभग 136 प्रकार के)
4. भूमि बंदोबस्त - 1921 से 26 के दौरान खालसा क्षेत्रों में भूमि बंदोबस्त कराए गए थे। जिनके तहत नकद भू-राजस्व लेने का प्रावधान किया गया था।
बीगोडी - भू-राजस्व नकदी में लेने की व्यवस्था।
बीगोडी की दर अत्यधिक थी जिसके कारण किसानों में असंतोष था।
5. गौडवाड क्षेत्र (बाली, पाली) के एकी आंदोलन का प्रभाव
6. शेखावाटी किसान आंदोलन का प्रभाव (नागौर पट्टी प्रभावित)
7. आर्थिक मंदी -1929 ई.
8. 1931 में अकाल के दौरान भी टैक्स में छूट नहीं दी जा रही थी।
9. बेगार प्रथा।
10. कुछ राजनीतिक संगठनों द्वारा किसानों में जागरूकता का संचार । जैसे - मारवाड़ हितकारिणी सभा, मारवाड़ सेवा संघ।

सर्वप्रथम मंडौर की माली जाति के किसानों ने आंदोलन की शुरूआत की। और बीगोडी में 50% की छूट की मांग की।
कुछ हद तक किसानों की मांग को स्वीकार कर लिया गया और अकाल के समय लगान में राहत (50% नहीं) देकर किसानों को संतुष्ट कर दिया गया।

1927 में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना बॉम्बे में की गई।

1929 में मारवाड़ में मारवाड़ देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना की गई।

24-25 नवंबर 1931 को पुष्कर में चांदकरण शारदा की अध्यक्षता में मारवाड़ देशी राज्य लोक परिषद की पहली बैठक आयोजित की गई।
इस बैठक द्वारा निम्न मांगे रखी गई -

1.  बीगोडी में कमी की जाए और बेगार को समाप्त किया जाए।
2. जागीरदारों के न्यायिक अधिकारों को समाप्त किया जाए।
3. पंचायतों की स्थापना की जाए।
4. किसानों के कल्याण के लिए समिति बनाई जाए।
5. किसानों को भूमि स्वामित्व दिया जाए।

26 नवंबर 1931 को बाई जी का मंदिर,जोधपुर  में शिव करण जोशी की अध्यक्षता में बैठक की गई।
इस बैठक द्वारा निम्न मांगे रखी गई -

1.  बीगोडी में कमी की जाए और बेगार को समाप्त किया जाए।
2. अकाल के समय लगान कम लिया जाए।

2 अप्रैल 1932 को डांगावास गांव, नागौर के किसानों ने राजा के सामने अपनी मांगे रखी -
उपरोक्त मांगों के अलावा इन्होंने लाग-बाग को समाप्त करने की मांग रखी। (बुवाई लाग, घासमरी कर)

29 मार्च से 30 अप्रैल 1932 के बीच किसानों ने जमीन के पट्टे वापिस राजा को सौंप दिए और जिन किसानों ने ऐसा नहीं किया उन्होंने बीगोडी जमा नहीं करवाई।

1936 में किसानों के साथ समझौता किया गया और 119 प्रकार की लागतें समाप्त कर दी गई। 
आंदोलन सुषुप्त अवस्था में चला गया।

1938 में मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना की गई और  आंदोलन वापस शुरू किया गया जिसके निम्नलिखित कारण थे -
1. 1936 में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के पांचवे अधिवेशन में नेहरु जी ने नेताओं द्वारा जनसंपर्क करने पर बल दिया।
2. 1938 में सुभाष चंद्र बोस जोधपुर की यात्रा पर आए और गिरदीकोट में सभा को संबोधित किया।
इसी वर्ष कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता में कांग्रेस द्वारा देशी राज्यों के आंदोलनों को समर्थन दिया गया

मारवाड़ लोक परिषद ने निम्नलिखित मांगे रखी -
1. अकाल राहत नीति की आलोचना की
2. युद्ध सहायता कर का विरोध किया
3. अवैध लाग-बाग का विरोध किया
अवैध लाग-बाग की जांच के लिए एक समिति का गठन किया गया और जयनारायण व्यास ने गैरजरूरी लागतें नामक पुस्तक लिखी।
4. उत्तरदायी शासन की मांग की गई।

राजा के समर्थन पर बलदेव राम मिर्धा ने मारवाड किसान सभा की स्थापना की।
मारवाड़ किसान सभा के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता मंगल सिंह कच्छावा ने की।
मारवाड़ किसान सभा ने मारवाड़ लोक परिषद का विरोध किया। इसके अनुसार -
1. मारवाड़ लोक परिषद के सभी नेता शहरी वर्ग से हैं।
2. यह उच्च जातीय संगठन है।
3. इसके नेताओं का किसानों और दलितों से कोई तालमेल नहीं है।
4. इस संगठन ने उत्तरदायी शासन की मांग नहीं की।
5. जागीरदारी शोषण का विरोध किया। इस कारण राजा ने संगठन को समर्थन दिया।

1945 में मारवाड़ किसान सभा ने जोधपुर में एक किसान सम्मेलन आयोजित करवाया। जिसमें सर छोटूराम चौधरी जैसे बड़े-2 नेताओं के साथ-साथ जोधपुर महाराजा ने भी भाग लिया। मारवाड़ किसान सभा ने अहिंसक आंदोलन एवं न्यायालय के माध्यम से अपनी मांगे मनवाने पर बल दिया।

चंडावल घटना (पाली) - 28 मार्च 1942

मारवाड़ लोक परिषद इस दिन उत्तरदायी शासन दिवस मना रही थी। सामंत ने बैठक पर लाठीचार्ज करवा दिया।
अगले दिन निमाज नामक स्थान पर भी किसानों की बैठक पर सामंत ने लाठीचार्ज करवा दिया।
गांधी जी ने हरिजन समाचार पत्र में इस घटना की आलोचना की।
गांधी जी ने समझौता करवाने के लिए अपना एक प्रतिनिधि श्रीप्रकाश भेजा।

डाबड़ा कांड (नागौर) - 13 मार्च 1947

मोतीराम जी किसान के घर पर लोक परिषद और किसान सभा की संयुक्त बैठक पर डीडवाना के सामंत ने लाठीचार्ज करवा दिया।
लाठीचार्ज में 6 किसान शहीद हो गए और प्रजामंडल के बड़े नेता मथुरादास माथुर घायल हो गए। इस घटना के बाद यहां पर जागीरदार और किसानों के बीच संघर्ष शुरू हो गया।

1948 में उत्तरदायी सरकार का गठन किया गया।
जयनारायण व्यास को मुख्यमंत्री तथा नाथूराम मिर्धा को कृषि मंत्री बनाया गया और किसानों की मांगे मान ली गई।

1938 में जाट कृषक सुधारक सभा की स्थापना की गई।
इस संगठन ने 1941-42 में परबतसर मेला और रामदेवरा मेला के माध्यम से राजनीतिक चेतना लाने का प्रयास किया था।

मारवाड़ किसान आंदोलन अन्य किसान आंदोलनों से निम्न बातों को लेकर भिन्न था -
1. अधिक लाग-बाग
2. जागीरदारों ने संगठित प्रतिरोध किया।
लागतें समाप्त होने के बाद भी अवैध तरीके से लागतें लेते रहे।
3. संवैधानिक तरीके से आंदोलन।
4. स्वयं के राजनीतिक संगठन। जैसे - मारवाड़ लोक परिषद, मारवाड किसान सभा, जाट कृषक सुधारक सभा।
5. बाहरी संगठनों के सहयोग का अभाव।
6. मध्यम वर्ग के नेताओं ने आंदोलन संचालित किया। जैसे - जयनारायण व्यास, राधाकृष्ण तात।

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