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अध्याय- 4 नीतिशास्त्र : इमैन्युअल कांट

नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC


नीतिशास्त्र : इमैन्युअल कांट

 यह एक परिणाम निरपेक्षवादी नीतिशास्त्री है।

इसके अनुसार कार्यों का मूल्यांकन परिणाम के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। कार्य का मूल्यांकन संकल्प के आधार पर करना चाहिए।

 सामान्यतः संकल्प दो प्रकार के होते हैं:-
(1) शुभ संकल्प - वे संकल्प जोकि कर्तव्य चेतना से प्रेरित है।
(2) अशुभ  संकल्प - वे संकल्प जो की भावनाओं या लाभ-हानि से प्रेरित है ।

शुभ संकल्प से किए गए कार्य ही नैतिक होते हैं अर्थात वह वे कार्य नैतिक है जो  कि कर्तव्य प्रेरणा से किए गए हैं।

 इसका प्रसिद्ध कथन है -
"कर्तव्य कर्तव्य के लिए"

इमैन्युअल कांट के अनुसार नैतिक नियमों का पालन करना ही कर्तव्य है। नैतिक नियमों को निरपेक्ष आदेश के रूप में लिया जाना चाहिए।
यहां निरपेक्ष का अर्थ है कि नैतिक नियम परिणाम सापेक्ष नहीं होने चाहिए तथा नैतिक नियम देश , काल , परिस्थितियों के सापेक्ष नहीं होने चाहिए।

 नैतिक नियमों को आदेश के रूप में लिया जाना चाहिए । यह सलाह या  इच्छा के रूप में नहीं होते । इनका पालन कठोरता से किया जाना चाहिए।

नैतिक नियमों में किसी भी प्रकार का अपवाद स्वीकार नहीं किया जा सकता ।

निरपेक्ष आदेश साधन ना होकर स्वतः साध्य है ।

इसके अनुसार व्यक्ति के दो पक्ष होते हैं :-
(1)बौद्धिक पक्ष - यह व्यक्ति को कर्तव्य पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है।
(2)भावनात्मक पक्ष - यह व्यक्ति को कर्तव्य पथ से विचलित करता है। अतः व्यक्ति को भावनाओं को नियंत्रित करना चाहिए तथा बौद्धिक पक्ष को विकसित करना चाहिए।

नैतिकता के सूत्र :- 

नैतिक नियमों का निर्माण करते समय चार सूत्रों का पालन किया जाना चाहिए।

(1) सार्वभौमिकता का नियम - नैतिक नियम सार्वभौमिक होने चाहिए अर्थात यह देश , काल , परिस्थिति के सापेक्ष नहीं होने चाहिए। नैतिक नियमों में किसी भी प्रकार के अपवाद को नहीं किया जा सकता।

(2) मनुष्य को साध्य मानने का नियम - मनुष्य सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है। मनुष्यता, मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती है। अतः मनुष्यता का सम्मान किया जाना चाहिए। किसी भी नैतिक नियम में मनुष्य को साधन नहीं बनाया जाना चाहिए। मनुष्य अपने आप में ही एक साध्य हैं। इसी कारण कांट दास प्रथा का विरोध करता है।

(3) स्वाधीनता का नियम - प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है। अतः किसी पर भी बाहर से नैतिक नियम थोपे नहीं जा सकते। प्रत्येक व्यक्ति अपने नैतिक नियमों का निर्माण स्वयं करता है।

(4) स्वयं को साध्यों के राज्य का विधायक समझने का नियम - यह उपरोक्त तीनों सूत्रों का समन्वय है। यहां विधायक से अर्थ है स्वाधीनता का नियम। साध्य से अर्थ है मनुष्य को साध्य मानने का नियम और राज्य से अर्थ है सार्वभौमिकता का नियम।

नैतिकता की पूर्व मान्यताएं :- 

कांट के अनुसार नैतिकता की 3 पूर्व मान्यताएं हैं -

(1) संकल्प स्वातंत्र्य - इसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं लेता  है और इसलिए उसे उसके निर्णयों हेतु उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। संकल्प स्वातंत्र्य  के लिए नियतिवाद को नकारना आवश्यक है।
 संकल्प स्वातंत्र्य के लिए तीन शर्ते आवश्यक है :-                 
(A) विकल्पों की उपलब्धता
(B) कार्य करने की क्षमता
(C) परिणामों का ज्ञान

(2) आत्मा की अमरता का सिद्धांत - इसके  अनुसार नैतिकता के लिए आत्मा की अमरता और पुनर्जन्म के सिद्धांत को स्वीकार किया जाना चाहिए क्योंकि इससे व्यक्ति नैतिक बनने के लिए प्रोत्साहित होता है क्योंकि एक जीवन सीमित है तथा इसमें पूर्ण नैतिकता को प्राप्त नहीं किया जा सकता इसलिए हमें स्वीकार करना चाहिए कि आत्मा पुनर्जन्म लेती है तथा अगले जन्म में नैतिकता का स्तर वही होगा जहां पर वर्तमान जन्म समाप्त हुआ है।

(3) ईश्वर का अस्तित्व - कांट के अनुसार ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध नहीं किया जा सकता । कांट से पूर्व देकार्त नामक दार्शनिक ने ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए तर्क प्रस्तुत किए थे। परंतु नैतिकता की स्थापना के लिए ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया जाना चाहिए। इससे व्यक्ति कर्तव्य पथ पर चलने के लिए प्रेरित होता है।

 ईश्वर व्यक्ति को नैतिक बने रहने पर आनंद प्रदान करता है। आनंद सहित शुभ संकल्पों को पूर्ण संकल्प कहा जाता है।               
ईश्वरीय संकल्पों को पवित्र संकल्प कहा जाता है। ईश्वरीय संकल्प विशुद्ध रूप से बुद्धि से लिए गए संकल्प होते हैं । इनमें भावनाओं का अंश मात्र भी नहीं होता है।

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