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अध्याय- 7 नीतिशास्त्र : अस्तित्ववाद

नीतिशास्त्र, Ethics for UPSC


नीतिशास्त्र में अस्तित्ववाद

प्रमुख अस्तित्ववादी विचारक
                                (1) सोरेन किर्केगार्ड
                                (2) सार्त्र

(1) सोरेन किर्केगार्ड :-  

यह एक धार्मिक व्यक्ति था इसलिए इससे विचारों पर धर्म का प्रभाव परिलक्षित होता है।

इसने भौतिकवाद का विरोध किया । इसके अनुसार मनुष्य भौतिक वस्तुओं के पीछे भागता रहता है तथा उनसे सुख या संतुष्टि प्राप्त करने की कोशिश करता है। यहां तक कि मनुष्य ने अपनी पहचान भी भौतिक वस्तुओं से ही बना ली है।
            मनुष्य एक मशीन बनकर रह गया है। जिसमें भावनाओं और संवेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। इससे मनुष्य का अस्तित्व भी खतरे में आ गया है। अतः भौतिकतावाद  का विरोध किया जाना चाहिए तथा भावनाओं और संवेदनाओं का विकास किया जाना चाहिए।

इसके अनुसार जीवन के तीन मुख्य चरण होते हैं :-
(A) पहला चरण :-  इस चरण में व्यक्ति भौतिकतावादी होता है तथा भौतिक वस्तुओं से सुख प्राप्त करने की कोशिश करता है। परंतु शीघ्र ही उसे यह अहसास हो जाता है कि भौतिक वस्तुएं उसे संतुष्टि प्रदान नहीं कर सकती इसलिए वह दूसरे चरण में प्रवेश करता है।

(B) दूसरा चरण :- इस चरण में व्यक्ति सामाजिक हितों के लिए कार्य करता है। सामाजिक उत्थान से उसे सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है। परंतु यह प्रतिष्ठा भी उसे अधिक लंबे समय तक संतुष्ट नहीं रख सकती।

(C) तीसरा चरण :- यह आध्यात्मिकता का चरण है। जब व्यक्ति आध्यात्मिक विकास के लिए कार्य करता है तथा वह  धर्म और ईश्वर की ओर आकर्षित होता है। बहुत कम लोग इस अवस्था में पहुंच पाते हैं। इसी अवस्था में मानव अस्तित्व का पूर्ण विकास होता है।

(2) सार्त्र :-  

यह घोर व्यक्तिवादी विचारक है।

इसके अनुसार मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है तथा बाद में उसका सार निर्धारित होता है जो कि उसके निर्णय पर निर्भर करता है।

मनुष्य के अस्तित्व की रक्षा के लिए यह ईश्वर के अस्तित्व को नकार देता है क्योंकि धर्म में यह संकल्पना है कि मनुष्य का सार तत्व ईश्वर के मस्तिष्क में होता है।

मनुष्य प्रत्येक अवस्था में स्वतंत्र होता है। इसका प्रसिद्ध कथन है मनुष्य स्वतंत्र रहने के लिए अभिशप्त है अर्थात मनुष्य चाहकर भी स्वतंत्रता को त्याग नहीं सकता।

प्रत्येक परिस्थिति में मनुष्य के पास विकल्प उपलब्ध होते हैं तथा वह निर्णय ले सकता है।  जैसे यदि कोई व्यक्ति जेल में बंद है तब भी उसके पास विकल्प है कि वह जेल में बंद रहे या वहां से भाग जाए । यदि कोई व्यक्ति कहता है कि वह आदेशों का पालन कर रहा था तब भी उसके पास विकल्प था कि वह आदेशों का पालन करें या नहीं ।

निर्णयों के साथ उत्तरदायित्व जुड़े होते हैं जिसके कारण व्यक्ति भयभीत रहता है क्योंकि उसे लगता है कि उसे उसके निर्णयों के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा और इसीलिए वह निर्णयों से बचने की कोशिश करता है और इस कारण वह एक झूठा जीवन जीता है। इसी कारण उसका अस्तित्व खतरे में है।

सार्त्र पूंजीवाद की आलोचना करता है क्योंकि इससे मनुष्य की स्वतंत्रता बाधित होती है।

सार्त्र  के अनुसार जगत में दो प्रकार की सत्ताएँ है :-

(A) मनुष्य (Being) - यह सदैव स्वतंत्र है तथा अपने निर्णय स्वयं लेता है।

(B) वस्तु (Becoming ) - यह  परतंत्र है इसकी उपयोगिता मनुष्य के द्वारा निर्धारित की जाती है।

यदि कोई मनुष्य अपने निर्णय किसी और को लेने दे तब इसका अर्थ है कि वह मनुष्य वस्तु में परिवर्तित हो रहा है। अतः मनुष्य को अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए अपने निर्णय स्वयं लेने चाहिए ।

सार्त्र के अनुसार वे संबंध नैतिक है जिनमें टकराव होता है क्योंकि यदि व्यक्ति स्वतंत्र है तब स्वभाविक है कि दो लोगों के बीच में वैचारिक मतभेद हो। इसलिए टकराव स्वभाविक है। यदि टकराव नहीं हो रहा है तब इसका अर्थ है कि एक मनुष्य ने स्वयं को वस्तु में परिवर्तित कर दिया है जो कि अनैतिक है।

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